शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

छायावाद के प्रर्वतक पं. मुकुटधर पांडेय

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छायावाद के प्रर्वतक पं. मुकुटधर पांडेयः  -   
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   (विश्वबोध कविता संग्रह से, संपादक -डाँ०बलदेव)
  


प्रकाशकीय:-
युग प्रवर्तक कवि पं. मुकुटधर पांडेय की श्रेष्ठ और विलुप्त प्राय रचनाओं को प्रथम बार पुस्तकाकार प्रकाशित करते हुए हमें आपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। पांडेय जी के नाम पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से जिज्ञासा भरे पत्र आते रहे हैं। जिनमें हिन्दी के समर्थ आलोचकों से लेकर सामान्य पाठकों तक ने उनकी रचनाओं को पढ़ने की बार बार इच्छा  प्रकट की है। हिन्दी के अनेक शोधकर्ताओं को भी उनकी प्रमाणित सामग्री के अभाव में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इस अभाव को पूर्ण करने की दृष्टि से सीमित साधनों के बीच यह छोटा सा प्रयास है। ये कविताएं व्दिवेदी युग और छायावाद युग की कविताओं के प्रमाणिक दस्तावेज हैं। इनसे खड़ी बोली काव्य धारा के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी।
         आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है हिन्दी संसार इस कविता-संग्रह का स्वागत करेगा। हम पांडेय जी के ऋणी हैं जिन्होंने कृपा पूर्वक हमें यह सुन्दर अवसर प्रदान किया।
                                          बसन्त राघव
                                             1983
                               श्रीराम       
                              दो शब्द     


ये कविताएं अधिकांश व्दिवेदी युग की उपज हैं। कविता के क्षेत्र में खड़ी बोली अपने पैर जमा चुकी थी। ब्रजभाषा के पूर्ण कवि, हरिऔध आदि जो दो चार समर्थ कवि थे। नवयुवकों में मैथिलीशरण गुप्त, लोचन प्रसाद पाण्डेय (मेरे अग्रज),  आदि प्रासादिक शैली में राष्ट्रीय और आख्यानक कविताएं लिख रहे थे। हमारे घर के लघु पुस्तक-संग्रह में बंगला और ओड़िया के सामयिक काव्य साहित्य -मधुसूदन दत्त, हेमचन्द्र और राधानाथ की ग्रंथावलियों का प्रवेश हो चुका था। तब पूर्व में रव्युदय नहीं हुआ था, पर शीध्र ही रवीन्द्र नाथ और उनके समानांतर व्दिजेन्द्रनाथ राय भी पहुँच गए थे। इन सबका एक मिला जुला प्रभाव मुझ पर पड़ा था।
             तत्कालीन मासिक पत्र-पत्रिकाओं में मेरी छोटी - छोटी कविताएँ छपा करती थीं, पर 'पूजा फूल"के बाद उनका कोई संग्रह नहीं हो पाया था और वे इधर दुष्प्राप्य भी हो रही थी। डाँ० बलदेव के प्रयत्न से उनका जो संग्रह प्रस्तुत किया जा रहा है, वही इस पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो रहा है। इसके प्रकाशन का सम्पूर्ण श्रेय उन्हीं को है, जिसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ।     
                               मुकुटधर पाण्डेय
                   रायगढ़, मकर संक्रांति, सं २०४० वि
                          **.            **
          पं. मुकुटधर पांडेय का जन्म सन् 1895 ई० को बिलासपुर जिले के बालपुर ग्राम में हुआ था। किंशुक-कानन आवेष्टित चित्रोत्पला के तट - प्रदेश में बसा गांव रायगढ़-सारंगढ़ मार्ग पर चन्द्रपुर (जमींदारी) की पूर्व दिशा में स्थित हैं और महानदी के पुल या किसी टीले से घनी अमराइयों से झांकता दिखाई देता है। सूर्योदय हो या सूर्यास्त दोनों ही समय यहाँ की छटा निराली होती है।
          अपने अच्छे दिनों में चाहे ग्रीष्म हो, चाहे भरी बरसात, सर्द हवाओं के दिन , अंधेरी रात हो या उजेली, उसकी श्री सुषमा में कहीं कोई अन्तर नहीं पड़ता, खेत धान की नवमंजरियों से भरे हों या तीसी के नीले उजले फूलों से। मेंड़ों पर निहारिकाओं से विमल प्रकाश फेंकते दूर्वादल हों या सरस इक्षु के दण्ड वाले खेत या वातावरण में भूख को बढ़ाती हुई औंटते रसों से छनकर आती हुई गुड़ की गंध, ये रंगरूप , ये गंध ध्वनियाँ आज भी पाण्डेय जी के किशोर मन को ललचाते हैं। पांडेय जी की कविताओं में बाग - बागीचों और पलाशवन से घिरा छोटा सा गाँव बालपुर अपने अतीत की स्मृतियों में खो जाता है। महानदी के सुरम्य तट पर मंजरित आम्रतरुओं  में छिपकर गाती हुई कोयल, अंगारे से दहकते ठंडे पलाशवन, नदी के सुनील मणिमय आकाश में उड़ते कल -हंसों की पांत.....लहरों पर दूर तक जाती उनकी परछाइयां..... जल पंखियाँ का शोर, चक्रवाक दम्पति की प्रतिफल विकल पुकार, कारण्डवों का कल-कूंजन-चट्टानों पर जलधारा की अविराम कल-कल ध्वनि और दूर दूर तक विजन बालुकाओं का विस्तार , नौका बिहार करते.... फिरते अंधेरे के झुरमुट में जगमगाते जुगनुओं के बीच से गुजरते कवि का मन जब घर लौटता तो आंगन में उतर आई चांदनी में पुनः खो जाता.... न भूख न प्यास ... तब कवि की सुकुमार कल्पना एक अज्ञात रहस्य की ओर इंगित करती.... कच्चे धागे से वह कौन-सा पट बुनती यह  भावानुभूति की चीज है।


