शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

कहानी // ...और पुजापा रहीम को // डॉ. जयश्री सिंह

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प्रकाशन : सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों का अनुशीलन, विविध विषयों पर 15 शोधलेख प्रकाशित। आकाशवाणी से रेडियो वार्ता प्रसारित। मुम्बई विश्वविद्यालय द्वारा 'पडित नरेन्द्र शर्मा हिन्दी एकेडेमिक पुरस्कार' । मुंबई बोर्ड द्वारा 'सरस्वती सुत सम्मान'। संप्रति: शोध निदेशक (मुबई विवि) बेडेकर कॉलेज. ठाणे में सहायक प्राध्यापक।

गाड़ी धीमी हो कर रुक गयी थी। बगल के कंपार्टमेंट से किसी महिला के लगातार बोलने की आवाज से ही शायद मेरी नींद टूटी थी। उसकी आवाज में अजीब सी तलखी थी। बोलते-बोलते कभी उसका स्वर रुआँसा हो जाता तो कभी कठोर। उसके सामने की सीट पैर बैठा यात्री केवल हाँ-हूँ के प्रति उत्तर में उसे सुनता जा रहा था मैंने घड़ी देखी। सुबह के दस बज रहे थे। मुबई- फैजाबाद 'साकेत एक्सप्रेस' के फैजाबाद पहुँचने का यही समय था। गाड़ी स्टेशन से कुछ ही दूर पुल के पास खड़ी थी अब सोने का कोई मतलब नहीं था। मैं नीचे उतरकर साइड वाली बर्थ पर बैठ गयी। पापा-मम्मी उतरने के लिए तैयार बैठे थे। अचानक याद आया कि आज गणेश चतुर्थी है। मुंबई का बेहद खास दिन! चारों ओर बाजे-गाजे के धूम धड़ाके -के साथ छोटे-बड़े सार्वजनिक पंडालों तथा गणेश भक्तों सहित अन्य कई मुबईकरों के घरो में गणपति प्रतिमा का आगमन हो चुका होगा। 'जय देव-जय देव, जय मंगल मूर्ति. ' के सामूहिक स्वर घोष के साथ स्वादिष्ट मोदकों का भोग लग चुका होगा। पंडालों में जगह-जगह दर्शनार्थियों का ताँता लग रहा होगा।

हर साल कॉलेजो में केवल एक ही दिन की छुट्टी मिलती थी, लेकिन इस बार गणेशोत्सव की सात दिनो की छुट्टी मिली थी। मैं इस लबी छुट्टी और ट्रेनों में न के बराबर की भीड़ का पूरा फायदा उठा लेना चाहती थी। इसलिए छुट्टी का पता चलते ही पापा-मम्मी के साथ मुंबई से अयोध्या, अयोध्या से नैमिषारण्य और फिर नैमिषारण्य से मथुरा- वृन्दावन की यात्रा का पूरा आयोजन कर चुकी थी। मैं खुश थी कि हर बार माँ के कहने पर उन्हे अयोध्या-वृन्दावन ले जाया करती हूँ, पर इस बार तो पापा को भी साथ लेकर राम और कृष्ण की जन्मभूमि के दर्शन का एक साथ लाभ उठा सकूँगी। मैं मन ही मन माता-पिता को साथ ले कर तीर्थ यात्रा करने की श्रवण कुमार वाली भावना से भी काफी खुश थी।

मैं मम्मी से कुछ हलकी-फुलकी बातें करने लगी। सहसा मेरा ध्यान उस महिला की ओर खिंचा चला गया। वह रोते हुए उस सामने वाले यात्री को अपनी व्यथा सुना रही थी। उसका दस वर्ष का बेटा उसकी गोद में सिर रखकर चुपचाप लेटा मेरी ओर देख रहा था थोड़ी देर पहले उसकी कर्कश सी आवाज से मुझे चिढ़ हो रही थी, परंतु अब मैं अपने आपको उनकी ओर देखने से रोक नहीं पायी वह दुपट्टे के चल से अपने आँसू पोंछते हुए कह रही थी, 'मै और मेरा बेटा कल से भूखे है रात को सोचा, किसी से खाना माँग लूँ, लेकिन हिम्मत नहीं हुई। यहाँ जो दो आदमी बैठे थे, वे मेरे बेटे को अपनी और देखता देख मुँह फेरकर उस ओर खाना छिपा कर खाने लगे। उसकी बातों से मुझे बडा ताज्जुब हुआ। क्या थर्ड एसी में भी कोई ऐसा व्यक्ति सफर कर सकता है, जिसके पास खाने तक को रोटी भी न हो?

इस कोच में मुंबई से फैजाबाद की एक बर्थ का किराया सोल-सत्रह सौ रुपयों के आस-पास था और उसके साथ तो उसका बेटा भी! फिर भला उसने थर्ड एसी का टिकट कैसे लिया होगा? यदि इतने पैसे थे तो खाने भर को क्यों नहीं? और यदि खाने तक के लिए भी नहीं, तो फिर वे यहाँ कैसे?

