सोमवार, 18 सितंबर 2017

नन्दलाल भारती की रचनाएँ

विदाई(कहानी)


पूरे गाँव मे कौतूहल का बाजार इतना गर्म था कि छोटे बच्चों को भी अनमना सा लग रहा था। सुखीराज पलंग पर पड़े पड़े आनंदित हो रहे थे,उन्हें अपार खुशी मिल रही थी, हो भी क्यों न शहर में पले,बढ़े और पढ़े इंजीनियर पोते के ब्याह की बात जो थी।गाँव वालों के लिए शहर की बारात में शामिल होने को लेकर उत्सुकता थी। गांव से शहर बारात जाने की मुख्य वजह थे सुखीराज, जिनका सारा क्रियाकर्म पलंग पर ही हो रहा था। सुखीराज कि खुशी के लिए यह सब कुछ हो रहा था।सुखीराज कि खुशी का ठिकाना न था, वे अपने पैरो पर खड़ा तो नहीं हो सकते थे, पोते की बारात में जाने के अनशन पर थे ।कुछ बुजुर्ग गांव के लोगो एंव मेहमानों के समझाने पर मान तो गए थे, पर बारात में ना जाने का गम उनके माथे पर पढ़ा जा सकता था।
दूल्हे अभिषेक के बाप एक उसूल पसन्द इंसान थे, दहेज को नरपिशाच मानते थे।वे अपनी इकलौती बेटी के ब्याह के लिए बहुत ढनके थे,दहेज़ लोभी  उनके सामने इतनी बड़ी मांग रख देते कि उन दरिंदो की मांग घर बेचने पर भी पूरी तरह पूरी होने की संभावना कम थी। कुंटल भर मांस, चिकन,एक कुन्तल मछली,अंग्रेजी ब्रांडेड वाइन, महँगी वाली फोर ह्वीलर, इसके बाद दैनिक जीवन मे उपयोग आने वाली हर छोटी बड़ी चीजें। बेटी जितनी उच्च शिक्षित थी उतनी उच्च कीमती दहेज, दहेज की मांग से घबरा कर नरेश बाबू ने बिटिया रानी का अंतरजातीय ब्याह कर दिया और लड़कों के ब्याह में दहेज़ न लेने की कसम ले लिया ।


गांव से सुबह चार बजे ढोल ढमाके के साथ कानपुर शहर के लिये बारात  बस और कार से निकल पड़ी। गांव से पांच सौ किलोमीटर दूर था कानपुर।खैर बारात नियत समय पर पहुंच गई। बस को थोड़ी देर हो गए। बहत्तर सीटों वाली लक्जरी बस थी। उपर से ड्राइवर रास्ता भटक गया।नरेश बाबू ने समधी बुद्ध नाथ से कई बार संपर्क साधने की कोशिश किये पर फोन बंद हो जाता ।बस रास्ते मे फंस गई, आखिरकार नरेश बाबू ने फिर मोबाईल फ़ोन लगाया,बस रास्ते में फंस गई है।दुल्हन के बाप बुद्ध नाथ बहुत भद्दे तरीके से बोले मेरे पास बहस का टाइम नहीं। लड़की   अभिलाषा के बाप की समधी और बारात के साथ बेरुखी की वजह थी दूल्हे की कार का पहुंच जाना। पांच सौ किलोमीटर दूर से बारात आ रही थी, लड़की के बाप को चाहिए था दो बाल्टी पानी लेकर शहर के मुख्य मार्ग पर दो लड़कों बैठा देना स्वार्थी बुद्ध नाथ ने ऐसा न कर रास्ता तक बताने से मना कर दिया।


