शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

माह की कविताएँ

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रमेश शर्मा

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दोहे रमेश के  हिंदी दिवस पर
............................................
हिंदी मेरे देश की,..... मोहक मधुर जुबान !
इसका होना चाहिए, और अधिक उत्थान !!

किया उन्होंने आज फिर, हिंदी पर अहसान !
दिया साल के बाद फिर, हिंदी में व्याख्यान !!

भावी पीढ़ी पर अगर, दिया नहीं जो ध्यान !
हो जाएगी सत्य यह,.... हिंदी से अनजान !!

हिंदी का समझें बड़ा, खुद को खिदमतगार !
बच्चे जिनके पढ़ रहे,..... अँग्रेजी अखबार !!

अँग्रेजी में लिख रहे, हिन्दी का अनुवाद !
संसद में भरपूर है ,.... ऐसों की तादाद !!

होती हिंदुस्तान की,......हिंदी से पहचान !
इसका होना चाहिए, सबको ही अभिमान !!

हिंदी का आदर करें ,..पढें नये नित छंद !
होगी सबकी एक दिन,हिंदी प्रथम पसंद !!

हिंदी भाषा देश की,.....जिसकी नहीं मिसाल !
समय समय पर विश्व में,जिसने किया कमाल ! !

फिल्मों का भी हाथ है,इसमें बडा रमेश !
हिंदी को पहचानते, इस कारण सब देश !!

फिल्मों के द्वारा गया, सहज बड़ा सन्देश !
हिंदी में बातें करे,....... आज समूचा देश !!

अंग्रेजी में ले रहे,...हिंदी का वो स्वाद !
भाषा हिंदी बोझ सी, दी हो जैसे लाद !!

हुई धुंधली आज पर ,उज्ज्वल है तकदीर !
चलो सँवारें हम सभी, हिंदी की तस्वीर !!
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दोहे श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर
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मघुसूदन माधव मदन,मनमोहन घनश्याम !
पूरे इक सौ आठ है,.......नारायण के नाम !!

लाये कारागार से , .....दे यमुना को मात !
तब से ही वसुदेव जी, हुए कृष्ण के तात !!

निर्बल की सुनता नहीं,... कोई यहाँ पुकार !
क्यों कान्हा लेते नहीं ,इस युग में अवतार!!

त्रेता जन्मे राम बन, ......द्वापर बन घन-श्याम !
  कलियुग को तनकर मिले, रावण कंस तमाम! !

कितनों को पूरी तरह,..है ये याद  रमेश!
दिया हुआ प्रभु आपका,गीता का संदेश!!
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दोहे रमेश के..स्वतंत्रता  दिवस  पर
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आजादी है देश की, ....वीरों का बलिदान !
नवयुग की नव पीढियां , दें वीरों को मान !!

आजादी को हो गए,........पूरे सत्तर साल !
नहीं गुलामी का मगर,कटा ज़हन से जाल !!

आजादी का कब हुआ,हमें पूर्ण अहसास !
पहले गोरों के रहे ,...अब अपनों के दास !!

जिसको देखो बेधड़क, लूट रहा है देश !
आजादी के अर्थ को, समझे नहीं रमेश !!

आजादी के बाद से, दिन-दिन भड़की आग !
सत्तर सालों   बाद भी, नहीं सके हम जाग !!

भूखे को रोटी नहीं,रहने को न  मकान !      
हुआ देश आजाद ये,कैसे लूँ मैं मान ! !

सत्तर पूरे हो गए ,....आजादी के साल !
नेता तो खुशहाल हैं,पर जनता बदहाल !!

आजादी अब हो गई,  है ऐसा हथियार !
अपनों के आगे करे, अपनों को लाचार !!

सुनने वाला ही नहीं,  जब कोई फ़रियाद !
आजादी के बाद भी ,हम कितने आज़ाद !!

चलो उन्होंने कर दिया, फिर से यह अहसान !
आजादी के पर्व का,.... किया आज सम्मान !!

आजादी उनके कभी, .....आयी नहीं करीब !
रहीं झिड़कियां गालियाँ,जिनका यहाँ नसीब !!

रमेश शर्मा.
९८२०५२५९४०

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सुशील शर्मा



रेवड़ियां बँट रहीं हैं

शिक्षा का सम्मान बिकाऊ है भाई।
पैरों पर गिरना टिकाऊ है भाई।
तुम मेरे हो तो आ जाओ मिल जायेगा।
मैं अध्यक्ष हूँ मैडल तुम पर खिल जायेगा।
क्या हुआ गर शिष्याओं को तुमने छेड़ा है।
क्या हुआ गर शिक्षा को तुमने तोड़ा मोड़ा है।
क्या हुआ गर माता पिता को दी तुमने हाला है।
मत डरो समिति का  अध्यक्ष तुम्हारा साला है ।
शिक्षा को भरे बाज़ारों में तुमने बेचा है।
ट्यूशन में अच्छा जलवा तुमने खेंचा हैं।
क्या हुआ गर शिष्यों के संग बैठ सुरा पान किया।
क्या हुआ गर विद्या के मंदिर का अपमान किया।
सम्मान की सूची में सबसे ऊपर नाम तेरा।
नोटों की गड्डी में बन गया काम तेरा।
अपने अपनों को रेवंड़ियाँ बाँट रहे।
दीमक बन कर ये सब शिक्षा को चाट रहे।
योग्य शिक्षक राजनीति में पिसता है।
चरण वंदना का सम्मानों से रिश्ता है।
---.

*कैसे हो गजानन*

कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

जी एस टी से व्यापारी हैं बेहाल।
दलालों की नहीं गल रही है दाल।
जमाखोरों का हुआ जीना मुहाल।
औरतों के कट रहे चोटियों के बाल।
राम रहीम पर पड़ा सीबीआई का जाल।
कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

पाकिस्तान कर रहा हरदम घात।
चीनी चाउमीन से न बन रही बात।
भारत से खा कर हरदम मात।
दोनों घुड़क रहे दिन और रात।
डोकलाम में मचा बबाल।
चीनी चूहे करें सवाल।
कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

तीन तलाक अब हुआ खलास।
मुस्लिम बहिनें हुईं पलास।
बेरोजगारी की दर है खास।
पप्पू अभी नहीं हुआ है पास।
टमाटर दहक कर हुआ है लाल।
प्याज सिमट कर हुई बेहाल।
कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

अन्नदाता खा रहा है गोली।
  रोटी इठला कर बोली।
नेट है सस्ता महंगी गोली।
मस्त है मजदूरों की टोली।
दिन में काम का नहीं मलाल।
मोबाइल से रोटी का सवाल।
कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

इस बार गजानन कुछ कर जाना।
ऑक्सीजन के सिलेंडर भर जाना।
बंद हो जाये बच्चों का मर जाना ।
विश्वास से सब मन भर जाना।
भारत में सब हों खुशहाल ।
जीवन में सब हों मालामाल।
कैसे हो गजानन अबकी साल।
भारत में तो मचा है धमाल।

---.
गणपति आराधना

घोर त्वं अघोर त्वं
भाव त्वं विभोर त्वं
सिद्धि त्वं प्रसिद्धि त्वं
क्षरण त्वं वृद्धि त्वं
अखंड बुद्धि शुद्धि त्वं
प्रचंड रिद्धि सिद्धि त्वं
प्रकल्प त्वं प्रगल्भ त्वं
प्रचंड दंड शाल्भ त्वं
समष्टि त्वं व्यष्टि त्वं
प्रकृति त्वं सृष्टि त्वं
काल त्वं कराल त्वं
देव दृष्टि भाल त्वं।
भूत त्वं भविष्य त्वं
दृश्य त्वं अदृश्य त्वं
कांति त्वं प्रकान्ति त्वं
शांति त्वं प्रशांति त्वं
नेह त्वं निहाल त्वं।
देह से विशाल त्वं
प्राण त्वं प्रमाण त्वं
सृष्टि का निर्माण त्वं
शक्ति त्वं भक्ति त्वं
आत्मअभिव्यक्ति त्वं
युक्त त्वं सयुंक्त त्वं
सर्व भाव युक्त त्वं
मान त्वं अभिमान त्वं
देवों का सम्मान त्वं
कल्प त्वं संकल्प त्वं
सृष्टि का विकल्प त्वं।
शिशु त्वं वृद्ध त्वं।
यौवन समृद्ध त्वं।
नीर त्वं क्षीर त्वं।
धीर त्वं अधीर त्वं
एक दंत दयावंत
संतो के महासंत
वक्रतुंड महाकाय
कृष्णपिंगाक्ष विकटाय
हे महाभाग ईश्वरं
क्षमस्व परमेश्वरं
----.
कृष्ण कृष्ण तन आज हुआ

कृष्ण कृष्ण तन आज हुआ है
राधा राधा मन चहका ।
सुरभित पुलकित मन है मेरा
बगिया सा जीवन महका।

अंतर्मन की मधुर बेल पर
कान्हा कान्हा पुष्प खिले
नव सर्जित पुष्पित अभिलाषा
राधा राधा प्रेम मिले।

कृष्ण कर्म के हैं अधिष्ठाता
राधा प्रेम की मर्यादा
कृष्ण समर्पित जीवन जैसे
राधा जीवन का वादा।

जीवन का उत्सव हैं राधा
कृष्ण सत्य का भान सखे।
बरसाने की लली हैं राधा
कृष्ण हैं बृज का मान सखे।

कृष्ण रहें राधा बनकर
राधा कृष्ण के अंदर हैं।
राधा इठलाती सी नदिया
कृष्ण आलंगित समंदर हैं।

मुरलीधर ने मुरली त्यागी
राधा को उपहार दिया।
जीवन की सारी खुशियों को
राधा पर ही वारि दिया।

