शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

दर्द ही ज़िंदगी का आख़िरी सच : ख़ानाबदोश - वीणा भाटिया / मनोज कुमार झा

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अजीत कौर की आत्मकथा ‘ख़ानाबदोश’ को पढ़ते हुए यह समझा जा सकता है कि आत्मकथा लिखना वाकई उनके लिए कितना कठिन रहा होगा। दर्द के समन्दर में पैठ कर या आग़ के दरिया से गुज़र कर ही ऐसी कृति सामने आ सकती है। किसी भी आत्मकथा में व्यक्ति के जीवन का सच सामने आता है। यह सफ़ेद के साथ स्याह भी होता है। एक व्यक्ति के जीवन में अच्छाइयों के साथ बुराइयाँ भी होती हैं, कई ऐसे प्रसंग होते हैं जिनका सामने आना ज़रूरी तो होता है, पर वह असुविधाजनक भी हो सकता है। महात्मा गाँधी ने कहा था कि आत्मकथा लिखना तलवार की धार पर चलने जैसा होता है। सच और केवल सच को सामने लाना बहुत आसान काम नहीं है। कहा जा सकता है कि आत्मकथा-लेखन किसी के लिए एक अग्नि-परीक्षा के समान हो सकता है। इसकी आग़ में जल कर लिखने वाले का व्यक्तित्व कुंदन की तरह निखर जाता है। पर आत्मकथा लिखने का साहस सबों में संभवत: नहीं होता। आत्मकथा लिखने वाले बहुत ही सच्चे, खरे और साहसी किस्म के लोग ही होते हैं। इस दृष्टि से महात्मा गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ विश्व की सर्वश्रेष्ठ आत्मकथाओं में मानी जा सकती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी आत्मकथा लिखी, और भी कई राजनेताओं ने। विश्व साहित्य में गोर्की की आत्मकथा जो उपन्यास के रूप में है – मेरा बचपन, जीवन की राहों पर और मेरे विश्वविद्याल अनुपम कृति है।

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हिन्दी में भी अच्छी आत्मकथाएँ लिखी गई हैं, पर ज़्यादा नहीं। राहुल सांकृत्यायन की मेरी जीवन यात्रा जो कई खण्डों में है, उल्लेखनीय कृति है। पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की ‘अपनी ख़बर’ छोटी, मगर कड़वे और नंगे सत्य को उजागर करती एक सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा है। हरिवंशराय बच्चन ने भी कई खण्डों में आत्मकथा लिखी। पर इस क्षेत्र में हिन्दी लेखकों ने उदासीनता ही दिखाई है। वहीं, लेखिकाओं में तो इस विधा में प्रभा खेतान, मन्नू भंडारी, कुसुम अंसल और कुछ अन्य को छोड़ कर संभवत: किसी ने हाथ नहीं आजमाया। मराठी में हंसा वाडेकर ने लिखा है। उर्दू में इस्मत चुगताई की आत्मकथा ‘काग़ज़ी है पैरहन’ अपने ढंग की खास ही रचना है। बांग्ला में भी कुछ स्त्री रचनाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं, जिनमें बेबी हालदार की ‘आँधेर आलो’ उल्लेखनीय है। पंजाबी में अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ बेहद लोकप्रिय आत्मकथा है। दिलीप कौर टिवाणा की आत्मकथा ‘नंगे पाँवों का सफ़र’ भी क्लासिक आत्मकथाओं की श्रेणी में आती है।

(ऊपर चित्र में - अजीत कौर के साथ उनकी पुत्री अर्पणा कौर)