राहगीरों एवं गूगल मैप के सहारे बड़ी मुश्किल से बस बारात लेकर शामियाने तक पहुंची थी ।द्वारपूजा हुई बाराती अपनी मर्यादा में रहकर खूब थिरके भी,नरेशबाबू भी पीछे नहीं रहे।
जलपान की व्यवस्था अच्छी थी,लड़की के बाप के दोस्त मि.नवनिगम आगे पीछे दिखे,लड़की के बाप लड़के के बाप से बात करना भी उचित नहीं समझे।जब तक शादी तय नहीं हुई थी तब तक जरुर बोलते थे भाई साहब आपका आदेश।ब्याह का दिन पड़ते ही नरेश बाबू विसार दिए गए । हर छोटी बड़ी बात के लिए लड़की,लड़की के माँ बाप अभिषेक से पूछते और अपने मनमाफिक करते, अभिषेक के ऊपर थोप देते।नरेश बाबू स्वंय आगे बढ़कर बात करते तो बुद्ध नाथ कहते अभिषेक जी ने कहा है। लेने देने,क्या खाना बनेगा,क्या पहनना है, सब अभिषेक जी की मर्जी से पता नहीं क्या झूठ था क्या सच।बारात शहर में पहुचते ही मि बुद्ध नाथ द्वारा नरेश बाबू का विरोध साफ साफ झलक रहा था, ना जाने कौन सी जड़ी बूटी खिलाकर अभिषेक को कटप्पा जैसा गुलाम बना कर माँ बाप घर परिवार के अरमानों का कत्ल करने के लिए तैयार कर लिया था।


ब्याह बैठ गया। लड़की वालों की तरफ से कोई औपचारिक बुलावा लड़के के बाप पास नहीं आया।नरेश बाबू के बहनोई, दमाद,मामा पक्ष के लोग हतप्रत थे, यह देखकर कि लड़की वाले लड़के के बाप को नहीं पूछ रहे है, सब कुछ लड़की वाले अपने तरीके से कर रहे हैं। दूल्हे के बाप को ऐसे लग रहा था जैसे किसी बेगानी शादी में आये हो।नरेश बाबू का छोटा।भाई महेश आश्चर्य चकित था लड़की के बाप के रवैये से।छोटा बेटा भाई के ब्याह के लिए अपनी परीक्षा दाव पर लगा दिया था, रात में ब्याह निपटाकर सुबह परीक्षा देना था वह भी छः सौ किलोमीटर दूर मालवांचल जाकर, पूरे ब्याह की जिम्मेदारी स्वतंत्र कुमार ने ही तो उठाया था, घर के जितने लोग थे नौकरी के सिलसिले में उतने शहर में थे,उसे भी लड़की के बाप कोई तवज्जो नहीं दे रहे थे,शायद दूल्हे को कटप्पा के रूप में तैयार जो कर लिए थे।


शादी शान्ति पूर्वक बीत जाए इसी  उधेड़बुन में नरेश बाबू थे, दहेज से कोई सरोकार तो था नहीं, बतौर दूल्हे का बाप  लड़की का बाप कोई  तवज्जो नहीं दे रहा था ।
आख़िरकार नरेश बाबू के बेटे का ब्याह था,वे अपने रिश्तेदारों को लेकर ब्याह में बैठ गए।ब्याह बौद्ध पद्धति से हुआ।ब्याह का मंगला चरण पूरा होने से पहले नरेश बाबू के साथ बैठे रिश्तेदारों को खाने के लिए दुल्हन पक्ष द्वारा बुला गया। नरेश बाबू के दमाद ने कहा दूल्हा दुल्हन और दुल्हन पक्ष के साथ खाना खाएंगे।इतने में लड़की के बाप बोले आप लोग चलिए हम लोग आ रहे हैं।
वर पक्ष के लोग खाने की कुर्सियों पर आकर बैठ जिसमे लड़के के बाप भी शामिल थे, पूरा एक घंटा बैठे रहे कोई खाना नही, खाने के नाम पर सूखा सलाद एक प्लेट में पड़ा था, बैरे खाना माँगने पर भी टस से मस नहीं हो रहे, आख़िरकार बिना खाना खाएं उठना पड़ा।नरेश बाबू के बेटी दमाद लू लग गई थी वे दोनों बुरी तरह परेशान थे, छोटे बेटे स्वतंत्र कुमार को ट्रेन पकड़ना था, जो सुबह पेपर देकर आया था, रात में ट्रेन का सफर कर सुबह परीक्षा देना था, आखिरकार वह भूखे चला गया। ट्रेन में खाना होगा ।


उधर ब्याह होने के बाद शूटिंग हुई, फोटोग्राफी हुई,लड़की के माँ बाप एंव कुटुम्ब के लोग डीजे पर थिरके, दूल्हा दुल्हन को खूब नचाया गया। खाने के बहाने वर पक्ष को खदेड़ कर बाहर कर दिया गया था।


