सोमवार, 25 सितंबर 2017

प्राची - अगस्त 2017 : आलेख // उपन्यासकार रामदरश मिश्र // डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ

प्रकाश मनु के साथ बातचीत से रामदरश मिश्र ने अपने उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया के संबंध में लिखा है- ‘‘आंख के सामने बस यह होता है कि किस जमीन की रचना है-उस जमीन की अपनी गंध, अपना परिवेश, अपनी मुश्किलें...बस कोई भी एक चीज लेकर लिखना शुरू कर देता हूं.’’ जाहिर है, मिश्र जी के लिए प्रमुख चीज यह जमीन है, जहां वे खड़े रहे हैं, जिसे उन्होंने कई तरह से जिया और अनुभवा है. लेकिन उन्होंने अन्यत्र यह भी संकेत किया है कि केवल स्थान-विशेष सब कुछ नहीं होता, आखिरकार वे संवेदनाएं और वे मूल्य ही महत्त्वपूर्ण और विचारणीय होते हैं, जो संवेदेशीय और टिकाऊ होते हैं. ‘आंचलिक उपन्यास’ पर लिखते हुए उनका कथन है-

‘‘उपन्यास का अर्थ है, कथा (सूक्ष्म या सघन) के माध्यम से व्यक्त होने वाला जीवन-चित्र जो स्थान विशेष या स्थान सामान्य से संबद्ध होकर सर्वदेशीय मानव-संवेदनाओं और मूल्यों की प्रतिष्ठा करे...किसी उपन्यास में द्रटव्य जीवन अपनी कितनी सच्चाई, मानवीयता और समग्रता के साथ व्यक्त हुआ है और यह अपनी संवदेना की गहराई तथा मानवीयता के कारण वृहत्तर मानव-सत्य को कहां तक स्पर्श करता है.’’

अपने पहले उपन्यास ‘पानी के प्राचीर’ से लेकर अब तक के सबसे नये उपन्यास ‘बीस-बरस’ तक की यात्रा में मिश्र जी जीवन-संदर्भों की प्रामाणिक पहचान के साथ-साथ अपने मूल्य-

बोध के लिए जाने गए हैं. उनके उपन्यासों में प्रामणिक स्थितियां हैं, जीवन चरित्र हैं, प्रासंगिक विचार हैं, लेकिन सर्वोपरि मानवीय मूल्यों को गौरवान्वित करने वाली जीवन-दृष्टि के, जिसकी दीप्ति न केवल उनके उपन्यासों बल्कि समग्र साहित्य को सार्थ, पठनीय और विचारणीय बनाती है. यह साधारण बात नहीं है. यहां पंजाबी के प्रसिद्ध कहानीकार महेंद्र सिंह सरना का यह कथन गौरतलब है : ‘‘...जिस साहित्य के पास स्वस्थ मूल्यों की पूंजी नहीं, साहित्य की मंडी में उसका व्यापार खोटा है.’’

मिश्र जी का पहला उपन्यास ‘पानी के प्राचीर’ सन् 1961 ई. में प्रकाशित हुआ था. मिश्र जी ने स्वीकार किया है कि इसे लिखने की प्रेरणा उन्हें ‘रेणु’ कृत ‘मैला आंचल’ को पढ़कर मिली : ‘‘मुझे लगा, ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूं. अपने गांव के बारे में एक ऐसा उपन्यास क्यों न लिखूं, जिसमें जो देखा-सुना हुआ है, अनुभव का हिस्सा बन चुका है-वह भरपूर आए.’’ इस उपन्यास में ‘राप्ती’ और ‘गोर्रा’ नदियों के बीच का ग्रामीण अंचल जीवंत रूप में है : और समग्र रूप में भी. प्रभाकर माचवे ने इस उपन्यास के संदर्भ में लिखा है-‘‘रामदरश चाहते हैं, गांव की अच्छाई-बुराई सबको अपनी पूरी गोलाई के साथ स्वीकार करना. वे सिर्फ एक पक्षीय होकर गांव में सबकुछ मधुरामपुर नहीं देखना चाहते, न प्रगतिवादी सिद्धांतग्राहियों की भांति यहां की गंदगी और बुराई और मुफलिसी को ही उभारकर सामने लाना चाहते हैं.’’ यही वजह है कि ‘पानी के प्राचीर’ में यथार्थ-बोध और मूल्य-बोध साथ-साथ संश्लिष्ट रूप में है. हर बार आने वाली बाढ़ की विभीषिका ग्रामीण जीवन को किस तरह विपन्न, अभावग्रस्त, झगड़ालू, अंधविश्वासी और शोषित बना रही है, इसका जितना प्रामाणिक चित्रण मिश्र जी की ग्राांचलिक कृतियों-‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ में मिलता है, हिंदी उपन्यास में अन्यत्र दुर्लभ है. उनके उपन्यासों में आयी बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है, अव्यवस्था, अन्याय, अनैतिकता का गंदला प्रवाह भी उसे भयावह बनाता है. ‘पानी के प्राचीर’ का अंत आजादी मिलने पर हुआ है. नीरू जहां ग्रामीणों की नियति का भाष्य करता है, यहीं आजादी से जुड़ी उसकी आशा जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास को जताती-‘‘गांव के चारों ओर पानी की ये दीवारें जो आप देख रहे हैं, इन्हें गुलामी ने और बलवान बना दिया है-ये हमारी फसलें लूट लेती हैं-आज हमें आजादी मिली है. अब ये पानी की दीवारें टूटेंगी-खेतों में नये सपने खिलेंगे.’’

