सोमवार, 11 सितंबर 2017

संचार माध्यमों से नित नये आयाम छू रही ‘मातृभाषा’ हिंदी // डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

14 सितंबर हिंदी दिवस पर विशेष...

संचार माध्यमों से नित नये आयाम छू रही ‘मातृभाषा’ हिंदी

० वैश्विक भाषा की ओर बढ़ रहे कदम

भारत वर्ष में अपनी ‘मातृभाषा’ को लेकर संकट के बादल सितंबर माह के दूसरे पखवाड़े से प्रतिवर्ष एक बड़ी चिंता के रूप में देखे जाते रहे है। यह समझ से परे है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी के रूप में दूसरे नंबर पर खड़े हमारे देश ने अब तक अपनी भाषा का सम्मान क्यों नहीं किया है? संप्रेषण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम टीवी भी अपने विज्ञापनों में हिंदी का ही उपयोग करता आ रहा है। यहां तक की करोड़पति बनाने वाले अतिशय लोकप्रिय कार्यक्रम की प्रस्तुति भी हिंदी में इस युग के सबसे चितेरे बालीवुड कलाकार अमिताभ बच्चन द्वारा की जा रही है। अमिताभ बच्चन द्वारा हिंदी उच्चारण के साथ महज खिलाड़ी की समझ और विश्व स्तर पर देखे जाने उक्त कार्यक्रम के प्रश्नों को अंग्रेजी में भी दिखाई जा रहा है। इसका एक कारण केवल वैश्विक स्तर पर कार्यक्रम की लोकप्रियता बनाये रखना ही है। हम यह कह सकते है कि हिंदी अखिल भारतीय ही नहीं वरन वैश्विक विस्तार के नये आयाम छू रही है। विज्ञापनों की भाषा और प्रोमोशन वीडियो की भाषा के रूप में सामने आने वाली हिंदी शुद्धतावादियों को भले ही न पच रही हो, युवा वर्ग ने उसे देशभर में अपनी सक्रिय भाषा कोश में शामिल कर रखा है। इसे हिंदी के संदर्भ में संचार माध्यम की बड़ी देन कहा जा सकता है।

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विगत कुछ दशकों में ‘मातृभाषा’ के सामर्थ्य में कभी वृद्धि हुई है। सन 2011 की जनगणना आंकड़ों के आधार पर अब भारतीय भाषा पूरी दुनिया में दूसरे नंबर पर है। पहले हमारी हिंदी का क्रम अंग्रेजी के बाद तीसरे नंबर पर था, जो अब अंग्रेजी से एक पायदान ऊपर है। संचार माध्यम में सबसे अधिक प्रयुक्त हिंदी भाषा ने अपनी जरूरत विश्व स्तर पर कर दिखाई है। यदि हम यह कहें कि संचार ही वह माध्यम है जो पूरी दुनिया को भाषा की महत्ता के साथ जोड़ते है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। संचार माध्यम के भाषा के रूप में प्रयुक्त होने पर हिंदी समस्त ज्ञान विज्ञान, और आधुनिक विषयों से सहजता के साथ जुड़ चुकी है। हिंदी ही वह भाषा है जो अदालतनुमा कार्यक्रमों के रूप में सरकार और प्रशासन से प्रश्न पूछती है, विश्व जनमत का निर्माण करने के लिए बुद्धिजीवियों और जनता के विचारों के प्रकटीकरण तथा प्रसारण का आधार बनती है, सच्चाई को सामने लाकर समाज को अफवाहों से बचाती है, विकास योजनाओं के संबंध में जनशिक्षण का दायित्व निभाती है, घटनाक्रम और समाचारों का गहन विश्लेषण करती है, तथा वस्तु की प्रकृति के अनुकूल विज्ञापन की रचना करके उपभोक्ता को उसकी अपनी भाषा में बाजार से चुनाव का सुविधा मुहैय्या कराती है। हिंदी के इस महिमा मंडन को देखते हुए देश के प्रख्यात कवि काका हाथ रसी के विचार याद आते है। उन्होंने कहा था-

