शनिवार, 23 सितंबर 2017

लघुकथा // तृप्ति // राजेंद्र ओझा

राजेन्द्र ओझा

*तृप्ति*

    आज कुछ अलग घटित हुआ। ऐसा जो कभी सोचा नहीं गया।सोचा ही नहीं तो देखा तो  और भी नहीं। 'संतोष होना चाहिए' जैसी बातें तो हम करते हैं, लेकिन कभी  संतोष नहीं रखते । आज 'संतोष का होना' होते हुए देखा। उसमें  एक "तृप्ति" दिखी। उसमें "बस और नहीं" दिखा। चेहरे पर जो भाव दिखे उसको व्याख्यायित करने के लिए शब्द  अभी सृजित नहीं हुए।

     पितृपक्ष ढलान पर था। लगभग  अस्त होते हुए पितृपक्ष पर पितरों की याद में भोजन करवाने का विचार परिवार में चल रहा था। गरीबों को पूरी और सेवँई   खिलाने के  अंतिम निर्णय के साथ विमर्श पूरा हुआ।

   दूसरे दिन मैं अपने बेटे के साथ पूरी और सेवँई लेकर गरीबों को खिलाने के लिए निकला। पानी पाउच भी रख लिए थे साथ में।

   रास्ते में  दूर  पोटली लटकाये    एक आदमी दिखा। पास पहूंचने पर देखा तो वह एक सपेरा था। उसे हमनें पूरी और सेवँई दी। वहीं कचरा बिनने वाला भी पहूंच गया।

"वाह" सपेरे ने कहा। ये वाह "सुख से भरा घडा" था। वह अपनी पेपर प्लेट किनारे रखने जा रहा था, जिसे कचरा बिनने वाले ने उठा लिया। "बड दिनों बाद मीठा खाए हों" जीवन का कुछ कंकरीला हिस्सा इस मिठास में घुल गया था।

     कुछ दूर आगे दो-चार बूढे भिखारी बैठे थे। अपनी बातों में खोये। जीर्ण-शीर्ण काया, पुराने-फटे कपड़े, आधा-अधूरा भरा पेट, धूल भरी जमीन, लेकिन एक शांति तिर रही थी उनके चेहरों पर। मुश्किल से मिलने वाली इस 'शांति' का उनके पास उपलब्ध होना, सुकून के साथ ही साथ एक प्रश्न था मेरे लिए। उन्हें भी पूरी, सेवँई देते हुए हम आगे बढ़ गयें।

  पूरी- सेवँई से खाली होता थैला एक अनदिखे सुख से भर भी रहा था। नदी जिसे "खारुन नदी" के नाम से जाना जाता है के पास हम पहुंच चुके थे।  इस स्थान को महादेव घाट के नाम से जाना जाता है।  नदी के किनारे भगवान शिव का बहुत पूराना मंदिर है, और लगभग तीर्थ के रूप मे विख्यात है। सावन माह के अतिरिक्त अन्य वृत्त- त्योहारों पर भी यहाँ मेले जैसा माहौल बना रहता है। यूँ पूरे वर्ष इस जगह भीड़ बनी रहती है, और इसीलिए ही भीख से अपना जीवन यापन करने वाले अनेक लोग हर समय यहाँ मिल ही जाते हैं।

    हमारे पास जो सामग्री शेष थी, वह यहाँ बांटने के लिए पर्याप्त थी। दोपहर का समय था और वे सब टीन से बने शेड के नीचे कतार से बैठे थे। हम यहाँ उन्हें कुछ बांटने के लिए ही आये हैं ये जानते हुए भी वे भीड़ के रूप मे हमारे पास जमा नहीं हुए। दो छोटी लड़कियां  तो हमारे पास से होते हुए आगे भी  निकल गयी। इस अविश्वसनीय अनुशासन ने मुझे चौंकाया।

   पेपर प्लेट और  दोना देने के बाद हमने पूरी और सेवँई उन्हें दी। जब और देने लगे तो एक भिखारन जो बहुत बूढ़ी हो चुकी थी ने कहा- भइगे बेटा, होगे।ओला दे दे, बिहनिया ले ओ हा कुछु नई पाय हे।कुछ दूर बैठी एक औरत की तरफ इशारा करते हुए उसने कहा।    ये शब्द विश्वास करने लायक नहीं थे, लेकिन सुनें तो जा ही रहे थे।

    आगे चली गईं दोनों लड़कियां वापस आ रही थी। उन्हें भी हमने पूरी और सेवँई देनी चाही। एक लड़की ने तो कुछ भी लेने से मना ही कर दिया। "भोजन" के रूप में कुछ भी मिलना निश्चित न होते हुए भी 'मना करना' अद्भुत और अकल्पनीय था।  हमने कहा थोडी सेवँई ले ले। उसने सेवँई तो ले ली लेकिन पूरी देने पर वो बोली - रोटी हावे मोर कने, ओखरे संग खाहूँ।

    हमारे द्वारा दी जाने वाली पूरी लेकर और उसे रात के लिए रखकर, रात की भूख के लिए वह निश्चिंत हो सकती थी, लेकिन विकट अनिश्चितता के बाद भी  लोभ, लालच उनके आसपास कहीं नहीं था। मैं फिर चौंका।

     जो लाए थे वह सब बांट चुके थे लेकिन  भीख के सहारे जो जीवित है उनसे बहुत कुछ  ऐसा  लेकर जो शहर की सोच में कहीं गुम हो चुका है लेकर लौट रहे थे हम।

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