सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : यात्रा-वृत्त // पांडिचेरी की ओर // रामदरश मिश्र

फिर वही न जाने का मन और जाने की विवशता के द्वन्द्व की कहानी. कुछ दिनों पूर्व पांडिचेरी से विजयलक्ष्मी का फोन मिला कि मुझे एक सेमिनार में शिरकत के लिए पांडिचेरी आना है और फिर वहीं उत्तर कि अब इतनी लंबी यात्रा के लिए न मन है न उत्साह. लेकिन विजयलक्ष्मी का आत्मीय आग्रह इतनी आसानी से पीछा छोड़ने वाला नहीं था. वह मुझे घेरता गया, घेरता गया और जब मैंने आधे मन से स्वीकृति दे दी तब द्वंद्व शुरू हो गया. जा पाऊंगा कि नहीं जा पाऊंगा. लेकिन कुछ समय बाद तब द्वंद्व जाने के निर्णय में बदल गया जब सरस्वती ने कहा कि मैं भी चलूंगी. फिर बेटी स्मिता का भी मन हो गया और जब विजयलक्ष्मी ने स्मिता के नाम निमंत्रण-पत्र भेज दिया तब तो उसका भी जाना निश्चित हो गया. हवाई टिकट कराया गया गैर वापसी वाला. अब चिंता होने लगी कि यदि किसी कारण से जाना रुक गया तो लगभग बीस हजार रुपये की चपत पड़ जायेगी. रुकना अपने स्वास्थ्य के कारण भी हो सकता है और किसी वजह से सेमिनार के स्थगित हो जाने के कारण भी. बहरहाल अब मैं यही मना रहा था कि, मैं यात्रारंभ के समय स्वस्थ रहूं और सेमिनार भी अपनी जगह कायम रहे.

कई दिनों से जुकाम दस्तक दे रहा था और मैं डर रहा था कि, यह कमबख्त ऐन मौके पर अपना कमाल दिखायेगा जैसा कि, यह प्रायः करता है. तो उससे मुक्ति या राहत पाने का उपाय करता रहा और तीन मार्च आया तब लगा कि, यह भी यात्रा में बाधक नहीं बनेगा. सो हम तीनों को बेटा शशांक सुबह साढ़े आठ बजे पालम हवाई अड्डे पर छोड़ आया. हम एक बजे तक चेन्नई पहुंच गये. यात्रा सुखद रही. वहां हमें लेने के लिये विजयलक्ष्मी की शिष्या अनिता सिंह टैक्सी लेकर आई हुई थी. तो टैक्सी प्रशस्त राजमार्ग पर भागती रही और हम लोग मार्ग-छवि से स्पंदित होते रहे. मुझे बताया गया था कि, चेन्नई से पांडिचेरी तक सड़क सागर के किनारे-किनारे चलती गई है. तो मैं सोचता रहा कि, सागर का किनारा अब आता है तब आता है, लेकिन नहीं आया. वैसे सड़क सागर के आसपास ही चलती रही लेकिन उससे सटकर चलती हुई कहीं भी दिखाई नहीं दी. हां, एक-दो बार सागर की झलक अवश्य दिखाई पड़ी. कहीं-कहीं सागर द्वारा छोड़े गये जल-विस्तार ने अवश्य ही अपनी छवि से हमें प्रफुल्लित किया. वे जल-विस्तार बड़ी झील का रूप ले रहे थे. आंखें जल-विस्तार पर उड़ती हुई दूर तक चली जाती थी और उसकी तथा उसके ऊपर झुके हुए आकाश की भीम नीलिमा को अपने में भर लेती थी लेकिन तेजी से भागती हुई टैक्सी आंखों को देर तक जल-साहचर्य का सुख लेने नहीं देती थी.

खैर सागर तट से सट कर यात्रा करने का सुख भले ही नहीं मिला किंतु प्रकृति तो अपनी विविध छवियों के साथ आद्योपांत सहचरी थी. मार्ग में दोनों ओर तरह-तरह के पेड़ों की हरियाली अपनी आभा फेंकती रही, ताल पोखरे, जंगली पौधे, ऊंची-नीची बन-खंडियां, उनसे गुजरती हुई हवाओं का ठंडा स्पर्श मुझे उस प्राकृतिक परिवेश के सुख का अहसास कराता रहा जिसके लिये मैं दिल्ली महानगर से निकला था. इस स्निग्ध प्रशस्त सड़क पर टैक्सी इसलिये भी तीव्र बेग से भाग रही थी कि, यहां वह भीड़-भड़क्का नहीं था जो अन्य सड़कों पर दिखाई पड़ता है. सड़क खुली हुई थी. उसके दोनों ओर दूर-दूर तक खुलापन था और महसूस हो रहा था कि, इस भूभाग में आबादी का दबदबा सघन नहीं है. अतः हर तरह से बहुत प्रसन्न हलकेपन की अनुभूति हो रही थी.

बीच में टैक्सीवाले ने टैक्सी रोक दी. ज्ञात हुआ कि, यह महाबलीपुरम है और यहां चाय पीनी है. हां, चाय की तलब महसूस हो रही थी. हवाई जहाज में जो चाय मिली थी वह ठंडी भी थी और बेस्वाद भी.

