रविवार, 24 सितंबर 2017

प्रेम का दीप // कविताएँ // कीर्ति श्रीवास्‍तव

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(1)
प्रेम का दीप

जल गया देखो
आज प्रेम का दीप
इस दीवाली गूंजे
प्रेम का संगीत।

फुलझड़ी दे रही
प्रेम के संकेत
प्रेम की मिठास में
भूलें सभी द्वेष
दिल आज कहे
मिले मन का मीत।

अनार ने जगाई
तन-मन में चिंगारी
बन जाऊँ मैं
अपने प्रीतम की प्‍यारी
झूमें आज मेरे
संग सजना की प्रीत।
    
शुभ-लाभ से आई
सुख-शांति अपार
बांटो आज खुल कर
सभी को प्‍यार
लक्ष्‍मी-गणेश कर रहे
जीवन को नवगीत।

इस दिवाली छाई
खुशियों की बहार
सभी के सजें
दीपों से द्वार
ऐसे ही चले
जीवन भर ये रीत।



(2)
सूरज की रोशनी

खोज रही हूं आज मैं
वह झरोखा
जहां प्रेम के दीप
जला करते थे
खो गए वो चौपाल
और चौबारे
जहां दर्द साथ बांटा करते थे

काली स्‍याह
आज रात हो गई है
फूल, कलियों की सुगंध
कही खो गई है
पाप की चादर ओढ़े
भंवरे मंडरा रहे हैं

अधनंगे बच्‍चे चार बत्ती
के नीचे तलाशते
नए सूरज की रोशनी को
जो मिटा दे
उनके जीवन का अन्‍धेरा

मुझे भी इंतजार है
उस सूरज की रोशनी का
और यकी है
आएगी एक दिन
वो चमचमाती
रोशनी जो मिटा देगी
वो अन्‍धेरा
जिसमे आज हम सभी
छुप गए है...



(3)
शुभ शगुन

क्‍या हुं मैं
कुम्‍हार के हाथों गढ़ी हुई
उसकी कल्‍पना का एक रूप
जिसने बनाया और उसने ही
आग में तपाया भी मुझे
और सौप दिया
एक अंजान साये को

अब मैं एक कठपुतली
से ज्‍यादा कुछ न थी
गढ़ी तो गई
एक हुनरबाज के हाथों से
पर रीति -रिवाजों की
रस्‍सी में कस दी गई
जकड़ लिया उसने मुझे
कभी छटपटाती तो
कभी चिड़चिड़ाती
पर रस्‍सी ढीली न कर पाती

अपनाया इस सत्‍य को
और जीना सीख लिया मैंने
पर चाक का पहिया
कुछ इस तरह घुमा
एक नन्‍ही परी
मेरी आशाओं को लिए
आ गई द्वार मेरे

अब कुम्‍हार मैं थी
गढ़ दिया मैंने उसे
एक सुन्‍दर काया में
तपाया भी उसे
पर कुछ इस तरह कि वो
शुभ शगुन बन जाए
एक अनजान साया के साथ
आजाद परिन्‍दे की तरह
जिए अपनी जिन्‍दगी
इस जहां के संग
कदम से कदम मिला कर

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(4)
एक नये सफर पर

धूप ने आज दस्‍तक दी
तो देहरी चमक उठी
कुछ शांत हुआ मन
उस हल्‍की
सुनहरी चमक से
सपने भी जाग गये
तूफान भी थम गया
मन का सागर आज
ठहर सा गया

तब जाना
इंतजार था जिसका
वो आज धूप की
सुनहरी चादर ओढ़
मेरे द्वारे आया है

आज फिर मैं जी उठी
नजरों से नजरें मिला सकी
आज रास्‍ता चुन लिया
मंजिल का भी पता चल गया
और बस चल दी
उस पगडंडी पर

जहाँ इंतजार कर रहा था
एक सपना
जहाँ बना सकूं मैं
अपनी पहचान
और मैं चल पड़ी
उस सुनहरी चादर संग
एक नये सफर पर।



(5)
आशायें

हारना तो मैंने सीखा ही नहीं
लोगो ने तो कि बहुत
मुझे हराने की कोशिशें
हारी तो मै फिर भी नहीं
पर टूटती तो जरुर हूँ

सोचती हूँ कब तलक
ये हौंसला साथ रहेगा मेरे
कब तलक कोशिश करूँगी
नसीब को हराने की
कोई तो हो जो
थाम ले हाथ मेरा
खड़ा हो संग मेरे

न रूप है न रंग है
सोने-चाँदी की खनक 
भी तो है नहीं साथ मेरे
पर हीरे-सी चमकती आशायें
दिल में लिए फिरती हूँ
कोई तो जौहरी मिलेगा
जो मेरी आशाओं को
कोहिनूर बना देगा।


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परिचय
नाम             :-         कीर्ति श्रीवास्‍तव
पति            :-        समीर श्रीवास्‍तव
जन्‍म             :-         06 जुलाई, 1974
षिक्षा         :-         एम.कॉम., डी.सी.पी.ए.
लेखन विधाएं    :-         कहानी /कविता/ गजल/ आलेख/ बाल साहित्‍य
प्रकाषन         :-         बाल कविता संग्रह ’मेहनत का फल होता मीठा’, बाल कहानी  
                                संग्रह ’लालच नहीं करूंगा’, प्रेरणादायी ’हमारे गौरव’
राष्‍ट्रीय-अन्‍तरराष्‍ट्रीय प्रतिष्‍ठित पत्र- पत्रिकाओं में कविता, गजल, गीत, कहानी , आलेख एवं बाल साहित्‍य प्रकाशित।
प्रसारण         :-         अकाशवाणी  (भोपाल, शिलांग), दूरदर्शन डीडी मध्‍यप्रदेश
पुरस्‍कार और सम्‍मान    :-        दो दर्जन से अधिक राष्‍ट्रीय एवं प्रादेषिक सम्‍मान
संप्रति :-                 सम्‍पादक ’साहित्‍य समीर दस्‍तक’ (मासिक पत्रिका)
                        संचालक ’चित्रा प्रकाशन’
अन्‍य                :-         भोपाल से प्रकाशित साप्‍ताहिक हिन्‍दी अखबार ’प्रेसमेन’ में
8 वर्ष तक प्रबंध संपादक।
             अनेक कार्यक्रमों में पत्र-वाचन
             मंच संचालन
स्‍थायी पता        :-            242, सर्वधर्म कालोनी,
                                  सी-सेक्‍टर, कोलार रोड, भेपाल
                              पिन-462042 (म.प्र.)


ईमेल -         kirtishrivastava06@gmail.com       

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