प्रेम नहीं पाना होता है।
राधा ने यह सिद्ध किया।
कृष्ण से त्यागी परमेश्वर को।
त्याग से मन आबद्ध किया।
---.
आज़ादी

आज़ादी का ये कैसा
मतलब तुमने जाना है।
सिर्फ अपनी स्वार्थसिद्धि
को ही तुमने आज़ादी माना है।

भारत की इस आज़ादी में
  कितनों ने मृत्यु वरण किया।
कितनों ने अपना घर छोड़ा
  कितनों ने जीवन मरण किया।

अनगिनत अनाम शहीद
हुए आज़ादी के मतवाले थे।
भारत माता की पुकार
पर वो कब रुकने वाले थे।

संघर्षों की आज़ादी को
हमने यूं बदनाम किया।
राजनीति को सिर पे चढ़ा
कर हमने ओछा काम किया।

आज़ादी का मतलब क्या
गाली की अभिव्यक्ति है।
आज़ादी का मतलब क्या
पाक की अंधभक्ति है।

आज़ादी का मतलब क्या
जे एन यू के प्यारे हैं।
आज़ादी का मतलब
क्या देशद्रोह के नारे हैं।

आज़ादी का मतलब क्या
पाक परस्ती होना है।
आज़ादी का मतलब क्या
  कश्मीर को खोना है।

आज़ादी का मतलब क्या
  कश्मीर के पत्थर हैं।
आज़ादी का मतलब क्या
  विस्फोटों के उत्तर हैं।

आज़ादी का मतलब क्या
  शिशुओं की सिसकारी हैं
आज़ादी का मतलब
क्या बच्चों की बेगारी है।

आज़ादी का मतलब क्या
तुष्टिकरण की नीति है।
आज़ादी का मतलब क्या
एक जाति वर्ग से प्रीति है।

आज़ादी का मतलब
गांधी का एक सपना है।
आज़ादी का मतलब
ये प्यारा भारत अपना है।

आज़ादी का मतलब
शास्त्री की खुद्दारी है।
आज़ादी का मतलब
कलाम की ईमानदारी है।

आज़ादी का मतलब
नेहरू का नेतृत्व है।
आज़ादी का मतलब
वल्लभ भाई का व्यक्तित्व है।

आज़ादी का मतलब
वीर सुभाष का मान है।
आज़ादी का मतलब
भगतसिंह का बलिदान है।

आओ हम सब मिलकर
एक नया विचार करें।
सबको साथ मे लेकर हम
सपनों को साकार करें।

स्वस्थ और विकसित भारत
का सपना सच करना होगा।
आज़ादी को अक्षुण्य बनाने
मिलजुल कर रहना होगा।

--


आगे बढ़ो

कल का दिन किसने देखा है।
आज अभी की बात करो।
ओछी सोचों को त्यागो मन से
सत्य को आत्मसात करो।

जिन घड़ियों में हँस सकते हैं
क्यों तड़पें संताप करें।
सुख दुःख तो है आना जाना।
कष्टों में क्यों विलाप करें।

जीवन के दृष्टिकोणों को
आज नया आयाम मिले।
सोच सकारात्मक हो तो
मन को पूर्णविराम मिले

हिम्मत कभी न हारो मन की।
स्वयं पर अटूट विश्वास रखो।
मंजिल खुद पहुंचेगी तुम तक।
मन में सोच कुछ खास रखो।

सोच हमारी सही दिशा पर।
संकल्पों का संग रथ हो।
दृढ़ निश्चय कर लक्ष्य को भेदो।
चाहे कितना कठिन पथ हो।

जीवन में ऐसे उछलो कि
आसमान को  छेद सको ।
मन की गहराई में डुबो तो
अंतरतम को भेद सको।

इतना फैलो कायनात में
जैसे सूरज की रोशनाई हो।
इतने मधुर बनो जीवन में
हर दिल की शहनाई हो।

जैसी सोच रखोगे मन में
वैसा ही वापिस पाओगे।
पर उपकार को जीवन दोगे
तुम ईश्वर बन  जाओगे।

तुम ऊर्जा के शक्तिपुंज हो
अपनी शक्ति को पहचानो
सदभावों को उत्सर्जित कर
सबको तुम अपना मानो।

----.
सरहदें

कई सरहदें बनी लोग बँटते गए।
हम अपनों ही अपनों से कटते गए।

उस तरफ कुछ हिस्से थे मेरे मगर।
कुछ अजनबी से वो सिमटते गए।

दर्द बढ़ता गया दूरियां भी बढ़ी।
सारे रिश्ते बस यूं ही बिगड़ते गए।

दर्द अपनों ने कुछ इस तरह का दिया।
वो हँसता रहा मेरे सिर कटते गए।

खून बिखरा हुआ है सरहदों पर मगर।
वो भी लड़ते गए हम भी लड़ते गए।

एक जमीन टुकड़ों में बंटती गई।
हम खामोशी से सब कुछ सहते गए।

सरहदों की रेखाएं खिंचती गईं।
देश बनते रहे रिश्ते मिटते गए।
----------.

एक आवाज़

मिल कर सब अन्यायों से अब लड़ बैठो।
अब सब मिल जाओ तन तन के यूं मत बैठो।

बीस बरस से भोग रहें है हम भैया।
अब तो न्याय दिला दो अब न यूं चुप बैठो।

शासन की कठपुतली तो सब कुई हैं।
तुम विरोध तो करलो गोदी में अब न बैठो।

एक विधायक बन गयो एक फिराक में है।
जो अध्यापक घर में जा क्यों घुस बैठो।

जग्गू शिल्पी भैरव बिज्जू तुम सब सुन लो।
एक न भये तो भाड़ में तुम जा घुस बैठो।

संघ संघ मत खेलो ने तो मर जेहो।
अध्यापक गर गुस्सा हो के उठ बैठो।

---

अश्रु

अश्रु जो ढलक गए
स्वप्न जो ललक गए
जीवन के सब रास्ते
चले तुम्हारे वास्ते।

प्यार जो तुमने किया
हृदय जो तुमने दिया
भले करो न प्यार तुम
करेंगे इंतजार हम।

उम्र बीतती गई
रात रीतती गई
सुबह का इंतजार है।
शायद यही तो प्यार है।

आज भी वहीं खड़े
रास्ते में पड़े
छोड़ कर गए थे तुम
कर रहे इंतजार हम।

प्रेम जो कभी तुमने किया
अपना हृदय मुझे दिया।
आज भी इंतजार है।
कहो न मुझ से प्यार है।

---

*काश मेरी भी एक बहिन होती।*

काश मेरी भी एक बहन होती
रोती हँसती और गुनगुनाती
रूठती ऐंठती खिलखिलाती।
मुझ से अपनी हर जिद मनवाती।
राखी बांध मुझे वो खुश होती
काश मेरी भी एक बहन होती।

घोड़ा बनता पीठ पर बैठाता।
उसको बाग बगीचा घुमाता।
लोरी गा गा कर उसे सुलाता।
मेरी बाहों के झूले में वो सोती
काश मेरी भी एक बहन होती।

सपनों के आकाश में उड़ती
सीधे दिल से वो आ जुड़ती
रिश्तों को परिभाषित करती
होती वो हम सबका मोती।
काश मेरी भी एक बहन होती।

कभी दोस्त बन मन को भाँती
कभी मातृवत वो बन जाती
कभी पुत्री बन खुशियां लाती।
जीवन की वो ज्योति होती।
काश मेरी भी एक बहिन होती।

रक्षाबंधन के दिन आती
मेरे माथे पर टीका लगाती
स्नेह सूत्र कलाई पर सजाती
आयु समृद्धि का वो वर देती।
काश मेरी भी एक बहिन होती।

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अशोक गुजराती


                                                                                      

        टावरिंग इन्‍फ़र्नो ’
            
(संदर्भ-सात जुलाई, ’17 को दिलशाद कालोनी, दिल्‍ली में लगी आग)
सड़क पर खड़े थे दस-बीस
गेट था थोड़ा खुला हुआ
भीतर थे और भी ज़्‍यादा
मैं कंधों पर स्‍पर्श कर उनके
बढ़ना चाह रहा था आगे
यहां-वहां कालिख पुता कीचड़
रात से स्‍पर्धा करतीं दीवारें
छत  अमावस्‍या का आकाश
और सामने...
सामने थे उन्‍नीस अस्‍थि-पंजर जानवरों-से
कोयले से भी काले
ये दोपहिया वाहनों की लाशें थीं
मुझे जाना था उस पार जहां था ज़ीना
बमुश्‍किल जले-राख हुए-लिजलिजे
बिखरे-बिखरे मलबे से बचता-बचाता
जब लगा चढ़ने अंधेरी सीढ़ियां
हर क़दम पर फैला था गंदा-कुरूप कूड़ा
चिरायंध घुस रही थी नाक में
ग्रिल की कालिमा लग रही थी
हाथों-वस्‍त्रों में किसी पाप कर्म की तरह
पहुंचा किसी प्रकार ऊपरी मंजिल पर
जहां रहता था मेरा दोस्‍त
बीच में आया दूसरा तल
जिसने ली थीं चार जानें रात में
रूह कंपा रहे थे वहां से आ रहे
हल्‍के-हल्‍के रुदन के आर्त्तनाद
गुज़रे भयंकर पलों से आतंकित बरबाद