नीरू ने किसानों के तड़पते चेहरे, आंसू से भीगी सूनी आंखें, खून से चिपचिपी पीठें, क्षमायाचना करते हाथ देखे हैं. अतः आजादी न केवल नीरू अपितु किसानों के लिए भी मुक्ति का द्वार बनकर आती है. ‘जल टूटता हुआ’ में संदर्भ आजादी मिलने के बाद का है. उपन्यास के प्रारम्भ में ही सुग्गन मास्टर के जरिए यह सवाल उठता है कि ‘आजादी ने क्या दिया हमें?’ हमें अर्थात विशेष रूप से पिछड़े अंचल के किसानों को. बाद में आजादी के मिलने के बाद गांव की दिशा और बेहाल हो जाने पर चिंता उभरी है.

आजादी से जुड़े समता, समानता, न्याय आदि मूल्य संकटग्रस्त दिखायी देते हैं. महीप सिंह जैसे जो लोग कल तक साम्राज्यवादी सत्ता के मजबूत पाये थे, अपने दमनचक्र से जनता को पोसा करते थे, आजादी के बाद वे स्वदेशी बाना धारण कर लेते हैं. और आजादी के लिए जूझने वाला आम आदमी जहां का तहां उपेक्षित और ठगा-सा रह जाता है. मिश्र जी ने जग्गू हरिजन के माध्यम से वास्तविक स्वाधीनता सेनानियों की उपेक्षा का बयान किया है. यह बयान एक देशव्यापी हादसे को खोलने वाला है. जग्गू हरिजन आजादी के संग्राम में तिरंगा उठाए घूमे थे. लेकिन आजादी मिलने पर उनकी स्थिति गरीबी की रेखा के नीचे का जीवन जीने वाले वर्ग की ही रही. पत्तल उठाना और गोबर की रोटी खाना उनकी विवशता है. उनके अपने दलित समुदाय की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ा है-‘‘सभी बाभन उनके मालिक हैं-ये बाभन चाहे बाहर भीख ही क्यों न मांगते हों, मिलों की दरबानी, चपरासगिरी और कुलीगीरी ही क्यों न करते हों, रिक्शा ही क्यों न हांकते हों, चोरी-डकैती ही क्यों न करते हों, लेकिन गांव में सभी हरिजनों के मालिक हैं.’’

डॉ. विवेकी राय ने ‘जल टूटता हुआ’ की चर्चा देशव्यापी मोहभंग के संदर्भ में की है. इसमें संदेह नहीं कि इसमें व्यक्ति यथार्थ ‘स्वतंत्रता’ से जुड़ी आशाओं को तार-तार कर देनेवाला है. लेकिन इसमें तथ्यचेतना के समानान्तर जो मूल्यचेतना है वह पाठक को हताश-निराश करने के बजाय अवमूल्यों के प्रतिवाद का बन प्रदान करती है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस उपन्यास के पात्रों के संबंध में जो लिखा है, वह गौरतलब है-

‘‘यह पात्र टूटते हुए मूल्यों और बढ़ती हुई विसंगतियों को उभारते हैं और परिवर्तन की झंझा के पद संचारों का आभास देते हैं. परंतु ये सारे पद-सचार अलक्षित रह जाते-जैसा कि कई व्यंग्य प्रधान आधुनिक उपन्यासों में रह गये हैं, यदि सतीश, उमाकांत बदमी और कुंजू जैसे अविचल दृढ़ चरित्र पात्र इसमें न आये होते.’’

यहां आचार्य द्विवेदी ने जिस अविचल दृढ़ता की चर्चा की है, वह पात्रों की जीवन-मूल्यों में गहरी आस्था और वचन-कर्म की एकता से निर्मित है. इस उपन्यास में लवंगी ने जो सवाल पूछा है, वह वर्तमान दलित चेतना का एक प्रखर अंग है-‘चमार का खून-खून नहीं है, बाभन का खून-खून है. हमारी कोई इज्जत नहीं होती, क्या बाभनों की ही इज्जत होती है?’ सतीश आदि चरित्र इस उपन्यास में अवमूल्यों से जूझ रहे हैं और लहूलुहान हो रहे हैं, लेकिन सकारात्मक मानवीय मूल्यों में उनका विश्वास बना हुआ है-‘सत्य के लिए मूल्य तो देना ही पड़ता है. और जब तक कुछ लोग संगठित होकर मूल्य देने को तैयार नहीं होंगे और दूसरों की देखादेखी असत्य की ओर उन्मुख होते रहेंगे, तब तक गांव का क्या देश का और पूरे विश्व का उद्धार नहीं होगा?’

वस्तुतः ‘जल टूटता हुआ’ युगबोध, मूल्यबोध, भाषिक रचाव, कथनपद्धति-सभी दृष्टियों से एक उत्कृष्ट उपन्यास है. इसका प्रकाशन 1969 ई. हुआ था, हालांकि यह लिखा पहले जा चुका था. इसके आसपास छपे उपन्यासों-‘आधा गांव’, ‘रागदरबारी’, ‘अलग-अलग वैतरणी’ आदि की जितनी चर्चा हुई है, उतनी ‘जल टूटता हुआ’ की नहीं. आलोचकों की बाड़ेबंधी के अलावा मिश्र जी का शिविरबद्धता से अलग रहना भी शायद इसका कारण रहा था. ‘रागदरबारी’ आदि से वह कहीं से भी उन्नीस नहीं है, बल्कि अपनी सकारात्मक मूल्य-दृष्टि के कारण यह कहीं इक्कीस ही ठहरता है. ‘आधागांव’ आदि इन सभी उपन्यासों के अंत में समझदार और संवेदनशील व्यक्ति गांव की भयानकता से टकराकर भाग खड़े होते हैं. लेकिन ‘जल टूटता हुआ’ में गांव में ही रहकर गांव की बेहूदगियों से जूझने का संकल्प आश्वस्त करता है.

