गुरुवार, 28 सितंबर 2017

प्रेम पर कविताएँ // धर्मेंद्र निर्मल

हिफ़्जू रहमान की कलाकृति


1.    इन आँखों में

इन आँखों में
अतल गहराइयाँ हैं
अतुल उचाँइयाँ,
असीम विस्तार है
अशेष कल्पनाएँ
अपूर्व आभास
अपार आनंद है इन आँखों में

इन आँखों में
अनुपम सौंदर्य है
अमर जीवटता
अचूक निशाने है
अकथ कथाएँ
अपठ ऋचाएँ
अबूझ मरीचिकाएँ है इन आँखों में

इन आँखों में
अनगिनत हिलोरें है
अटल से अटल को हिलोर दे
अशांत बवंडर को कर दे
शांत
अबोल बोल
अगाध प्रेम है इन आँखों में

इन आँखों में अपार पार
अमेल मेल
अनंत असंभव संभावनाएँ
अमिट रंग है

इन आँखों में इतना सब है
कह नहीं सकता मैं
कह नहीं सकता हर कोई
इतना सब है इन आँखों में


2. छोटे से कमरे में

सब कुछ
सकेल ले गए हो तुम
भावनाओं की भूख
प्यास आँखों की
मिटें
ऐसा कुछ भी तो नहीं
इस छोटे से कमरे में

नन्हीं नर्म चुलबुली धूप
खिड़की से कूद
मेरे गालों पर
खेलती गौरैया सी
गोया गुदगुदाते मुस्कुराते कहती - गुड मार्निंग
तुम मुझसे
सटे
इस छोटे से कमरे में

कहीं जाने से पहले
खीचकर तलाशता है
बिलकुल तुम्हारी तरह दर्पण
मेरे चेहरे पर
सिंदूर के धब्बे कहीं बिंदी
चैंक पड़ता है कभी
केश, कमीज पर देख मेरे ही
टूटे
इस छोटे से कमरे में

तेरे रूप से भीनी अजीब सी गंध
बिखर सपनों के संग
तुम्हारी तरह
करीब और करीब
मुझे रखना चाहती है
नींद से दूर
छूटे
इस छोटे से कमरे में

लटकाए
दरवाजे के आजू बाजू
जो तूने ग्रीटिंग कार्ड्स
जोड़ जोड़
लटक रहा तुम्हारी बाली सा
झूमर तेरी नथनी
मेरी नाक पर
अब तब
डटे
इस छोटे से कमरे में

3. परिभाषा

परिभाषा
एक ब्रम्हपाश
बाँधती शब्द कड़ियों में
वृहत और निर्बंध
विषय
और इंजेक्शन के बाद
खुराक उदाहरण जैसे
आत्मसमर्पण
सारी समस्याओं का
मगर
विश्वजीत प्रेम
परिभाषा से परे
पग पग को धरे
जैसे जगतपाल
परे
विज्ञान के अनुसंधानों से।


4. प्रेम ! प्रेम !! प्रेम!!

चंचल शरारती हवाओं ने
तेरी काली घनी
जुल्फों को छेड़ा
मयूर हुआ मन मेरा

प्रणय भार से
झुकी तेरी पलकें
आतुर तुम्हें कसने
गिरि के महापेड़ों सी
उठी मेरी बाँहें

तेरी बिंदिया चमकी
कि
उछाहों की असीम तरंगें लिए
अंतहीन भावी सपनों के
उथल पुथल बीच
महासागर में तब्दील हुआ
मेरा ह्रदय

मेरा अनकहा प्रेम
मेरे होंठों की प्यास
भारी पड़ी
तुम्हारी मौन स्वीकृति पर
तुमने बरसा दी
कड़ककर
गरजकर
उमड़ घुमड़
प्रेम ! प्रेम !! प्रेम !!
और भीगता चला गया
मैं
मेरा मन
अंतर्मन
ए सावन की मतवाली घटा
तू आसमाँ की राजकुमारी है
तो मैं धरती का राजकुमार।


धर्मेन्द्र निर्मल 

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