गुरुवार, 7 सितंबर 2017

व्यंग्य // नीट एन डर्टी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

 सुचिता राउत की कलाकृति

क्या बताऊँ, चाहा तो कभी नहीं था कि हिन्दी लेखन में अनावश्यक रूप से अंग्रेज़ी के शब्द घुसेड़ दिए जाएं, पर मजबूरी कुछ ऐसी आन पडी है कि इस आलेख का शीर्षक अंग्रेज़ी का देना पड़ रहा है – neat n dirty – ( साफ़ और गंदा ) और वह भी अनावश्यक रूप से ! मैं चाहता तो शीर्षक “साफ़ और गंदा” भी दे सकता था। ऐसा नहीं हो सका।

मुझे घोटाओं की चिंता सता रही थी। तमाम तरह के घोटालों का अध्ययन करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि घटित होने वाले घोटालों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। कुछ घोटाले बड़े साफ़-सफाई से घटित किए जाते हैं। उन्हें मैं ‘नीट’ कहता हूँ। कुछ अन्य घोटाले अत्यन्त गंदे और घृणित ढंग से घटित होते हैं, उन्हें मैं ‘डर्टी’ कहता हूँ। मास्टर आदमी ठहरा। बच्चों की कापियां जांचता रहा हूँ। साफ़-सुथरी कापी को ‘नीट’ (भले ही उसमें सवाल गलत ही क्यों न हों) और गंदी लिखावट की कापी को (भले ही सवालों का जवाब उसमे सही ही क्यों न हो ) ‘डर्टी’ लिखता रहा हूँ। अब आदत ऐसी पड़ गई है कि “नीट एन डर्टी” चश्मे से ही हर चीज़ देखने लगा हूँ, फिर वह राजनैतिक उठापटक ही क्यों न हो।

तमिलनाडु का किस्सा है। वहां एक सीधी-सादी लेकिन प्रतिभाशाली लड़की को मेडिकल में प्रवेश के लिए “नीट” की परीक्षा देनी पडी लेकिन वह इतनी डर्टी साबित हुई कि छात्रा ने आत्महत्या कर ली। तमिलनाडु में अभी तक “नीट’ परीक्षा नहीं होती थी और स्टेट बोर्ड की बारहवीं की परिक्षा के अंकों के आधार पर मेडीकल में प्रवेश मिल जाता था। इस छात्रा ने १२ वीं में ९८ फीसदी अंक पाए थे और सोच रही थी कि उसे मेडिकल में प्रवेश मिल ही जाएगा। तमिलनाडु की राजनीति में आखिर तक यह बहस चलती रही कि छात्रों को नीट की परीक्षा दिलवाई जाए या नहीं। अंतत: हाँ –ना करते हुए नीट के पक्ष में निर्णय बड़ी सफाई से ले लिया गया। लेकिन राज्य की राजनीति के इस चौसर पर मेधा बलिदान हो गई। द्वंद्व में घिरी छात्रा नीट में ७२० अंकों में केवल ८६ अंक प्राप्त कर पाई। हताश बेचारी आत्मह्त्या के लिए मजबूर हो गई। अब तमिलनाडु में कोहराम मचा हुआ है। ज़ाहिर है बड़ी सफाई से जो निर्णय लिए जाते हैं साफ़-सुथरे नहीं होते। ‘नीट’ भले ही हों !

राम रहीम काण्ड ही ले लीजिए। हज़रत ने अपना मूल नाम बदल के ‘राम रहीम’ रख लिया। राम भक्त भी खुश, रहीम भक्त भी खुश। अपनी जन्म तिथि बदल कर १५ अगस्त कर ली। स्वतंत्रता दिवस को अपना जन्म बताते ही बन्दा स्वच्छंद हो गया। बड़ी सफाई से अकूत संपत्ति इकट्ठी कर ली। खुद कृष्ण बनकर ढेरों भक्त इकट्ठे कर लिए। अनेक भक्तिनें राधा बन गईं। भक्तों को ‘राम रहीम’ की रक्षा के लिए हथियार बंद किया गया ताकि ‘डेरा’ सुरक्षित रह सके। शासकों और राजनीतिज्ञों के लिए ऐश के सारे इंतज़ाम किए गए। ये सारा काम इतनी सफाई से किया गया कि आम जनता राम रहीम को भगवान ही समझ बैठी। भोली थी बेचारी ! लेकिन ‘घर का भेदी लंका ढाए’ को चरितार्थ करते हुए राधा का रोल निभाने वाली दो तथाकथित भक्तिनों ने ‘डेरे’ की सारी पोल खोल दी। सफाई से बनाया गया डेरा दाग-दाग हो गया। भगवान जेल के अन्दर पहुँच गए। साफ़-सुथरा इतना गंदा भी हो सकता है, किसी को अहसास नहीं था ! वो कहते हैं न, हर चीज़ जो चमकती है सोना नहीं होती।

हम लोग अक्सर भूल जाते हैं, जो नीट है अन्दर ही अन्दर डर्टी भी हो सकता है और जो ऊपर से देखने में डर्टी है, वह नीट भी होता है। सारे धर्म और शिक्षण संस्थाएं अच्छी अच्छी बातें बताती हैं। ‘यह करो यह न करो’ के उपदेशों से भरी पडी हैं। कोई ऐसा शिक्षक नहीं जो गलत रास्ते पर चलने को ठीक बताए। कोई ऐसा धर्म नहीं जो अनैतिकता की शिक्षा दे। दोनों ही क्षेत्रों में सब कुछ नीट-नीट दीखता है। लेकिन शिक्षकों और धर्मोपदेशकों में कितने ही, कितने डर्टी होते हैं, कहा नहीं जा सकता। आप तो जानते ही हैं,ऐसे न जाने कितनों पर बलात्कार तक के मुकद्दमें चल रहे हैं।

सो भाइयो और बहनों, ज़रा संभल कर रहें। नीट और डर्टी की सीमा-रेखाएं धुंधलाने लगी हैं। भक्ति और अंधभक्ति के बीच तमीज़ करना ज़रूरी है। विवेक के अभाव में फिसलना आसान है। क्या कहूँ, कहना पड़ता है। पैडागोगी डाइज हार्ड।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१, सर्कुलर रोड, १०, एच आई जी

इलाहाबाद- २११००१

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