उधर बधू पक्ष के लोग थिरक रहे थे, इधर पर पक्ष के खास लोग घंटे भर की प्रतीक्षा के बाद उठ कर चले गए।सम्भवतः लड़की वालों ने खाना पहले ही खा लिया था।


चारों ओर सन्नाटा पसर चुका था,सुबह होने को आतुर थी, लड़के के बाप, फूफा, जीजा बहन, पानी पीकर भूख शांत कर चुके थे।अब खाने की कोई इच्छा न थी, था तो अफसोस और पश्चाप। चिड़िया चहचहाने लगी थी। इसी बीच लड़की के बाप के साथ गेस्ट हाउस के लोग नरेश बाबू के पास आये ,आते ही बुद्ध नाथ अंग्रेजी का एक शब्द सॉरी बोले।


नरेश बाबू बोले अच्छा तरीका है, बेइज्जत करो जूते मारो फिर सॉरी बोल  दो, खैर वर पक्ष के लोग शरीफ थे मुँह जूठा कर वापस आ गए। हां एक चमत्कार और हुआ था खाने की प्लेटों के नीचे एक एक लिफाफे रखे गए थे संभवतः सभी लिफाफों में  एक सौ एक रुपये ,एक सौ एक रुपये रखे गए थे। शायद समधी जी को अपने हाथ से देना खुद के लिए अपमानजनक रहा हो । सभी ने लिफाफे बैरो को दे दिए पर नरेश बाबू ने रख लिए थे।रिंग सेरेमनी,तिलक और पूरे ब्याह में मिली रकम अब इक्कीस हजार एक सौ एक रुपया हो चुकी थी ।खैर नरेश बाबू और उनके परिवार के लिए दुल्हन ही दहेज थी। दुःखद बात ये थी कि दूल्हे के परिवार और बराती हाशिये पर समधी ने फेंक दिए थे।वधु पक्ष के लोग जिसमे आधा दर्जन लड़कियां शामिल थी, दूल्हा भी बारात के लोगों सगे रिश्तेदारों को ही नहीं अपने बाप और भाईयों तक को नजरअंदाज कर रहा था ,ना जाने लड़की वालों ने कौन सा काला जादू कर दिया। शादी के दिन ही अभिषेक बेगानों जैसा बर्ताव करने लगा,बेटे के आकस्मिक मानसिक बदलाव को देखकर नरेश बाबू हतप्रत थे।दुल्हन पक्ष को अपार खुशी मिल रही थी, शायद इसलिए की नया नवेला दमाद उनकी मर्जी से दो कदम आगे चल रहा था।
नरेशबाबू के लिए यह सब विषपान जैसा तो लग रहा था ।वे कोई हंगामा खड़ा नहीं करना चाह रहे थे जिससे इज्जत पर कोई दाग न लगे,लड़की के बाप थे कि नरेश बाबू की मर्यादा का दाह संस्कार किए जा रहे थे।


नरेश बाबू की आँख से नींद गायब थी सुबह क्या हुई कानपुर के दादा बहादुर हीजड़ो की टोली आ गई, इक्कीस हजार एक सौ एक पर अड़ गए,इतना ही तो ब्याह में मिली रकम थी। नरेशबाबू हिजड़ों के व्यंग बाण से आहत हो रहे थे, लम्बी जद्दोजहद के बाद पांच हजार एक सौ रुपये में हिजड़े माने। हिजड़ों के जाने के बाद नरेशबाबू को तनिक राहत महसूस हुई।

विदाई की तैयारी होने लगी, घंटे भर बाद दुल्हन को कार में बिठा दिया गया।कार गंतव्य की ओर चल पड़ी।बस में बाराती बैठे हुए थे खुशी की बात थी कि सभी बाराती सभ्य और शिक्षित थे, उनके लिये नरेश बाबू की इज्जत उनकी खुद की इज्ज़त थी,तभी तो इतना सब कुछ होने के बाद भी कोई विवाद नहीं हुआ।नरेशबाबू को अपना फर्ज हमेशा याद रहता था,वे लड़की के बाप को खुद से श्रेष्ठ मानते थे।