          समूचा परिवार साहित्य साधना में आकंठ डूबा हुआ। पं. लोचन प्रसाद पांडेय की रचनाओं का सुलेख करते,  आगन्तुक कवियों और सन्यासियों का गीत-संगीत सुनते, पार्वती लायब्रेरी में अध्ययन करते या रहंस बेड़ा में अभिनय करते, कवि मुकुटधर पांडेय का बचपन लुकाछिपी में कविता रचते बीत जाता है। पितृशोक से रचना कर्म गतिशील हो उठता है। चौदह वर्ष की उम्र में पहली कविता "स्वदेश बान्धव" में प्रकाशित होती है। खेल ही खेल में ढेर-सी कविताएँ रजत और स्वर्ण पदकों की उद्घोषणा के साथ हितकारिणी, इन्दु, स्वदेश बांधव, आर्य महिला, विशाल भारत तथा सरस्वती जैसी श्रेष्ठ पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर छपने लगती हैं। देखते ही देखते सन् 1916 में सन् 1909 से 15 तक की कविताएं मुरली-मुकुटधर पाण्डेय के नाम से इटावा के ब्रह्म-प्रेस से सज-धज के साथ "पूजा फूल'" शीर्षक से प्रकाशित होती है। उसी वर्ष किशोर कवि प्रवेशिका में प्रयाग विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण भी हो जाता है। बालपुर और रायगढ़ कुछ दिनों के लिए  छूट-सा जाता है-- कवि अधीर हो पुकार उठता है--


    "बालकाल तू मुझसे ऐसी आज बिदा क्यों लेता है,
     मेरे इस सुखमय जीवन को दुःखमय से भर देता है।"


         इलाहाबाद में रहते हुए दो तीन माह मजे में गुजरे, फिर वहाँ से एक दिन अचानक ही टेलिग्राम.... और तीसरे दिन अस्वस्थता की हालत में रायगढ़। यहाँ महामारी फैली हुई है। पूज्याग्रज पं० लोचन प्रसाद पांडेय ने जीप की व्यवस्था कर दी है। शाम होते-होते घर लौट आते हैं। फिर सदा के लिए काँलेज का रास्ता बन्द। वहीं बालपुर में पिता श्री व्दारा स्थापित विद्यालय में अध्ययन/ बाकी समय हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला और उड़ीया साहित्य के गंभीर अध्ययन, अनुवाद और स्वतंत्र लेखन में।अब उनका ध्यान गाँव के काम करने वाले गरीब किसानों की ओर गया। उन्होंने श्रम की महिमा गायी।
"छोड़ जन-संकुल नगर निवास किया. क्यों विजन ग्राम     में गेह ,
नहीं  प्रसादों  की  कुछ  चाह - कुटीरों  से  क्यों   इतना     नेह ।