सारे फ़्‍लैटों के आगे की खाली जगह में
अधजली कुर्सियों-अलमारियों जैसे
कभी उपयोगी रहे सामान खोकर चमक
ज्‍यों याद कर रहे थे अपना अतीत, काल
दोस्‍त ने, जो हमेशा रहा है शेर-दिल
रुआंसी आवाज़ में बुलाया अन्‍दर
दरवाज़े-सीलिंग पर वहां भी थे
रात में तीन बजे लगी
मरी हुई आग की लपटों के अवशेष
चिरायता-से कड़ुए काले-कलूटे दाग़
अवसन्‍न मित्र ने बताया-
रास्‍ते पर बालकनी जिनकी थी
उतरे साड़ियां लटका-लटका कर
ऐन सामने के फ़्‍लैट वाले पिछली तरफ़ से
भाग गये चुपचाप हमें नहीं उठाया
हम तो जागे नींद से
बाहर की चीखें-चिल्‍लाहटें सुन
ग्रिल का दरवाज़ा था गरम
कपड़ा लगाकर खोला
धुआं-धुआं था गहरा छाया हुआ
भस्‍म प्‍लास्‍टिक की ज़हरीली गंध से सराबोर
दाह-संस्‍कार के पश्‍चात-सी थीं
गाहे-बगाहे अग्‍नि शिखाएं ज़ोर दिखा रही
हटाकर मुझे बढ़ा बेटा नादीद-सा
खींचीं एक के बाद एक
सिर्फ़ सुनाई देती दर्दनाक पुकारों के सहारे
दूसरे तल की तीन छटपटाती लड़कियां
हमारे घर में रहीं सुबह तक
बच गयी उनकी ज़िन्‍दगी
फिर भी था मेरा दोस्‍त बिलकुल अस्‍वस्‍थ
उसकी भी बाईक-स्‍कूटी जलीं
नहीं था उसका दुख
वह तो था परेशान
दूसरी मंज़िल के अपने आत्‍मीय
और उसके शेष परिजनों को बचा लेते
यदि पता चलता समय रहते...
मैं उसे सांत्‍वना, नाकाम-सी, देकर
लौट आया बुझे मन से
मालूम नहीं वह क्‍यों
दहकते अंगारों के बावजूद
बुझा ही रहा कई घण्‍टों तक...
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’प्रख्‍यात अंग्रेज़ी फ़िल्‍म.
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परिभाषा

हल दुनिया की तमाम
समस्‍याओं का यही है
सिर्फ़ वह करें
जो दूसरों को तकलीफ़ ना दे
यानी... आप प्रेम में हैं!
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साझेदारी

तुमसे मिलना
कुछ यों ही है
जैसे रैक में
विज्ञान और साहित्‍य की किताबें
साथ-साथ रखी हों
मैं कहता रहा
कुछ नहीं होगा
तुम बज़िद रही
आप क्‍या जानो
औरत की तकलीफ़
क्षण-दो क्षण का आपका दैहिक आनंद
मुश्‍किल में डाल देता है उसका भविष्‍य
मैं संयम में उतर गया
पूछा लेकिन
क्‍या यह सम-भोग नहीं ?
मादाएं क्‍यों सोचती ऐसा
यह एकल है
स्‍वीकारो अपनी भी संतुष्‍टि
तभी ज़िम्‍मेदारी का अहसास
होगा दोनों भागीदारों को
दिलो-दिमाग़ से जुड़ता है यह अगर
ना तुम करोगी बेवफ़ाई, ना मैं !!
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राहत

हो बेतहाशा तनाव
दुख की बदली से घिरा हो मन
अवसन्‍न-सा
छायी हो विकलता पोर-पोर में
आ जाये फ़ोन
अपने प्रिय का
बातें हों प्रेम भरी
धुल जाता है सारा क्‍लेश
पहली बारिश की तरह
सुख की तरंगें
तृप्‍ति की लहरें
लगती हैं उछलने
खुशबू मिट्‌टी की आने लगती हैं
हृदय की संतप्‍त भूमि से...
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डा. अशोक गुजराती, बी-40,एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्‍ली- 110 095.
ईमेल % ashokgujarati07@gmail.com


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शशांक मिश्र भारती


शिक्षक दिवस पर मुक्‍तक
            
एक-
बालकों में आदर्शों का निर्णायक है शिक्षक,
नैतिक मूल्‍यों उच्‍चचरित्र का परिचायक है शिक्षक।
स्वयं बनकर आदर्श कहलाता जो है सुनायक-
अनुकरण प्रक्रिया का मापक बालकों का शिक्षक॥


दो-
शिक्षक ही बालक के जीवन की पहली सीढ़ी है
जिसके आदर्शों पर चल बढ़ी सदैव यह पीढी है,
अप्‍प दीपो, भले न, किन्‍तु परहित जलना होगा-
व्‍यथित समाज, कहीं भटक गयी यह पीढ़ी है॥


तीन-
पशुता से मानवता में बदल सके जो शिक्षा,
दुराचारी को सदाचारी बनाये है वो शिक्षा।
नेतृत्‍व देश को सही दिलाये तो शिक्षा-
छू सकें श्रेष्‍ठता के शिखर वही आदर्श शिक्षा॥

 
चार-
शिक्षक बदली धारा में जब वृत्तिक सेवक सा होता है
कोई समाज और देश तभी तो भारत सा करुणा में रोता है,
जब बालपन में पिया गरल संसद का चीर भिगोता है
नेतृत्‍व क्षीण होता है तब और राष्‍ट्र गौरव खोता है॥


पांच-
शिक्षक ही निर्मित करता है बालक का व्‍यक्‍तित्‍व,
वही उसे सफल बनाता उपजाता जग में अस्‍तित्‍व।
उसके ही आदर्श कृष्‍ण, कबीर, विवेकानन्‍द बनाते-
युग प्रवर्तक बनकर के हैं अपना इतिहास रचाते॥


छः-
व्‍याप्‍त है इस समय आरोप- प्रत्‍यारोप का दौर
संसद, गांव, शिक्षालय न कोई भी बचा ठौर
मेघ सम गरजते देश का सोचें समय नहीं
जब तक चलता यहां है अपने स्‍वार्थ का दौर॥


सात-
विद्या के मन्‍दिर जब बन जाते  हैं मदिरालय,
शिक्षा-दीक्षा कुछ न तू-तू में- में के आलय।
देख दुर्दशा ऐसी है आत्‍मा सत्‍य की मचलती
दूषित हो वातावरण छवि धूमिल के ये आलय॥


आठ-
राजनीति और समाज पर जब चाटुकारिता हो हावी,
नियम- कानून कुछ न होते, मात्र चापलूसी प्रभावी।
कर्तव्‍य-अकर्तव्‍य कोई न देखे, तन-मन इनसे दूषित
क्‍या आस-विश्‍वास लगाये,जब पीढ़ी भावी न सुरक्षित॥


नौ-
पद-प्रतिष्‍ठा और निष्‍ठा जब-जब नशे में झूलती है,
घायल हो जाते हैं विचार आत्‍मा सत्‍य की मचलती है।
श्रम निष्‍ठा और विश्‍वास अगली पीढ़ी का बना रहे -
इसीलिए सच्‍चे हृदयों से क्रान्‍ति की ज्‍वाला निकलती है॥

 
दस-
शिक्षा ही बालक को संस्‍कारवान बनाती है,
उपजाती अस्‍तित्‍व शीर्ष नेतृत्‍व तक ले जाती है।
शिक्षा ही विद्या अमोघ अतिप्रखरता भर देती
अद्‌भुदता को भर पताका विश्‍व में लहराती है॥


शशांक मिश्र भारती सम्‍पादक देवसुधा हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ0प्र0
ईमेलः- shashank.misra73@rediffmail.com

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अंकुश्री


                              
      अधिक छेड़छाड़ नहीं पच पाये
                                 
                                          -

            चिड़ियाखाने  का  हाथी  कैलेन्‍डर  पर  छपता है
              देखता है जो  भी  उसको,  वन्‍यप्राणी  कहता है।

            जंगल अब जमीन पर नहीं, बस कागज पर रहता है
             कहां भटकते रहेंगे लोग ? टी0 भी0 सब कहता है।

            दूर से जो आती  चिड़ियां,  अब  बहुत शरमाती है
             आबादी जो उजड़ जाती,  नहीं फिर बस पाती है।

            जिसका था जगत सारा,  आकाष पूरा खुला हुआ
             नंगी, उजड़ी धरती पर, सभी कुछ जैसे धुला हुआ।

            प्रकृति को भी नहीं छोड़ा,  छेड़ दिया है खुल कर
             सभी नदियां भरती जा रही, पहाड़ उसमें घुल कर।

            अब मौसम का मिजाज बदला,  हवा चले शरमाती
             तभी तो यह  गरमाती  और  सबको  है भरमाती।

            कब  गरमी बढ़ जाती है, कब जाड़ा बढ़ जाता है
             पारा  नीचे  रहता है  और  तुरत  चढ़ जाता है।

            सुरक्षा में  लगे रहने  पर, फिर भी नहीं बच पाये
             छेड़छाड़  प्रकृति के साथ  अधिक नहीं पच पाये।
--0--



                         पर्यावरण

                        

                वायु, जल और दृश्‍य,ध्‍वनि
प्रदूषित  हुआ  सारा  है।

बहुतेरे  उद्योग  नहीं  हैं
प्रदूषण  ने  पर मारा है।

टूटा  ग्‍लोब बन सकता है
धरा  को  नहीं उबारा है।

नोच-नोच  कर खाने हेतु
धन  उनको यह प्‍यारा है।

सबों का  बड़ा दुलारा है
पर्यावरण  एक  नारा है।
--0--

  

         अंकुश्री
       सिदरौल, प्रेस कॉलोनी,
       पोस्‍ट बौक्‍स 28, नामकुम
          रांची-834 010


