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शशांक मिश्र भारती के दस बालगीत

अजीज खान की कलाकृति

नन्‍हा चूहा

नन्‍हा चूहा बनकर राजा जा पहुंचा स्‍कूल

सिर पर लम्‍बा टोप लगाए मस्‍ती में भरपूर

सीधे जाकर प्रधानाचार्य जी के कक्ष में

बोला -श्रीमान मेरी विनती सुन लीजै

मैं भी पढूंगा नित विद्यालय आऊंगा

महोदय नाम मेरा भी लिख लीजै

चूहे की विनती सुन प्रधानाचार्य जी बोले

सुनिये राजाबाबू नाम तुम्‍हारा लिख लेंगे

अपने माता-पिता को साथ लाइये

पहले उनका इण्‍टरव्‍यू हम लेंगे

जो स्‍वस्‍थ परम्‍परा पब्‍लिक स्‍कूलों की

उसको अब हमको भी निभाना है

बालक चाहे कितना भी योग्‍य हो

पर माता-पिता को अजमाना है

उत्तर सुनकर प्रधानाचार्य महोदय का

नन्‍हा चूहा भूल गया सब काम

पढाई-लिखाई की बात छोड़ दी

वह न कभी आयेगा लिखाने नाम ॥

अनेक पेड़

मेरे घर में सुन्‍दर-सुन्‍दर

हैं अनेक पेड़,

छोटे-बड़े रंग-बिरंगे

फूलों वाले पेड़।

कोई छोटा कोई बड़ा है

कोई गिरा कोई पड़ा है,

हैं बहुत से पेड़

मनमोहक ये पेड़।

गरमी हो या हो जाड़ा-

हर मौसम इनसे नाता है

इनके हरे भरे होने पर

हर पेड़ सभी को भाता है।

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सीखो

नदियों से जानो बहना,

झरने सा नत मस्‍तक

कोयल सा मीठा कहना,

फूलों से सीखें हंसना

चिडि़यों सा चहकना

कमल सा खुश रहना,

धरती मां सा धीरज

पहाड़ सा न डिगना,

उठना सीखो नभ सा

हवा सा बाग में बहना,

सड़क सा पड़े रहकर

हंस-हंस कर सहना,

दीन-दुःखियों के कष्‍ट

पल भर में हल करना,

पथ में आये कोई बाधा

साहस से दूर करना॥


गधेराम जी

गधे राम जी आज सुबह को

पहुंच गए स्‍कूल

सफेदरंग की कमीज पहने थे

और खाकी पतलून

ढेंचू-ढेंचू कर कहा उन्‍होंने

पढ़ना मुझे सिखाओ ना

निरक्षर हूं मैं अब तक

साक्षर मुझे बनाओ ना

साक्षर यदि बन गया मैं तो

आदर्श गधा बन जाऊंगा

रखूंगा न कोई गधा निरक्षर

अभियान ऐसा चलाऊंगा।

पड़ता दांत गंवाना

दीदी जी ने भइया जी को

दी जब एक टाफी

भइया बोला प्‍यारी दीदी

वह भी दो जो बाकी

दीदी बोली सुन रे भइया

टाफी अधिक न खाना

मीठा हैं अधिक जो खाते

पड़ जाता दांत गंवाना

उम्र आठ मुंह पैंसठ का

पोपले हैं कहलाते

जब खोलते मुंह बोलने को

दोस्‍त हंसी उड़ाते


गुडि़या रानी

नन्‍हीं सी गुडि़या रानी तुम

देर सुबह तक क्‍यों सोती हो

सूर्योदय की अनुपम लाली का

सुन्‍दर दृश्‍य क्‍यों खोती हो

प्रकृति का निरुपम वैभव

खोना बिटिया रानी ठीक नहीं

जल्‍दी उठना स्‍वास्‍थयवर्धक

बिस्‍तर से चिपकना ठीक नहीं

सुबह को जल्‍दी जागकर ही

काम समय से कर सकती हो

घर- दोस्‍त हों या विद्यालय

प्रभावित सबको कर सकती हो

आलस्‍य नहीं तुम्‍हारी प्रतिभा

पौरुषता ही तो संबल है

कल परसों की बात छोडि़ये

तुरन्‍त करो विजयीफल है

समय से करते काम जो अपने

नित आगे ही खड़े होते हैं

जो देर तक बिस्‍तर पकड़ते

जीवन भर रहते रोते हैं।


शुभ हो जन्‍म दिवस

जीवन में आपके हर क्षण

बहे प्‍यार का रस,

मेरी यही है कामना

हो अच्‍छा जन्‍म दिवस।

भविष्‍य खिले फूलों सा

न पथ में कभी कांटे

सावन आये झूंम-झूंम

ढेर सी खुशियां बांटे

बगिया सा हो सौन्‍दर्य

छाये चहुं ओर हर्ष

पाओ सारी मंजिलें

हो खुशहाली का वर्ष

न हो कोई कठिनाई

हों पूरे सुन्‍दर सपने

बिखरे कपोलों पर लाली

पराये भी हों अपने

शत्रु-मित्र जुड़ जायें

बने ऐसा जन्‍मदिवस

स्‍वस्‍थ और सानन्‍द झूमते

तुम जियो हजारों वर्ष॥

तितली रानी


एक-

तितली रानी तितली रानी

तुम तो हो गई बड़ी सयानी

रंग-बिरंगे परिधान पहनकर

फूलों के संग करती शैतानी

आसमान से आ जाती हो

रंगों से मुझको भा जाती हो

सुन्‍दर-सुन्‍दर पंख हिलाकर

बगिया में इठला जाती हो।


दो-

तितली रानी आओ ना

भइया को हँसाओ ना

रंग-बिरंगे कपड़ें जैसे

अपने पंख हिलाओ ना,

बगिया में आजाओ ना

और अधिक सताओ ना

आसमान की रानी तुम

तितली रानी आओ ना।


श्रम का पथ

श्रम का पथ अपनाओ बच्‍चों

उच्‍च सफलता पाओ जी

मन के सारे अन्‍धकार को

देखो दूर भगाओ जी

गांधी जैसा तयाग करो

नेताजी सा विश्‍वास रखो

हार करो स्‍वीकार नहीं

उर में सच्‍ची आस रखो।

शशांक मिश्र भारती सम्‍पादक देवसुधा हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0

ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com

बालकथा 5712067663526632833

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