एकांकी // एक मनहूस दिन // डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य

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डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य का एकांकी संग्रह - घूमती दुनिया तथा अन्य एकांकी एक उम्दा एकांकी संग्रह है, और सभी एकांकी मंचनीय हैं. भाषा सरल और एकांकी...

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डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य का एकांकी संग्रह - घूमती दुनिया तथा अन्य एकांकी एक उम्दा एकांकी संग्रह है, और सभी एकांकी मंचनीय हैं. भाषा सरल और एकांकी मंचन के लिए वातावरण और पृष्ठ-भूमि भी सामान्य रखी गई है, जिससे स्कूलों आदि में एकांकी प्रतियोगिता में मंचन बेहद आसान हो सकती है. एक रेडियो नाट्य भी सम्मिलित है जो बेहद प्रभावी है. प्रस्तुत है संग्रह से एक एकांकी - एक मनहूस दिन.

एकांकी

एक मनहूस दिन

डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य

पात्र परिचय

विवेक : एक छात्र, उम्र 15 वर्ष

स्वराज बाबू : मकान मालिक, उम्र 25 वर्ष

उर्मिला : मकान मालिक की पत्नी, उम्र 22 वर्ष

ठग : उम्र 4० वर्ष

बस यात्री : उम्र 3० वर्ष

रेल यात्री : उम्र 3० वर्ष

रिक्शावाला : उम्र 25 वर्ष

खोमचेवाला : उम्र 3० वर्ष

आदमी : एक किसान, उम्र 4० वर्ष

औरत : किसान की पत्नी, उम्र 35 वर्ष

पिताजी : विवेक के पिताजी, उम्र 4० वर्ष

(दृश्य 1)

: (गर्मी का मौसम है। मई का महीना है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के बेवर कस्बे का एक मकान जिसके ड़ाईगरूम में कुछ चित्र टँगे हैं। पंखा और कूलर चल रहे हैं। एक मेज के चारों ओर पड़ी कुर्सियों पर विवेक, स्वराज बाबू तथा उनकी पत्नी उर्मिला बैठे हैं । मेज पर एक ट्रे रखी है । तीनों लोगों के हाथों में रंगीन शर्बत के गिलास हैं । शर्बत के घूँट भरते हुए वे तीनों बातें भी करते जाते हैं ।)

विवेक : भाई साहब! मेरी कक्षा नौ की वार्षिक परीक्षा समाप्त हो चुकी है और मैं पास भी हो गया हूँ। अब मैं आपका कमरा खाली करके अपने गाँव जाना चाह रहा हूँ।

स्वराज बाबू : भाई विवेक! तुम तो बहुत ही भले घर के लड़के मालूम पड़ते हो । तुमको मेरे घर में रहते हुए एक साल गुजर गया और मालूम ही नहीं पड़ा ।

उर्मिला : मुहल्ले वाले भी कहते हैं कि विवेक बहुत ही सीधा लड़का है। स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे बदतमीजी से बाज नहीं आते किंतु तुम तो सचमुच ही एक हीरा हो विवेक ।

विवेक : आप लोग कुछ ज्यादा ही तारीफ किए जा रहे हैं. आप लोग तो मेरी इस तरह तारीफ कर रहे हैं, जैसे मैं कोई आदमी न होकर देवता हूँ।

स्वराज बाबू : विवेक! तू यार अपने को देवता ही समझ ।

विवेक : मैं अपना सामान तो बाँध चुका हूँ अब मुझे इजाजत दीजिए । जुलाई में फिर आ जाऊँगा और आप ही के पास रहूँगा ।

स्वराज बाबू : ठीक है विवेक! लेट हो रहे होगे । अपने घर किधर से जाओगे?

विवेक : यहाँ से बस द्वारा भोगाँव जाऊँगा, वहाँ से ट्रेन पकड़ लूंगा । कोसमा रेलवे स्टेशन पर उतरकर अपने घर चला जाऊँगा ।

स्वराज बाबू : क्या तुम्हारा घर कोसमा रेलवे स्टेशन के पास ही है?

विवेक : नहीं, वहाँ से तो नौ किलोमीटर दूर है । वहाँ की यात्रा तो मुझे पैदल ही करनी पड़ेगी ।

(दृश्य 2 )

( बेवर कस्बे का बस स्टैंड जिसमें कई बसें खड़ी हैं। एक बस की सीट पर विवेक बैठा है।)

विवेक : (स्वगत) बस बहुत देर लगा रही है। कंडक्टर व ड़ाइवर न जाने कहाँ चले गए हैं। ये लोग भोगाँव में ट्रेन पकड़ने भी देंगे या नहीं। (जाग्रत होकर एक बस यात्री से) भाई साहब, क्या मुझे शिकोहाबाद जाने वाली ट्रेन मिल जाएगी?