मिश्र जी के तीसरे उपन्यास ‘बीच का समय’ में कथ्य बदला हुआ है. इसमें काम-संबंधों के संदर्भ में नैतिकता का सवाल सिर उठाए खड़ा है. प्रोफेसर शील और छात्रा रीता के लगाव में कई वर्जनाएं-बाधाएं हैं. तमाम द्वंद्व के बीच में प्रो. शील को अपनी उस पत्नी के प्रति जिम्मेदारी का अहसास है, जो गांव में है. पत्नी अनपढ़ है, सुंदर भी नहीं है, शिक्षित पति की वास्तविक सहचरी बनने में अक्षम है लेकिन पति विवाह-विच्छेद जैसा कोई कदम नहीं उठाता. इसी तरह रीता भी नहीं चाहती कि क्षणिक उबाल में उसके पूज्य की प्रतिमा टूटे और चकनाचूर हो जाये. विवाहेतर देहसंबंध मिश्र जी के उपन्यासों में हैं, लेकिन वे बहुत अपरिहार्य होने पर ही स्वीकृत हैं. ‘जल टूटता हुआ’ में कुंजू-बदमी का संबंध इसी प्रकार का है. इस संबंध के

माध्यम से नयी मूल्यवत्ता को प्रतिष्ठित करने का आग्रह भी सक्रिय है. लेकिन ‘बीच का समय’ में मिश्र जी ने यौन-वर्जनाओं के उल्लंघन की जरूरत नहीं समझी है. ‘बीच का समय’ का शील प्रेम को उसके असली रूप में ‘जंगली’ मानता है लेकिन उपन्यासकार का स्टैंड रीता की मानसिकता के मेल में है. वह शील से पूछती है-‘कैसा लगता है सर, जब एकाएक कोई आदर्शमूर्ति टूटकर वहीं गिर जाती है, जहां हजारों-लाखों सामान्य मूर्तियां गिरी होती हैं.’ मिश्र जी के प्रायः सभी उपन्यासों में प्रेम एक उदात्त मूल्य के रूप में है, यह यदि देहभोग में परिणत हुआ भी है तो किसी विसंगति को चुनौती देने के लिए या किसी नयी मूल्य मर्यादा की ओर संकेत करने के लिए.

‘सूखता हुआ तालाब’ में गांव के भविष्य की चिंता प्रमुख हैः ‘क्या होगा गांव का, जहां जड़ता इतनी कि एक बेवकूफ आदमी भी सोखा-ओझा बनकर ठग ले और जहां चालाकी इतनी कि हर आदमी अपने स्वार्थ के लिए दूसरे को बेच खाये.’ ‘सूखता हुआ तालाब’ एक तरह से ‘जल टूटता हुआ’ का संक्षिप्त संस्करण है. इसमें गांव की तोड़ने वाली ताकतें और भी मजबूत हुई हैं. इसलिए मूल्यों में विश्वास रखने वाले देवप्रकाश को गांव से पलायन करना पड़ता है. लेकिन शंकर का सरपंच बनना संकेत है कि बेहूदगियों से जूझने के रास्ते बंद नहीं हुए हैं. यथार्थ बोध के स्तर पर अभी बहुत कुछ बचा हुआ है. यह विश्वास मिश्र जी के एक अन्य उपन्यास ‘अपने लोग’ में भी दिखायी देता है.

‘अपने लोग’ में एक संवेदनशील बुद्धिजीवी प्रमोद के कोण से अभाव और असमानता के प्रसार को चिंता की दृष्टि से देखा गया है. आजादी के बाद एक खास तबका खूब फला-फूला है. उसकी समृद्धि में जनसाधारण का घनघोर श्रम और दुर्गति का योगदान है-‘जहां वैभव है, वहां उसके नीचे एक उजड़ा हुआ जीवन पड़ा है, वैभव की कल्पना गरीबों के जीवन के उजाड़ के बिना हो ही नहीं सकती.’ प्रमोद मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित है. लेकिन इस उपन्यास-अन्याय को प्रश्रय देने वाली व्यवस्था के प्रति छुटपुट आक्रोश के अतिरिक्त कोई सामूहिक जुझारू अभियान देखने में नहीं आता. हां, उमेश और पवन के सहारे भविष्य के परिवर्तन की सम्भावनाएं इस उपन्यास में जरूर इंगित हुई है. जहां उपन्यासकार ने दो महत्त्वपूर्ण संकेत छोड़े हैं. उमेश पागल हो गया है. इस व्यवस्था में हर भावुक किन्तु जुझारू व्यक्ति की नियति अंततः पागल होना है. अकेला संघर्ष इसी नकारात्मक बिन्दु तक पहुंचाता है. यहां पर भी संकेतित है कि मौजूदा दौर में सत्य बोलने का साहस शायद पागलों में ही हर गया है. पवन के माध्यम से रचनाकार ने युवा पीढ़ी के विद्रोह-भाव और नव-निर्माण शक्ति में अपनी आस्था जतायी है. ‘आकाश की छत’ में कामरेड जगत् का निम्नवर्ग को अन्याय, शोषण के विरोध में तैयार करना सही कदम है. ‘आकाश की छत’ में प्रत्यक्ष हिंसा या वर्गशत्रु के वध का निषेध है, क्योंकि रचनाकार जानता है कि एक शोषक के मरने से लड़ाई खत्म नहीं होगी. एक शोषक के मरने पर उसकी जगह दूसरा शोषक उठ खड़ा होगा. ‘अपने लोग’ का मध्यवर्गीय प्रमोद अपने बेटे को जुझारू शक्तियों के साथ जुड़ते देखकर प्रसन्न होता है. उसे खुशी है कि उसकी भीरुता और निष्क्रियता या प्रायश्चित एवं प्रतिवाद नयी पीढ़ी द्वारा होने जा रहा है-‘कभी-कभी तड़प होती है कि काश मैं इस मिट्टी की गरीबी के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष कर पाता. मैं सक्रिय नहीं कर सकता. यह मेरी सीमा है, इसलिए वह चाह लिये मैं बराबर तड़पता रहा हूं. यह चाह तुम्हारे माध्यम से अभिव्यक्ति पा ले तो मुझे परम तृप्ति होगी.’