फिर तो मानवीय करुणा का विस्तार होता ही गया और वह करुणा पशु-पंक्षियों और प्रकृति में भी प्रतिबिंबित होने लगी..... कुछ कुछ रोमाटिज्म की शुरूआत जैसी। हिन्दी काव्य में एक नई ताजगी पैदा हुई। स्थूल की जगह सूक्ष्म ने लिया, व्दिवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता फीकी पड़ने लगी। प्रेम और सौंदर्य का नया ताना-बाना बुना जाने लगा, जिसमें वैयक्तिक रागानुभूति के साथ ही रहस्यात्मक प्रवृत्तियां बढ़ने लगी और पद्यात्मकता की जगह प्रगीतात्मकता प्रमुख होती गयी। इस धारा पर मैथिली शरण गुप्त, बद्रीनाथ भट्ट और जय शंकर प्रसाद भी अग्रसित हो रहे थे। इस  समय पांडेय जी प्रायः सभी प्रमुख पत्रिकाओं के लिए महत्वपूर्ण हो उठे। हितकारिणी के सम्पादक श्री नर्मदा मिश्र ने 5/10/1913 को एक पत्र लिखा था, जिसका एक अंश यहाँ उद्धृत है। - "आपकी एक कविता इस अंक में छप रही है। कृप्या दूसरी कोई अच्छी-सी कविता भेजियेगा। कृतज्ञ होउंगा। मेरी दृढ़ इच्छा रहती है कि प्रत्येक अंक में आपकी एक न एक लेख अवश्य रहे, पर यह आपकी कृपा और इच्छा के अधीन है। " इतना ही नहीं "सरस्वती" की फ्रि लिस्ट में उनका नाम दर्ज हो गया। "किसान"जैसी कविता के लिए सम्पादक पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने लिखा था-" ऐसी कोई चीज बन जाय तो रजिस्टर्ड डाक से सीधे "विशाल भारत" को भेजने की कृपा करेंगे।"
          "पूजा फूल" के प्रकाशन के बाद पहले-पहल तो उन्होंने विशुद्ध मानवीय प्रेम का गीत गाया:-

                 हुआ प्रथम जब उसका दर्शन
                 गया हाथ से निकल तभी मन।


    फिर यह पार्थिव प्रेम अपार्थिव प्रेम में बदल गया-:-


     "देखेंगे   नक्षत्रों   में  जा  उनका   दिव्य   प्रकाश,
   किसकी नेत्र ज्योति है अद्भुत किसके मुख का हास।"


"कुटिल-केश चुंबित मुख मंडल का हास" कवि के मलिन लोचनों में सदा के लिए दिव्य प्रकाश बन गया। लेकिन यह अलौकिक सत्ता निवृत्ति मूलक नहीं, प्रवृत्ति मूलक है। इसीलिए कवि उसे स्पष्ट भी कर देता है:-
                    हुआ प्रकाश तमोमय जग में
                    मिला मुझे तू तत्क्षण जग  में
                    तेरा  बोध  हुआ  पग  पग  में
                    खुला       रहस्य        महान।

         कविता लेखन के साथ ही गद्य लेखन भी समान गति से चल रहा था। इस बीच एक घटना घटी, उनके किसी मित्र ने ऐसी भंग खिलाई कि उसकी खुमारी आज भी दिलों-दिमाग को बैचेन कर बैठती है। जन्म कुंडली में किसी उत्कली ज्योतिषी ने चित्त विभ्रम और हिन्दी -भाषी ज्योतिषी ने 'चित्तक्षत' लिखा था। यह घटना 1918 की है जो सन् 1923 में चरम सीमा में पहुंच गयी। मानसिक अशान्ति से साहित्य - साधना एकदम से छिन्न-भिन्न हो गई। शोध-प्रबन्धों ने गलत - सलत बातें लिखीं। कतिपय सज्जनों ने उन आलोचकों को मुह-तोड़ जवाब भी दिया, लेकिन कवि ने उन्हें क्षमा कर दिया। "बात यह थी कि सन् 1923 के लगभग मुझे एक मानसिक रोग हुआ था। मेरी साहित्यिक साधना छिन्न भिन्न हो गयी, तब किसी ने मुझे स्वर्गीय मान लिया हो तो वह एक प्रकार से ठीक ही था। वह मुझ पर दैवी प्रकोप था, कोई देव - गुरु - शाप या कोई अभिचार था। यह मेरे जीवन का अभी तक एक रहस्य ही बना हुआ है।"