कल टीटीई आया भी तो था; यदि इसके पास टिकट न होता तो अवश्य ही इसे यहाँ से किसी दूसरे डिब्बे में भेज देता.!

वे दोनो देखने में बेहद गरीब लग रहे थे। उनकी स्थिति, उसकी बातें तथा एसी का टिकट, इन बातों का आपस में कोई तालमेल नहीं था। मेरे मन में कई सवाल एक साथ घूम रहे थे। वह मेरी ओर देख कर बोली, 'रात में मन हुआ कि दीदी से ही दो पराँठे माँग लूँ। पर सोच कर ही रह गयी। मेरा बेटा भूखा ही सो गया। ' उसकी बातें मेरे मन पर गहरा आघात कर गयी। जिस पर मैंने कल से अभी तक कोई ध्यान ही नहीं दिया था, वह माँ कल रात से ही मुझसे आस लगाये बैठी थी! उसका छोटा सा बेटा भूखा सो गया? कल रात जब मैं टिफिन खोलकर मम्मी-पापा को पराँठा, सब्जी, अचार परोस रही थी, तब वह खाना पाने की लालसा से मेरी ओर देख रहा था! इस कल्पना से ही मेरा हृदय छलनी हो गया। ओह! मुझे इसका आभास क्यो नहीं हुआ? और होता भी तो कैसे? क्या इस डिब्बे में कोई ऐसा भी होगा? मैं कभी सोच भी तो नहीं सकती थी। मन में भारी पछतावा और कई सवाल लिए मैं उसकी ओर देखने लगी और ध्यान से उसकी बातें सुनने लगी।

वह बता रही क कि वह पिछले दस सालों से हर पंद्रह दिन में लगातार फैजाबाद से मुंबई आ-जा रही है। जब से उसका यह बेटा पैदा हुआ है लगभग तब से। तीन लड़कियों के बाद हुआ था बेटा वह जन्म से ही बीमार रहता था। उसने फैजाबाद के कई डॉक्टरों को दिखाया, पर कोई दवा काम न आई। बच्चे की स्थिति बद से बदतर होती चली गयी। किसी डॉक्टर की सलाह पर गाँव के मुखिया से कर्ज माँग कर वह उसे दिल्ली ले गयी। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में कई चक्कर लगाये पर बच्चे की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उसकी गरीबी को देखते हुए वही के एक डॉक्टर ने उसे मुंबई के सरकारी अस्पताल में जाने की सलाह दी, जहाँ उसके बेटे का मुफ्त इलाज हो सकता था।

महिला कहती जा रही थी कि फैजाबाद से दिल्ली तक कोई ऐसा व्यक्ति अथवा डॉक्टर न हुआ, जिसके आगे वह रोई न हो जब उसके पति की मृत्यु हुई तो उसका बेटा बहुत छोटा था। फैजाबाद के किसी गाँव में उसका कच्चा सा मकान है। तीन छोटी-छोटी बेटियाँ और यह इकलौता बीमार बेटा उसकी बीमारी की कोई थाह न पाकर गाँव की यह गरीब, असहाय मुसलमान महिला घर की दहलीज पारकर फैजाबाद से बाहर दिल्ली- मुंबई जैसे महानगरों में अपने बेटे को जिलाए रखने की आस में हर पदं्रह दिन में अस्पतालो के चक्कर काट रही थी।

दिल्ली के डॉक्टर ने उसे बताया तो कुछ नही, लेकिन एक पर्ची लिख कर पकडाने के साथ उसे मुबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में जल्द से जल्द पहुँचने की सलाह दी। पर्ची में लिखी बातों से पूर्णत. अनभिज्ञ गाँव की वह अनपढ स्त्री बच्चे को लेकर घर लौट आयी। उसकी पंद्रह व तेरह वर्ष की दोनों बेटियाँ आस-पड़ोस के घरो में काम कर जैसे- तैसे रोटी का जुगाड़ कर लेती थी। बेटियों को पड़ोसिनों के भरोसे छोड़ तथा टिकट के पैसों का इंतजाम कर वह बेटे के साथ मुंबई पहुँची। उसे मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में आने के बाद यह ज्ञात हुआ कि उसके बेटे को ब्लड कैंसर की बीमारी है, जिसके लिए उसे हर पंद्रह दिन में रक्त बदलवाने के लिए मुंबई आना जरूरी है।