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘अपने लोग’ के संदर्भ में पाया है कि सामाजिक स्थितियों का चित्रण करते समय रामदरश मिश्र की प्रगतिशील दृष्टि उभरकर सामने आती है. इस कृति में रचनाकार ने बी. लाल-मंजरी, किसनलाल-इमरतिया के प्रेम के माध्यम से जातिगत ऊंचनीच को तोड़ना चाहा है. डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों में-‘‘यह भी कि लांक्षित ब्राह्मण और गरीब ईसाई या चमार एक धरातल पर खड़े होकर सामाजिक विषमता को झेल सकते हैं, नये समाज की सृष्टि कर सकते हैं. यह सृष्टि स्वस्थ और गहरी नैतिकता से युक्त है और सच्चे अर्थों में जनवादी और प्रगतिशील है, यह बहुत मूल्यवान है.’’

बाद के उपन्यासों में ‘रात का सफर’, ‘बिना दरवाजे का मकान’, ‘थकी हुई सुबह’, मुख्यतः नारी के संघर्ष की कहानी कहते हैं अतः इनमें नारी संबंधी रूढ़ियों और अवमूल्यों का प्रतिकार स्वाभाविक तौर पर काफी जगह घेरता है. ‘रात का सफर’ में पत्नी के साथ छल और अत्याचार को खारिज किया गया है. इस उपन्यास में ऋतु का अपने डॉक्टर पति को चांटा मारना पुरुष के सनातन एकाधिकार को चुनौती के साथ-साथ ‘सतीत्व’, ‘पातिव्रत’ आदि मूल्यों को नये संघर्ष में देखने-परखने की शुरुआत भी है. इस उपन्यास के एक पात्र का यह कथन सकारात्मक दिशा में संक्रमण का द्योतक और प्रेरक है-‘‘प्रेम के शव को ढोने से कोई फायदा नहीं है ऋतु! जीवन अमूल्य होता है. इससे संबंधित जब किसी वस्तु का मूल्य चुक जाये तो उसे छोड़ नहीं देना चाहिए?’’ नारी के संबंध में ‘जिजीविषा’ और अपने अस्तित्व-व्यक्तित्व को बचाये रखने की चिंता ‘बिना दरवाजे का मकान’ आदि कृतियों में भी व्यक्त हुई है. मिश्र जी के उपन्यासों में ‘मंजरी’ (अपने लोग), ‘बदमी’, ‘लवंगी (जल टूटता हुआ), ‘दीपा’ (बिना दरवाजे का मकान), ‘रूपमती’ (आकाश की छत), ‘लक्ष्मी’ (थकी हुई सुबह) आदि अनेक नारी चरित्र अपनी प्रखरता के चलते ध्यान खींचते हैं. इनके माध्यम से मिश्र जी ने यौन-नैतिकता से लेकर नारी मुक्ति तक के सवालों पर विचार किया है. इस विचार-विमर्श से ‘मुक्ति’, ‘सहयोग’, ‘सतीत्व’, ‘पातिव्रत’, ‘श्रद्धा-सम्मान’ आदि मूल्य कठिन आजमाइश के दौर में है. इनमें से अधिकतर नारियां शक्ति-पुंज हैं और पुरुष-प्रधान व्यवस्था द्वारा लादे गये मूल्यों से असहमति जताती हैं.

‘बिना दरवाजे का मकान’ की दीपा पेट की भूख, संतान की भूख, औरत की अपनी भूख के साथ-साथ सुरक्षा की भूख से एक साथ लड़ रही है. मल्लाह जाति की ये युवती महानगर में मेहनत-मजूरी करके जी रही है और अपने अपाहिज पति का भी पालन कर रही है. गांव में रूपन सिंह का हाथ दांतों से काटकर वह जिस ‘यौन शुचिता’ की रक्षा करती है, वह उसके महानगरीय जीवन में भी अक्षुण्ण रहती है. ऐसा नहीं कि देह की भूख उसे पीड़ित नहीं करती, लेकिन वह उससे जूझ पाने में सफल होती है. बसंत को वह समर्पित हो जाती है. लेकिन यहां ‘यौन शुचिता’ की रक्षा करने में पहल बसंत करता है. ‘स्वाभिमान’ और ‘स्वालंबन’-दीपा के व्यक्तित्व के दो आकर्षक पक्ष हैं और दोनों मिले हुए हैं. इनके बूते पर वह किसी भी असंगति और अन्याय का प्रतिवाद कर पाती है. एक जगह उसका कथन है-‘हाथ-पांव सलामत होने पर अपने मरद की भी धौंस नहीं सहते बीवी जी! हम लोग खुद अपने बल पर जी सकती हैं. एक मरद बिगड़ैल निकलेगा, उस ससुरे को छोड़कर दूसरा कर लेंगे. लेकिन आप लोग तो वहीं सड़ती रहेंगी, घर के अंतर सारा नरक भोगती रहेंगे और इज्जत का परदा टांगे रहेंगी.’ इस अवतरण में मध्यवर्गीय नारी और मेहनतकश नारी केसोच और कर्म के अंतर को समझा जा सकता है. मेहनतकश नारी को ‘पातिव्रत’, ‘सतीत्व’ से ज्यादा, ‘श्रम की शक्ति’ में विश्वास है. यह कथन कथित नारी-मुक्ति की दिशा नारी के आर्थिक स्वालंबन में निहित होने का संकेत भी देता है.