वैसे न तो मैं चाय का घोर चाहक हूं, न सरस्वती जी. मैंने तो उदरव्याथि के कारण कई साल तक चाय छोड़ दी थी. अब सुबह-शाम थोड़ी-थोड़ी ले लेता हूं यानी कुल मिलाकर आधी प्याली चाय. सरस्वती जी भी बस सुबह-शाम चाय लेती हैं किंतु बाहर निकलने पर चाय की तलब बढ़ जाती है, भीतर-भीतर चाय की पुकार होने लगती है और हम कई बार और कुछ ज्यादा मात्रा में चाय ले लेते हैं. और आश्चर्य यह कि, यह परेशान भी नहीं करती. दिल्ली में तो चाय तनिक भी ज्यादा हो जाये तो पेट में एसिडिटी का शोर मच जाता है. वहां तो जहाज में मिली चाय ने चाय का सुख नहीं दिया और यहां गरम-गरम अच्छी चाय पीने की इच्छा हो रही थी, सो यहां रुकना अच्छा लगा. चाय यहां कुछ बेहतर मिली किंतु फिर भी वह चाय नहीं जो तृप्ति दे सके. मुझे लगा कि आज का दिन चाय दृष्टि से कुछ ठीक नहीं है.

बहरहाल हम कुल तीन घंटे में पांडिचेरी विश्वविद्यालय में पहुंच गये. वहां के अतिथिगृह में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी. अतिथिगृह बड़ा था और भव्य भी. एक कमरे में मुझे और सरस्वती जी को ठहराया गया, दूसरे कमरे में स्मिता को. उस कमरे में एक और महिला को आना था. हमारे आने का समाचार सुनकर विजयलक्ष्मी आ गयीं. यद्यपि मैंने उन्हें बार-बार आश्वस्त किया था कि, मैं आ रहा हूं, आ रहा हूं, किंतु वे बार-बार यहीं कहती रहीं, ‘आ जाइये न, आ जाइये न.’ और मुझे देखकर उन्हें लगा कि हां मैं सचमुच आ गया हूं. विह्वल होकर मिलीं. स्नेहातिरेक से पत्नी को गले लगाया, स्मिता को प्यार मिला. दस साल पूर्व की तिरुपति यात्रा की स्मृतियों में डूबने-उतराने लगी. उन्हें कल शुरू होने वाली संगोष्ठी से संबंधित अनेक कार्य देखने थे. अतः हमारे लिये मिठाई और ढेर सारे फल छोड़कर चली गयीं. हमने चाय पी. हां, यह चाय आज बाहर की सबसे अच्छी चाय थी. थोड़ा विश्राम किया. स्मिता की खिड़की के बाहर एक खाली मैदान था जिसमें खर-पतवार थे, अलाय-बलय की चीजें फेंकी हुई थीं. बिल्ली-कुत्ते घूम रहे थे.

उस मैदान के बाद अतिथिगृह की चहारदीवारी थी. उसके बाद बड़े-बड़े पेड़ों का सघन विस्तार था. कुछ पेड़ों पर ऊपर से नीचे तक बहुत बड़े-बड़े सफेद-सफेद फूल लदे थे. लगता था जैसे धूप के बड़े-बड़े गुच्छे हों. तो ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के सघन विस्तार के कारण उनके पीछे स्थित सागर दिखाई नहीं दे रहा था किंतु स्मिता ने भांप लिया कि, वहां सागर है जो पुकार रहा है- ‘आओ, आओ, आओ.’ फिर क्या था, थके होने के बावजूद हम चल पड़े सागर की ओर.

अतिथिगृह से निकल कर हम बाईं ओर सड़क पर कुछ दूर गये कि, एक टूटी-फूटी कच्ची सड़क से बाईं ओर मुड़ गये. सागर साफ दिखाई दे रहा था. शाम हो गयी थी किंतु यहां-वहां रोशनियां थीं और खुले में सब कुछ दिखाई दे रहा था. सागर के तट तक झाड़ियों और पेड़ों का जंगल फैला हुआ था और उसमें यहां-वहां कुछ घर बने हुए थे जो ठीक से दिखाई नहीं पड़ रहे थे. दो-एक फ्रांसीसी लोग साइकिल या स्कूटर से उस जंगल में आते-जाते दिखाई पड़ जाते थे, तो महसूस होता था कि, जंगल के भीतर वे लोग रहते हैं. हम लोग उस झुटपुटे रेत विस्तार को कुचलते हुए समुद्र तट पर जा रहे थे. तट निर्जन था और ऊबड़-खाबड़ था. कुछ दूरी पर दो-चार युवक टहलते हुए दिखाई पड़े, बाकी दूर-दूर तक कोई नहीं था. हां, समुद्र में दूर कुछ नावें रेंगती हुई दिखाई पड़ रही थीं जो संभवतः घर की ओर लौट रही थीं. हां, इसे निर्जन भी कैसे कहा जाये? यहां तो सागर की अनंत लहरें गरजती हुई, हाहाकार करती हुई, लहरें लहरों पर गिरती हुई वेग से तट की ओर आती थीं और तट से टकराकर उछल पड़ती थीं तथा अट्टहास करती हुई राशि-राशि झाग उगल देती थीं. शाम का यह निर्जन इन लहरों के भीम संगीत और उन्मत्त-नर्तन की रंगशाला बन गया था.