पंजाबी में अजीत कौर आजादी के बाद उभरी प्रमुख रचनाकारों में हैं। इनकी आत्मकथा ‘ख़ानाबदोश’ इस दृष्टि से एक अनुपम कृति है कि इसमें एक स्त्री के जीवन-संघर्ष, आत्म-संघर्ष के साथ ही अपने समय का सामाजिक यथार्थ संपूर्ण जटिलता के साथ परत-दर-परत सामने आया है। अजीत कौर आजादी के बाद की पंजाबी की सबसे उल्लेखनीय साहित्यकार मानी जाती हैं। इनकी रचनाओं में स्त्री के जीवन के संघर्ष के साथ उसके प्रति परिवार और समाज का भेदभाव भरा दृष्टिकोण बहुत ही प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है। उनकी आत्मकथा ‘ख़ानाबदोश’ में न केवल निजी जीवन की विडम्बनापूर्ण स्थितियाँ, बल्कि पूरा सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ प्रतिबिम्बित होता है। एक पुरुष वर्चस्व वाले समाज में बचपन से ही एक स्त्री को जितनी तरह की बंदिशें झेलनी होती हैं, जिस घुटन का सामना करना पड़ता है, अपनी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है और और संवेदनशील मन पर इसका क्या असर होता है, इतने जीवंत रूप में इस आत्मकथा में सामने आया है कि पाठक को लगता है कि वह सब कुछ एक चल-चित्र की भाँति देख रहा है। इस आत्मकथा में एक पूरा युग जीवंत हो उठा है, जिसमें न जाने कितने तरह के बदलाव आ रहे हैं, पर वह एक प्रसव-पीड़ा से गुज़र रहा है। अजीत कौर ने अपनी आत्मकथा में जिन सच्चाइयों को सामने रखा है, उसे देखते हुए समझा जा सकता है कि इसकी लेखन-प्रक्रिया उनके लिए कितनी दर्द भरी रही होगी। दरअसल, वह अंतहीन दर्द का ही एक जीवंत दस्तावेज़ है।

अजीत कौर ने इस आत्मकथा के बारे में शुरुआत में ही लिखा है, “दर्द ही ज़िंदगी का आख़िरी सच है। दर्द और अकेलापन। और आप न दर्द साझा कर सकते हैं, न अकेलापन। अपना-अपना दर्द और अपना-अपना अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम ज़िंदगी की गलियों से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने जख़्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भीड़ों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफ़े बाँट रहे थे। दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही भोगना होता है, तो फ़िर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ? मैं तो एक जख़्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख़्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी – अपने जख़्मों से शर्मसार, हमेशा उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक ख़ामोशी से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पड़ी?"

आत्मकथा की शुरुआत होती है अजीत कौर की छोटी बेटी कैंडी के साथ फ्रांस में हुई दुर्घटना के साथ जिसकी ख़बर उनकी बड़ी बेटी फ़ोन पर अर्पणा देती है। कैंडी वजीफ़ा पा कर फ्रांस पढ़ाई के लिए जाती है, जहाँ वह बुरी तरह जल जाती है और अंत में भीषण दर्द सहने के बाद उसकी मौत हो जाती है। अजीत कौर बेटी के साथ हुई दुर्घटना की ख़बर सुनकर कैसे फ्रांस जाती हैं, कैसे बेटी के ठीक होने की दुआएँ करती रहती हैं बिना खाए-पिए, पर आख़िर बेटी उनके सामने ही दम तोड़ देती है। इतनी बड़ी त्रासदी के बाद कैसे वह हिम्मत जुटा कर वापिस आती हैं और फ़िर शुरू होता है उनका जीवन-संघर्ष। अजीत कौर लिखती हैं – “हर हादसे के बाद लगता है कि ज़िंदगी में अब कुछ भी नहीं बचा। बचना ही नहीं चाहिए। बच ही नहीं सकता। पर ज़िंदगी तो कम्बख़्त आख़िर ज़िंदगी है। मनहूस, बदबख़्त, कमज़र्फ़, ढीठ ज़िंदगी! जब मन का, और रूह का, और जिस्म का एक साबुत टुकड़ा काट भी दिया जाए, तो भी बाक़ी की लँगड़ी, लूली, कोढ़-खाई ज़िंदगी चलती ही जाती है। बेशर्म, बेहया, ढीठ यह ज़िंदगी!” समझा जा सकता है कि अजीत कौर ने ज़िंदगी के किन स्याह रंगों से, किस दर्द में डूब कर ये सब लिखा है।