वह बताती जा रही थी कि वहाँ इलाज मुफ्त है लेकिन हर पंद्रह दिन में मुंबई से फैजाबाद की यात्रा का भार उठा पाना उसके लिए कही से भी सरल न था। उसके गाँव में कई पढ़े-लिखे लोग थे, जो उसकी लाचारी से वाकिफ थे। ग्रामपंचायत से भी उसे काफी उम्मीद थी, परंतु किसी ने उसे सहानुभूति के चंद बोलों के सिवा कुछ न दिया। कहते-कहते उसका आक्रोश फूट पडा, 'सब बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ऊँचे-ऊँचे लोगो तक अपनी पहुँच का बखान करते हैं। सौ प्रकार की सलाह देते हैं पर मदद कोई नहीं करता। भला हो मुंबई के अस्पताल के उस डॉक्टर का, जिसने एक माँ की परिस्थिति तथा उसके दर्द को समझा। कानूनी मदद से सरकारी कोष से कुछ रुपये दिलाये तथा आवश्यक कागजी कार्यवाही से रेलवे से हर पंद्रह दिन की यात्रा का पास बनवाने में मदद की। वह यह नहीं जानती थी कि डॉक्टर तथा अस्पताल द्वारा दिए उस कागज में क्या लिखा है पर उसे इतना ज्ञान अवश्य था कि उसके बेटे के इलाज के लिए उसके जीवन की उम्मीद के लिए, उस अनिश्चित काल की नियमित यात्रा के लिए यह कागज बेहद जरूरी है। उसको दिखा देने मात्र से उसे यात्रा का टिकट मिल जाता था तथा टीटीई कभी उसे इस डिब्बे से बाहर नहीं करता। वह लाचार माँ, जो अपने आस-पास के गाँव के लोगों को जहाँ एक ओर जी भर कर कोस रही थी वही मुंबई के उस अस्पताल के डॉक्टर को पनियाई आँखो से लाखों दुआएँ दे रही थी, जिसकी बदौलत उसे बेरोकटोक इलाज तक साकेत एक्सप्रेस के थर्ड एसी कोच में दो सीटों का आरक्षण मिला था ।सालों से परिचित अस्पताल के कर्मचारी उस दुखियारी माँ को भी रोगियों के लिए आने वाले मुफ्त भोजन में से दोनों समय का भोजन दिलवा दिया करते थे। उनमें से कुछ उसकी हिम्मत व हौसले की दाद देते नहीं थकते, तो कुछ चाय- बिस्किट के नाम पर सौ-पचास रुपये दे दिया करते थे उसकी दुःख भरी दास्तान सुनकर कई बार लोकमान्य तिलक टर्मिनल से अस्पताल तक ले जाने वाले टैक्सी वाले टैक्सी का किराया तक छोड़ दिया करते थे, जिसने दस वर्षों से गरीबी, बीमारी और लाचारी का यथार्थ भोगा था

उस मुस्लिम महिला से यह जानकर मुझे बेहद गर्व महसूस हो रहा था कि भारत में और कही हो न हो, पर मेरे शहर के लोगो में आज भी मानवता जिंदा है। भारत का यह महानगर जाति- धर्म से परे मानव धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ समझता है, इसलिए हर जाति, भाषा, धर्म के लोगो को अपनी गोद में समेटे हुए है। इसी कारण लोग मुंबई को 'मिनी इंडिया' कहते हैं।

पिछले दस वर्षों का उसका अनुभव कह रहा था कि मुंबई केवल चकाचौंध और व्यस्तता का ही शहर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को समझने तथा निराशा में भी आशा देकर संघर्ष के साथ जीवन जीने की कला सिखाने वाला शहर है।

जहाँ अपने शहर की इस मानवता पर मैं गद् गद् थी, वहीं मेरे मन में यह टीस भी रह-रह कर उभर रही थी कि मैं उसके बच्चे को रात में खाना न दे सकी। मैं मन में कोई पछतावा लेकर आगे बढ़ना नहीं चाहती थी। हम एक सप्ताह की यात्रा पर चले थे, अतः मेरे पास खाने-पीने की कई चीजें थी। मैने झटपट कई तरह के नमकीन, चिप्स और बिस्किट के पैकेट्स उस नन्हे से रहमान को पकड़ा दिए और उसकी माँ को अगली यात्रा के सहयोग के लिए पाँच सौ रुपये का नोट। अब तक माँ की गोद में चुपचाप पड़ा रहीम खाने की कई चीजें पा कर खुश हो गया था और उसकी माँ हाथजोड़ कर आभार की मुद्रा में खड़ी हो गयी। स्टेशन आ चुका था। हम सामान लेकर नीचे उतर आये। अवधबिहारी की भूमि पर कदम रखते ही मुझे यह आभास हुआ कि राम की सच्ची सेवा यही है कि उनके कोष का पुजापा उस नन्हे से रहीम को मिले, जिसे इस समय उसकी बेहद आवश्यकता है।

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग जोशी-बेडेकर महाविद्यालय, थाने- 4००6०1

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(साभार - हिन्दुस्तानी ज़बान, अप्रैल-जून 2017)

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