          पांडेय जी ने मानसिक अशान्ति के इन्हीं क्षणों में "कविता "और "छायावाद"  जैसे युगांतरकारी लेख और "कुररी के प्रति" जैसे अमर रचनाएँ लिखीं।
            पंडित मुकुटधर पांडेय संक्रमण काल के सबसे अधिक सामथ्यर्वान कवि हैं। वे व्दिवेदी युग और छायावाद युग के बीच की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी हैं जिनकी काव्य-यात्रा को समझे बिना खड़ीबोली के दूसरे-तीसरे दशक तक के विकास को सही रूप से नहीं समझा जा सकता, उन्होंने व्दिवेदी-युग के शुष्क उद्यान में नूतन सुर भरा तथा बसन्त की अगवानी कर युग प्रवर्तन का ऐतिहासिक कार्य किया।


           वे जीवन की समग्रता के कवि हैं।उनके काव्य में प्रसन्न और उदास दोनों भावों के छाया चित्र हैं। उन्हें प्रकृति के सौंदर्य में अज्ञात सत्ता का आभास मिलता है,
उसके प्रति कौतूहल उनमें हर कहीं विद्यमान है। यदि एक ओर उनके काव्य में अन्तर-सौंदर्य की तीव्र एवं सूक्ष्मतम अनुभूति , समर्पण और एकान्त साधना की प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति है तो दूसरी ओर व्दिवेदी युगीन प्रासादिकता और लोकहित कि आदर्श।


          सन् 1915 के आस पास स्वच्छन्दतावादी काव्य-धारा चौड़ा पाट बनाने में लगी थी, व्दिवेदी युगीन तट -कछार उसमें ढहने लगे थे। इस धारा के सबसे सशक्त हस्ताक्षर थे जयशंकर प्रसाद और मुकुटधर पांडेय । इसके समानांतर सन् 1920 तक व्दिवेदी युग भी संघर्षरत रहा कहा जा सकता है, उसका प्रभाव सन् 1935 तक रहा। मुकुटधर पांडेय में स्वच्छन्दतावादी और व्दिवेदी -युगीन काव्य की गंगा-जमुनी धारा यदि एक साथ प्रवाहित दिखे तो आश्चर्य नहीं। लेकिन तय है उस युग के काव्य का प्रवर्तन उन्हीं से होता है। उन्हीं की प्रगीत रचनाओं से होकर छायावादी कविताएं यात्रा करती हैं, और उन्होंने ही सर्वप्रथम उस युग की कविताओं को व्दिवेदी युग से अलग रेखांकित किया। "कविता" (हितकारिणी1919) तथा  "छायावाद"
(श्रीशारदा 1920) जैसी सशक्त लेखमाला व्दारा ही उस युग की कविता की पहचान होती है। इस कविता धारा को सांकेतिक शैली के अर्थ विशेष में पांडेय जी ने "छायावाद" नाम दिया था।
       वैसे छायावाद का प्रथम प्रयोग श्रीशारदा की लेखमाला के प्रकाशन के पूर्व मार्च 1920 की हितकारिणी में प्रकाशित उनकी कविता "चरण प्रसाद"
में हुआ है:-
                     भाषा क्या वह  छायावाद
                     है न कहीं उसका अनुवाद

मेरे विचार से यह छायावाद की एक सुन्दर व्याख्या है। और इसका प्रयोग हिन्दी में आप्त वाणी जैसा ही हुआ है। स्वतः स्फूर्त और परम पूर्ण।
         कवि मुकुटधर पांडेय अपनी सहजात प्रवृत्तियों के साथ ही युग बोध से भी जुड़े, और यही वजह है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं। उनके रचना संसार में व्दिवेदी युग और छायावाद के काव्य संस्कार मौजूद हैं। इसी अर्थ में मैंने उन्हें संक्रमण काल का कवि कहा है। वे सन् 1909 से 1923 तक अत्यधिक सक्रिय रहे। हिन्दी प्रदेश के वे शायद अकेले निर्विवाद और.लोकप्रिय कवि थे, जो उस समय की प्रायः सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के मुख पृष्ठ में ससम्मान स्थान पाते रहे।


          पं. मुकुटधर पांडेय की कविताएं सन् 1909 से 1983 तक फैली हुई हैं। उन्होंने बारह वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया था। इकहत्तर वर्षों की प्रदीर्घ साधना को कुछ पृष्ठों में मुद्रित नहीं किया जा सकता।  पूजा-फूल में कुल 74कविताएं हैं। तीन पं. मुरलीधर पांडेय की तथा इकहत्तर मुकुटधर पांडेय जी की। यह महज संयोग है कि इतनी ही रचनाएँ इस संकलन में अनजाने आ गयी हैं। पुस्तक का शीर्षक उनकी प्रसिद्ध कविता "विश्वबोध"के नाम पर रखा गया है, कोई आग्रह नहीं आखिर एक शीर्षक ही तो देना था।