इसके बाद वे अतीत में लौटती हैं अपने बचपन में। लाहौर में जहाँ वह पैदा हुईं, पली-बढ़ीं, जहाँ उनके नाना-नानी और तमाम रिश्तेदार थे और जहाँ था परम्परावादी परिवार में लड़कियों पर हर तरह का बंधन। बाहर मत जाओ, दरवाजे से मत झाँको, यह न करो, वह न करो। जहाँ हर क़दम पर एक लड़की होने की कमतरी का अहसास कराया जाने का दर्द और उस विडम्बना को उन्होंने शिद्दत के साथ महसूस किया। लाहौर में बिताए अपने बचपन का जो चित्रण अजीत कौर ने किया है, वहाँ घनीभूत संवेदना के साथ उस समय का पूरा परिदृश्य जीवंत हो उठता है। अजीत कौर के लेखन में वाकई शब्दों की जादूगरी है। वह ऐसा गद्य है जिसकी संवेदना काव्यात्मक है।

इसके बाद कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अपने शिक्षक बलदेव से उनका रागात्मक संबंध बनता है। बदलेव साहित्यिक व्यक्ति हैं और उनसे उनका विविध विषयों पर चर्चा के साथ किताबों का आदान-प्रदान शुरू होता है। कब यह आकर्षण प्रेम में बदल जाता है, इसका पता उन्हें भी नहीं चलता। तरुणाई के इस प्रेम का बहुत ही काव्यात्मक चित्रण अजीत कौर ने किया है। साइकिल से कॉलेज जाते हुए बलदेव से रोज एक एकांत स्थल पर मिलना, घँटों बातें करना और दीन-दुनिया को भूल कर एक ऐसे अलौकिक जगत में पहुँच जाना जिसकी अनुभूति सच्चा प्रेम करने वाले ही कर सकते हैं। अजीत कौर और बलदेव के इस प्रेम में स्वाभाविक तौर पर दैहिक आकर्षण तो है, पर वह आख़िर तक प्लूटोनिक ही रह जाता है। यद्यपि जब घरवालों को पता चलता है इसके बारे में तो लानत-मलामत कम नहीं होती, फिर बलदेव से रिश्ते की बात होती है, रिश्ता तय भी हो जाता है, लेकिन इसी बीच कुछ ऐसा घटता है कि यह अंज़ाम तक नहीं पहुँच पाता। यानी दर्द का एक और दरिया सामने हिलोरें लेने लगता है। खास बात ये है कि बलदेव के संपर्क में आने के बाद ही अजीत कौर कहानियाँ लिखना शुरू करती हैं और साहित्य का व्यापक अध्ययन भी। उन्हें अमृता प्रीतम के पिता से पढ़ने का मौक़ा भी मिलता है, जिसका उन्होंने प्रसंगानुकूल उल्लेख किया है। इस बीच, एक कहानीकार के रूप में उनकी ख्याति फैलने लगती है। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ प्रकाशित होने लगती हैं। पर घर का माहौल भिन्न है। वहाँ औरत के लिए लक्ष्मण रेखा बहुत पहले से खींच कर रखी हुई है। उस बंद माहौल में अजीत कौर का आत्म-संघर्ष उनकी गहरी जिजीविषा से ही प्रतिफलित होता है।