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हिमांशी


कुदरत के गीत                     
                  -

बड़ी मासूम है वो लड़की ,
             देखा है उसे हर कहीं ,

सुबह की किरण सी उजली ,
             वो जमीं पर जब उतरती है ,
खिल उठते हैं फूल ,
           के जब होठों पर उसके ,
                                       मुस्कान ठहरती है।
बहुत खूबसूरत है वो लड़की।

       भीग के आयी हो , जैसे झरने से हवा
ऐसी खुशबुओं में लिपटी है ၊
     कभी बरसात की हरियाली ,
            कभी बर्फ की चादर सी सफेद ,
  तो कभी , पतझड़ के जर्द पत्तों से
                     नारंगी लिबास में आती है जो ,
बड़े प्यार से थाम लिया है ,
                 अपनी बाँहों में ,उसने,
                                            धरती को ,
कहते हैं नाम उसका कुदरत है,
        बड़ी प्यारी, बड़ी मासूम है वो लड़की ।
 
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सोचती हूँ,
        एक रोज,
जब धूप सुनहली होगी,
         गर्म हवाओं के साये में,
                 दुनिया सोई होगी,
एक कतरा पानी का लेकर,
          तुम इन्द्रधनुष बनाना,
धूप के रस्ते, रंग बिखेरते ,
          मेरे आँगन में आना ।
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तुम आना किसी दिन ,
                 या शाम को
                     बैठकर बातें करेंगे।
मैं बताऊँगी तुम्हें,
        धरती की बातें, फूलों के किस्से,
                  बरसात की खुशबू,
  धूप का आँगन में उतरना और
                       साँझ का फिसलना,
      और भी बहुत कुछ,
पर पहले तुम बताना,
             ठहरी रात में तारों के संग,
                      रोशनी बिखेरते चाँद !
क्या तुमने परियों को गाते देखा है?

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शर्वरी चतुर्वेदी

मैं देखती हूं,
लाचार मां को ।
लुटा देती हूं,
अपने सारे प्यार ।।
भूल जाती हूँ,
दिन की तमाम बाते ।
कि किस सहेली ने,
किये थे कमेन्ट पास ।।
कि किन लोगों ने,
ईर्ष्या से देखा मुझे खुशहाल।
किसने मुह बिचकाये,
और कौन देखना चाहता है मुझे हताश।।
किसकी आंखों में,
कौन सा रंग था बाहर आने को आतुर।
भूल जाती हूँ कि,
आज का दिन कैसे गुजर गया था ।।
पुनः ऊर्जावान हो जाती हूँ,
मां की  बेबसी देखकर ।
फिर तैयार हो जाती हूँ,
योद्धा सी संघर्ष  करने को खुशहाल।।
अपने  ,
निर्णय पर अटल सन्तुष्ट ।
अपने में मग्न,
अपने सपनों को साकार होते हुए देख खुश।।


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निगम राज

दिल में समाई कोई निशानी निकल पड़े ।
ज़ब्त की हुई मुँह से ज़ुबानी निकल पड़े ।

असर ये होता है बादलों की बरसात का;
ज़मीं के अंग अंग से जवानी निकल पड़े ।

वो देखते हैं प्यार मेरा प्यार की नज़र से;
इस अदा से किस्सा कहानी निकल पड़े ।

ज़िन्दगी ज़िंदा दिली से जिये चलो यारों;
हर सूरत में उम्र की रवानी निकल पड़े ।

वो आये थे महब्बत से मिलने मगर मेरा;
जनाज़ा देख आँखों से पानी निकल पड़े ।

चुरा लीं नज़रें 'राज़' से ये सोच के वहीं; 
मुम्किन है कोई याद पुरानी निकल पड़े ।

******निगम'राज़'.
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शुभांकर सिंह

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मानवता अक्सर मरती है
जब बिन कपड़ों के छोटे बच्चे 
हथेली फैलाते हैं
हम कहते हैं छुट्टा नहीं है। ।
मानवता अक्सर मरती है ।
जब देर रात स्टेशन पर
रिक्शे पर सोते अधेड़ को
कहते हैं कटरा चलोगे
और देते हैं आधे पैसे ।।
मानवता अक्सर मरती है
जब घने कोहरे में मजदूरन को
खींच ले जाते हैं
  बसवाड़ी के पीछे धर्म समाजी ठेकेदार
और कहते हैं बस एक बार ।।
sshubhankar05@gmail.com



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आशीष श्रीवास्तव

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तुम भी मुझको मान लो सबसे अच्छा मित्र

अंतस में मेरे समा गया है
आपका प्यारा चित्र
आ जाओ बन जाओ
मेरे सबसे अच्छे मित्र

मन में मेरे बस गया है आपका ही चित्र
आकर बतला दो दुनिया को हम हैं सबसे अच्छे मित्र

सुन रक्खा है मैंने कि
ये प्यार होता है विचित्र
महका दो जीवन की बगिया
महके जैसे इत्र

आ जाओ न बन जाइए  मेरे सबसे प्यारे मित्र
मैंने तो अपना मान लिया  देखा है जबसे सचित्र


कहते हैं हर रिश्ते से ऊपर
होते हैं सच्चे मित्र
खुश होंगे हम-तुम मिलकर तो
खुश होंगे अपने पितृ


मन में मेरे बस गया है आपका ही चित्र
आकर बतला दो दुनिया को हम हैं सबसे अच्छे मित्र

आत्मा की आवाज है ये
मन है बहुत पवित्र
आ जाओ बन जाओ न
मेरे सबसे अच्छे मित्र

मैंने तो अपना मान लिया  देखा है जबसे सचित्र
तुम भी मुझको मान लो अपना सबसे अच्छा मित्र


-- आशीष श्रीवास्तव
         8871584907
        भोपाल मप्र
                                               ashish35.srivastava@yahoo.in

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नीति वर्मा


तिरंगा
आन बान और शान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा
तीन रंगों में रचा बसा ये
हम सबकी है जान तिरंगा
हरियाली ने दिया हरा रंग
खुशहाली बना केसरिया रंग
श्वेत शान्ति की पावन गंगा
मेरा ये अभिमान तिरंगा

लहर-लहर लहराता जाये
लहरों से ये लड़ कर आये
फहर-फहर फहराता जाये
पहाड़ों पर ये चढ़ जाये
निकले सीना तान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा
सीमाओं पर फौज लड़े जब
तब चक्र सुदर्शन बन जाये
दुश्मन के हर एक वार का
करे सामना बढ़ जाये
आगे आने वाला दुश्मन
देखे इसको थर्राये
मेरे देश की शान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा
--

बाल दिवस......चाचा नेहरू
एक थे चाचा एक थे बापू
थे तो वे इंसान
कद काठी में हम तुम जैसे
पर थे बड़े महान

बापू चले थे सत्य राह पर
अहिंसा का पाठ पढ़ाते
चाचा भी थे उनके पीछे
जग में नाम कमाते

जब भारत में जीना था दूभर
हर इंसा था पग-पग बेघर
ऐसे में ही जब बापू का
छूट गया था साथ
चाचा ने था सबको संभाला
रखकर सबके सर पर हाथ

बने वो नेता प्रथम देश के
आगे थी कठिनाई
ऐसे में ही देखो चढ़कर
चीन की सेना आई
अपने पद का मान बढ़ा
सेना लेकर की अगुवाई
पंचषील का नियम बनाया
दिषा नई दिखलाई
बच्चों के संग बैठकर
बच्चा बनना हमें सिखाया
कोमलता से खिले पुष्प को
अपने हृदय पर सजाया
सारे जग के चाचा बनकर
प्यार का रस बरसाया
पर है एक बड़ा ही निर्दय
वक्त है जिसका नाम
चाचा को भी छीन ले गया
कर गया अपना काम
जीवन का आधार बनकर
बस रह गई उनकी याद
चैदह नवम्बर के दिन
चाचा याद बहुत हैं आते
हम बच्चे बड़े प्यार से
उनका जन्मदिन हैं मनाते
बाल दिवस पर सारे बच्चे
झूमते नाचते गाते
बाल दिवस हम सब मिलकर
चाचा के गुण गाते
आओ करें प्रतिज्ञा हम भी
चाचा जैसे बन जायें
देश का ऊंॅचा नाम करें
और जग में नाम कमायें
--


सफलता का मंत्र
मेहनत से न डरें हम
आगे ही आगे बढ़ें हम
जीत लें दुनिया का हर गम
मेहनत से न डरें हम

चींटी एक बहुत छोटी-सी
कितना बोझ उठाती है
कभी न थकती, कभी न रूकती
मंजिल पर पहुंॅचाती है
नहीं वो पल भर लेती दम
आगे ही आगे बढ़ें हम

मेहनत कश मजदूर को देखो
नई इमारत गढ़ता है
मेहनत से ही तो किसान
धरती को सोना करता है
पर्वत भी कट जाते हैं
नदियों का रूख भी मुड़ता है
मेहनत करके ही सोना
तपकर कुंदर बनता है
कभी न थककर बैठे हम
आगे ही आगे बढ़ें कदम

मेहनत ने ही चांद छुआ
मेहनत ने सागर नापें हैं
इसके आगे बड़े-बड़े
संकट भी शीश झुकाते हैं
मेहनत का ही खेल है सारा
धरती पर जो दिखता है
मेहनत करने वाला इंसा
जो चाहे कर सकता है।

-- --


गुरू की महिमा

गुरू तू है सबसे बड़ा
मां ने जन्म दिया, पिता ने पाल दिया
ज्ञान की गंगा बहाकर तूने
हमको तार दिया। गुरू........

ईष्वर कौन है कहांॅ है
चांद, सूरज चलते हैं कैसे
कैसे टिमटिमाते हैं तारे
कैसे जलता है दीया
तूने हमको बता दिया।  गुरू......