नरेशबाबू बस की ओर बढ़ने लगे तभी बारात में आये लड़के आगे बढ़कर आए और बोले बाबू सामान तो रखना बाकी है।
कैसा सामान नरेशबाबू बोले।
दुल्हन का बेड, विस्तर,दूसरे फर्नीचर्स, टीवीी, फ्रिज़, वाशिंग मशीन ये सब सामान लड़के एक स्वर में  बोले।
बच्चों बस में बैठो घर चलो, कुछ नहीं चाहिए था, नहीं लिया।दुल्हन ही दहेज़ है।
इतने में जय नारायन बोले सब जोडकर कर नगद नरायन ले लिए होंगे। आजकल तो अभिषेक जैसे लड़को की बोली लगती है।
चुप करो जय बाबू  घर चलो नरेश बाबू बोले।


जय नरायन बाबू बोले बड़े लोगों की बडी बातें,सब ऑनलाइन पहुंच जाएगा। लड़कों बस में बैठ जाओ।
बस अपने गंतव्य की ओर दौड़ पड़ी,दूर का सफर था। नरेशबाबू को न रात में खाना नसीब हुआ और न सुबह नाश्ता।वे तो अपने ही बेटे की शादी में बेगाने हो गए थे,नाश्ते की प्रतीक्षा करते रहे ,आखिर में गेस्ट हाउस में पता किये तो पता चला नाश्ता खत्म हो गया है।नरेशबाबू चुपचाप बैठे थे फिर जय बाबू बोले क्यों चिन्ता कर रहे हो ऑन लाईन में सामान सुरक्षित घर पहुंच  जाता है।
कोई सामान नहीं है तो चिन्ता कैसी ? नरेशबाबू बोले।


क्या यार इतनी दूर बेटे का ब्याह किये वह भी भिखारी के घर जो अपनी बेटी को एक बिस्तर भी नहीं दिया।दिखावा तो ऐसे कर रहा था जैसे कानपुर का राजा हो।आखिरकार,नरेशबाबू को कान में रुई डालनी पड़ी। दुल्हन और बारात सूरज डूबने से पहले गांव पहुंच आयी।दुल्हन आते ही दुल्हन देखने आने वाली महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी।किसी महिला ने दुल्हन से पूछा पापा ने क्या क्या दिया, कुछ तो दिखाई नहीं पड़ रहा।


अभिलाषा बेधड़क बोली पाप सब कुछ देंगें।
कब दूसरी महिला बोली।
पापा कह रहे थे जब सेटल्ड हो जाएंगे तब।
नाशमिटो ये तो घर जोड़ने के पहले तोड़ने की बात कर दी।
एक अन्य महिला बोली भाग्यश्री को अब आराम मिल जाएगा, बेचारी पेट के घाव से परेशान रहती है, दोनों जून  बहू के हाथों बनी रोटी मिल जाएगी।
इतने में अभिलाषा बोली मैं सास ससुर के लिये रोटी बनाने नहीं आयी हूँ, अपने पति को रोटी बनाकर दूंगी,सास ससुर को क्यों दूंगी।
यही संस्कार दिया दुल्हनिया तुम्हारे माँ बाप ने एक महिला  बोली।
क्या गलत है अभिलाषा बोली।


सभी महिलाएं अपना अपना माथा कूटती हुई तुरन्त उठ खड़ी हो गई।
  अचेत सा नरेशबाबू को अलग थलग पड़ा हुआ देखकर भाग्यश्री भाग कर  नरेशबाबू के पास पहुंचकर पूछी अभिषेक के पापा तबियत तो ठीक है?
हाँ ठीक है, घर मे पहली बहू आयी है, खुशी मनाओ, उदास क्यों पड़े हो ?
पगली सारी खुशी पर ओले पड़ गए।अरमानों का कत्ल हो गया, जीते जी मर गया।कैसे और कौन सी खुशी मनाएं, गलत परिवार की लड़की आ गयी, भगवान जीवन भर की तपस्या को भंग होने से बचाना। घर मे बहू नहीं आयी है, हमारा बेटा विदा हो गया है भाग्यश्री।


बहू तन से सुंदर भले ही पर उसके मन मे खोट है, बहू को देखने आई महिलाओं को ऐसा आभास हुआ है,इस सबसे बढ़कर उसके बाप ने घर तोड़ने के  मंत्र से कान फूंक कर भेजा है।तमन्ना थी कि नैतिक दायित्व बोध और संस्कारवान बहू मिले घर परिवार को साथ लेकर चले।यह तो आते अलग चूल्हा रोपने की तैयारी से आयी है आंखों में आँसू लिए भाग्यश्री बोली।
हाँ भाग्यवान यही तो जानलेवा दर्द है, बहू ऐसी मिली कि बेटा विदा हो गया।हम दोनों फिर हो गए एकदम अकेले।