           पं. मुकुटधर पांडेय जी की करीब तीन सौ कविताएं मेरे पास संकलित हैं। पिछले एक दशक से मैं साहित्य मनीषी पं. मुकुटधर पांडेय"शीर्षक एक स्वतंत्र पुस्तक लिख रहा था, इसी दौरान ये कविताएँ पुरानी पत्र-पत्रिकाओं, कुछ पुस्तकों और कुछ पांडेय जी से प्राप्त हो गयी, उन्हीं में से यह चयन है। कविता के नीचे विवरण दे दिया गया है। अतः अलग से उल्लेख करना औपजारिकता ही है। क्रमांक चार से अठारह "पूजा फूल" से ली गयी है। जीवन साफल्य "काल की कुटिलता"और शोकांजलिक कविता-कुसुम माला में भी संकलित है। व्दिवेदी युग में वे अनुवादक के रुप में लोकप्रिय थे। अंग्रेजी और बंगला की अनूदित रचनाओं ने खड़ी बोली कविता धारा को प्रभावित किया हो तो आश्चर्य नहीं, यहां बंगला की चार अनूदित रचनाएँ भी शामिल हैं। अन्तिम ग्यारह कविताएं सन् 60 के बाद की है। कविताएं एक क्रम में है ताकि कवि.के विकास क्रम को देखा-परखा जा सके।


          और अन्त में , इस संकलन के लिए पांडेय जी ने जिस औदार्य से अनुमति दी, इस आभार को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। हिन्दी के नये पुराने पाठकों तक पांडेय जी की अन्य रचनाएं भी मैं पहुँचा सकूँ यह मेरी एकान्त कामना है।
                                        डाँ०बलदेव
रायगढ़:-दिनांक19/11/83


                              कविता
                             *******
                                             मुकुटधर पांडेय
   कविता सुललित पारिजात का हास है,
          कविता नश्वर जीवन का  उल्लास  है ।
   कविता रमणी के उर का  प्रतिरूप है,
          कविता शैशव  का   सुविचार अनूप है।
   कविता  भावोन्मतों   का   सुप्रलाप  है,
           कविता  कान्त -जनों का  मृदु   आलाप है।
   कविता गत गौरव का स्मरण- विधान है,
            कविता  चिर-विरही का  सकरुण  गान है।
   कविता  अन्तर उर  का बचन-प्रवाह  है,
              कविता  कारा  बध्द हृदय   को आह  है।
   कविता  मग्न   मनोरथ  का  उद्गार    है,
                कविता   सुन्दर  एक  अन्य  संसार  है।
   कविता  वर  वीरों  का स्वर  करवाल  है,
                 कविता आत्मोध्दरण हेतु दृढ़ ढाल है।
   कविता   कोई   लोकोत्तर  आल्हाद   है,
                कविता सरस्वती  का  परम  प्रसाद  है।
   कविता  मधुमय -सुधा सलित की है घटा,
                  कविता कवि के एक स्वप्न की है  छटा।
चन्द्रप्रभा,1917                
                            (  बिश्वबोध कविता संग्रह से पृ.9 )


                           चरण-प्रसाद
                           **********
   कण्टक- पथ  में  से पहुँचाया  चारु  प्रदेश
   धन्यवाद  मैं   दूँ   कैसे   तुझको   प्राणेश!
                       यह  मेरा  आत्मिक  अवसाद?
                       हुआ मुझे   तब चरण-प्रसाद  ।
   छोड़ा   था  तूने  मुझपर  यह  दुर्ध्दर-शूल,
   किन्तु  हो  गया  छूकर  मुझको  मृदु-फूल
                       यह  प्रभाव  किसका अविवाद?
                       आती  ठीक  नहीं    है    याद। 
   जी   होता   है   दे   डालूँ   तुझको   सर्वस्व,
   न्यौछावर कर  दूँ  तुझ  पर सम्पूर्ण निजस्व।
                        उत्सुकता   या    यह   आह्वाद?
                        अथवा   प्रियता   पूर्ण  प्रमाद  ?
   लो निज अन्तर से मम  आन्तर -भाषा जान,
   लिख सकती लिपि भी क्या उसके भेद महान।
                      भाषा    क्या   वह    छायावाद,
                      है    न   कहीं  उसका अनुवाद।
                                          *  *
हितकारिणी, मार्च1920
(विश्वबोध कविता संग्रह पृ. 40)

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