मंगलवार, 19 सितंबर 2017

हास्य कविताएँ : 3 – कैलेन्डर की आखिरी तारीख : महेश संतुष्ट

नामदेव काकाड़े की कलाकृति

आदमी

भीड के आवागमन में
भीड का अंश हो गया-आदमी
लगता है लम्बी भीड़ में
भेड हो गया है'-आदमी ।

भयंकर रेल दुर्धटना के बाद
बिखरी हुई लाशों की
शिनाख्त कर भारी भीड़ में
एक एक- कर छंट गया है -आदमी ।

मुर्दे की अर्थी पर
मरघट तक आंसू बहाकर
अपने हिस्से की तलाश में
  खो गया है.. .आदमी ।

शादी, जश्न, जलसे एवं
भीड़ की अन्य किश्तों में
निमंत्रण पत्र की तरह
औपचारिकता का शिकार हो गया-आदमी ।

कानून-कचहरी में
एक दरख्वास्त के बाद
हस्ताक्षर के लिए, कागज और

कैलेंडर की आखिरी तारीख हो गया-आदमी ।

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काला गुलाब
-
जब भी मैं
फूलों की घाटी में
जाता हूं...
तो वहां,
मैं रोज
एक काली लडकी को
लाल गुलाब से
बातें करते देखता हूं ।

मैं देखता हूं
जब भी वह
अपनी काली अंगुलियों से
लाल गुलाब की
पखुडियों को सहलाती हैं
तो गुलाब शर्म से
और लाल हो जाता है

क्या गुलाब को
वह काली अगुलियां पसंद हैं?

यह तो मैं नहीं जानता! 
किन्तु इतना अवश्य जानता हूं कि-
  जिस गुलाब को
वह काली लड़की
वर्षों से निहारती आ रही हैं
  वह आजकल
''काला-गुलाब'' कहलाता है!

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संसद सदस्य

समाज में से
छंटनी किए हुए
वे
शरीफ
व्यक्ति ।
जो एक सैकिण्ड का काम
पांच साल में भी-
नहीं कर पाते?

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मजदूर

चुनावों के बाद
पूरे
पांच साल के लिए
हो जाता है ।
संसद से दूर
हां । मजदूर!

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थानेदार

एक अव्वल
दर्जे का
शरीफ व्यक्ति!

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शिकायत

कुछ लोगो में-
यह भी
आदत
होती है!

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राजनीति
मोटी पूंजी
लगाकर
पूंजी हडपने की
एक गुप्त नीति..!

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मख्यमन्त्री
एक
ऐसा
मुर्गा
जो सारे
मुर्गी खाने में
एक ही होता है ।

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हरिजन

आजादी की
मांग
करने वालों का
एक
गुलाम
व्यक्ति!'

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ओफिसर
आफिस
में
सर..!
किन्तु
घर
में
रबर'

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देश-भक्त

आजकल
लुटेरों
और
वेश्याओं के
सेवक ही
सच्चे देश भक्त
कहलाते हैं ।

 

-------------

नेता

वे सर्कस के-
शेर कहलाते हैं ।
और रोजाना
पांच किलो
कच्चा मीट खाते हैं ।
फिर भी साहले
'हैंटरधारी' ' के आगे
नपुंसक कहलाते हैं!

-------------

मन्त्री पद
प्रधानमन्त्री
जिंदाबाद ! का
नारा लगाते लगाते
जो गंगा
हो जाए !
बस !
उसी को मिलता है
यह अनोखा पद !

-------------

राष्ट्रपति-पद
एक
ऐसी
जवानी,
जो अक्सर
बुढ़ापे में ही मिलती है ।

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पति-पत्नि
कौन
कहता है,
एक
म्यान में-
दो तलवारें नहीं होती!
शादी के बाद
वह दोनों तलवारें
एक ही-
मकान में तो होती हैं ।

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उल्टी गंगा
आजकल
जो लड़ना
नहीं जानते---
उन्हें बनाया जाता है,
मुख्य सेनापति...!
और जो-
लिखना नहीं जानते,

उन्हें मुख्य प्रधान-सम्पादक!

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आलोचना

एक पुस्तक-
प्रतियोगिता में
जब एक लेखक की
पुस्तक को
स्वीकृति नहीं मिली!
तो लेखक ने
प्रतियोगिता आलोचना में ही
एक पुस्तक लिख डाली!

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लेखक
कहते हैं
लेखन भी
एक अछूत का रोग है ।
तभी तो
राजधानी में
एक-एक-परिवार के
छ छ: सदस्यों को-
यही रोग है!

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पत्नी

चाहे-
कितनी खूबसूरत
क्यों न हो?
किंतु पति को
हमेशा पडोसन,
कुछ ज्यादा,
सुन्दर दिखाई देती है
अगर
विश्वास न हो तो
अपने पड़ोसी से
अपनी पत्नी के बारे में
  पूछ कर देख लें..!

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दिमाग
जिसे
औरतें
अपने सिंगारदान में
संभाल कर रखती हैं! 

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अनहोनी

वह
लड़ने
गए...!
जख्मी होकर
आ गए ! !
....वो
बदला
लेने गई ! !
लौटकर
नहीं आई!!

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अपनापन

वह उम्र भर
खेलते रहे
जहरीले साँपों से-
- लेकिन जब मरे
तो आदमी के जहर से 

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शिवलिंग

परमेश्वर का
एक अद्भुत
नर-कंकाल !

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चढावा

पुजारी का
एक
अनिश्चित वेतन!

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सत्ता
विश्व की
सबसे मूल्यवान
  वस्तु!

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दंगा
यह भी
कैसी
आजादी है ।
मांगो तो
मौत मिलती नहीं-
बेमौत
लाशों के ढेर लग जाते हैं !

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प्रेम
आदमी
आदमी को खा रहा है ।
  हम-उम्र बनकर!
कौन,
कब,
  किसको खा गया-
  दोनों बेखबर!

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14

महेश सन्तुष्ट
सन् 1974 से साहित्य साधना में लगे हुए हैं । प्रारम्भ में कविताओं और समाज सुधारात्मक लेखों पर कलम अधिक चलाई । बाद में पत्रकारिता की ओर रुचि उन्मुख हुई । राष्ट्रीय स्तर के तीन दैनिकों के संवाददाता रहे हैं । इसके अलावा गंगानगर जिले के साहित्यकारो को प्रकाश मे लाने के लिए इन्होंने एक महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसकी आज भी प्रशंसा चर्चा होती रही है । वह हैं 'प्रयासिका' का प्रकाशन! इसमें जिले के लेखक-लेखिका का सचित्र, रचना सहित परिचय प्रकाशित हुआ है.
आकाशवाणी सूरतगढ से कई कहानियाँ एवं वार्ताएं आदि प्रसारित के साथ साथ पंजाब केसरी दैनिक ट्रिब्यून आदि अन्य पत्र पत्रिकाओं में भी बराबर छपते रहे हैं --
-महेश संतुष्ट
हनुमानगढ़, राजस्थान

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(हास्य-व्यंग्य कविता संग्रह - कैलेन्डर की आखिरी तारीख से साभार)

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