हम मुग्ध होकर देख रहे थे. काफी देर तक देखते रहे. जी नहीं भर रहा था. एक तो यह कि, रास्ता साफ नहीं था, रात को भी जीव-जंतु वहां विचर सकता था, दूसरे खाने-पीने का भी समय हो गया था. आदमी कहीं हो आखिर उसे रोटी के पास लौटना ही होता है. तो हम भी फिर यहां आने की इच्छा लिये अतिथिगृह में लौट आये और खाना खाकर अपने को रात की गोद में डाल दिया. यहां का मौसम दिल्ली से भिन्न था. दिल्ली से जब चले थे तब रातें तो ठंडी थी ही, दिन भी ऐसा नहीं हुआ था कि, पंखा चलाया जाये. किंतु यहां तो रात में ए.सी. चलानी पड़ी वैसे हम लोगों को ए.सी. रास नहीं आती किंतु कमरे को कुछ अनुकूलित करने के लिये कुछ तो ए.सी. का सहारा लेना पड़ता है. यहां भी कुछ देर बाद तो पंखा ही साथी रहा. पंखे में साथी की सी सहजता अनुभव होती है.

4 मार्च की सुबह हुई. हमसे कहा गया था कि, हम साढ़े नौ बजे तक तैयार रहें. आठ बजे नाश्ता आ जायेगा. तो हम लोग तो जल्दी उठने वाले लोगों में से हैं. उठ गये. स्मिता को चाय चाहिये थी मिल जाती तो मैं भी ले लेता. कहा न कि बाहर निकलने पर चाय के साथ मेरे संबंध में कुछ बदलाव आ जाता है. लेकिन यहां चाय कहां मिले? अतिथिगृह नया है, भोजनालय का कक्ष तो है किंतु अभी उसमें खान-पान की समुचित व्यवस्था नहीं हुई है और यूनिवर्सिटी कैंपस शहर से दूर एक निर्जन में है. यहां खाने-पीने की कोई दुकान नहीं है. चलो कोई बात नहीं, आठ अजे मिल जायेगा जो मिलना होगा. तो आठ बजे हम लोग अतिथिगृह के भोजनालय में एकत्रित हो गये जहां बाहर से नाश्ता आना था. दक्षिण भारतीय नाश्ता तो बहुत अच्छा था ही, उससे अच्छा था नाश्ते पर अनेक लोगों का संगम. वहीं मिल गये सपत्नीक डॉ. टी मोहन सिंह (हैदराबाद), सपत्नीक डॉ. अमरनाथ (कोलकाता), डॉ. सुंदरम, डॉ. शिवरामि रेड्डी (तिरुपति), डॉ. अर्विंदाक्षन (कोच्ची), डॉ. किरणबाला अरोड़ा (अनंतपुर), डॉ. कृष्ण मुरारी मिश्र (अलीगढ़) और कई अन्य लोग. पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अनेक छात्र तो थे ही जो हमारी देखभाल में लगे थे. हिंदी विभाग के एक प्रवक्ता प्रमोद मीणा और शोध-छात्रा अनिता सिंह पर तो हमारी देखभाल का कुछ ज्यादा ही उत्तरदायित्व था.

साढ़े नौ बजे गाड़ी आई. सबसे पहले मुझे कुलपति जे.ए.के. तरीन से मिलना था. हम उनके कक्ष में उनसे मिले. उनसे मिलना बहुत अच्छा लगा. उन्होंने हिंदी विभाग के प्रति अपना जो स्नेह और सहयोग व्यक्त किया उससे मुझे बहुत सुख मिला और यह आश्वासन कि उनके नेतृत्व में यहां के हिन्दी विभाग को वे तमाम सुविधायें प्राप्त होंगी, जिनके लिये विजयलक्ष्मी एक लंबे समय से लड़ती और लहूलुहान होती रही हैं. दस बजे कार्यक्रम शुरू हो गया. कुलपतिजी को ही संगोष्ठी का उद्घाटन करना था, किया और अपने भाषण में भी हिन्दी के प्रति अपनी आत्मीयता का इजहार किया. उन्हें किसी बैठक में जाना था अतः वे साढ़े दस बजे चले गये. फिर तो मुझे ही बोलना था. समकालीन हिन्दी कहानी पर जो कुछ कहना था कहा और फिर विद्वानों का भाषण-क्रम शुरू हो गया. जो विद्वान नाश्ते पर मिले थे उनके अतिरिक्त भी कुछ लोगों से भेंट हुई. वे थे डॉ. अच्युतानंद (कालिकट), डॉ. अर्जुन चौव्हाण (कोल्हापुर).

दो दिन की संगोष्ठी में लोग अपने-अपने समय पर बोले और अच्छा बोले-अपने विषय में धंसकर बोले. मुझे सबको सुनना तो अच्छा लगा ही, सबके आत्मीयता भरे साहचर्य से दो दिन तक गुजरना और भी अच्छा लगा. तीन तारीख को यात्रा के क्रम में मैं पूरा दिन तना रहा. दूसरे दिन के सभी सत्रों में दिन-भर बैठा रहा. तो देह थकान से भर गयी लेकिन सबके बीच सबके साथ होने से उसकी प्रतीति नहीं हुई. जब शाम को लौटा तब दो दिन के अनवतर श्रम की थकान मुझ पर सवार ही गया. स्मिता ने कहा, ‘‘पापा चलिये सागर बुला रहा है.’’ मैंने कहा, ‘‘बेटा, तुम जाओ मुझे तो खाट बुला रही है.’’ हां, खाट तो बुला ही रही थी किंतु उससे पूर्व अनिता सिंह के घर पर हमें भोजन बुला रहा था. अनिता ने हम तीनों को बहुत गहरी आत्मीयता के साथ अपने यहां भोजन पर बुलाया था.