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नियति(लघुकथा)

अरे वाह  सावित्री क्या खूब सुन्दर बहू खोज कर लायी है,बहुत सुंदर जोड़ी है, भगवान बुरी नज़र से बचाना।नरेश, बेटवा वैभव की पढ़ाई के लिए कर्ज लेता रहा, आखिरकार मकसद में कामयाब हो गया । बहू भी सुंदर ढूंढ लाया। जैसे सवित्री घर परिवार संभाली है, वैसे ही तुम भी संभाल कर रखना बहूरानी भले ही शहर की हो शहर में रहना।तुम्हारी सास कोई कम नहीं है दरोगा की बेटी है, पर पूर गाँव की बहुओं में सवित्र को अव्वल दर्जा हासिल है, सावित्री की गद्दी बहूरानी तुम्हें संभालना है ।बधाई हो सावित्री सच मे बहुत सुन्दर बहू है।

हां दादी अम्मा क्यों नहीं रखेगी घर परिवार का मान, घर परिवार को त्याग कर जीना कोई। जीना नहीं होता।परिवार के साथ जो सुख है, अकेले में नहीं सावित्री बोली।

दान दहेज तो अच्छा मिला होगा दादी अम्मा पूछ बैठी।

दादी अम्मा दिल दुखाने की क्यों कर दी आप तो जानती है वैभाव  को उसूल पसंद है ।खुद से वादा किये थे बिना दहेज की शादी करने की और ले आये बहुरानी को। दादी अम्मा दहेज़ की रकम से तो जीवन बीतने वाला नहीं ।एक बाप अपने कुल की इज्ज़त सौंप देता है, क्या यह दान कम है।

यह तो हर बाप को करना पड़ता है।तुम्हारे समधी ने कौन सा इतिहास रच दिया दादी अम्मा बोली।

अनुष्का ही हमारे परिवार के लिये बेटी है, बहू है और दुनिया की सबसे बड़ी दौलत भी ,हमे दहेज़ नहीं चाहिए सावित्री बोल ही रही थी कि इतने में नई नवेली दुल्हन अनुष्का बोली हमे भी मिलेगा।

अब कब मिलेगा दादी अम्मा बोली।

पापा कह रहे थे जब तुम और दमाद जी शहर में सेटल हो जाओगे तब अनुष्का बोली ।

क्या........? अचंभित होकर दादी अम्मा बोली।

हाँ दादी अम्मा ।

सावित्री सुना  रही है तुम्हारी बहूरानी क्या कह रही हैं।

क्या दादी अम्मा ? सावित्री बोली।

तुम्हारे समधी ने तुम्हारी बहू अनुष्का के कान में तुमसे अलग होने का मंत्र फूंक कर बेटी विदा किया है।

क्या कह रही हैं दादी अम्मा ।

ठीक कह रही हूँ। तुम्हारे समधी की नियति में खोट हैं, तुम्हारा घर परिवार आबाद होने से पहले ही तुम्हारे समधी ने बर्बादी का मंत्र अपनी बिटिया के कान में फूंक दिया है।

इतना सुनते ही सावित्री बोली है ।जीवन भर की तपस्या भंग हो गई हे भगवान ये किस गुनाह की सजा और धड़ाम से गिर गई चारों खाना चित।
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सबक(लघुकथा)

काकी पाय लागूं।

दिन दूनी रात चौगुनी तरक़्क़ी करो बेटा।

काकी तबियत ठीक है ।काका कहाँ हैं।

हां बेटा तबियत ठीक है ।तुम्हारे काका बूढ़ी हड्डी घिसने गए हैं और कहाँ जायेंगे।

काकी  आराम का समय हैं। काका है कि घर टिकते ही नहीं।

बेटा जब तक हाथ पांव चल रहे है,तब तक आराम कैसा ? बैठ जायेगे तो रोटी कैसे मिलेगी ?