‘थकी हुई सुबह’ की लक्ष्मी कई अवसरों पर नारी के लिए निर्दिष्ट ‘अवमूल्यों’ के प्रति विद्रोह करती है. समाज में पुरुष को श्रेष्ठ और नारी को अधम मानने वाली विचारधारा को खारिज करते वह कहती है-‘बेटी-बेटे का भेदभाव मां-बाप के प्रति संतान के कर्तव्य को भी बांट देता है. पता नहीं किसने यह नियम बना दिया कि बेटी की हर चीज मां-बाप के लिए अछूत है. तो सुन लीजिए, मैं भी कोई निर्जीव चीज नहीं हूं कि जहां जैसे डाल दी जाऊं, पड़ी रहूंगी.’ लक्ष्मी का विद्रोहभाव उसके अपने कटु अनुभवों के भीतर से उपजा है और वह सोचती रही है-‘क्या स्त्रियों को दूसरा ईश्वर पैदा करता है या उसके यहां नारी-पुरुष के लिए दो नियम हैं?’ पति के पलायन कर जाने के बाद वह अपनी शिक्षा पूरी करती है और स्वालंबन की शक्ति से संपन्न हो जाती है. हालांकि रामधन मिश्र के प्रति समर्पित होना उसके तेज को कम करता है. यह पुरुषों की लोलुपता को देखते हुए एक ताकतवर पुरुष के साथ खुद को जोड़ लेना ‘सुरक्षा’ की दृष्टि से ठीक समझती है. यह निर्णय किसी नये ‘मूल्य’ के उदय का द्योतक नहीं है, बल्कि विकल्पहीनता की विवशता मात्र है.

नारियों की तरह ही रामदरश मिश्र के उपन्यासों में आये दलित चरित्र भी मानवीय और जनतांत्रिक मूल्यों के लिए जूझ रहे हैं. उपन्यासकार ने अपनी उपन्यास-यात्रा के प्रथम चरण से लेकर आज तक दलितों के उत्पीड़न का न केवल खुला विरोध किया है. अपितु समता, समानता, न्याय आदि मूल्यों का जबर्दस्त समर्थन भी किया है. ‘जल टूटता हुआ’ में हरिजनों या दलितों में अपने प्रति होने वाले अन्याय की चेतना जड़ पकड़ चुकी है वे सामंती शक्तियों से जूझने भी लगे हैं. जगपतिया का खेत महीप सिंह नहीं कटवा पाते क्योंकि वह गरीब, अछूत और पिछड़े वर्ग के वंचितों को एकजुट और संघर्ष-सक्षम बनाने में सक्षम होता है. उपन्यासकार की यह चिंता उपन्यासों में कई जगह सिर उठाती है कि लोग अकेले-अकेले क्यों प्रतिवाद करते हैं? यह निर्भ्रान्त है कि बिना सामूहिक संघर्ष के कुछ भी हासिल नहीं होगा. ‘बिना दरवाजे का मकान’ में कहा गया है : ‘डी.टी.सी. हो या और कोई व्यवस्था जब तक उसे एक बड़े समूह से टकराने का भय नहीं होता, कुछ नहीं करती.’ ‘आकाश की छत’ में दलित जन कामरेड जगत के नेतृत्व में एकजुट हो रहे हैं. कामरेड जगत अकेली लड़ाई और किसी एक के प्रति केंद्रित लड़ाई के अंतविर्रोधों से अवगत हैं. वे अंतिम विकल्प के तौर पर हिंसा को त्याज्य नहीं मानते-‘हमें तो उस व्यवस्था को खत्म करना होगा, जिसमें सेठ पैदा होते रहते हैं, लेकिन यह भी तुम ठीक ही कहते हो कि हमें कभी-कभी सेठ को भी मारना होता है.’