दूसरे दिन के पूर्वान्ह के सत्र में नहीं गया. आराम करता रहा. स्मिता से कह रखा था कि जब भोजन का समय हो तो गाड़ी भेजवा देना. भोजन के अवसर पर फिर बहुत अच्छा लगा. विजयलक्ष्मी ने कहा, ‘‘कमरे में ही भोजन मंगवा देते हैं.’’ मैंने मना कर दिया. मुझे सबके साथ खाना अच्छा लगता है.

नई पीढ़ी के शिक्षक और छात्र मुझे घेर-घेरकर कुछ पूछते-पाछते रहे और अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते रहे. भोजन के पश्चात् संवाद-गोष्ठी घंटा भर चली थी. वास्तव में संवाद-गोष्ठी बहुत जीवंत गोष्ठी होती है. उसमें श्रोताओं की भी भागीदारी होती है और प्रश्नों के सामने वक्ता अधिक खुलता है तथा इससे यह भी ज्ञात होता है कि श्रोताओं में वक्ताओं के भाषणों की क्या प्रतिक्रिया होती रही है.

घंटे भर की संवाद-गोष्ठी के पश्चात् समापन-गोष्ठी थी जिसमें कुल सचिव तथा कला-संकाय के अध्यक्ष के वक्तव्य हुए और अंत में मुझे भी बोलना ही पड़ा. वास्तव में सबको इस बात की तृप्ति अनुभूत होती रही कि गोष्ठियां बहुत सफल रहीं और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई. इस सारस्वत कार्यक्रम की सफलता में विजयलक्ष्मी की भूमिका तो बुनियादी भूमिका रही थी, उनकी सहकर्मिणी पद्मप्रिया की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण रही. उन्होंने इस उत्सव की जीवंतता की निर्मिति के अनेक प्रकार से सहयोग दिया.

जैसा कि होता है कि, दो दिनों की गहमागहमी भरा सारस्वत उत्सव समापन-गोष्ठी के समय एक उदासी से भर आया था. बिछड़ने का दर्द सबके चेहरों पर उग आया था. लेकिन गनीमत थी कि अभी सुंदरम जी, अमरनाथ जी, मोहनसिंह जी, शिवरामि रेड्डी जी तथा हमें एक दिन और साथ रहना था पांडिचेरी शहर में.

वहीं कर्नाटक निवास में हमारे लिये कमरे आरक्षित कराये गये थे. तो गोष्ठी के पश्चात् हम सभी विश्वविद्यालय के अतिथिगृह को छोड़कर कर्नाटक निवास चले गये. मैं पहली बार पांडिचेरी शहर को देख रहा था. दोस्तों से उसकी खूबसूरती के बारे में बार-बार सुना था तो मैं उस भाव को लिये हुए उसे देख रहा था.

वास्तव में यह एक नये चरित्र का शहर लगा-बहुत शांत, खुला हुआ, सौम्य, सुरक्षित, जैसे इसमें अरविंद की आत्मा व्याप्त हो. कर्नाटक निवास में हम सभी पास-पास के ही कमरों में ठराये गये. हम तीन थे अतः हमारे लिये चार बेड वाला कक्ष आरक्षित था. सामने शिवरामि रेड्डी का कमरा था और यह आकस्मिक नहीं था बहुत सहज था क्योंकि शिवरामि न जाने कब से मेरे बहुत पास हैं. वे केवल मेरे लिए ठहर गये थे. उनका मन था कि वे मुझे विदा करके ही तिरुपति के लिये प्रस्थान करेंगे. उन्होंने अपना पर्चा पढ़ते समय कहा भी था, ‘‘मैं तो मिश्र जी से मिलने आया हूं. पर्चा तो एक बहाना था.’’ तो वे लगातार मेरे साथ-साथ चलते रहे-मेरे योगक्षेम की चिंता करते रहे. क्या संयोग है कि जब मैं डॉ. रेड्डी के बुलाने पर तिरुपति गया था तब विजयलक्ष्मी ने मेरे योगक्षेम की चिंता संभाली थी और जब विजयलक्ष्मी के बुलाने पर पांडिचेरी गया था तब डॉ. रेड्डी ने यह मोर्चा संभाला. खैर हम थके थे तो भी स्मिता की प्रेरणा से सागर तट की ओर चल पड़े. सागर तट वहां से समीप ही था यानी लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर. तो वहां गये. वहां तो मेला लगा हुआ था. हम भी उस मेले में शरीक होकर सागर से रूबरू हो गये. ठंडी-ठंडी हवा के स्पर्श से थकान झरती रही और सागर का मंद गर्जन कानों में गूंजता रहा. हां आज पहले दिन का सा उसमें आक्रोश और अट्टहास नहीं था. हम उसी की प्रतीक्षा करते रहे किंतु सागर तो सागर है, उसका जब जैसा मन होगा करेगा, हमारे चाहने के इशारे पर तो वह नहीं चलेगा. कुछ देर बाद हम लौट आये. खाना खाने के लिये एक गुजराती होटल में जाना था. विजयलक्ष्मी की व्यवस्था बहुत चुस्त-दुरुस्त होती है. कभी प्रत्यक्ष रूप से, कभी परोक्ष रूप से वे हमारी सुख-सुविधा के साथ जुड़ी हुई चल रही थीं. हां, मैं उन दो महिलाओं का नाम कैसे भूल सकता हूं जो विजयलक्ष्मी का पर्याय बन कर हमारे योगक्षेम की चिंता के साथ जुड़ी रही. वे थीं सुश्री शारदा (शोध छात्रा) और सुश्री अर्पणा राय (अरविंद आश्रम से जुड़ी शिक्षिका). ये दोनों महिलायें हमारे खाने-पीने, जलपान, यहां से वहां आने-जाने के प्रबंध से सोत्साह जुड़ी रहीं. सुबह-सुबह सात बजे पांडिचेरी से विदाई भी इन्हीं के सानिध्य में हुई.