नदियों में आता है कहां से
अविरल कल-कल पानी
भरता नहीं क्यों समंदर
जाता कहां है पानी
भेद हमको बता दिया। गुरू......
बीज कैसे धरा में पनपता
फूल बीज में बदलता है कैसे
कैसे खुले आसमां में
पंछियों का कारवां है उड़ता
हमें ये भी दिखा दिया।  गुरू.....
मातृप्रेम से देशप्रेम तक
संघर्षों से कैसे है लड़ना
कैसे देशवासी जनों की
प्यार की माला है गुथना
तूने हमको सिखा दिया
तूने भेद ये बता दिया
तूने सब कुछ सिखा दिया। गुरू......

-- --

 

यादों के आकार
जब भी देखती हूं यादों के झरोखों से,
गहरी धुंध के बीच
आती है नजर एक परछाई भी,
धुंध छंटती है धीरे-धीरे
और परछाई लेने लगती है,
‘‘आकार’’
मैं कोशिश करती हूं आकार को
जानने की, पहचानने की
इस कोशिश में पाती हॅूं,
अपने
सारे अस्तित्व को
टूटकर बिखरते हुए,
मैं घबराकर समेटने लगती हूं
अपने किरचा-किरचा हुए
अस्तित्व को
और खो जाता है
वह आकार एक गहरी धुंध में
ले लेता है, एक परछाई का रूप
सोचती हूं शायद वह परछाई/आकार
है तुम्हारा
तुम, जिसे पाकर
मैंने सम्पूर्णता पायी थी
तुम, जिसे पाकर
मेरा अस्तित्व
तुम में खो गया था
और तुम्हें खोकर जो
किरचा-किरचा
हो गया है।

-- ---


स्वप्न

तुम आए थे मेरे जीवन में,
एक अर्थ मिला था,
जिंदगी को
तुम्हें पाकर पायी थी सम्पूर्णता
मैंने,
हुआ था ये अहसास मुझे
कि,
मेरा होना या न होना
अर्थ रखता है किसी के लिए
कोई है
जो दे सकता है
मेरे मन मस्तिष्क को परिपक्वता
कोई है
जो चाहत रखता है
मेरे व्यक्तित्व को संवारने की
निखारने की
कोई है
जो चाहता है मुझे मेरे रूप में,
शायद
यह भूल गयी थी मैं कि
स्वप्न कितना भी मधुर क्यों न हो
यथार्थ नहीं होता
स्वयं ही ढोना होता है
अपने अहसासों से जुड़े बोझ
अकेले
कोई किसी का साथ एक पल तो
निभा देता है
लेकिन, नहीं निभा सकता
एक पूरी उम्र!
-- --


नारी का मन

सबलता और सजलता का
सम्मिश्रण है नारी का मन
सबल है आत्मा
सजल नयन हैं
भावुक बड़ा नारी का मन है।

जब राह कोई दुर्गम आए
   तब सबल आत्मा टकराये
जब आह सुने किसी अपने की
   तो सजल नयन भर-भर आयें

सम्मान पर जब कोई घात करे
          या दुर्योधन का रूप धरे
                   बन के रूप वो काली का
            हर दुर्जन का संघात करें
                     तब सबल आत्मा साथ रहे
     जब उमड़े प्यार किसी पर भी
या प्यार मिले किसी अपने का
     जब साथी बिछड़ रहा हो कोई
या अपना कोई साथ चले
     अंखियों से प्रेम का नीर भरे
सजल नयन सब साथ रहे

                        आशा और निराशा के
भंवर में उलझी कश्ती को
                 अपने अनथक प्रयासों से
जब नारी उसको पार करे
                   तब सबल आत्मा साथ रहे
     प्यार बड़ा हो या नन्हा-सा
हर एक, अदा पर मुस्काए                   

अंतस के हर एक कोने से
उनकी खुशियों की दुआ करे
     सजल नयन तब साथ रहे
                    नारी जब नारी का मान रखे
तब दुनिया भी सम्मान करे
                सजल सबल का संगम हो
और नये युग का निर्माण करे
                    तब सजल नयन प्रेम छलकाये
  सबल आत्मा नवगान करे।


-- नीति वर्मा
बी- 42, इन्द्रपुरी, भोपाल मप्र

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कार्तिकेय त्रिपाठी

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आओ मिलकर सारे हम ,जीवन को नव-नित गान दें ,
मुस्कुराकर हम सभी के ,  होठों पर मुस्कान दें ।
जिन्दगी से मोह की , मेहमाननवाजी छोड़ दें ,
और सारे गिले-शिकवे , मन के माफिक छोड़ दें ।
क्यूँ नहीँ जीवन से सारे , अवगुणों को झार दें ,
आसमाँ की हर बुलंदी , को जमी पर वार दें ।
हो सुरों में तान ऐसी , जो हिमालय चीर दे ,
ना जुबाँ के शब्द ऐसे , जो दिलों को पीर दे ।
भाव में तू सत्य भरकर , प्रीत शिव से जोड़ दे ,
तू धरा पर मुस्कुराकर , जन से नाता  जोड़ दे ।
दिल भले ही हो परेशाँ , टूटते तारे भी हों ,
बाँटे सुख - दुख हम सभी के, होठों पर मुस्कान हो।
खूं से रिश्ता हो न हो , पर मन से मन का मेल हो ,
हो भले अन्जान फिर-भी , होठों पर मुस्कान हो ।
तेरे-मेरे जीवन की , बस एक यही पहचान हो ,
बस सभी के होठों पर ,  ढेर- सी मुस्कान हो ।
बेटियों की भी धरा पर , फूल - सी मुस्कान हो ,
मोतियों - सी हो उभरती , होठों पर मुस्कान हो ।
आओ जीवन में हमेशा , मुस्कुराकर श्वांस लें ,
चाहें कैसी- भी घडी़ हो , मुस्कुराना सीख लें ।
आओ मिलकर सारे हम , जीवन को नव नित गान दें।
मुस्कुराकर हम सभी के , होठों पर मुस्कान दें ।।
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मैं सपने बेचने आया हूँ , बोलो तुम क्या खरीदोगे ?
मैं घनघोर- घटा काले बादल ,को उकसाने आया हूँ ,
मैं इस धरती की धूलि से , अंगार जलाने आया हूँ ,
आँखों में थोडी़ शर्म पले , वो अलख जगाने आया हूँ ।
मैं प्यार के शब्दों की बागड़ , तेरे आँगन में लगाने आया हूँ ,
मैं बंजर पड़ती भूमि में , एक फसल लगाने आया हूँ,
मैं अपनेपन की धुरी पर , एक गाँव बसाने आया हूँ,
मैं स्वर्ग धरा पर लाने की ,एक आस जगाने आया हूँ।।
मैं चाँद और तारे से , घर  रोशन करने आया हूँ ,
मैं विनती करके सूरज से ,थोडी़ ठंडक ले आया हूँ ,
मैं बहती गंगा-जमुना से , बस, मोह बडा़ने आया हूँ ,
मैं माँ की खाली दुनिया में , बचपन लौटाने आया हूँ।
मैं जीवन की हर मुश्किल को,आसान बनाने आया हूँ,
मैं भटके हर-एक मानव को,नई राह दिखाने आया हूँ,
मैं तेरे अहम भाव में भी , बस, सेंध लगाने आया हूँ ,
मैं मन-भावों की दूरी में,स्नेह लेप लगाने आया हूँ ।
मैं दीन-दुखी और अबलाओं के,संताप मिटाने आया हूँ,
मैं जीवनदायी नारी के , हर आंसू हरने आया हूँ ,
मैं दो और दो की जोड़-तोड़, थोडी़ कम करने आया हूँ,
मैं अर्थ से पोषित दुनिया में ,बस योग जगाने आया हूँ।
मैं इच्छाओं की अमरबेल पर,बस रोक लगाने आया हूँ
मैं जाति-धर्म की बस्ती में, गंगाजल लेकर आया हूँ ,
मैं जग की हर-एक बेटी को, बस खुशियाँ देने आया हूँ ,
मैं लेन-देन के कलयुग में ,बस मुस्कानें देने आया हूँ ।।
मैं सपने बेचने आया हूँ .......
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....✍ कार्तिकेय त्रिपाठी
117सी.स्पेशल, गांधीनगर ,इन्दौर म.प्र.
          पिनकोड - 453112