शिक्षा और संगठन ने दलित वर्ग हो जो मजबूती दी है, इसका प्रमाण ‘बीस बरस’ उपन्यास में भी है. इस उपन्यास में हरिजन युवती पढ़-लिखकर अध्यापिका बन गई है और सवर्ण लफंगों से डरती नहीं है-‘अब वे दिन गए जब ऊंची जाति के लफंगे हमें इस्तेमाल की चीज समझते रहे हैं.’ आर्थिक स्वालंबन ने दलितों को शक्ति प्रदान की है. ‘बीस बरस’ में दलितों के टोलों की आर्थिक स्थिति सुधर रही है और सुखदेव जैसे लोग उन्हें समता-समानता का पाठ पढ़ाकर अधिकारों के लिए लड़ना सिखा रहे हैं-

‘मैं अपने लोगों को सिखाता हूं कि तुम किसी से छोटे नहीं हो. तुम लोग अपनी मेहनत की कमाई खाते हो, फिर किसी के आगे झुकने का क्या मतलब? वे भी इंसान हैं, तुम भी इंसान हो. तुम्हें सारे इंसानी हक मिलने ही चाहिए.’ आज हिंदी में दलित-लेखन का अलग संकाय बन गया है. लेकिन हिंदी के आंचलिक उपन्यासों में दलितों की नियति और संघर्ष का जितना प्रामाणिक और मार्मिक बयान मिलता है, वह आज भी दुर्लभ है. मिश्र जी के उपन्यासों में आया दलित जीवन उनकी प्रत्यक्षानुभूति और पक्षधरता का संश्लिष्ट रूप लिए हुए है. यहां मूल्यबोध कहीं भी आरोपित न होकर कथात्मक रचाव में रचा-बसा हुआ है.

‘अपने लोग’ में मिश्र जी ने अनेक मुद्दों के साथ शिक्षा जगत् की आपाधापी पर भी गंभीरता से विचार किया है. उनके बाद के उपन्यास ‘दूसरा घर’ में भी शिक्षा जगत् की कुरूपता एक अहम् मुद्दा है. इस कृति में रामदरश मिश्र का अपना भोगा हुआ सच प्रतिबिंबित है. जिन परिस्थितियों में मिश्र जी गुजरात छोड़ने को विवश हुए थे लगभग उन्हीं स्थितियों में ‘दूसरा घर’ के डॉ. गौतम वहां से विदा होते हैं. प्रबंधतंत्र की निरंकुशता, योग्यता पर अयोग्यता को वरीयता, चाटुकारिता का माहौल, शिक्षक राजनीति के संदर्भों के बीच उपन्यासकार ईमानदारी, न्याय, संघर्ष आदि सकारात्मक अवधारणाओं को अपना समर्थन देता है. यह सकारात्मकता जातिवाद, दहेज, सांप्रदायिकता आदि विकृतियों को लेकर भी सामने आती है. जातिवाद का कड़ा विरोध करते हुए कहा गया है-‘जातिसूचक पुंछल्ले को काट फेंकना चाहिए और यह काम उन्हें शुरू करना चाहिए जिनके पुंछल्ले उनके अपमान के सूचक हैं.’ इस उपन्यास में समाज को जिन दो वर्गों-सुखी लोगों की कतार, लहूलुहान लोगों की जमात-में बांटा गया है, उनमें लहूलुहान वर्ग के साथ उपन्यासकार अपनी आत्मीयता अनुभव करता है. इस उपन्यास में ही नहीं अपनी समग्र उपन्यास यात्रा के दौरान उपन्यासकार की प्रतिबद्धता दुखी और लहूलुहान जमात के साथ रही है.

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में जो मूल्यवादी चिंतन उभरता है, वह प्रायः शिक्षित मध्यवर्गीय व्यक्तियों के माध्यम से आया है. नीरू, सतीश, प्रमोद, यश, डॉ. गौतम आदि को जो सकारात्मक मूल्य मिले हैं, वे कहीं से उधार लिये हुए और आरोपित नहीं हैं. वे पात्र अपनी जमीन से कमोबेश जुड़े हुए हैं और इन्होंने जो दृष्टि प्राप्त की है, उसमें पूवरंचल के कछार के परिवेश का बहुत हाथ है. प्रत्यक्ष अनुभव जब किसी बोध या दृष्टिकोण का निर्माण करते हैं, तब वह ठोस और टिकाऊ होता है. ‘अपने लोग’ का प्रमोद स्वीकार करता है कि जिस नदी की बाढ़ विभीषिका बनती है, वहीं टूटन से बचने की ताकत देती है-

‘तुम्हीं ने हमारे बचपन को गढ़ा है, तुम्हीं ने हमें सपने दिए हैं और तुम्हीं ने अपने फन फुफकार-फुफकारकर हमें अपने गुंजलक में लपेटा है और हमें लड़ने की अपार ताकत दी है, तुम्हारा प्यार और मार सबके लिए बराबर रहा है मां.’

अवमूल्यों से जुड़ने का बल उपन्यासकार को लोकजीवन के विश्वासों से भी मिला है. ‘जल टूटता हुआ’ का एक प्रसंग यहां द्रष्टव्य है ‘दशहरे के दिल ‘नीलकंठ’ के दर्शन से शुभ और मंगल होने की लोक-मान्यता है. गांव के बच्चे नीलकंठ के माध्यम से सीता को अपना संदेश भेजते हैं-‘नीलकंठ तिलवारी बारी/सीता से कहिअ भेंट अंकवारी/हमार नांव किसन मुरारी.’ इसकी व्याख्या उपन्यासकार ने जिस प्रकार की है, उससे उसका मूल्यवादी चिंतन मुखर हुआ है-

‘सीता कैद है रावण के यहां, आज ही मुक्त होगी. सीता धरती की बेटी है, धरती की बेटी कैद है धरती के शोषक के यहां. धरती के बेटे बेचैन हैं, अपनी बहन से मिलने के लिए, उन्हें मालूम है कि राम आज उद्धार करेंगे सीता का. भेंट अंकवार कह देना सीता से ओ भाई नीलकंठ. तुम्हीं कह सकते हो, परिंदे हो और शिव के प्रतिरूप हो.’