तीसरा दिन हमारा खाली दिन था. यानी इस दिन पांडिचेरी घूमना था. तो क्या था बस अरविंद आश्रम और मातृमंदिर का दर्शन करना था. श्री अरविंद और श्री मां तो पांडिचेरी की आत्मा का स्पंदन बनकर उसमें व्याप्त हैं. लेकिन यह काम आसान नहीं था. विजयलक्ष्मी ने इस असंभव कार्य को भी संभव कर दिखाया. विजयलक्ष्मी ने ही बताया कि अरविंद साधना स्थल तक जाना आसान नहीं है. वह आम आदमी के लिए वर्ष में एक दिन संभव हो पाता है, बाकी दिनों में आश्रम से जुड़े जिन लोगों की जिस दिन वर्षगांठ होती है. उस दिन वे ही वहां जाते हैं और ध्यान लगाते हैं. विजयलक्ष्मी आरंभ से जुड़ी हुई हैं तो भी वे हमें ले जाने में सफल नहीं हो पा रही थीं. अंत में निराश होकर श्री मां के ध्यान में डूब गईं और साश्रु हो गईं. किसी बड़े अधिकारी का ध्यान इनकी ओर गया और सफलता प्राप्त हो गई. वैसे विजयलक्ष्मी वास्तव में विजयलक्ष्मी हैं जो मन में ठान लेती हैं उसे करके रहती हैं, क्योंकि वे अपने लिये नहीं, औरों के लिये कुछ करने का ठानती हैं.

तो हम लोग आश्रम-परिसर में चले गये. वहां बोलना मना था. अद्भुत शांति छाई हुई थी. चेकिंग हो रही थी यानी इस बात की जांच हो रही थी कि हमें यहां आने की अनुमति मिली है या नहीं. हम साधना-कक्ष के निचले भाग में ले जाये गये. वहां अनेक लोग ध्यान में बैठे थे, हम भी बैठ गये. कुछ देर बाद साधना-कक्ष में जाने के लिये हमें संकेत दिया गया. हम सीढ़ी चढ़कर ऊपर गये और हमें अनुमति-पत्र दिया गया था. उसकी जांच की गयी. साधना-कक्ष में जाकर फिर हम लोग

ध्यान में बैठ गये. कुछ देर बाद हम वहां से मुक्त होकर नीचे चले गये और मुझे लगा कि मैं मुक्त सांस ले रहा हूं. वास्तव में मैं न नीचे ध्यान में था न ऊपर. बस चुपचाप बैठा रहा और सोचता रहा कब मुक्ति मिलेगी. ध्यान जबरदस्ती थोड़े ही होता है, उसके लिए तो अपना कमरा ही काफी है. मैं यहां ध्यान के लिए आया ही नहीं था. मैं तो बस एक महायोगी के साधना-स्थल का दर्शन करने आया था और वह भी सहज भाव से.

मुझे क्या पता था कि इस साधना-स्थल पर हमें ले आने के लिए विजयलक्ष्मी को इतना लहूलुहान होना पड़ेगा, जगह-जगह हमारी जांच-पड़ताल होगी और एक आतंकित मौन सहन करना पड़ेगा. मुझे तो लगा कि मैं किसी विशेष राजनयिक अवसर पर राष्ट्रपति भवन में गया हूं. हां, याद है एक बार डॉ. शंकरदयाल शर्मा के राष्ट्रपति होने के काल में चेकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति आये थे. राष्ट्रपति भवन में उनके स्वागत में समारोह था. मुझे भी बुलाया गया था. मैं गया और एक भव्य समारोह के आतंक के साथ काफी समय तक वहां बंद रहा. मैं उस पूज्य आश्रम का व्यवस्था या वातावरण की समीक्षा नहीं कर रहा हूं, केवल अपनी मनःस्थिति बयान कर रहा हूं. मैं थोड़ा दूसरे मिजाज का आदमी हूं जो किसी भी प्रकार के बंधन को पसंद नहीं करता. जहां किसी भी प्रकार का बंधन होता है वहां जाने से घबराता हूं. यहां भी वह घबराहट अनुभव हो रही थी किंतु जैसे ही मैं साधना-भवन से बाहर आया, देखा-गेंदे के राशि-राशि रंग-बिरंगे फूल खिलखिला रहे हैं. वे मौन भाव से पूछ रहे हैं, ‘‘कैसे हो दोस्त.’’ लगा कि मैं भी उनसे पूछ रहा हूं, ‘‘तुम लोग कैसे हो दोस्त.’’ मुझे लगा कि हवाएं उनके रंगों को, उनकी मूक-ध्वनियों को लिये-लिये पूरे आश्रम परिवेश में बसंत का गीत गा रही हैं.