क्या काकी तू क्यों झंख रही है। झंखे खरभान जेकर खाले खरिहान।बेटा इंजीनियर,काका भी अच्छा कमाएं हैं।

बेटा अभी हाथ पांव चल रहे हैं,जिस दिन खटिया पर पड़ जायेंगे रोवन रोटी हो जाएगी।

काकी इतनी निराश क्यों हो रही हो ?

बेटा निराश होने की बात है। बेटा ने कह दिया है तुमने अपना घर बसा लिया । मेरा घर बसने नहीं दे रही हो ,तोड़ रही हो।बहू ने कहा दिया है कि सास ससुर की नौकरानी नहीं हूँ कि  थाप थाप कर देती रहूंगी।  कैसी उम्मीद ऐसे बेटे बहू से सुखवीर ?हम तो अपनी ही कमाई चैन से नहीं खा पा रहे, महीनों से नींद उड़ी हुई है, तुम्हारे काका कि आंखों में आंसू उतरे रहते हैं।

काकी हिम्मत न हार ।

बेटा हिम्मत नहीं हार रही, तुम्हारे काका तो और हिम्मती हैं बस दुःख से हार रहे हैं।

काकी हौसला रखो, एक बेटा- बहू ने ठुकराया है।अभी तो बेटा एक बेटी भी तुम्हारे जीने के सहारे हैं।

हां बेटा वो तो है।

काकी क़ानून भी तुम्हारे साथ है, जो तुम्हारी देख रेख सेवा सुश्रुषा करें, उसी को अपना उत्तराधिकारी बनाना। बेटा होने  भर से ही उत्तराधिकारी नहीं हो जाता कोई बेटा।नालायक बेटा-बहू को  चल-अचल संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार तुम्हारे पास है काकी।

हाँ बेटा सुखवीर जानती हूँ पर वह भी तो घोर  दुःख है।

काकी नालायक से बेहतर तो लायक है।

ठीक कह रहे हो सुखवीर बेटा,जिस बेटा कि ऊंची शिक्षा के लिए कर्ज के बोझ तले दबे रहे ।वही  बेटा अपनी माँ को कहे तुमने अपना घर बसा लिया मेरा घर तोड़ रही हो,जिस बहू को बेटी का मान दिये,कलेजे से लगा कर रखी वही बहू कहे सास ससुर की नौकरानी नहीं हूँ कि उन्हें थाप थाप रोटी कर देती रहूंगी,

ऐसे नालायक बेटा- बहू घर से बेघर करें, उससे पहले उन्हें  सबक सिखाना  जरूरी है काकी।
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सुलक्षणा(लघुकथा)

विजय बेटा शहर में सब ठीक है ?

हाँ दादू पांव छूते हुये विजय बोला ।

आंखे लाल, आवाज़ में बेचैनी ,तुम्हारा दर्द बयां कर रही हैं, तुम कह रहे हो सब ठीक है।

तुम्हारी नव विवाहिता बहूरानी कहाँ है?

मायके गयी है, बेटा नौकरी पर है।

मना किया था अभी मायके मत भेजना।

दादू मैंने नहीं भेजा।बहू के बाप ने तो मुझसे बात तक नहीं किया।

बहू मायके चली गयी ?

हाँ दादू ।

अब क्या कहती है ?

सास ससुर माँ बाप नहीं हो सकते।ठूस ठूस कर खिलाते है।इस घर मे मरने का मन करता है।सास ससुर को रोटी थापने नहीं आई हूँ ।मैं इस घर की नौकरानी नहीं हूँ।बहू को ना मैं अच्छा लगता हूँ, ना मेरी पत्नी, ना बेटी और ना छोटा बेटा।अल्पदृष्टि है, उसके माँ बाप ने छिपाया ।अब तो पागल भी लगती है। मैं तो अपनी बेटी समझता हूँ पर बहू दुश्मन ना जाने क्यों ? बहुत बुरे फंस गया दादू।

तुम तो बहुत खुश थे, कह रहे थे अच्छे सम्पन्न,शिक्षित परिवार की लड़की है।मुझे तो परिवार में खोट लगती है, तभी तो कुलक्षणा साबित हो रही है।इतनी दूर और बिना दहेज़ की शादी करने पर भी तुमको इतना दर्द।दहेज में एक गिलास नहीं मिला रक़म तो कोसों दूर की बात।ऐसे दरिद्र घर की लड़की परिवार के गले में फांसी का फंदा बन गई। दूसरे लड़की वाले लाखों बिना मांगे दे रहे थे,तुम उनसे कहते रहे मेरा बेटा बिकाऊ नहीं है।बहुत सिध्दांतवादी बन रहे थे।काश लोगो की बात मान लेते।

दादू बिना दहेज की शादी कर गुनाह तो नहीं किया पर हो गया ?