बस यात्री : (आश्वासन देते हुए) हाँ भाई साहब! मिल जाएगी ।

(बस स्टार्ट होती है तथा भर्र-भर्र की आवाज करती हुई चली जाती है। हार्न की पीं-पीं-पों-पों के स्वर भी उभरते हैं ।)

( दृश्य 3)

भोगाँव कस्बे का बस अड्‌डा । विवेक अपना संदूक सिर पर रखे तथा हाथ में बाल्टी लिए खड़ा है। बाल्टी में भी कुछ सामान है ।)

विवेक : (भोगाँव रेलवे स्टेशन की ओर देखते हुए, स्वगत) अरे! गाड़ियाँ तो दोनों आ गयीं । अब पैदल जाकर गाड़ी पकड़ना मुश्किल है। पता नहीं किस मनहूस का मुँह देखकर जागा हूँ।

(एक रिक्शे वाले का प्रवेश)

रिक्शावाला : (चिल्लाते हुए) रेलवे स्टेशन, रेलवे स्टेशन। है कोई रेलवे स्टेशन चलने वाला।

विवेक : क्या तुम शिकोहाबाद जाने वाली गाड़ी मिला दोगे?

रिक्शावाला : हाँ क्यों नहीं?

(विवेक रिक्शे पर बैठता है और रिक्शा ओझल हो जाता है ।)

(दृश्य 4)

(रेलवे स्टेशन भोगांव। रेलगाड़ी के एक डिब्बे में विवेक बैठा है। गाड़ी से उतरे यात्री पास से ही गुजर रहे हैं। शोर-शराबे में कई स्वर उभर रहे हैं। कभी फटे बाँस की सी आवाज में चाये-चाये' 'गरम चाये' की आवाज आती है तो कभी 'पान बीड़ी सिगरेट' का स्वर गूँजता है। एक बूढ़े स्वर में आवाज आती है, '' आगरे का पेठा ... '' विवेक गाड़ी के छूटने का इंतजार कर रहा है। गाड़ी की सीटी की आवाज गूँजती है और गाड़ी फर्रुखाबाद की ओर चल पड़ती है।)

विवेक : (चौंककर, स्वगत) अरे! ये गाड़ी फर्रुखाबाद की ओर क्यों चल रही है। मैं तो शिकोहाबाद जाने वाली गाड़ी में बैठा हूँ। शायद किसी कारण बैक हो रही है। अरे! यह तो रफ्तार पकड़ती चली जा रही है। (हड़बड़ाते हुए एक रेलयात्री से ) भाई साहब ये गाड़ी कहाँ जा रही है?

यात्री : फर्रूखाबाद

विवेक : (हड़बड़ाते हुए) मैं तो शिकोहाबाद जाने वाली गाड़ी में बैठा था ।

रेलयात्री : आप हड़बड़ी में गलत बैठ गये । शिकोहाबाद जाने वाली गाड़ी स्टेशन पर खड़ी है। जल्दी उतरकर उस गाड़ी को पकड़ लो ।

(विवेक चलती गाड़ी से कूद पड़ता है। नीचे कूदते ही उसे पटक लग जाती है। उसका बक्सा तथा अन्य सामान वह रेलयात्री नीचे फेंक देता है। विवेक बक्सा सिर पर रखकर तथा बाल्टी व अन्य सामान हाथ में पकड़कर पीछे की ओर भागता है।)

विवेक : (स्वगत) गाड़ी तो हैं, देखें -मिल पाती है या नहीं ।

(विवेक शिकोहाबाद जाने वाली गाड़ी की ओर बहुत तेजी से दौड़ता है। गाड़ी के हार्न की आवाज गूँज जाती है। स्टेशन पर घंटी की आवाज ' टन-टन-टन-टन ' की आवाज के साथ गूँजती है। विवेक दौड़ता ही रहता है और गाड़ी छूट जाती है। गाड़ी बहुत दूर निकल जाती है। और विवेक प्लेट फार्म पर ठगा सा खड़ा रह जाता है ।)

(दृश्य 5)

(स्थान भोगाँव का बस अड्‌डा । विवेक मैनपुरी जाने वाली बस के आने का इंतजार कर रहा है। एक बस आती है और उसके सामने खड़ी हो जाती है। बस में बैठा एक अधेड़ उम्र का आदमी जो एक ठग है विवेक को देखता है ।)

ठग : (अपनत्व दिखाते हुए) अरे बेटा! क्या मैनपुरी जाना है? यह बस मैनपुरी जा रही है।

विवेक : मुझे मैनपुरी ही जाना है।

ठग : अरे! तो आओ! मेरे पास सीट भी खाली है।

(विवेक अपना सामान लेकर बस में चढ़ता है। ठग बड़ी आत्मीयता से उसे अपने पास बैठा लेता है । ठग की नजर विवेक के सामान का निरीक्षण करने में लगी हुई है। थोडी देर में बस चल पडती है।)

ठग : मैनपुरी ही जाओगे या और आगे?