बलदेव से रिश्ता टूटने के बाद उनका विवाह एक परंपरागत परिवार में कर दिया जाता है, जहाँ हर तरह की बंदिशें होती हैं। पुराने विचारों के उनके पति के लिए पत्नी की जगह रसोई और घर के कामकाज तक ही सीमित है। वहाँ से लेखिका की ज़िंदगी का एक नया दुखपूर्ण अध्याय शुरू हो जाता है। पति को उनका लिखना-पढ़ना तक पसंद नहीं। मजबूरन उन्हें यह छोड़ना पड़ता है। जब पहली बच्ची होती है तो पति और ससुरालवालों का कटाक्ष भी सहन करना पड़ता है। पति अक्सर उन्हें मायके भेज देते हैं। कुछ महीने मायके फिर ससुराल। यह सिलसिला लगातार जारी रहता है। उनके स्वाभिमान को कुचलने की लगातार कोशिशें। वह सब सहन करती जाती हैं, क्योंकि परंपरागत परिवार में यही सिखाया गया है कि पति के आगे मुँह मत खोलो। उसकी आज्ञा का पालन करो। इसी बीच, वे परिवार के साथ शिमला और अन्य जगहों पर घूमने जाती हैं और उसी दौरान देश को आजादी मिल जाती है। आजादी और उसके साथ विभाजन। फिर उनका अपना शहर लाहौर उनके लिए परदेश हो जाता है। इस विडम्बना की बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति इस आत्मकथा में हुई है। अजीत कौर ने लिखा है – “पाकिस्तान बना तो हम शिमला में थे। बस, जिस तरह अक्सर पहाड़ों पर जाया करते थे, उसी तरह। कि अचानक एक सुबह पता चला कि हिन्दुस्तान आज़ाद हो रहा है, रात को बारह बजे, और उसके दो टुकड़े हो रहे हैं। रात को हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया, और हम बेघर होकर उजड़ गए। यह एक बहुत बड़ी त्रासदी थी। फ़िर उनका परिवार लाहौर लौट नहीं सका। किसी पारिवारिक मित्र की सहायता से जालंधर में रहने का बंदोबस्त हुआ। बाद में दिल्ली शिफ्ट हो गए। उनके पिता ने जिन्हें वे दारजी कहती थीं, दिल्ली में ही अपना दवाखाना खोल लिया। उनके पति भी दिल्ली ही आ गए। दूसरी बार बेटी पैदा होने पर पति की बेरुखी और उत्पीड़न और बढ़ गया। वह उन्हें हमेशा उनके पिता के घर छोड़ आते थे। फिर कुछ महीने बीतने के बाद वापिस ले आते थे। यह सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा। उन्होंने उन पर नौकरी करने के लिए भी दबाव बनाया, पर पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने से साफ मना कर दिया, क्योंकि वहाँ गैरमर्दों के बीच काम करना पड़ता। मजबूरन वे गर्ल्ज़ स्कूल में शिक्षिका का काम करने लगीं। फिर भी उनके ज़ुल्म बदस्तूर जारी रहे। वह अपने पति के घर और अपने पिता के घर के बीच फुटबॉल बन गई थीं। आख़िर विवाह के बारह साल बीतने के बाद जब आठवीं बार उनके पति ने उन्हें उनकी माँ के घर भेजा तो उन्होंने यह तय कर लिया कि अब दोबारा इस घर की दहलीज़ के अंदर कद़म नहीं रखूँगी। उन्होंने अपनी छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ख़ुद अपने भरोसे जीने का फ़ैसला किया। इसे उन्होंने अपना नया जन्म माना। अजीत कौर लिखती हैं – “पहला जन्म तो नानी के पीर मक्की वाले घर में हुआ था। दूसरा बलदेव की बाँहों में, जिन्होंने मेरी मिट्टी को गूँध कर दुबारा मेरा बुत बनाय था, जिस्म का भी और रूह का भी। तीसरा, जब विवाह हुआ था, और सबने कहा था कि यह बेटियों का दूसरा जन्म होता है। पिछला सब भूल कर, मर कर, नए घर के लोगों में, और नई ज़िम्मेवारियों के साथ। और चौथा, जब मैंने ख़ाविंद के घर की दहलीज़ लाँघते हुए फ़ैसला किया था कि अब दोबारा उस घर में क़दम नहीं रखूँगी।” यह एक बड़ा और कठोर निर्णय था। पर बाद में उन्होंने अपनी माँ का घर भी छोड़ दिया और वर्किंग वुमन्स हॉस्टल में रहने लगीं। दोनों बच्चियों का स्कूल में दाखिला करवाया। उस दौरान उन्होंने जो आर्थिक परेशानियाँ झेलीं और जो संघर्ष किया, वह सबके वश की बात नहीं। वह अपने अकेले के दम पर ट्रेड मैग़जीन निकालती हैं कई भाषाओं में, ताकि दूसरे देशों से जो ट्रेड होते हैं, उनमें ये काम आए। यह मैग़जीन काफी सफ़ल भी होती है। पर कई समस्याएँ भी आती हैं और एक स्त्री होने के नाते उन पर जो कमेंट आदि होते हैं, वह उन्हें झेलना पड़ता है। ऐसे कई प्रसंग हैं आत्मकथा में। एक स्त्री को बिना किसी वजह के जो बदनामी झेलनी पड़ती है और चाहे वह किसी काम से किसी से मिले, लोग उसका नाम उससे जोड़ कर शिगूफ़े ही छोड़ते हैं। इसका जिक़्र भी इस आत्मकथा में आया है।