इस व्याख्या में कई संकेत छिपे हैं, जो शोषणमुक्ति, समता, समानता आदि मूल्यों के पक्ष में जाते हैं. ‘‘ग्रामवासियों के लिए परंपरागत दशहरा एक तरह से शोषण-मुक्ति का पर्व है. धरती-पुत्री सीता तो शोषक के पंजे से मुक्त हो गयी थी लेकिन धरती-पुत्री की बहुत-सी धरती आज भी शोषकों के चंगुल में है. स्थिति के इस विपर्यय के बावजद लोकजीवन में शोषण सरीखे नास्तिमूल्य को खारिज करने तथा समानता-समता स्थापित होने का आशावाद सबल है. वास्तविक स्थिति-शोषण की भयावहता को दिखाते हुए जन-मन में संचित शोषण मुक्ति की आकांक्षा को व्यक्त करना नकारात्मक मूल्यों की ओर प्रयाण करना है.’’ उपन्यासकार ने इसी प्रसंग में ‘नीलकंठ’ के दर्शन की महानगरीय स्थिति को भी ‘कन्ट्रास्ट’ में रखा है और परंपरा पर व्यावसायिकता के हावी होने की भर्त्सना की है-‘‘किन्तु यह नीलकंठ शहरों में बंद कर लिया गया. बहेलिया उसे पिंजड़े में बंद करके दर-दर घुमाता है और धर्मप्राण नगरजन दर्शन करते हैं, अपने पाप-ताप का शमन करते हैं...बहेलिए का नीलकंठ दो पैसे में धर्म बांटता फिर रहा है.’’ इस तरह के प्रसंग वृहत्तर मानव सत्य को स्पर्श करने की गवाही देते हैं.

रामदरश मिश्र ने अपनी मूल्यदृष्टि को प्रायः ‘कंट्रास्ट’ में प्रस्तुत किया है. वे एक ओर स्याह अंधेरे की भीषणता बयान करते हैं, दूसरी ओर रोशनी की चमक को अपना समर्थन देते हैं. उन्होंने हर उपन्यास में कुछ चरित्र नास्तिमूल्यों के प्रतीक रूप में रचे हैं और उनकी तुलना में सकारात्मक मूल्यों का कोई ‘मॉडल’ अवश्य है, जिसे उपन्यासकार का विश्वास और समर्थन प्राप्त है. ‘दीनदयाल’, ‘महीप सिंह’ (जल टूटता हुआ), ‘गजेन्द्र सिंह’ (पानी के प्राचीर), ‘सूर्यकुमार’ (अपने लोग), ‘मोतीलाल’ (सूखता हुआ तालाब), ‘रूपक सिंह’ (बिना दरवाजे का मकान), ‘बुद्धिसागर’ (थकी हुई सुबह), ‘पारसभाई’ (दूसरा घर) आदि नास्तिमूल्यों के संवाहक खल चरित्रों के मुकाबले ‘सतीश’ (जल टूटता हुआ), ‘नीरू’ (पानी के प्राचीर), ‘प्रमोद’ (अपने लोग), ‘देवप्रकाश’ (सूखता हुआ तालाब), ‘दीपा’ (बिना दरवाजे का मकान), ‘डॉ. गौतम’ (दूसरा घर) आदि चरित्रों की उपस्थिति मनुष्यता और उससे जुड़े मूल्यों में उपन्यासकार के विश्वास को पुष्ट करती है.

कई विचारसरणियों ने रामदरश मिश्र के उपन्यासों में व्यक्त मूल्यवादी चिंतन को पुष्ट किया है. डॉ. विवेकी राय की दृष्टि में श्री मिश्र मूलतः गांधीवादी हैं और समाजवादी विचारों से गहरे प्रभावित हैं. डॉ. विवेकी राय के अनुसार-‘‘कथाकार रामदरश मिश्र के सृजन-व्यापार में मूलधन गांधीवाद है और समाजवाद अनेक स्तरीय बढ़ोतरी के साथ ब्याज रूप में आया है. यह ब्याज चिंतन राष्ट्रीयता और मानवीयता की अपनी जमीन से जुड़ा होता है, अतः उपन्यासों में अनेक स्थलों पर मुखौटावादी कम्युनिस्टों की निंदा की गई है और जनवादी रंग लाने के लिए कहीं भी चालू राजनीतिक फार्मूलों का प्रयोग नहीं किया गया है.’’ सत्य, करुणा, अहिंसा आदि को महत्त्व देने तथा कहीं हृदय परिवर्तन के प्रमाणों से लगता है, मिश्र जी कुछ गांधीवादी मूल्यों के प्रति आस्थावान् हैं. लेकिन जैसा कि डॉ. महावीर सिंह चौहान ने लिखा है कि युग की किसी महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक समस्या के समाधान में वे हृदय-परिवर्तन की अवधारणा का उपयोग नहीं करते हैं. इसलिए उन्हें गांधीवादी नहीं कहा जा सकता है. वर्ग, शोषण, सम्पत्ति का संचय आदि को लेकर उनके विचार निश्चय ही समाजवादी हैं. मिश्र जी ने अपने साक्षात्कारों में स्वयं को ‘मार्क्सवादी’ कहा है और यह स्पष्ट किया है कि ‘मार्क्सवाद’ उन पर एक सीमा से अधिक नहीं छाने पाया है. उन्होंने इसे ‘नारे’ के रूप में न लेकर एक दृष्टि के रूप में लिया है, गरीबी के अपमान और दर्द को समझने और लिखने के निमित्त लिया है. लेकिन अधिकतर वामपंथी समीक्षक मिश्र जी को बिरादरी-बाहर ही मानते हैं. प्रायः उन्होंने रामदरश मिश्र के उपन्यासों की चर्चा ही नहीं की है. डॉ. नित्यानंद तिवारी, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे सहृदय समीक्षकों ने अवश्य मिश्र जी के उपन्यासों पर लिखा है : ‘अपने लोग’ पर लिखते हुए डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का विचार कुछ ऐसा है कि कथाचरित्र प्रमोद की तरह रामदरश जी भी अपने को मार्क्सवादी घोषित तो करते हैं, लेकिन राजनीति से कहीं नहीं जुड़ते. डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने यह आपत्ति की है कि इस उपन्यास में ‘व्यक्ति’ को राजनीति के चरित्र मानने की गलती की गई है.