विवेक : मैं अपने गाँव जा रहा हूँ अंकल ।

ठग : इधर कहाँ से आए?

विवेक : मैं बेवर से आया हूँ । मैं वहाँ अमर शहीद इंटर कॉलेज में पढ़ता हूँ। मेरी वार्षिक परीक्षा समाप्त हो गई है सो मैं गर्मी की छुट्‌टियाँ बिताने गाँव जा रहा हूँ ।

ठग : तुम्हारा गाँव कहाँ है बेटा?

विवेक : मेरा गाँव कोसमा रेलवे स्टेशन से नौ किलोमीटर की दूरी पर है। कैरावली नाम है मेरे गाँव का ।

ठग : चलो तुम्हें सफर में कोई दिक्कत नहीं होगी मैं जो तुम्हारे साथ हूँ।

विवेक : मैं अकेला सफर करता रहता हूँ अंकल । मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है।

ठग : मैं फिरोजाबाद जिले का रहने वाला हूँ। मैं तुम्हारी नौकरी अभी लगवा सकता हूँ । तुम मुझे अपना पता लिखा देना ।

विवेक : मैं तो अभी पड़ रहा हू। नौकरी-वीकरी के बारे में अभी कुछ सोचा ही नहीं है। वैसे मेरे पिताजी मुझे डॉक्टर बनाना चाहते हैं.।

ठग : अच्छा यह बताओ कि अब अपने गाँव किस रास्ते से होकर जाओगे?

विवेक : अब तो मैं मैनपुरी से इटावा जाने वाली प्राइवेट बस में बैठूंगा और रास्ते में रतिभानपुर उतर पड़ेगा । वहाँ से नौ किलोमीटर की दूरी पर मेरा गाँव है। वहाँ से पैदल चला जाऊँगा।

ठग : तब तो मेरा और तुम्हारा साथ है । मुझे भी इटावा में कुछ काम है। (स्वगत) कितना अनभिज्ञ है यह बच्चा । मेरी नजर इसके बक्से पर लगी हुई है और इसे कुछ भी नहीं पता । जरूर इसके बक्से में कुछ न कुछ कीमती सामान होगा ।

(दृश्य 6)

(मैनपुरी बस अड्‌डा । विवेक और ठग बस से उतरते हैं । बस अड्‌डे पर कई बसें खड़ी हैं। भर्र-भर्र, पीं-पीं पों-पों की आवाजें गूँज रही है। कंडक्टरों की आवाज भी उभर रही है। जिसमें '' है कोई दिल्ली दिल्ली दिल्ली है कोई आगरा, आगरा आगरा है कोई बेवर छिबरामऊ कन्नौज, कानपुर, लखनऊ '' आदि स्वर साफ सुनाई पड रहे हैं। विवेक अपना बक्सा सिर पर रख लेता है और बाल्टी तथा अन्य सामान हाथ में पकड लेता है।)

ठग : अब किधर से होकर जाओगे बेटा?

विवेक : सोच रहा हूँ इटावा वाले प्राइवेट अड्‌डे पर चला जाऊँ और इटावा वाली बस में बैठ जाऊँ ।

ठग : चलो मैं भी साथ चल रहा हूँ।

विवेक : आप जाइए मैं तो बाजार में घूमकर जाऊँगा ।

ठग : अच्छा क्या खरीदोगे?

विवेक : गर्मी का मौसम है। एक सुराही घर पर ले जाऊँगा ।

ठग : सुराही तो कुम्हार मण्डी अर्थात् सीताराम मार्केट में मिलती है। चलो मैं तुम्हें अच्छी सी सुराही दिलवा दूँगा।

विवेक : मैं रेलवे स्टेशन पर जा सकता हूँ और हो सकता है कि मैं कोसमा के लिए निकल जाऊँ ।

ठग : तो चलो मैं भी स्टेशन चलूँगा और फिरोजाबाद के लिए गाड़ी पकड़ लूँगा ।

विवेक : (स्वगत) यह आदमी पीछा ही नहीं छोड़ रहा है। लगता है कि दाल में कुछ काला है । कहीं मुझे यह ठगी का शिकार तो नहीं बनाना चाहता । मेरे पास इसे क्या मिल जाएगा ।