इसके बाद वह दौर भी आता है जब इनके खाविंद़ का रवैया बहुत ही कठोर हो जाता है और वो इन्हें धमकियाँ देने लगते हैं कि बेटियों का अपहरण करवा दूँगा और और सिंगापुर की वेश्या मंडियों में बेच दूँगा। इससे ये डर जाती हैं और बौखला भी जाती हैं। जवाब देती हैं कि सिंगापुर क्यों, यहीं दिल्ली में जीबी रोड पर बेच दो, तुम्हें भी कभी सुख मिलेगा। लेकिन पति के डर से वे बच्चियों का दाखिला बाहर किसी दूसरे शहर में करवा देती हैं, पर इससे खर्च बढ़ जाता है। वे लिखती हैं कि पहले भी काम पर से आने के बाद या कभी कुछ देर हो जाने के बाद उन्हें पति ताना देते थे कि किस यार से मिल कर आ रही हो। जाहिर है, कितने दुख और दर्द को झेलते हुए भी वह लगातार लेखन में लगी रहीं, यह उनके हिम्मत और जज्बे की ही बात है।

इसके बाद, हादसों का हुजूम।

गुनाहे अव्वल – औरत होना

गुनाहे दोम – अकेली औरत

गुनाहे सोम – अकेली और अपनी रोटी ख़ुद कमाती औरत

गुनाहे अज़ीम तरीन – अपनी रोटी ख़ुद कमाती, ज़हीन, ख़ुद्दार, अकेली औरत, इस देवताओं के मुल्क़ हिंदुस्तान में।

ये है लब्बो-लुबाब अजीत कौर की आत्मकथा ‘ख़ानाबदोश’ का, जिसमें उल्लेखित सभी कहानियाँ और उनके संदर्भ इस एक लेख में नहीं समा सकते। पर 1984 का जिक़्र ज़रूरी है। तब तक उनकी बड़ी बेटी अर्पणा कौर एक ख्यातिलब्ध चित्रकार बन चुकी थीं, पर्याप्त नाम कमा चुकी थीं, लेकिन अजीत कौर के पास अपना एक अदद घर मौजूद नहीं था। वर्किंग वुमन्स होस्टल से किराए के घरों तक का सफ़र जारी था। 1984 के सिख दंगों ने अजीत कौर को और अर्पणा कौर को भी भीतर से हिला दिया। जहाँ तक संभव हो सकता था, उन्होंने पीड़ितों की मदद की, पर उस दौर में उनके लिए किराए का एक घर ढूंढ पाना बहुत मुश्किल हो गया था। ऐसी बात नहीं कि घर नहीं मिलते थे। मिलते थे, पर सिख पहचान के साथ दिल्ली में किराए का घर मिलना असंभव-सा लगने लगा था। फिर किसी तरह जामिया मिल्लिया के एक सहृद्य प्रोफेसर ने उन्हें अपना घर किराए पर रहने के लिए दिया। ऐसे ही हाल से दो-चार उन्हें तब होना पड़ा था जब 1977 में इंदिरा गाँधी की हार के बाद केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। एक वकील के घर में वे किराए पर रह रही थीं, जो जनता पार्टी से जुड़ा था और जिसने उन्हें बहुत परेशान किया। मुक़दमेबाजी में उलझाया। तब ज्यूडिशियरी की असलियत उन्हें साफ़ दिखाई पड़ी। मनमानी फ़ीस लेकर भी बड़े से बड़ा वकील उनके पक्ष में दलील करने को तैयार नहीं था। अजीत कौर ने लिखा कि इनकी स्थिति वेश्याओं से भी गई गुजरी है, क्योंकि एक वेश्या पैसे लेने के बाद मुकरती नहीं, जबकि ये साफ धोखा दे देते हैं। इन कठिनाइयों और तल्ख़ अनुभवों के बावजूद ख़ास बात ये है कि अजीत कौर की रचना-धर्मिता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वे और भी मजबूत होती चली गईं।

