सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : रामदरश मिश्र की दो गजलें


चले जो, तो रस्ते सहारे हुए.
दिये खुद को तो सब हमारे हुए.

जो छेड़ा तराना तेरे जंग का,
चले संग सब गम के मारे हुए.

सुबह हो रही, हंस रही है ज़मीं,
कहीं गुम चमकते सितारे हुए.

उठो, लो उठा तुम भी परचम कोई,
न बैठो यों आंचल पसारे हुए.

बिखर कर बने थे जो स्वर याचना,
मिले तो जमाने के नारे हुए.

जिन्हें खोजते थे कई साल से,
वे खुद आज घर हैं पधारे हुए.

जमाना हुआ था हमें ऐ खुदी,
तुझे नाम लेकर पुकारे हुए.

--

सुबह ये कैसी? रात के बदन की बू तो नहीं.

पड़ा है कौन सड़क पर मरा सा, तू तो नहीं.

लहर सा खाता हूं हर नींद टूट जाने पर,
हूं सोचता कोई सपना गया है छू तो नहीं.

लदा-फदा सा सुखों से सफ़र उदासा क्यों,
जगी है आप में अब खुद की जुस्तजू तो नहीं.

फटी-फटी सी आंख सामने ये सन्नाटा,
युगों से बैठा है ये कौन, मैं ही हूं तो नहीं.

ये कौन है जो घूमता है भरा ज़ख़्मों से,
किसी ग़रीब की आंखों की आरजू तो नहीं.

मेरा नसीब खींच लाया मुझे थाने में,
ख़ुदा के पास भी जाता मैं कभी यूं तो नहीं.

हुआ क्या हंसते-हंसते आप रुक गये सहसा,
किसी की आंख का आंसू बना लू तो नहीं.

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