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सीताराम पटेल


शून्य
क्या सही है और क्या है गलत
जो उग रहा है या जो डुब रहा है
वे सब कुछ देख रहा है
कहां पर मैंने गलती किया है
कहां पर मैंने सही किया है
चांद और सूरूज को सब मालूम है
सुबह आकर मुझे परिन्दे जगाते हैं
वे सब जानते हैं मैं कैसा आदमी हूं
उपरवाला सब कुछ देखता होगा
या ना भी देखता होगा
पर अंदरवाला ताक सब कुछ देख रहा है
अपने कर्म का प्रतिकर्म
सबको यहां भोग कर जाना है
जन्म से पहले और मृत्यु के बाद का
तो किसी को मालूम नहीं हैं
पर जो अभी दिख रहा है
वो चाहे यथार्थ हो या स्वप्न
वो कर्म तो अपने अंदर बैठा है
वो सब कुछ जान रहा है
थोड़े से लोभ लाभ के लिए
हम अपना कर्म क्यों गलत करते हैं
आदिमयुग से आधुनिक युग तक आने में
आदमी को बहुत समय लगा है
पर वास्तव में हम आधुनिक युग में हैं
कि वही आदिम युग में जी रहे हैं
वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं
कि जंगली युग में जी रहे हैं
ये मेरे समझ से परे है
आधुनिकता को जीने के लिए हमें
मानवता का निभाना अति आवश्यक है
मानव धर्म को छोड़कर
यहां और कोई धर्म नहीं है
हर प्राणियों को यहां जीने का अधिकार है
जैव विविधता ही धरा को जीवित रख सकती है
वरना एक दिन धरा भी धरासाई हो जाएगी
और हम सब शून्य में विलीन हो जाएंगे
शून्य से आए हैं और शून्य में ही चले जाएंगे
शायद शून्य ही सत्य है
शून्य के आगे पीछे जो संसार है
वे सब स्वप्न है
और हम सब स्वप्न लोक में जी रहे हैं
शून्य मानव संसार में संग्रह करता रहता है
शून्य लेकर पैदा हुआ है
और शून्य लेकर ही उसे जाना है
फिर ये भटकाव कैसा है
हम धरती पुत्र ईश्वरअंशी
इन बातों से अनभिज्ञ क्यों हैं
क्यों यहां लूटपाट मची हुई है
विश्व एक है
एक विश्व की चाह में जबरदस्ती
क्यों हम विश्व को ही नष्ट करना चाह रहे हैं
क्या विश्वात्मा अब अपनी लीला
यहांॅ से समेटना चाह रहा है
अपनी एक नई लीला रचना करने के लिए
----.
1:- अब यहाँ न आना
अब यहाँ न आना प्रभुजी
अब यहाँ न आना
न चक्की पीसना
न हवा है खाना
देह होगा छलनी
जी लेंगे यहाँ हम
कालकूट जहर
पी लेंगे यहाँ हम
आत्मा की छलनी
होता हर दिन यहाँ
रूक जायेगा यहाँ
साँसों का आना जाना
पग पग में भरी है
पीड़ा हमारे यहाँ
पूरा मर चुका है
मानवता हमारे यहाँ
पूरा घुल गया है
अमेरिकी जहर यहाँ
अब मया प्रेम यहाँ
कहाँ है पाना
अब यहाँ न आना प्रभुजी
अब यहाँ न आना

2:-ऐसी राह दिखाना
ऐसी राह दिखाना प्रभुजी
ऐसी राह दिखाना
जो जाता हो सीधे दिल में
बस उसे है पाना
अँधा बनाकर देना आँख
जो देख सके, बस तेरा ही बाना
लंगड़ा बनाकर देना पाँव
जो चल सके, वो राहों तुझे पाना
बहरा बनाकर देना कान
जो सुन सके, तेरा ही गुन गाना
गूंगा बनाकर देना मुख
जो गा सके बस, तेरा ही गाना
                   


अनुपम उपहार
उड़ रहे पंडुकी कबूतर
बुलबुल गा रहे हैं गान
सारिका के बोल सुन्दर
तोता सुनाये अपनी तान
घर के छत के मुंडेर पर
आकर बोला कौंआ कांव
चील भी उड़ रहा नभ पर
बगुले जा रहे पीपल छांव
कुकड़ू कू मुर्गा बोला उधर
जाग गया अब सारा गांव
मांझी खोल जल्दी लंगर
सागर मध्य ले जा तू नाव
सुबह शाम की समीर यहां
प्रकृति का अनुमप उपहार
जल्दी सोयें औ जल्दी जागे
यह सुखी जीवन का आधार
  सीताराम पटेल

Sita Ram Patel
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बीणा चौधरी

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सच्चे मित्र है हम तुम्हारे..
मुझमें तेरे सुधार की चाहत है।
"मैं आईना हूँ- मुझे टूटने की आदत है"।

लोगों को बात-बात पर रूठने की आदत है,
आईने को सच्चाई दिखलाने की चाहत है।
सच्ची बातें लगती बड़ी कड़वाहट है,
और.. लोगों को न अपनी कमी देखने की चाहत है।
यथार्थ से उन्हें मुँह मोड़ने की आदत है,
दहशत बन दर्पण तोड़ने की आदत है।
पर,
सच्चे मित्र है हम तुम्हारे..
मुझमें तेरे सुधार की चाहत है।
"मैं आईना हूँ- मुझे टूटने की आदत है"।

खफा ना हो तू स्वयं के ढाल से,
हम रहेंगे सदैव मित्र तुम्हारे,
जब भी आओगे पास तुम,
उभारेंगे वास्तविक बिम्ब फिर..
बदलेंगे नहीं किसी दिन,
तोड़ दिये गए तो भी हिचकिचाहट कैसा?
आखिर,
सच्चे मित्र है हम तुम्हारे..
मुझमें तेरे सुधार की चाहत है।
"मैं आईना हूँ- मुझे टूटने की आदत है"।

             -बीणा चौधरी (पश्चिम बंगाल, सिलिगुड़ी)

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राहुल कुमावत

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मैं कुछ भी नहीं
    तेरे सिवा
न रैन, न चैन
तुझ बिन सुख गये मोरे नैन

तेरी गाली, तेरी लड़ाई
तेरा प्यार, तेरा गुस्सा
जीवन का ये मेरा हिस्सा
न गिला है, न शिकवा है
न बैर है, न तकरार है
तू ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा उपहार है
तेरा साथ, तेरा विश्वास
तेरी हमदर्दी, तेरी शरारत
मलहम लगाती तेरी हर मीठी बात
तेरे साथ में कभी,,,,,,,,,,
न दूर, न उदास
न छल, न झूठ
तू कभी ना मुझसे रुठ
तेरे आँसू, तेरे गम
तेरी आदतें, तेरी परेशानियां
तुझसे जुड़ी मेरी हर निशानियां
न सह सकूँ, न रह सकूँ
न बोल सकूँ, न तोल सकूँ
अपना प्यार शब्दों से न कह सकूँ
तेरे सपने, तेरे इरादे
तेरी मंजिल, तेरी यादें
मेरे भी ये ख्वाब सजादे
न तन से, न मन से
न दिमाग से, न धन से
मेरी हर सांस हो अब बस तेरे नाम से
   

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दरकते रिश्ते
                 छूटते हाथों को
आज पकड़ेगा कौन?
                तू भी पीठ दिखाये
में भी पीठ दिखाऊ
          आँखों के आँसू
पोछेंगा कौन?
                लड़ लड़ कर
टूट गए है
               बात इतनी छोटी सी है
इसे समझेगा कौन?
           वक्त की कमी है आज
            परख ले
समय के साथ
               भला चलेगा कौन?
निभाना आसान नहीं है
            रिश्ते
कम ही मिलते है जमीं पर
          ये फरिश्ते
इसकी कीमत समझेगा कौन?
कमी मुझमें भी है
                      कमी तुझमें भी है
ये तो सबमें भी है
                     ये बतलायेगा कौन?
तकलीफ किसे ना हो
                     दूरियां तड़पाती हैं
फासलों से राहत की
                   मलहम लगायेगा कौन?
अँधेरा है घना
                इस मुश्किल सी राह में
पथ का रास्ता
                दिखलायेगा कौन?
आज दुःख ही तो है
                  कल खुशियों में फिर
हाथ से ताली
                  बजायेगा कौन?
रोता तू भी है
                 रोता में भी हूँ
पर थोड़े समय बाद में
                   हँसायेगा कौन?
नासमझ था
                में मोह में पड़ गया
भूल से भूल हो गयी
         इस खलल में
राहुल दूर खड़ा ही रह गया
अब भला
             आप ही बताओ
पास बुलायेगा कौन?

राहुल कुमावत
उम्र-20 वर्ष
बोरसी दुर्ग छत्तीसगढ़

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डाली दुबे

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तुम अभी जिंदा हो
     मैं ने मरने नहीं दिया
        तुम्हें बचपन में
तुम अभी जिन्दा हो मुझमें,
जब में शान्त रूप में चलती हूँ
तुम मेरी अंदर कही खलबली मचाते हो
मेरे जिम्मेदारी की इस कंधों पे
कभी तुम  आ के हिलाते हो,
तुम अभी जिन्दा हो
जब में सड़क पे परेशान गहराई में चलती हूँ
तुम आ कर मेरे चाल में जोश भर जाते हो
बारिश की बूंदे जब छूती है
मुझे
तुम न जाने कहा से
खिलखिला जाते हो
तुम अभी जिंदा हो,
मैं ने मरने नहीं दिया तुम्हें बचपन
सब कहते है की में बहुत समझदार हो गई
पर अब भी तुम मुझे नादान बना जाते हो
मेरे छोटी सी गंभीर मुस्कान में
आज भी तुम खिलखिला जाते हो
तुम अभी जिंदा हो
मैं ने मरने नहीं दिया तुम्हें बचपन