दस लाख तुमने खर्च कर दिए ।तुमको मिला था कुल मिलाकर इक्कीस हजार एक सौ एक यही ना । बहू तुमको पानी देने में नौकरानी बन रही है।ये बहू  के अच्छे संस्कार तो नहीं कहे जा सकते । देखो हमारी सुलक्षणा बहुओं को पूरे गाँव के लिए उदाहरण है,घर- परिवार ,नात -हित सबको साथ लेकर चल रहीं हैं।मुझ अपाहिज का भरपूर ख्याल रखती है बेटी जैसे ।काश तुम्हारी पुत्र बधु  भी हमारी बहुओं जैसी होती।
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वज़ह(लघुकथा)

एक हमारे भी खास रिश्तेदार थे जोखनबाबू।

क्या अब नहीं हैं ?

बिल्कुल है ।

थे क्यो ?

दिखावा पसंद थे, आदेश दो भाई साहब कहते नहीं थकते थे।जब स्वार्थ की असलियत जमाने के सामने आ गई और मेरी बेनूरी हो गयी। मैंने रिश्तेदार को त्याग दिया। रिश्तेदारी को कसकर पकड़ लिया।रिश्तेदारी अपनेपन पर टिकती है झूठ, फरेब, दिखावा और स्वार्थ पर नहीं।

तुम भी कमाल के हो यार उपदेश बाबू, रिश्तेदार का त्याग करते हो रिश्तेदारी को कसकर पकड़ते हो।

रिश्तेदारी की वजह पाक है जो हमारे कुल की मर्यादा बन चुकी है जोखानबाबू।
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बड़ी बहू(लघुकथा)

बसन्त में उदासी क्यों पार्वती ? बड़ी बहू आ गई है,खुश रहा करो।चूल्ह चौके से फुर्सत लो देविका बोली।

यही तो तकलीफ है।बहू ने चैन छिन लिया देविका बहन पार्वती बोली ।

बिना दहेज की शादी, उच्च शिक्षित बहू, नाक में दम बात समझ मे नहीं आयी पार्वती क्या माज़रा है ?

बहू के बाप ने तो बारात गए हमारे खून के रिश्तेदारों को  खाना ,नाश्ता के लिए पूछा ही नहीं, दहेज क्या देता।खुद की बेटी के लिए एक चददर मय्यसर नहीं हुआ, खैर विवेक के पापा ने दहेज रहित बेटे का ब्याह करने की शपथ लिए थे पूरा कर दिखाये, पर गलत परिवार से रिश्ता हो गया।बहू छाती पर मूंग दलने लगी है डोली से उतरते ही।ना जाने किस गुनाह की साजिश मिल रही है।

सुना है तुमने बहू को बेटी मान लिया है।

माना तो था देविका बहन पर सब ब्यर्थ गया।

ऐसा कौन सा गुल खिला रही है तुम्हारी  बहू पार्वती।

बहू चाहती है बेटा घर परिवार भाई-बहन, माँ-बाप से नाता तोड़ ले।बहू और बहू के मायके वालों तक सीमित रहे।बेटा ऐसा नहीं चाहता।

तुम्हारी बड़ी बहू तुम बूढ़े पति-पत्नी, घर -परिवार की दुश्मन निकली।तुम्हारी उच्च शिक्षित बड़ी बहू से तो हमारी अल्प शिक्षित बहुएं लाख गुना बेहतर है, घर परिवार नात हित सबका ख्याल रखती है, हम बूढा बूढ़ी को समय से सुकून की रोटी देती हैं देविका बोली।

बहुत गुमान था बहू पर सब टूट गया, सकून भी छिन गया है, कहते कहते पार्वती रो उठी।
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कविता