मैं भीतर से खुल आया और लगा कि मेरा गांव, मेरा शहर और पांडिचेरी का यह आध्यात्मिक लोक वसंत के उस एक रंग में रंग गया है जो मेरा अपना रंग रहा है जो मेरी

धरती का रंग रहा है. मैं कहीं भी रहूं, किसी भी हाल में रहूं, इस रंग से मेरा संबंध नहीं टूटता. आश्रम से चला तो फूलों ने कहा, ‘‘विदा दोस्त.’’ विदा? अरे काहे का विदा भाई, तुम तो हर जगह मेरे साथ रहते हो. घर लौटूंगा तो वहां भी मेरी छोटी-सी आंगन-वाटिका में तुम्हीं खिलखिलाते हुए मिलोगे.

दोपहर के बाद मातृ-मंदिर जाने का कार्यक्रम था. ज्ञात हुआ कि पांडिचेरी से छः-सात किलोमीटर की दूरी पर श्री मां की स्मृति में एक भव्य मंदिर बनाया गया है. वहां जाना है. निश्चित समय पर बड़ी टैक्सी आई. हम सभी उसमें सवार होकर मातृ-मंदिर की ओर चले. मातृ-मंदिर का सौंदर्य तो जो होगा सो तो होगा ही, मार्ग के सौंदर्य ने मुझे अपने में समो लिया. जंगलनुमा सघन वृक्ष-राजियों के बीच से भागती पतली-पतली सड़कों के आकर्षण का क्या कहना. सड़क के दोनों ओर तरह-तरह के फूलोंवाले, तरह-तरह के फलवाले, तरह-तरह के रूप रंगवाले जंगली वृक्षों के विस्तार में मन खो जा रहा था और भटकने लगता था. बीच-बीच के अवकाशों में बने हुए घर अपने एकांत सौंदर्य की कहानी कह रहे थे. बसंत का अहसास आद्योपांत व्याप्त था.

मन हो रहा था कि इसी प्रकार सड़क चलती रहे, चलती रहे और कहीं भी उसका अंत न हो. अंत हो होना ही था परंतु अंत भी एक जंगली पहाड़ी और गंवई परिवेश में ही हुआ. इस परिवेश में मातृ-मंदिर से संबंधित भवन था जिसमें हमें ले जाया गया और मातृ-मंदिर संबंधी सूचनायें दी गईं. मातृ-मंदिर परिवेश की एक फिल्म भी दिखाई गई. वहां से हम मातृ-मंदिर की ओर चले. कुछ दूर पर एक खुले मैदान में सुनहली आभावाला एक मंदिर दिखाई पड़ा. वहां जाने से पूर्व एक जगह मार्ग में एक विदेशी भक्त मातृ-मंदिर के बारे में समझा रहा था. सारे लोग उसके पास खड़े होकर उसकी बात सुन रहे थे. हम खुले आसमान के नीचे खड़े थे. धूप तेज थी. मैं बुरी तरह थका हुआ भी था और गाइड की धीमी आवाज में फूटती हुई अंग्रेजी तनिक भी पल्ले नहीं पड़ रही थी. इसकी एक वजह यह भी थी कि हम थोड़ी दूरी पर खड़े थे. तो मैं वहां से हटकर कुछ दूर पड़े एक पत्थर पर बैठ गया और दूर-दूर तक फैले ऊंचे-ऊंचे धूसरित टीलों को, पेड़ों को देखने लगा. कुछ देर बाद भीड़ मातृ-मंदिर की ओर बढ़ी तो मैं भी चल पड़ा. जूते तो बाहर निकाले ही गये, हमें पहनने के लिए मोजे दिये गये. शायद इसलिये कि सीढ़ी और कक्ष हमारे पैरों की धूल से आहत न हों. सीढ़ी नहीं थी, बस नीचे से ऊपर को जाता प्रशस्त गलियारा था. जब मैं चढ़ने लगा तब ज्ञात हुआ कि काफी दूर तक चढ़ाई करनी है.

धूप से आहत थका तन ऊपर चढ़ने से विवशता अनुभव कर रहा था. सोचने लगा कि मेरी मति मारी गयी थी कि यहां चला आया. लेकिन अब चढ़ना तो था ही. सो चढ़ता गया और अंत में अपने को एक विशाल कक्ष में पाया. जाकर नीचे बैठ गया और तमाम लोगों की तरह मैं भी ध्यान करने जैसा कुछ करने लगा. बैठा ही था कि एक लड़की मेरे पास आई. वह मुझे उठाने लगी. पहले तो मैं कुछ समझा ही नहीं कि क्या कह रही है, जब मैं उठ गया तब उसने एक कुर्सी की ओर इशारा किया. तो यह बात है. बुजुर्ग की सुविधा का ध्यान रखा गया है. मैं उसके प्रति कृतज्ञ हो गया.

