गुरुवार, 7 सितंबर 2017

कहानी // अग्नि दान // शालिनी मुखरैया

अजय शुक्ला की कलाकृति
“राजेश भाई नहीँ रहे “ आफिस से घर आते ही पत्नी ने सूचना दी. मन को एकदम से गहरा झटका लगा.  सहसा विश्वास ही नहीँ हुआ कि ऐसा भी हो सकता है. अभी सुबह ही तो मुलाकात हुई थी , कितने खुश थे वह. बड़ी बेटी अमेरिका से जो वापिस आ रही थी उस दिन.  दो ही तो बेटियाँ हैँ उनके ,बहुत ही  होशियार और सुशील.बड़ी  बेटी  मैत्रेयी  ने एमबीए किया था और अमेरिका कि किसी अच्छी कम्पनी मेँ उसे नौकरी मिल गयी थी और छोटी वाली नेहा अभी कालेज मेँ ही थी. राजेश ने अपनी दोनोँ बेटियोँ को बेटोँ की तरह पाला था. कभी भी किसी प्रकार का भेद्भाव नहीँ किया था और दोनोँ बेटियोँ ने भी अपने पिता का पूरा मान रखा था. पूरी सोसाइटी मेँ  उनकी तारीफ होती थी.


मैँने तुरंत अपनी पत्नी को राजेश के घर चलने के लिये कहा. वहाँ पहुँच कर देखा तो लोगोँ की भीड़ जमा थी. राजेश का  व्यवहार ही ऐसा था. बहुत ही मिलनसार और हँसमुख स्वभाव के थे राजेश , इस कारण सोसाइटी मेँ सबसे मधुर सम्बन्ध थे. उन की पत्नी सुरेखा का रो रो कर बुरा हाल था ,बार बार पछाड़ खा कर बेहोश हो जातीँ. अमेरिका से बड़ी बेटी भी आ चुकी थी ,उसने सपने भी न सोचा था कि जिस पिता से आने से कुछ घंटे पहले ही बात हुई थी ,उनसे मुलाकात भी नहीँ हो सकेगी. वह सदा  सदा के उन्हेँ छोड़ कर चले  जायेँगे. राजेश बड़ी बेसब्री से मैत्रेयी के आने का इंतज़ार कर रहे थे.  दिल्ली फ्लाइट लेट होने पर उसने मैत्रेयी से बात भी की थी. मैत्रेयी ने घर आने के लिये टैक्सी ले ली थी और तीन – चार घंटे मेँ घर आने वाली थी. दोपहर का खाना खा कर राजेश आराम करने के लिये  बिस्तर पर लेटे थे.

एक घंटे बाद सुरेखा ने राजेश को हिला कर जगाना चाहा तो भय के कारण उसकी  चीख निकल गयी. राजेश इस दुनिया से जा चुके थे ,शायद नीँद मेँ ही हृदयाघात हुआ था. आनन – फानन मेँ ही पूरी सोसाइटी मेँ खबर फैल गयी थी. कई सारे लोग राजेश के घर जमा हो गये. तभी राजेश की बड़ी बेटी की कार  वहाँ आ कर रुकी. दरवाजे पर भीड़ देख कर उसका मन किसी अनहोनी की आशँका से काँप उठा.  वह भीड़ को चीरती हुई घर मेँ दाखिल हुई तो दहाड़ेँ मार कर रोती हुई माँ के स्वर ने मन- मस्तिष्क सब को शून्य कर दिया.  अपनी  आँखो के सामने अपने पिता को को देख कर उसके आँसुओँ का ज्वार बह निकला.

जैसे –तैसे  उसने अपनी माँ और बहन को सम्भाला.  सभी रिश्तेदारोँ को खबर कर दी गयी थी. राकेश के दोनोँ भाई दूसरे  शहर से आ चुके थे.  सभी पड़ोसियोँ ने मिल कर अंतिम संस्कार की तैयारियाँ कर ली थीँ.पंडितजी आ चुके थे और अंतिम रस्मेँ बाकी थीँ , तभी वहाँ सुगबुगाहट उठी कि मृतक को दाग कौन देगा. सभी रिश्तेदार चेहरे पर प्रश्न चिन्ह लिये खड़े थे. राजेश के कोई पुत्र तो था नहीँ ,ऐसे मेँ भाई का ही फर्ज़ बनता था कि वो इस रस्म को निभाये. मगर आजकल रिश्ते कितने खोखले होते हैँ यह ऐसे ही वक़्त पर पता चलता है.  राजेश के दोनोँ भाई एक दूसरे का मुँह ताक रहे थे और चालाकी से एक दूसरे पर डाल कर बचना चाह रहे थे. जो दाग देता उसे पूरे 13 दिन तक रह कर सभी रस्मेँ निभानी पड़तीँ.  बाहर हो रही कानाफूसी की खबर जब राजेश की बेटी मैत्रेयी तक पहुँची तो वह अन्दर तक हिल गयी.

अपनी पछाड़ खायी माँ को वह और दु:ख मेँ नहीँ देखना  चाहती थी. मन ही मन उसने कोई निर्णय ले लिया और बाहर आ कर शांत स्वर मेँ बोली -- ”पंडितजी , पिताजी के अंतिम संस्कार की सारी रस्मेँ मैँ पूरी करूँगी “ बाहर सारी भीड़ इस कथन से अवाक थी. एक नये सिरे से काना फूसी भीड़ मेँ शुरू हो चुकी थी,
“भला लड़कियाँ भी कभी शमशान जाती हैँ क्या ?” जो लोग समाज के ठेकेदार बने फिरते हैँ सबके चेहरे से नक़ाब उतरे हुये थे ,मगर किसी ने आगे आ कर जिम्मेदारी उठाना स्वीकार नहीँ किया.  ”पिताजी के कोई बेटा नहीँ है तो क्या हुआ ,हम बहनोँ को उन्होँने ने बेटे की तरह ही पाला है “ मैत्रेयी का रुँधा हुआ स्वर था.                                                                .

”मेरे पिताजी किसी की दया दृष्टि के मोहताज नहीँ  है” ”मैँ अपने पिता के अंतिम संस्कार की सारी रस्मेँ निभाउँगी ,जिसे मेरे निर्णय से ऐतराज़ है वो लोग यहाँ से जा सकते  हैँ “ विरोध का स्वर मन्द होने लगा ,मैत्रेयी और उसकी बहन ने सारी रस्मेँ निभायीँ.  वातावरण मेँ “राम नाम सत्य है” का स्वर गूँज उठा.  जिस बेटी को राजेश कन्यादान कर विदा करने के सपने देख रहा था उसी पिता को उस बेटी को अग्निदान देना पड़ा. समाज के सारे ठेकेदार मुँह बाये देखते रहे.

आखिर कब तक बेटियोँ और बेटोँ मेँ फर्क चलता रहेगा. किसी न किसी को तो इन रुढियोँ को खत्म करने के लिये  आगे आना पड़ेगा , अग्निदान करना पड़ेगा ?

                                      

शालिनी मुखरैया
                                         विशेष सहायक
                                         शाखा मेडीकल रोड ,

अलीगढ़                                        

22.07.2017

2 blogger-facebook:

  1. सच कहा किसी न किसी को तो रूढ़ियों को तोड़ना पड़ेगा। सुंदर कहानी। कहानी के टेक्स्ट में ' ंं' की जगह चन्द्रबिंदी का उपयोग किया गया है। उसमे सुधार कर लें।
    duibaat.blogspot.com

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  2. आपके सुझाव के लिए धन्यवाद

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