शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

कभी 'चिंतन' पर ही 'चिंतन' कर देखें // डॉ. चन्द्रकुमार जैन

जीवन सिर्फ गुलाब के फूलों की सेज़ नहीं है जिसकी कोमलता से हम खुश और मादक सुरभि में मस्त जीते रहें। जीवन, वास्तव में सुख-दुःख, आशा-निराशा, उतार-चढ़ाव और हानि-लाभ का चमत्कारिक मेला जैसा है। जीवन में सफलता और उन्नति सभी चाहते हैं। पर स्मरण रहे कि सफलता का एक साधन है मनन और चिंतन। चिंतन का मतलब यह नहीं कि आप समस्याओं को लेकर चिंता में डूबे रहें। हर समय खोये रहें या कुछ न कुछ सोचते रहें । सच तो यह है कि चिंतन वह साधन है जिससे आपको प्रगति और सफलता का रास्ता दिखता है।

अब प्रश्न यह है कि चिंतन किस चीज़ का करें ? किस पर ध्यान लगाएं ? तो लीजिये आज के इस चिंतन में चिंतन के कुछ आयाम भी साझा कर लें। अपने आपसे, अपने विचार और अपने कर्म  के बीच के अन्तर पर, अपने स्वरूप, जीवन के उद्देश्य, प्रकृति की हमसे अपेक्षा, इस दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग, अब तक क्या किया, क्या खोया, क्या पाया, क्या करना है आगे, आत्म सुधार के लिए क्या किया जा सकता जैसे किसी भी पहलू पर चिंतन किया जाना चाहिए और समीक्षा की जानी चाहिए कि अपनी वर्तमान गतिविधियां अपने जीवन लक्ष्यों से तालमेल रखती हैं या नहीं? यदि अन्तर है तो वह कहां है, कितना है? इस अंतर को दूर करने के लिए जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों? आखिर क्यों ?

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ये प्रश्र ऐसे हैं जिन्हें अपने आप से गंभीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहां सुधार की आवश्यकता हो उसके लिए क्या कदम किस प्रकार उठाया जाय, इसका निर्णय करना चाहिए। हर दिन नया जन्म, नया जीवन मानकर चला जाय और उसे श्रेष्ठतम तरीके से जीकर दिखाने का प्रातःकाल ही प्रण कर लिया जाय तो यह ध्यान दिन भर प्रायः हर घड़ी बना रहता है कि आज कोई नकारात्मक विचार मन में नहीं आने देना है, निकृष्ट कर्म नहीं करना है, जो कुछ सोचा जायेगा वैसा ही होगा और जितने भी कार्य किये जाएंगे उनमें पूरी ईमानदारी बरती जाएगी। प्रातःकाल पूरे दिन की दिनचर्या निर्धारित कर लेनी चाहिए है। साथ ही संभावित चुनौतियों का सामना करने का संकल्प भी करना चाहिए।

आइये, प्रयोग के तौर पर आज की सुबह मौन के महत्त्व पर ही थोड़ा चिंतन कर लें। एक बार एक महिला एक साधु के पास पहुंची। उनसे साधु से पूछा - जैसे ही मेरे पति काम से घर लौटते हैं, वो अपना सारा गुस्सा मुझ पर निकालना शुरु कर देते हैं। ऐसी परिस्थिति में मैं भी गुस्से में प्रतिक्रिया देती हूं जिससे हालात  और बिगड़ जाते हैं। ऎसी दशा से उबरने के लिए आपके पास इसका कोई उपाय है? साधु ने विश्वास के साथ जबाव दिया - हाँ ! और पेड़ के नीचे रखे पानी के बर्तन को झुकाते हुए कहा, “यह पवित्र जल है। जैसे ही तुम्हारा पति क्रोधित होने लगे, इस पानी को अपने मुंह में भर लेना और इसे तब तक नहीं निगलना जबत क उसका गुस्सा शांत ना हो जाये।”

उस महिला ने ऐसा ही किया। कमाल की बात यह थी कि यह काम भी कर गया। झगड़ा बंद हुआ और कुछ दिनों बाद घर में केवल शांति बसने लगी। एक दिन वह पवित्र जल खत्म हो गया और उसे वापस से लेने महिला दौड़ती हुई साधु के पास जा पहुंची। उसने खुशी ज़ाहिर करते हुए  साधु को समाधान की सफलता के बारे में बताया और उनसे और पवित्र जल मांगा। इस बात पर साधु मुस्कुराने लगे और सच्चाई बताते हुए महिला को कहा, “पवित्रता जल में नहीं थी बल्कि तुम्हारी चुप्पी में थी।” उस जल को मुंह में भरकर वह अपने शब्दों को अंदर और बाहर दोनों रूप से जन्म लेने से रोकती थी। इसलिए हम चिंतन करें कि मौन, चुप्पी या खामोशी में कितनी ताकत है।

हर व्यक्ति अपने शब्दों के प्रयोग से अपने संसार का निर्माण करता है। हम खुशनुमा शब्दों का इस्तेमाल कर किसी का दिन अच्छा बना सकते हैं या कड़े शब्दों का इस्तेमाल कर बुरा। हम अक्सर शब्दों से चोट खाते हैं और दिखा नहीं पाते। हालांकि, शब्दों की ताकत के बारे में थोड़ी सी जागरुकता भी किसी के संसार में या उसके आस-पास की दुनिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।

हम याद रखें कि समस्या शब्दों में नहीं होती बल्कि उसकी वास्तविक समझ न होने के कारण होती है। वास्तव में, हमारे जीवन में कहने और सुनने में  लापरवाही के परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। जब शब्द की ताकत समझ में आ जाती है तो ये शब्द मंत्र की तरह महसूस होते हैं। संस्कृत शब्द ‘मंत्र’ का अर्थ है शब्दों से रक्षा करना और जब किसी की रक्षा शब्दों से हो जाती है तो वह दूसरों की दी हुई पीड़ा से भी बच जाता है। यह उसे चोट पहुंचाने के बजाय उसका उपचार करती है। जितना अधिक आप शब्दों की ताकत को समझ पायेंगे, उतना ही अधिक आप चुप्पी की ताकत को भी समझ पायेंगे। इस प्रकार के चिंतन और मनन से जीवन की दशा और दिशा में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आएगा। फिर क्या,  ज़िंदगी आपसे ज्यादा गहराई से संवाद करेगी और आपकी बिगड़ी बात पल भर में बन जाएगी। क्यों न हम आज से चिंतन को ही चिंतन का विषय बनाकर देखें।

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