(विवेक और ठग दोनों पैदल चल पड़ते हैं और वहाँ से ओझल हो जाते हैं।

(दृश्य 7)

(कुम्हार मण्डी में एक बंद दुकान के चबूतरे पर विवेक और ठगराज बैठे हैं । विवेक का सारा सामान संदूक और बाल्टी आदि रखे हैं ।)

ठग : ऐसा करो बेटा कि तुम मेरा पता लिख लो ।

विवेक : मेरे पास कोई कॉपी कागज बाहर नहीं है । कापी निकालने के लिए मुझे बक्सा खोलना पड़ेगा ।

ठग : खोल लो बक्सा और मेरा पता लिख लो । इसके बाद सुराही लेने चलते हैं।

(विवेक अपना बक्सा खोलता है तथा ठग की गिद्ध दृष्टि वाली आँखें यह निरीक्षण करने लगती हैं कि बक्से में क्या है। विवेक एक कापी निकाल कर ठग की तरफ बढ़ाता है। ठग कापी के एक पन्ने पर अपना पता लिखता है।)

ठग : (स्वगत) मैं तो समझता था कि बक्से में न जाने क्या माल होगा । इसमें तो बस किताबें ही किताबें भरी है।

इन किताबों का मेरे लिए रद्‌दी से ज्यादा कोई मूल्य नहीं है ।

विवेक : अंकल जी चलो सुराही खरीद लें ।

(स्वगत) यह आफत न जाने क्यों पीछा ही छोड़ने में नहीं आ रही है । यह आदमी इतना अपनत्व क्यों दिखा रहा है । मुझ पर तो ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे लूटकर यह मालामाल हो जाएगा ।

ठग : अरे कहाँ खो गए बेटा? चलो तरबूज खाते हैं ।

विवेक : (चौंककर) कहीं नहीं आपके साथ तरबूज खाने चल रहा हूँ।

(दृश्य 8)

(मैनपुरी नगर का घंटाघर चौक । एक खोमचे वाला अपना खोमचा लगाये हुए है । वहीं पास में एक चबूतरा है। चबूतरे पर बक्सा और बाल्टी रखे हुए हैं। पास में ही विवेक और ठग खड़े हुए हैं ।)

ठग : (विवेक को कुछ पैसे देकर सब्जी मण्डी की तरफ इशारा करते हुए) बेटा ये पैसे लो और वो देखो पास में ही सब्जी मंडी है वहाँ से तरबूज ले आओ।

(विवेक पैसे लेकर सब्जी की मंडी की ओर चल देता है । ठग वहीं खड़ा रह जाता है ।)

(दृश्य 9)

(सब्जी मंडी में सब्जी की दुकानें सजी हैं । सब्जी बेचने वालों की आवाजें आ रही हैं। विवेक इधर-उधर घूमकर तरबूज की दुकान तलाश रहा है ।)

विवेक : (चौंककर) अरे! यहाँ तो कहीं भी तरबूज नहीं बिक रहे हैं । (स्वगत) कहीं ऐसा न हो कि वह आदमी मेरी किताबें लेकर चम्पत हो जाये । जाऊँ देखूँ ।

(विवेक सड़क पर चल देता है और घंटाघर चौक की ओर बढ़ता है।)

(दृश्य 1०)

(घंटाघर चौक पर चबूतरे पर बक्सा व सुराही रखे हैं पर बाल्टी व अन्य सामान नहीं है । ठग बाल्टी और उसमें रखा अन्य सामान लेकर गायब है । खोमचा वाला अपनी धुन में मस्त है। विवेक के चेहरे पर आश्चर्य व निराशा का मिला जुला भाव है ।)

विवेक : '' (स्वगत) अरे! यह आदमी कहाँ गया? क्या वह बाल्टी नेकर भाग गया?

. विवेक भौचक्का सा होकर इधर-उधर देखता है।)

विवेक : (खोमचे वाले से) भाई साहब! अभी जो आदमी मैं यहाँ छोड गया था वह किधर गया?

खोमचेवाला : (झल्लाकर) मुझे क्या मालूम । मैं अपना काम कर रहा हूँ या आने जाने वाले आदमियों का हिसाब रख रहा हूँ। ये बक्सा क्या तुम्हारा है?

विवेक : हाँ ।

खोमचेवाला : इस तरह बीच चौराहे पर डाल जाते हो। क्या बिलकुल ही पागल हो?