वस्तुतः रामदरश के उपन्यासों में आये कथित मार्क्सवादी चरित्र अवसरवादी और कथनी-करनी में फर्क वाले हैं. स्व. सव्यसाची जैसे मार्क्सवादी लेखक इस बारे में दृढ़ थे कि मार्क्सवाद को मानने वाला ‘कम्यूनिस्ट’ एक श्रेष्ठ व्यक्ति होता है-‘‘कम्यूनिस्ट होना संसार का सबसे बेहतरीन इंसान होना है क्योंकि दुनिया में कम्यूनिस्ट ही ऐसे जीव हैं जो अपने लिए न जीकर समाज के लिए जीते हैं...’’ लेकिन जहां कम्यूनिस्ट अपने लिए ही जी रहे हों, दूसरों के शोधप्रबंध से 40-50 पृष्ठ उड़ाकर अपना शोधकार्य पूरा कर रहे हों, हर अकादमी, हर सरकारी संस्थान के दोहन में जुटे हुए हों, जातिवाद को खुलेआम बढ़ावा दे रहे हों, क्या तब भी उन्हें दुनिया के बेहतरीन आदमी के तौर पर चित्रित किया जाना चाहिए? मिश्र जी के उपन्यासों में आये रामकुमार, मोतीलाल, जनार्दन आदि तनिक भी अवास्तविक नहीं है. यदि उनके मन में कम्यूनिस्टों के प्रति कोई पूर्वाग्रह होता तो वे ‘कामरेड जगत’ (आकाश की छत) जैसे जुझारू और सकारात्मक चरित्र की सृष्टि नहीं करते. वर्गभेद, शोषण, वर्ग संघर्ष आदि से संबंधित उनकी जीवन दृष्टि पर मार्क्सवाद का बहुत गहरा असर है. मार्क्सवाद एक ऐसा मानवीय विचारवाद है कि कोई भी प्रबुद्ध जागरूक समकालीन लेखक उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता. मिश्र जी की मूल्य दृष्टि भी कई स्तरों पर मार्क्सवाद के चिंतन सूत्रों से प्रेरित, प्रभावित और निर्मित है. उनके उपन्यासों में बार-बार समता और समानता की मांग उभरती है. ‘आकाश की छत’ के अंत में आया कथन ‘और जवार को जीना है वो सेठ को खतम करना होगा’ संकेत देता है कि सेठ अर्थात पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा बहुत जरूरी है. मिश्र जी के हर उपन्यास में व्यवस्था-विरोध के तेवर हैं. पूंजीवादी तंत्र से लेकर आज के नवधनाढ्य वर्ग के हित में जुटी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्विरोध, उपन्यासकार के प्रहार की सीमा में है. परिवर्तनकामी व्यक्तियों और शक्तियों को अपना खुला समर्थन देते हुए रामदरश मिश्र ने जता दिया है कि वे जनहितकारी और सकारात्मक परिवर्तन में गहरा विश्वास रखते हैं.

झूठ, बेईमानी और प्रपंच की मुखर भर्त्सना, शोषण और अत्याचार का विरोध, वर्ग संघर्ष का आह्वान, दलितजन की पक्षधरता, रूढ़ि, जड़ता, अंधविश्वास से असहमति, परिवर्तनकामी शक्तियों का समर्थन-रामदरश मिश्र के उपन्यासों में व्यक्त मूल्य-चिंतन के प्रमुख पक्ष हैं. इन्होंने उनकी कृतियों को विचारोत्तेजक, पठनीय, विचारणीय, प्रासंगिक और बहुत कुछ स्थायी महत्त्व का बनाया है. यह उपन्यासकार का कौशल है कि उसने मूल्यों को संवदेनात्मक धरातल पर प्रस्तुत किया है, इससे कृतियों की संप्रेषणीयता बढ़ी है. हिंदी उपन्यास का कोई पाठक या समीक्षक यदि कुछ पूर्वाग्रहों से युक्त होकर भी विचार करेगा तो मिश्र जी की उपन्यास-यात्रा के तीन पड़ाव-‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘अपने लोग’ संपूर्ण हिंदी उपन्यास की स्थायी उपलब्धियों के रूप में दिखायी देंगे. उनके लघु उपन्यासों के महत्त्व पर आलोचकों का ध्यान कम गया है. ‘आकाश की छत’, ‘बिना दरवाजे का मकान’ आदि कृतियों में भी बहुत दिन तक जीवित रहने की शक्ति विद्यमान है, क्योंकि वे न केवल अनुभवों की गहरी जमीन में धंसी हुई अपितु महत्त्वपूर्ण जनधर्मी मूल्य दृष्टि से भी संपन्न है.

सम्पर्कः डी-131, रमेश विहार,

अलीगढ़-202001 (उ.प्र.)

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