शनिवार, 2 सितंबर 2017

मृत्युतिथि-पुण्यतिथि तथा पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करें // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मृत्युतिथि-पुण्यतिथि तथा पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य करें

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मानसश्री डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

'मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति''

आज बदलते समय में जीवन भागमभाग का हो गया है। विशेष रूप से नई पीढ़ी श्राद्ध को ढकोसला समझकर उसे करना व्यर्थ समझते हैं। प्रायः जो लोग श्राद्ध करते हैं वे यथाविधि-विधान, श्रद्धा व भक्ति के साथ अपने परिवार के मृत सदस्यों का श्राद्ध अपना पितृऋण-पितृ कर्त्तव्य समझ कर करते हैं। एक बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो सिर्फ रस्म-रिवाज और खाना पूर्ति एवं समाज के भय-प्रतिष्ठा के कारण श्राद्ध कर अपना भार उतारते हैं। अतः श्रद्धा-भक्ति-प्रेम-पारिवारिक कर्त्तव्य नई पीढ़ी को देना चाहते हैं तो उन्हें श्राद्धकर्म को पूर्ण आस्था, भक्ति एवं शास्त्रोक्त विधि से करना चाहिये। ऐसे किये गये श्राद्ध से परिवार में सुख, शांति, कल्याण प्राप्ति के साथ-साथ नई पीढ़ी को यह कार्य संस्कार के रूप में प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को बड़े ही प्रेम, श्रद्धापूर्वक, शास्त्रोक्त विधि से श्राद्धों को करना चाहिये।

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इस व्यस्ततापूर्ण जीवन में यदि शास्त्र सम्मत श्राद्धों को न कर सकें तो उन्हें कम-से-कम क्षयाह-वार्षिक मृत्यु तिथि पर अथवा आश्विन मास के पितृपक्ष में तो अवश्य ही अपने स्वर्गवासी पितृगण का श्राद्ध करना चाहिये। पितृपक्ष में पितरों का विशेष सम्बन्ध होता है। इस दिन धूप देने तथा तर्पण करने का विधान है। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से पितरों का दिन प्रारम्भ हो जाता है, जो अमावस्या तक रहता है।

मनुस्मृति में वर्णन है कि-मनुष्यों के एक मास के बराबर पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। मास में दो पक्ष होते हैं। मनुष्यों का कृष्णपक्ष पितरों के कर्म का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों के सोने के लिए रात होती है-

पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तुः पक्षयोः।

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कर्मचेष्टास्वहः कृष्ण शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।। (मनुस्मृति 1/66)

एक मात्र यही कारण है कि अश्विन मास के कृष्णपक्ष-पितृपक्ष में पितृश्राद्ध करने का विधान है। ऐसा करने से पितरों को प्रतिदिन भोजन मिल जाता है। कर्म करने वाले में पूर्ण श्रद्धा होने पर ही श्राद्ध पूर्ण माना गया है। इसलिये श्राद्ध को संक्षिप्त में इस प्रकार बताया जा सकता है-''अपने स्वर्गवासी पितृगणों के हितार्थ श्रद्धापूर्वक किये जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है। हमारी प्राचीन संस्कृति में धार्मिक ग्रंथों में पितृयज्ञ भी बताया गया है।''

प्रश्न यह है कि परिवार के माता-पिता, भाई आदि स्वर्गवासी हो गये अब श्राद्ध का क्या औचित्य है? इसका बड़ा ही सरल उत्तर है। श्राद्ध से पितृगण के अतिरिक्त दिव्य पितृगण, विश्वदेवा, अग्निवात, अर्यम्मा आदि पितृ भी प्रसन्न होते हैं, जो कि देवतुल्य है।

राष्ट्र में समय-समय पर राष्ट्र हेतु बलिदान एवं देश सेवा करने वाले महापुरूषों की पुण्यतिथि पूरे राष्ट्र में बड़े जोश से मनाई जाती है, जैसे गांधी पुण्यतिथि, लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि एवं पं. जवाहरलाल नेहरू पुण्यतिथि आदि। हम इन महापुरूषों की पुण्यतिथि मनाकर उनके राष्ट्रप्रेम, बलिदान, त्याग आदि का सम्मान करते हैं। यदि हम अपने ही घर परिवार में अपने माता-पिता, जिन्होंने हमारा लालन-पालन, पोषण किया उनका वर्ष में दो बार (मृत्यु दिवस एवं श्राद्ध तिथि) पर श्राद्धरूपी सम्मान नहीं करते हैं तो पितृ ऋण से हम मुक्त नहीं होंगे तथा हम हमारी नई पीढ़ी को भी गलत सन्देश दे रहें हैं। इससे वे हमारे जाने के बाद हमारा भी श्राद्ध क्या करेंगे? हमारे परिवार के वयोवृद्ध हमसे आशा करते हैं कि उनकी रुग्णावस्था में हम उनकी सेवा करें तथा मृत्यु पश्चात् शास्त्रसम्मत और्ध्वदैहिक कर्म पूरी निष्ठा से करें।

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पितृदेव प्रसन्न होने पर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों प्रकार के भरपूर सुख प्रदान करते हैं एवं कुपित होने पर परिवार को नाना प्रकार के कष्ट भोगना पड़ते हैं। राजा राम ने भी वनवास में पिता की मृत्यु पश्चात् श्राद्धकर्म किया था। कूर्म पुराण में वर्णित है कि जो प्राणी विधिपूर्वक, शान्त मन एवं श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करता है वह सभी पापों से मुक्त होकर परमधाम में मुक्ति को प्राप्त करता है तथा जन्म-मरण के चक्र में नहीं पड़ता है।

पितृ का श्राद्ध करने का अधिकारी ज्येष्ठ पुत्र होता है, किन्तु अब संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार व जीवनयापन हेतु अलग-अलग स्थान पर रहने के कारण यह संभव नहीं होता है। अतः अलग रहकर भी यथा शक्ति इस कार्य को करने का प्रयत्न करना चाहिये। श्राद्ध के कारण परिवार वर्ष में एक या दो बार इकट्ठा हो जाता है तथा आपस में मिल बैठ भोजन करने के अतिरिक्त पारस्परिक चर्चा द्वारा एक दूसरे को सुनने समझने व उनकी समस्याओं का निराकरण भी हो जाता है।

श्राद्ध एक कर्मकाण्डी ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक स्वयं निमंत्रित कर विधिविधान से करना चाहिये। संभव हो सके तो जिसका श्राद्ध किया जाता है उनका चित्र रखकर माल्यार्पण एवं पुष्पों से परिवार को श्राद्ध करना चाहिये ताकि आनेवाली पीढ़ी उनको स्मरण कर सुसंस्कारित हो सके।

डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता 'मानस शिरोमणि' Sr. MIG.103 व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार

, उज्जैन (म.प्र.)

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