देर तक लोग ध्यान में डूबे रहे लेकिन मैं तो यों ही बैठा रहा और उस भव्य समारोह में जिस चीज को मैं एकटक निहारता रहा, वह थी प्रकाश-रेखा. हां, कक्ष के बीच एक गोलाकार मंडप बना था. छत पर से प्रकाश की एक मोटी लकीर वहां उतर रही थी. यानी कक्ष की सतह से छत तक प्रकाश की एक रेखा खिंची हुई थी. हो सकता है यह आत्मा के प्रकाश के अर्ध्वमुखी होने का प्रतीक हो या आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश के उतरने का प्रतीक हो. जो भी हो मोहक था, प्रभावकारी था.

कुछ समय बाद हम नीचे आ गए और पास खड़े वट वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गये. मातृ-मंदिर के चारों ओर मोहक खुला विस्तार था. जिसमें यहां-वहां वृक्षों का होना और भी सुंदर लग रहा था. यहां लोग परिक्रमा करते हैं. मुझसे कहा गया तो मैंने मना कर दिया. वैसे भी धार्मिक दृष्टि से किसी भी परिक्रमा में मेरा विश्वास नहीं है और यहां तो मैं थकावट से चूर था. सो बरगद के नीचे बैठ गया. मेरे पास मेरे कुछ साथी भी बैठ गये. हम बहुत देर से चुप थे. इच्छा होती थी कि आपस में कुछ बतियायें इल्के स्वर में ही सही, लेकिन वहां खड़ा एक आदमी बार-बार मुंह पर उंगली रखकर इशारा कर रहा था कि हम चुप रहें, बिल्कुल चुप रहें. तो हम चुप होकर बरगद की छांह का सुख ले रहे थे.

बरगद की तमाम बरोहें पेड़ का रूप ले चुकी थीं और बरगद एक बरगद न रहकर समुदाय हो गया था-एक बड़े मंडप की तरह. कई विदेशी भक्त किसी न किसी बरगद का आलिंगन कर रहे थे, नमन कर रहे थे. और जैसे ही कहीं से तनिक भी आवाज आती थी, वह आदमी मुंह पर उंगली रखे पहुंच जाता था. एक चिड़िया चहचहा उठी. फिर थोड़ी देर बाद पपीहा भी पुकार उठा-पी कहां? वाह क्या बात है, चिड़िया ने सन्नाटे को तोड़ा. अब उसे कोई चुप कराये. लगा कि, चिड़िया के माध्यम से मैं ही बोल रहा हूं. हल्का हो आया. पास बैठे मित्र से कहा, ‘‘अब इसे कोई चुप कराये.’’ तब तक वह चुप्पी-निदेशक व्यक्ति इशारा करता आ गया. चिड़िया बोल रही थी. मैंने इशारे से कहा कि उसे चुप कराओ. वह मुस्कुराया और इस भाव से हाथ हिलाया कि उसे कोई कैसे चुप करा सकता है श्रीमान्!

हम वहां से लौटने लगे तो ज्ञात हुआ कि हमें विजयलक्ष्मी के घर चलना है. यह तो सुखद बात थी. यहां आकर विजयलक्ष्मी के घर नहीं गये तो यहां आना ही व्यर्थ गया. वहां गये और घंटा भर उनके घर के स्नेहिल वातावरण में बैठे रहे, चाय पीते रहे. संयोग से उनके पतिदेव शर्मा की भी विजयवाड़ा से आ गये थे. वहां से चले तो लोगों को लगा कि फिर सागर बुला रहा है. अतः सागर के किनारे उतरकर टैक्सी को विदा कर दिया. मैं वहां चला तो गया लेकिन थकान से भर चुका था. अतः कुछ देर बाद सरस्वती जी के साथ निलयम को लौट आया. डॉ. रेड्डी हमें अकेला कहां छोड़ने वाले थे, वे भी साथ हो लिये. कुछ देर बाद सबको खाना खाने भी जाना था उसी गुजराती होटल में. वह होटल हमें बहुत पसंद आया. इसका भोजन स्वादिष्ट था और सर्विस में बड़ी त्वरा थी. गुजराती होटल होने के बावजूद यह गुजराती भोजन की कुछ विशेषताओं से मुक्त था यानी दाल-सब्जी में गुड़ नहीं पड़ता था, खाने में मिर्च बहुत कम होती थी. वास्तव में मेरे खाने में मिर्च नहीं पड़ती है. तो मैं परेशान था यह सोचकर कि मेरा काम कैसे चलेगा. हर जगह हर चीज में मिर्च की अधिकता होगी किंतु यह देखकर बहुत प्रसन्नता हुई कि यहां किसी भी भोजनालय में मिर्च का अत्याचार नहीं था. मैं बहुत सहज भाव से सब कुछ लेता गया और इस गुजराती होटल के हलवे का स्वाद तो अद्भुत था. ऐसा स्वादिष्ट हलवा मैंने नहीं खाया था. सरस्वती जी चाहती थीं जानना कि यह कैसे बनाया गया है किंतु संकोच के मारे कुछ नहीं पूछ सकीं.