डाली दुबे
स्नातकोत्तर(हिंदी)
मुम्बई विद्यापीठ

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कुमारी अर्चना


"मैं कृष्ण बोल रहा हूँ"
मैं कृष्ण बोल रहा हूँ
मैं जल्द फिर से  रहा हूँ
कलयुग में अपनी माया रचने
अपनी मनमोहक सी छवि लिए
इस छलिया रूपी संसार को
फिर से छलने!
अपनी बाँसुरी को बजाकर
राधा और गोपियों को फिर रिझाने
मीरा का मोहन बनने को
मैं कृष्ण बोल रहा हूँ
मैं जल्द फिर से आ रहा हूँ!
जन्म तो मेरा मथुरा में
देवकी के गर्भ से हुआ
पलने में मैया यशोदा ने झुलाया
लालन पालन गऊँअन के बीच
वृदावन के वन में हुआ
खेल खेला सखा सुदमा संग
रास रचाओं गोपिओं और राधा संग गलियों में
कई मयावी राक्षसों को वधकर
उन्हें श्राप से मुक्त किया
कंश के पाप से त्रासित् जनता को
बेडियों से मुक्त किया
राजशासन का मैंने भोग किया
ना राधा ना ही मीरा का हो सका
रूक्मणि संग सांसारिक संबंध निभाया!
फिर कंश रूपी मानव का राज
पृथ्वी ग्रह पे हो रहा है
जिस मानव को प्रखर बृद्धि,बल व शक्ति दी
अन्य जीव,जन्तुओं की सुरक्षा और आश्रय दें
वही दानव बनकर मानवता का विनाश
कर रहा
दीन-बंधु,दु:खियों और शिशुओं व नारी पर नित्य अत्याचार किया
दसवाँ कल्कि अवतार लेकर मैं
मानव के अंदर बसे इसी श्रेष्ठा के दंभ व अहंकार का मरदन करने
जैसे कालिया नाग का किया था
नर या नारी किसी भी रूप में
धरा पे कभी भी प्रकट हो सकता हूँ!
शिव की जटा की पूरी गंगा लेकर
विष्णु का सुदर्शन चक्र लेकर
ब्रह्मा का ब्रह्मास्त्र  लेकर
गणेश का ज्ञान व बुद्धि लेकर
इन्द्र का वज्र लेकर
त्रिदेवियों की शक्ति लेकर आ रहा
मैं कृष्ण  बोल रहा हूँ
मैं फिर से आ रहा हूँ!
---.
"धन्य हुआ मेरा जीवन"
आर्या के आर्यावर्त में आने का सम्मान मिला
भारत की जन्मभूमि  जैसी गोदी मिली
भारत माता जैसी माता मिला
घन्य हुआ मेरा ये जीवन
जो मैंने इस देश में जन्म लिया
ओ मेरे भारत देश महान!
जियूँ तो तेरी आन के लिए
मरूँ तो तेरी शान के लिए!
दे वर मुझे ओ भारत माँ
दुश्मनों का सीना चीर सकूँ
फिर से मैं झाँसी की रानी!
तिरंगा ध्वज को ना झुकने दूँगी
लालकिला पे तिरंगा सदा लहराने दूँगी
दुश्मनों के वतन में भी भारत का
विजय पताका लहरा कर छोडूँगी!
---.
"और कितनी सदी"...
और कितनी सदियों तक
गुलामी में जीता रहेगा भारत
ढोती रहेगी हमारी पीढियाँ
इन दिकयानूसी प्रथाओं को
और कितना पसीना के साथ
जलता रहेगा जम़ीर!
और कितना बार जिंदा होकर भी
रोज रोज मरता रहेगा गरीब
बंद करो ये हाथों से रिक्शा खींचने का
पश्चिम बंगाल से अमानवीय प्रथा!
ये असल भारत की आजादी नहीं
बिट्रिश भारत की बची हुई वो गुलामी है
जिसे ना चाहते हुए भी देश और जनता
दोनों भुगत रहे!
जैसे भारत को हमने इण्डिया नाम से वर्षों पुकारा
जैसे अँग्रेजी को राजकाज की भाषा बनाया
और हिंदी को आज भी हाशिये पे लटकाया
स्वतंत्रता के असली  मायने तभी समझे जाएंगे
जब देबी कुचली जनता
इससे सदा सदा के लिए
मुक्त हो जाएगी
रोटी,कपड़ा और मकान
बुनियादी सुविधा जन को मिल पाएगी
भारत भाग्य विधाता के गीत
देश की जनता एक साथ गाएगी!
-----.
"आशा सहनी का कंकाल"
आशा सहनी का कंकाल
क्या कहता है!
जऱा फुर्सत में बैठ के
सोचे ऐ सभ्य समाज
एक वृद्ध भी यहाँ कमरे में
वर्षों से बंद बंद रहता है!
हाड़ मांस गल गल कर
अस्थि पंजर बस बचता है
मानवता क्या महानगरों में
दिन में भी सोता है!
चौबीस धंटे इन्सान केवल
मशीन बना नोटों को छापता है
ये नोटों से कैसे तुम्हारा नाता है
जो अपनों का सहारा ना बन सके!
बेटा ही माँ -बाप की चिंता को
मुखाग्नी दे मुक्ति देगा
हिंदु धर्म ऐसा क्यों कहता है!
बेटी क्यों नहीं दे सकती
जब वो भी माँ के गर्भ में
नौ महीने बेटे जैसे ही पलती है!
होती अगर आशा सहनी को एक बेटी
अंतिम अवस्था में सेवा सत्कार वो पाती
और उसकी आत्मा भी शरीर से मुक्त होकर
ब्रह्म में लीन हो स्वर्ण को जाती
अब तो यहाँ बेटे के इंतजार में बैठी रह जाएगी
बेटा ऑडहोम में छोड़ेगा या
साथ विदेश ले जाएगा!
आशा सहनी का कंकाल
ऐसा कुछ कहता है!

कमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार

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श्रद्धा मिश्रा


उफ्फ! तक नही निकलती
और आह भी
नहीं भर सकते,
जिंदगी कुछ भी करती रहे,
हम कुछ भी नहीं कर सकते।
ये फैसले फ़ासलों के
लेना कौन चाहता है,
ये बोझ मासूम कंधों पे
ढोना कौन चाहता है।
सबको मरना है एक दिन
फिर भी खुद मर नहीं सकते,
जिंदगी कुछ भी करती रहे
हम कुछ भी कर नहीं सकते।
आओ
दो पल को ही सही
एक लम्हा
साथ गुजार लें,
हमसे हो गयी है
अनजाने में
वो सब गलतियां सुधार लें।
आँखों में है आंसू बहुत
मगर ये छर नहीं सकते,
जिंदगी कुछ भी करती रहे
हम कुछ भी कर नहीं सकते।
मेरी खुशियों में
सब साथ थे,
मेरे गम में
कौन
गमगीन है,
मैंने हँस के
अपनी परेशानियों
का सामना करूँ,
ये जुर्म बहुत संगीन है।
बहुत डराती है मुश्किलें मुझे भी
मगर क्या करें डर नहीं सकते,
जिंदगी कुछ भी करती रहे
हम कुछ भी कर नहीं सकते।
श्रद्धा मिश्रा


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महेन्द्र देवांगन माटी

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खुशियाँ बांटो
****************
चलो मनायें खुशियाँ प्यारे, सुख दुख सब बाँटे ।
दीन दुखियों को सहारा देकर, क्लेश उनका काटे ।
संकट में जो काम आये, वही सच्चा इंसान है ।
दुख में जो हाथ बटाये , मानव की पहचान है ।
व्यर्थ की बातें न करो , झगड़ा झंझट छोड़ो ।
गले लगाओ प्रेम से, मानव को मानव से जोड़ो।
चार दिन की जिंदगी है,  हंसकर जीना सीखो ।
काम कुछ ऐसा कर जाओ , इतिहास में नाम लिखो।
धन दौलत का घमंड तुम्हारा , काम नहीं आयेगा ।
माटी का जीवन है प्यारे , माटी में मिल जायेगा ।
----.
आजादी का पर्व
***************
आजादी का पर्व मनाने, गाँव गली तक जायेंगे ।
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
नहीं भूलेंगे उन वीरों को , देश को जो आजाद किया ।
भारत मां की रक्षा खातिर, जान अपनी कुर्बान किया ।
आज उसी की याद में हम सब , नये तराने गायेंगे ।
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
चन्द्रशेखर आजाद भगतसिंह,  भारत के ये शेर हुए ।
इनकी ताकत के आगे, अंग्रेजी सत्ता ढेर हुए ।
बिगुल बज गया आजादी का, वंदे मातरम गायेंगे ।
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
मिली आजादी कुर्बानी से,  अब तो  नहीं जाने देंगे ।
चाहे कुछ हो जाये फिर भी, आंच नहीं आने देंगे ।
संभल जाओ ओ चाटुकार तुम, अब तो शोर मचायेंगे ।
तीन रंगों का प्यारा झंडा, शान से हम लहरायेंगे ।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, सबको आगे आना होगा ।
स्कूल हो या मदरसा सब पर , तिरंगा फहराना होगा ।
देशभक्ति का जज्बा है ये , मिलकर साथ मनायेंगे ।
तीन रंगों का प्यारा झंडा,  शान से हम लहरायेंगे ।
 
महेन्द्र देवांगन माटी
   पंडरिया  (कवर्धा )
     छत्तीसगढ़
mahendradewanganmati@gmail.Com

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शिल्पी मिश्रा


मन जब उदास होता है !
जब मन उदास होता है, कोई है जो पास होता है...
तन्हाईयों में भी मेरे साथ होता है...
मेरे हर दर्द को गले लगाता है, मेरी हर खुशी में खास बन जाता है...
मैं सो जाती हूं...और वो रातभर मेरे भीतर जागता है...
हर पल हर घड़ी मुझे निहारता है...
मैं टूटती हूं, बिखरती हूं बिगड़ती हूं..वो मुझे संवारता है...
देखती हूं तो है नहीं, सोचती हूं तो बस छू लू अभी...
हंस कर कहता है...तेरी तस्वीर में नहीं तेरी तकदीर में हूं...
रिश्ते रुठे तो रुठे... सपने टूटे तो टूटे..मैं तेरे साथ हूं...
टूटने नहीं दूंगा तूझे...गिरने नहीं दूंगा तुझे...
तेरे साथ चलना है अभी दूर तलक ....
तेरा एहसास हूं...कभी हार नहीं मानना पगली...
मैं हर पल तेरे साथ हूं .....हां मैं तेरा एहसास हूं...
................................
4- शीर्षक - मुद्दतों बाद मेरी मोहब्बत ने पुकारा है...
चित्रकारी करके तेरी उकेर दूं....
आज अनकही, अनसुनी, अधूरी कहानी उधेड़ दूं...
मुद्दतों बाद मेरी मोहब्बत ने पुकारा है...
सोचती हूं आज हर सवाल का जवाब पूंछ लू...
कोरे कागज पर अपनी कहानी समेट लूं...
गुजरे हुए हर पल की निशानी समेट लूं...
चित्रकारी करके आज तेरी तस्वीर उकेर दूं..
हां तेरी तस्वीर उकेर दूं...