विवेक : (खिसियाकर) आज पागल ही बन गया हूँ भाई साहब । न जाने किस मनहूस का चेहरा देखकर जागा हूँ। साले की बाल्टी पर ही नीयत डाँवाडोल हो गयी । भागते भूत की लँगोटी से ही संतुष्टि हो गयी साले को।

(दृश्य 11)

(विवेक अपना बक्सा सिर पर रखे तथा हाथ में सुराही पकड़े मैनपुरी की सड़कों पर घूमते हुए उस ठग को तलाश रहा है। पर ठग के कहीं दर्शन नहीं हो रहे हैं ।) विवेक : (स्वगत) किसी भी सड़क पर नहीं मिल रहा है । न जाने किस पाताल में समा गया । साला नौकरी दिलाने चला था । (कुछ देर में विवेक किसी दूसरी सड़क पर आ जाता है।)

विवेक : (स्वगत) इस सड़क पर भी नहीं है । इतना सामान खो जाने पर घर पर माँ बहुत डाँटेगी । उनको क्या जवाब दूँगा । मैं जानता हूँ कि पिताजी कुछ भी नहीं कहेंगे पर मेरी बुद्धि और विवेक पर तो प्रश्नचिह्‌न लगेगा ही ।

(दृश्य 12)

कोसमा गाँव में एक खेत के किनारे पेड़ खड़ा है । वहीं आटा चक्की चल रही है । पुक-पुक की आवाज वातावरण में गूँज रही है। विवेक अवसाद की स्थिति में पेड़ के नीचे लेटा है। उसके पास ही बक्सा व सुराही रखे हैं।

एक औरत वहाँ कलेवा लेकर आती है जो बालक विवेक को पेड़ के नीचे सोता देखकर चौंक जाती है ।)

औरत : अजी सुनते हो । ये बालक किसका है ।

(विवेक का शरीर छूकर देखते हुए) अरे इसे तो बहुत तेज बुखार चढ़ा है ।

आदमी : यह तो काफी देर का लेटा है । मुझे नहीं मालूम कि यह कहाँ का रहने वाला है । (विवेक को झकझोर कर जगाते हुए) अरे! बेटे जागो तो ।

(विवेक आँखे खोलता है ।)

आदमी : तुम कहाँ रहते हो बेटे?

विवेक : मैं कैरावली गाँव का रहने वाला हूँ । मैं रेलगाड़ी से उतरा हूँ । एक ठग मेरा कुछ सामान ठग ले गया । इसलिए मेरी तबियत खराब हो गई ।

आदमी : अरे तुम तो भूखे भी होगे बेटा । उठो हमारे साथ कुछ खाना खा लो । ठग जो कुछ ले गया उसे ले जाने दो । तुम तो सुरक्षित बच गए ।

(औरत अपने पति को खाना परोसती है। वह विवेक को भी खाना परोस देती है। आदमी और विवेक दोनों खाना खाते हैं ।)

( दृश्य 13)

(ग्राम कैरावली में विवेक का घर । आंगन में विवेक और उसके पिताजी चारपाई पर बैठे बातें कर रहे हैं ।)

पिताजी : (समझाते हुए) जो हुआ उसे भूल जाओ विवेक । तुम सुरक्षित बच के घर आ गए मुझे इस बात की खुशी है। कल का दिन तुम्हारे लिए एक मनहूस दिन बनकर आया था । कितने खतरों को झेलकर तुम सुरक्षित घर पर आ गए। वाह रे प्रभु! तेरी लीला अपरम्पार है । (कुछ रुपये विवेक को देते हुए) लो ये रुपये रख लो । जो सामान वह ठग ले गया है, वह नया खरीद लेना । और हाँ यह घटना अपनी माँ को कभी मत बताना ।

(विवेक की आँखों में खुशी के आँसू आ जाते हैं वह अपने पिताजी के सीने से चिपक जाता है ।)

(पर्दा गिरता है)

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डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य

संपर्क - शाक्य प्रकाशन, घंटाघर चौक, क्लब घर, मैनपुरी, उप्र 2015001

ईमेल -  harishchandrashakya11@gmail.com

(एकांकी संग्रह घूमती दुनिया तथा अन्य एकांकी से साभार. संग्रह प्राप्त करने का पता - निरूपमा प्रकाशन, 506/13, शास्त्री नगर, मेरठ उप्र ईमेल - nirupmaprakashan@gmail.com आईएसबीएन नं - 978-93-81050-67-5)

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रचनाकार: एकांकी // एक मनहूस दिन // डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य
एकांकी // एक मनहूस दिन // डॉ. हरिश्चंद्र शाक्य
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