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य।

सुना? रूस में हो गयी है, हिंदी अब अनिवार्य

है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्र भाषा के चाचा,

बनने वालों के मुंह पर क्या पड़ा तमाचा,

कह काका जो ऐश कर रहे, राजधानी में,

नहीं डूब सकते है क्या चुल्ल भर पानी में।

हम रोज यह देख है कि राष्ट्रीय ही नहीं विविध अंतर्राष्ट्रीय चैनलों में हिंदी आज सभी प्रकार के आधुनिक संदर्भों को व्यक्त करने के अपने सामर्थ्य को विश्व के समक्ष प्रमाणित कर रही है। हमें यह कहने में संकोच नहीं होना कि वैश्विक संदर्भ में हिंदी की वास्तविक शक्ति को उभारने में संचार माध्यमों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक तरफ साहित्य लेखन की भाषा आज भी संस्कृत निष्ठ बनी हुई है, तो दूसरी तरफ संचार माध्यम की भाषा ने जन भाषा का रूप धारण करके व्यापक जनस्वीकृति प्राप्त कर ली है। समाचार विश्लेषण तक में कोड मिश्रित हिंदी का प्रयोग इसका प्रमुख उदाहरण माना जा सकता है। इतना ही नहीं पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, पारिवारिक, जासूसी, वेज्ञानिक और हास्यप्रधान अनेक प्रकार के धारावाहिको का प्रदर्शन विभिन्न चैलनों पर जिस हिंदी भाषा में किया जा रहा है, वह एक रूपी और एक रस नहीं बल्कि विषय के अनुरूप अनेक प्रकार के व्यवहारिक भाषा रूपों या कोड का मिश्रण के उपयेाग के साथ जनस्वीकृत स्वरूप अख्तियार कर रहा है। यदि हम संक्षेप में कहना चाहे तो यह गलत नहीं होगा कि संचार माध्यम के कारण हिंदी भाषा बड़ी तेजी से तत्समता से सरलीकरण की ओर अग्रसर है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारी हिंदी भाषा विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा थी, किंतु आज वह दूसरे स्थान पर आ खड़ी हुई। यदि हिंदी जानने-समझने वाले हिंदीतर भाषी देशी-विदेशी भाषा प्रयोक्ताओं को भी इसमें जोड़ दिया जाये तो हो सकता है कि हिदीं विश्व की सर्वाधिक व्यवहृत भाषा सिद्ध हो जाये। यह कहना भी गलत न होगा कि संचार माध्यमों ने हिंदी के जिस विविधतापूर्ण सर्व समर्थ नये रूप का विकास किया है, उसने भाषा समृद्ध समाज के साथ साथ भाषा वंचित समाज के सदस्यों को भी वैश्विक संदर्भ में जोड़ने का काम किया है। अब स्थिति यह है कि भारत तक पहुंचने के लिए बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हिंदी और भारतीय भाषाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। हिंदी के रूप विस्तार के मूल में यह तथ्य निहित है कि गतिशीलता हिंदी का बुनियादी चरित्र है और हिंदी अपनी लचीली प्रकृति के कारण स्वयं को सामाजिक आवश्यकताओं के लिए आसानी से बदल लेती है। यही कारण है कि हिंदी के अनेक ऐसे क्षेत्रीय रूप विकसित हो चुकी है, जिन पर उन क्षेत्रों की भाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे अवसरों पर हिंदी व्याकरण और संचारना के प्रति अतिरिक्त सचेत नहीं रहती, बल्कि उदारता के साथ इस प्रभाव को आत्मसात कर लेती है। यही प्रवृत्ति हिंदी के निरंतर विकास का आधार है और जब तक यह प्रवृत्ति विद्यमान है, तब तक हिंदी का विकास रूक नहीं सकता। इसी संदर्भ में पुनः काका हाथ रसी का व्यंग्य मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहा है-

पुत्र छदम्मी लाल से बोले श्री मनहूस,

हिंदी पढ़नी होए तो, जाओ बेटे रूस,

जाओ बेटे रूस, भलि आयी आजादी,

इंग्लिस रानी हुई हिंद में, हिंदी बांदी,

कहं काका कविराय, ध्येय को भेजो लानत,

अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वकालत।।

बाजारीकरण की अन्य कितने भी कारणों से निंदा की जाये, लेकिन यह मानना होगा कि उसने हिंदी के लिए अनुकूल चुनौती प्रस्तुत की है। बावजूद इसके हिंदी बाजार सापेक्ष होते हुए भी संस्कृति निरपेक्ष नहीं है। विज्ञापन से लेकर धारावाहिकों तक के विश्लेषण द्वारा यह सिद्ध किया जा सकता है कि संचार माध्यमों की हिंदी अंग्रेजी और अंग्रेजियत की छाया की मुक्त है। यह अपनी जड़ों से जुड़ी हुई भाषा है। अंग्रेजी भले ही विश्व भाषा हो, भारत में वह महज डेढ़ से दो प्रतिशत लोगों द्वारा बोली जाती है। रेडियो भी हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाला व्यापक माध्यम रहा है। प्रसन्नता की बात यह है कि टेलीविजन बहुत थोड़े समय में ही हिंदी माध्यम बन गया है। प्रतिदिन होने वाले इस बात का प्रमाण है कि हिंदी के कार्यक्रम चाहे किसी भी विषय से संबंधित हो, देशभर में सर्वाधिक देखे जाते है। अतः व्यावसायिक दृष्टिकोण से हिंदी संचार माध्यमों के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र उपलब्ध कराती है। अंतिम रूप से यह कहा जा सकता है कि 21वीं शताब्दी में मुद्रित और इलेक्ट्रानिक दोनों ही प्रकार के संचार माध्यम नये विकास के आयामों को छू रहे है, जिसके परिणाम स्वरूप हिंदी भाषा भी नई नई चुनौतियों का सामना करने के लिए नई शक्ति का अर्जन कर रही है।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

sk201642@gmail.com

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  1. सुन्दर लेख। हिंदी जन जन की भाषा बनती जा रही है। आपने २०११ के जिस जनगणना का जिक्र किया उसका लिंक भी स्रोत के रूप में लेख में देते तो पाठकों के लिए अच्छा होता।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मिश्रा जी,
    बहुत खूब लिखा आपने. पर गुस्ताखी माफ... आप हम सब पर हिंदी को मातृभाषा के रूप में क्यों थोप रहे हैं. यदि भारत जन्मभूमि की वजह से माता है उस तरह व्युत्पत्ति है तो हम यह भी मान लें कि हम सबका बाप बैल है क्यों कि गाय भी हमारी माता है. व्युत्पत्तियों को सापेक्ष पढ़ें समझें तो शायद बेहतर होगा. हिंदी तो आज हमारी राष्ट्र भाषा भी नहीं है. और राजनीति वोटों तक ही सीमित रही तो कभी बन भी नहीं पाएगी. हाँ मैं इस बात का सम्मान करता हूँ कि विविधता लिए इस देश में हिंदी भी कुछ की मातृभाषा है. आप laxmirangam.blogspot.in और हिंदी कुंज पर मेरे हिंदी संबंधी लेख पढ सकते हैं. मैं बिलासपुर का ही पढा-बढा हूँ रविशंकर विश्वविद्यालय से.

    सादर,
    एम आर अयंगर,
    7780116592
    8462021340

    उत्तर देंहटाएं

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