इस बीच, एक और प्रकरण रहा जिसने उनके दिल को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया और वह था एक बुक सेलर और पब्लिशर ओमा से उनका प्रेम प्रकरण। ओमा शादीशुदा था और उसने उन्हें अपनी किताबों को हिंदी और अंग्रेजी में भी प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित किया था। यह उस दौर की ही बात है जब वे वर्किंग वुमन्स हॉस्टल में रहती थीं और उनकी बेटियाँ दूसरे शहर में हॉस्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थीं। ‘सात नीम-कश तीर’ से लिखा गया यह अध्याय अंतिम है। शुरुआती हिचक के बाद उसके साथ उनका इश्क़ परवान चढ़ा और ओमा उनकी ज़िंदगी में पूरी तरह शामिल हो गया, जिस्मानी और रूहानी हर तरह से। पति से अलग होने के बाद यह उनका अंतिम प्रेम प्रकरण रहा। कई वर्षों का उनका यह साथ भी उन्हें आख़िर में दर्द ही दे गया, जब ओमा पूरी तरह से भोग लेने के बाद उन्हें तनहा छोड़ कर गुम हो गया। फिर कभी नहीं मिलने के लिए। जबकि इस ख़ुद्दार महिला ने कभी भी उससे आर्थिक या अन्य किसी तरह की मदद नहीं ली। वे तो बस उसके प्रेम में डूबी थीं और यह प्रेम भी बहुत हिचक के बाद शुरू हुआ था। जब ओमा नाम का वह शख्स उन्हें अकेला छोड़ बंबई और बैंगलोर शहर में चला गया और वे उसका पीछा करती वहाँ गईं, फिर भी उसने मिलना गवारा नहीं किया तो कहाँ जातीं। किस दर पर। फिर बिस्तर, हॉस्टल और बुखार। लिखा है – “बुख़ार भी कई बार कितनी मदद करता है, चढ़ा भी तो अपने बिस्तर पर वापस पहुँचा कर। शायद उसे पता चल गया था, कि मुझे साथ की ज़रूरत है। शायद उसे पता चल गया था, कि मैं बेहद अकेली हूँ।”

तो ज़िंदगी ख़ानाबदोश रही। कहीं कोई अपना ठिकाना नहीं। कोई घर नहीं, कोई अपना नहीं, बस अकेलेपन और दर्द का समन्दर, जिसमें डूब कर मोती निकालती रहीं। अपनों ने जो दर्द दिया, उसके बदले दूसरों को ख़ुशियाँ बाँटती रहीं। यही है सफ़र एक ख़ानाबदोश का।

कहा जा सकता है कि अजीत कौर की यह आत्मकथा विश्व आत्मकथा साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसमें सिर्फ़ उनका जीवन ही नहीं, एक पूरे काल-खण्ड की गाथा सामने आई है। इसमें अपने समय का इतिहास जिसमें स्त्री पीड़ितों में सबसे पीड़ित है, अभिलिखित है।

Email – manojkumarjhamk@gmail.com

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