सुबह सात बजे बड़ी टैक्सी का आना था. इससे हम तीनों के साथ डॉ. अमरनाथ दंपति तथा डॉ. मोहन सिंह दंपति को भी चेन्नई जाना था. अतः सबको सावधान कर दिया गया कि सात बजे तैयार रहें, देर होने पर हमारा प्लेन छूट जायेगा. डॉ. रेड्डी तो आकस्मिक विवशतावश दस बजे रात को ही चले गये, इस पश्चाताप के साथ कि वे हमें विदा नहीं कर पायेंगे.

टैक्सी चली तो मुझे सादर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बिठा दिया गया. मैं समझा कि यह मेरी वरिष्ठता का सम्मान है और प्रसन्न हुआ. रास्ते में पीछे बैठे लोग परस्पर गप्प मारते रहे. यहां की बातें, वहां की बातें, न जाने कहां-कहां की बातें और सरस्वती जी नेतृत्व कर रही थीं. मैं तो अकेला पड़ गया था और चुप रहने को अभिशप्त था. हां, कभी-कभी ड्राइवर अपने तमिलियन उच्चारण वाली अंग्रेजी में कुछ पूछ देता था और बड़ी मुश्किल से उसे समझकर मैं जवाब दे पाता था. वास्तव में शुरू में यह ड्राइवर बहुत कड़क और रूखा लगा था. काया भी ऊंची और कड़क थी लेकिन धीरे-धीरे लगता गया कि वह बहुत संवेदनशील व्यक्ति है और मेरे प्रति लगाव महसूस करता हुआ कभी-कभी कुछ पूछ देता है. उसकी वाणी की नीरसता के भीतर छिपी आर्द्रता भी क्रमशः झरने लगी. उसे यह भी लगा होगा कि पीछे बैठे लोग तो परस्पर गपियां रहे हैं और मैं अकेला पड़ गया हूं. तो वह उस अकेलेपन को तोड़ने के लिए ही बार-बार कुछ पूछ लेता था.

मैंने एक बार पीछे मुड़कर कहा, ‘‘मैं समझ गया कि आप लोगों ने मुझे आगे क्यों ठेल दिया है. सोचा होगा इस बूढ़े आदमी के साथ हम लोगों की बातचीत उन्मुक्त रूप नहीं ले पायेगी, अतः उसे सम्मान के साथ आगे की सीट पर बैठा दो.’’ जोर की हंसी पड़ी और सभी लोग एक साथ बोल पड़े, ‘‘नहीं, नहीं, ऐसा मत सोचिये.’’

इन तीन दिनों के प्रवास के दौरान कई लोगों ने कई बार यह बात उठाई कि देखिये यहां के सारे साइनबोर्ड तमिल में हैं, हिंदी की तो बात छोड़िये, अंग्रेजी में भी नहीं है. इससे बाहर के लोगों को कितनी कठिनाई होती है. टैक्सी में भी यह बात उठाई गई तो मैंने कहा, ‘‘हां, यह बात तो है. बाहर का आदमी यहां आकर नहीं जान सकता है कि कौन बस कहां जा रही है, यह कौन-सा स्थल है, यह काहे की दुकान है. लेकिन देखिये इन्हें अपनी भाषा से कितना प्यार है. अंग्रेजी-प्रेमी कहा जाता है किंतु ये अंग्रेजी को अपने काम के लिये इस्तेमाल करते हैं अपनी अस्मिता का अनुभव तो ये अपनी भाषा में ही करते हैं, इसलिये सारे बोर्ड तमिल में हैं. और हिन्दी प्रेमियों को देखिये. उनके बोर्ड भी अंग्रेजी में होंगे, शादी-ब्याह भी अंग्रेजी में होंगे, रुतबे और अस्मिता की अभिव्यक्ति भी अंग्रेजी में होगी. उन्हें तो तमिल भाषियों से सीखना चाहिये कि अपनी भाषा का सम्मान क्या होता है.

मुझे तो लगता है कि तमिल-भाषियों की अपेक्षा हिन्दी भाषी ज्यादा हिंदी की उपेक्षा करते हैं. तमिल भाषी अपनी भाषा का सम्मान तो करते हैं. हां, अंग्रेजी या हिन्दी का प्रयोग होता तो इन्हीं का लाभ होता, पर्यटन को बढ़ावा मिलता. बाहर से बहुत से लोग तो इस डर से इधर नहीं आते होंगे कि उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि यह कौन-सी जगह है और उन्हें कहां जाना है. और देखिये दिल्ली हवाई अड्डे पर जो अखबार रखे हुए थे उनमें एक भी अखबार हिंदी का नहीं था. हिन्दी भाषी प्रदेश दिल्ली, राजभाषा हिन्दी की बात करने वाली सरकार और उसका इंडियन एयर लाइंस, फिर हिन्दी का अखबार क्यों नहीं? सारे अखबार अंग्रेजी के. अब इस मानसिक दरिद्रता को क्या कहा जाये? हिन्दी क्षेत्र को अपनी भाषायी अस्मिता का बोध? इस उन्मत्त सरकार से कोई पूछने वाला है कि, ‘‘वह हिन्दी का अनादर क्यों कर रही है? क्यों वह अंग्रेजी का नाच-नाच रही है?’’ बहरहाल चेन्नई हवाई अड्डा आ गया था. साथियों ने हमें बहुत भावभीनी विदाई दी. साढ़े तीन दिनों के साहचर्य में जो सुख मिला उसे लिये-दिये हम प्लेन में बैठे और दिल्ली आ गये.

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