  शिल्पी मिश्रा
AJNARA HOMES
B-1 TOWER, FLAT NO. 2201
GAUTAMBUDH NAGAR, GREATER NOIDA
NEAR GAUR CITY


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सुखमंगल सिंह


"पंद्रह अगस्त "
दिन भर सब चिल्लाते हैं ,
पंद्रह अगस्त मनाते हैं ?
तानाशाही -ठेकेदार ,
लोगों को तड़पाते हैं !
भला बताओ तुम्हीं आज ,
आजादी को लाये हैं !!
सत्य अहिंसा प्रतिबिंब बने ,
रक्तित लास दिखाए हैं |
शांति- दूत और सादगी,
संसद -देखे जाते हों ?
जन-गण-मन अधिनायक,
सभ्यता में खो जाते हों ?
हरियाली खेतों की सारी,
नील गाय चर जाते हों ?|
संघर्ष को करने वाले ,
मालाएं माँ चढाते हो !
धरती के उन वीरों को ,
भूल कभी न पाते हो |
देश प्रेम सद्भाव अमर -
सृजन और श्रृंगार अमर !
आंगन में रस बरसाते हो ,
माला फूल चढाते हो |
देश पे मरने वाले वीर ,
वन्देमातरम गाते हो |
रे! आजादी के रखवाले,
तिरंगा हम लहराते हों |
चाँद को छूने वाले हों ?
देश -शान बढाते हों ||
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राजेश गोसाईं


1...  लौट आना
तू देश का सिपाही
अपना फर्ज निभाना
तू मेरा भी है भाई
बन्धन राखी का निभाना
तेरे माथे लहू की रोली
बांधूंगी हाथ पे गोली
चाहे डोरी टूटे बचपन की , मेरे भाई
पहले डोर , देश की बचाना
बन्धन राखी के तारों का
चाहे टूट जाये कोई बात नहीं
सरहद के तारों की रक्षा में
तू हिन्द की बिन्दिया सजाना
ए मेरे वीर सिपाही
सीमा पे तू मुझको भूल जाना
याद करके ये कलाई
तू लाज देश की बचाना
दुश्मन चाहे कितने भी आये
तू लाशें सबकी बिछाना
कोई लांघ सके ना इधर
तू दीवार ऐसी बन जाना
राखी वाले हाथ , देख रहे हैं बाट
कब भरेगी तेरी कलाई
धरती का फर्ज निभा के
तू भारत की शान बढ़ाना
रेशम की डोरी से
प्यार की डोरी से
भर दूंगी तेरी कलाई
राखी के तोहफे में
तू हिन्दुस्तान नया ले आना
हिन्द की बगिया में
तिरंगा यहाँ लहराना
मेरे चंदा , मेरे भाई
तू लौट के जल्दी आना.....२

----------------
  
2...   रंग बसन्ती
रंग बसन्ती अंग बसन्ती
ये रंग सबको भा गया
हरी धरा के संग ये रंग
अंग अंग में समा गया
नई उमंग में नई तरंग में
खुली हवाओं के संग में
तिरंगा ये मुस्कुरा गया
रंग रंग में रंग बसन्ती छा गया
नील गगन में होके मगन ये
लगन जीने की सिखा गया
अंग अंग में रंग बसन्ती ये
मस्त मलंग संग नचा गया

.....................
  
3..  खजानों में
खेतों में खलिहानों मे
बागों में बागानों में
पहाड़ों और मैदानों में
खानों और खजानों में
वीरों के बलिदानो में
आरती और अजानों में
गीतों मे और गानों में
उन्नत हो विकास की छत
पथ में समरथ  निर्माण रहे
हो गुणगान सदा जग में तेरा
मेरे भारत तेरी ये मुस्कान रहे
जब तक सूरज चन्दा चमके
मेरा हिन्दुस्तान रहे
जलते रहें ईमान धर्म के दीये
रोशन देश का नाम रहे
बनी रहे माँ भारती की आन बान
शान में कान्हा की बंसी की तान रहे
मुख में जय भारत जय श्री राम रहे
जब तक सूरज चन्दा चमके
मेरा हिन्दुस्तान रहे
मेरा हिन्दुस्तान रहे

-------------
4-...उल्टे दिन
पाकिस्तान का हर कोना
अब दिल्ली बन जायेगा
उल्टे दिन तू उसके गिन
जग में हिन्दुस्तां का
डंका बज जायेगा
नीले नीले अम्बर पे
लाल पीली आग से
नापाक हरकतों का
रंग अब उड़ जायेगा
एक तिरंगा भारत का
सारे पाकिस्तां में लहरायेगा
उल्टे दिन तू उसके गिन
जग में हिन्दुस्तां का
डंका बज जायेगा

-------
5.....क्षणिकायें
जब भी जरूरत पड़ती है
हम तलवार बन जाते हैं
देश की रक्षा के लिये
हम हथियार बन जाते हैं
रणचण्डी के देश में
आँखों में ज्वाला ले कर
सांसों से उगलते शोलों में
हर दुश्मन के लिये
अंगार बन जाते हैं हम
-----------
*******
मेरे जलते हुये कश्मीर
तेरी ये सुलग रही तस्वीर
के तेरा अमन कहाँ है
के तेरा चैन कहाँ है
सदा हरियाली में रहता था
झरना अमृत का बहता था
तेरी केसर घाटी अब
खुशहाल कहाँ है
-------------
मिल के चलो....२
ए भाई जरा मिल के चलो.....
कदम से कदम मिला के चलो.....
कन्धे से कन्धा मिला के......
हाथों में हाथ मिला के....
मिल के चलो......
आया है दुश्मन सरहद पे....
तुम सर उठा के चलो......
मातृभूमि की रक्षा हेतु...
वीरों के पथ पे चलो....
वतन के मान रथ पे .....
कफन बाँध के चलो.....
पुकार रही है ये जमीं.....
पुकार तुम सुन के चलो,....
जिन्दा रखने को देश सदा
फूल मौत के चुन चलो....
-------------
काश कुछ ऐसा हो
अम्बर का रंग बदल जाये
सारा दिन यह तिरंगा हो
और सांझ , केसर में ढल जाये
सारे जग को ये गगन
फिर मगन कर जाये
ये प्रेम की अगन
मेरे देश की लगन बन जाये
राजेश गोसाईं

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मोहन लाल


रक्षाबंधन है प्यार का
                         बंधन एक भाई का
सारे जहां से अलबेला है रिश्ता
                             लोहे से ज्यादा मजबूत है धागा
है एक बहन का प्यार इसमें
                                 बंधन के अरमानों के साज इनमें
मन की मुरादों से मांगा है तुमको
                                       है बहना प्यारी मेरे सखी हो तुम
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धर्मेन्द्र निर्मल

 

आ बाँधू तुम्हें राखी ।
बाँधू भैया तुम्हें राखी।।

जीवन किस्मत का पासा है,
सदा रहोगे आशा है,
सुख दुख में मेरे साथी।।

कदम कही डगमग डोले,
कंधे के नीचे आ हौले,
बन जाओगे बैसाखी।।

फँस जाउँ किसी उलझन में,
दुनिया के विशाल गगन में,
दोगे दिशा दिखा झाँकी।।

बाँध रही मैं स्नेह पूरित,
करती रहे नित अंकुरित,
प्रेम ह्रदय में राखी।।

सुसज्जित हुई कलाई,
कच्चे धागे में भाई ,
उर निधि सौगात राखी।।   

000000000000

जितेन्द्र कुमार


ऊड़ी हमले पर रचित कविता

-------०--रणभेरी--०--------

हम शान्ति की माला जपते हैं,
               वो शान्ति भंग कर देते हैं।
  हम हाथ बढ़ाते मित्रों सा,,
               वो शुरू ज़ंग कर देते हैं॥

दुश्मन भारत की छाती पर,
               बन्दर की भाँति उछलता है।
  क्या लहू हमारा पानी है?
               जो अब भी नहीं उबलता है?

देखो, उन बेबस बहनों को,
                आँसू छलकाती माओं को।
  देखो, अनाथ उन बच्चों को,
                घुट-घुट मरती विधवाओं को ॥

नन्ही बिटिया की आँखों से,
                बहते अश्कों के पानी का।
  बदला लेना होगा हमको,
                उन वीरों की कुर्बानी का ॥

वह अदना सा 'नापाक' यहाँ
                 चढ़ कर हुंकारें भरता है।
  सुन कर ललकारें चुप रहना,
                 बस, इसी का नाम कायरता है॥

बस बहुत हुआ कायरता का,
                  अब पाठ नहीं पढ़.   सकते हैं।
  हमको भी दिखलाना होगा,
                   घर में घुस कर लड़ सकते हैं ॥

हमको जवाब देना होगा,
                उसके ईंटों का पत्थर से।
  लेकर बन्दूकें निकल पड़ो,
                ऐ वीर जवानों! घर घर से ॥

गर क्षमा करो तो कुत्ते का भी,
                साहस कुछ बढ़ जाता है।
  वह भूल के अपनी औकातें,
                नाहर को आँख दिखाता है ॥

पर यह गुस्ताखी माफ नहीं,
                अब ईंट से ईंट बजानी है।
  ऐ पाक! युद्ध में खुलकर आ,
                अब तुझको धूल चटानी है ॥

                                -जितेन्द्र कुमार
                          ग्राम- चिलबिली दान चिलबिली
                          पोस्ट- बाजार गोसाईं
                          जनपद- आज़मगढ़

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