।।।।।। कैसी मजबूरी ।।।।।


ये कैसी सल्तनत है
जहां शोषितों को आंसू
अमीरों को रत्न धन मोती,
मिलते हैं,
शोषितों के नसीब दुर्भाग्य
बसते हैं
पीडित को दण्ड शोषक को
बख्शीश क्या इसी को
आधुनिक सल्तनत कहते हैं
ये कैसी सल्तनत है
जहाँ अछूत बसते हैं........
दर्द की आंधी जीवन संघर्ष
अत्याचारी को संरक्षण
निरापद को दण्ड यहां
हाय. रे बदनसीबी
जातिवाद, अत्याचार,चीर हरण
हक पर अतिक्रमण, छाती पर
अन्याय की दहकती अग्नि
विष पीकर भी देश महान
कहते हैं
ये कौन सी सल्तनत मे
सांस भरते हैं.....................
श्रमवीर,कर्मठ, हाशिये के लोग
अभाव,दुख,दर्द में जी रहे
खूंटी पर टंगता हल,
हलधर सूली पर झूल रहे
महंगाई की फुफकार
आमजन सहमे सहमे जी रहे
अभिव्यक्ति की आजादी लहूलुहान
कलम के सिपाही मारे जा रहे
चहुंओर से सवाल उठ रहे
कैसी सल्तनत ,लोग
भय आतंक के साये में जी रहे......
बढ रहा है खौफ़ निरन्तर
जातिवाद का भय भारी
जातिविहीन मानवतावादी
समाज की कोई ले नहीँ रहा जिम्मेदारी
जातिवादी तलवार पर सल्तनत है प्यारी
इक्कीसवीं सदी का युग पर,
छुआछूत ऊंच नीच का आदिम युग है जारी
इक्कीसवीं सदी समतावादी विकास का युग
जातिवाद रहित जीवन जीने का युग
हाय रे सल्तनत तरक्की से दूर
जातिवाद का बोझ ढो रहे
हम कौन सी सल्तनत मे
जीने को मजबूर हो रहे........।
हाय रे सल्तनत बस मिथ्या
शेखी
कभी, बाल विवाह, गरीबी, शिक्षा के
दिन पर गिरते स्तर,बेरोजगारी,स्वास्थ्य
जातीय उत्पीड़न,घटती कृषि भूमि
घटती खेती किसानों की मौत पर
सामाजिक जागरण या कोई बहस देखी
अपनी जहाँ वालों आधुनिक सल्तनत
हमसे है हम सल्तनत से नही
ऐसी क्या मजबूरी है कि मौन
सब कुछ सह रहे
सल्तनत कि जय जयकार कर रहे...........
डॉ नन्दलाल भारती
17/09/2017

कैसा शहर(कविता)
ये कैसा शहर है बरखुरदार
ना रीति ना प्रीति
धोखा, छल फरेब,षड़यंत्र
ये कैसे लोग कैसा तन्त्र
मौत के इन्तजाम, छाती पर प्रहार
ये कैसा शहर है बरखुरदार......
ये कैसा शहर,आग का समंदर
डंसता घडिय़ाली व्यवहार
पारगमन की आड़ में अश्रुधार
रिश्ते की प्यास , जड में जहर
हाय रे  पीठ में भोंकता खंजर
पुष्प की आड़ ,नागफनी का प्रहार
ये कैसे लोग हैं बरखुरदार...........
मन में पसरा बंजर ,तपती बसंत बयार
जश्न के नाम करते घाव का व्यापार
छल स्वार्थ के चबूतरे ,दिखावे के जश्न
जग हंसता,चक्रव्यूह में रिश्ते वाले प्रश्न
छल,भय,जादू से ना जुड़ सकती प्रीत
ना कर अभिमान, ना पक्की जीत
धोखे से असि का ना कर प्रहार
बदनाम हो जाओगे बरखुरदार......
ना लूट सपनों की टकसाल
ना कर मर्यादा पर वार
तेरा भी लूट जायेगा एक दिन संसार
आंसू दिये जो , मिलेगा तुम्हें गुना हजार
कैसे मानुष जिह्वा पर विष,मन में कटार
युग बदला तुम ना बदले कैसे तुम, कैसा शहर ?
कैसी रीति कैसी प्रीति कैसा लोकाचार
रिश्ते को ना करो बदनाम बरखुरदार.......


डॉ नन्दलाल भारती
संपर्क - nlbharatiauthor@gmail.com

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