गुरुवार, 28 सितंबर 2017

"स्त्री भ्रूण हत्या एक अभिशाप" // मंजुल भटनागर

नारी को देवी ,दुर्गा ,पार्वती की पूजा करने वाले देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का रिवाज काफी पुराना है पुराने जमाने से ही किसी एक वर्ग विशेष में नवजात लडकियों को दूध में डुबो कर मार दिया जाता था .या कई बार जन्मते ही ज़हर चटा दिया जाता था .

इस देश में नारी पर जुल्म की कथा काफी पुरानी है .सीता गर्भ वती होने के बाद भी निष्कासित कर दी जाती है और द्रौपदी भरी महा सभा में अपमानित की जाती है .प्राचीन समय में युद्ध में किसी राजा की पराजय के बाद वहॉ की रानियाँ तथा सभी कुलीन महिलाओं को राज्‍य के सम्‍मान के खातिर जौहर करने या स्‍वयं को अग्‍नि में समर्पित करने के लिए प्रेरित किया जाता था ताकि शत्रु उन्‍हें युद्ध में जीती अन्‍य वस्‍तुओं के साथ लूट कर न ले जा सकें.

. विकास की गति के साथ ही नारी के उत्पीडन ने भी गति पायी   .प्राचीन काल से ही पुरुष सत्ता प्रधान होते हुए समाज ने महिला शक्ति को चार दिवारी में बंद कर दिया .और एक पर्दा लगा दिया जिससे उस पर होते हुए शोषण की खबर बाहर न निकले।

स्त्री भ्रूण हत्या का प्राम्भ इस देश जब खुले रूप से होने लगा जब ,कुछ साल पूर्व हमारे देश में ‘अल्ट्रासाउंड मशीन का चलन हुआ .भारत में करीब १९८० के लगभग ,चिकित्सकीय दृष्टि से यह आविष्कार पश्चिम के वैज्ञानिकों ने माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य रोगियों में पेट के दोषों की पहचान करने और उसका इलाज करने की नियत से किया था। भारत के भी निजि चकित्सालयों में भी इसी उद्देश्य के रहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी।

देखा जाय तो यह उपलब्धि बुरी नहीं थी पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या करने के इस रिवाज के रूप में बदल गया यह कृत्य भारतीय समाज के मुख पर एक बाद नुमा दाग है . यह लिंग परीक्षण तकनीक तो इन बेटों के दीवानों के लिये वरदान साबित हुई है.

जब कन्या भ्रुण हत्या के रिवाज़ की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा अनेक समाज सेवकों ने ,संतों ने और पढ़े लिखे वर्ग ने इस बात को लेकर अनेक अभियान छेड़े ,वाद विवाद किये पर आज तक इस समाज की पुरुष मानसिकता नहीं बदली इस मानसिकता से त्रस्त वो लोग नहीं जो अनपढ़ हैं ,पर खेद का विषय है कि सभ्य और बुद्धिजीवी वर्ग भी इस मानसिकता से त्रस्त है .

मानव सभ्यता का विकास जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ता गया उसी के साथ भ्रूण हत्या का व्यापार भी बढ़ता गया है । आज इस देश के विकसित शहरों के साथ साथ गाँव गाँव में कन्या भ्रूण हत्या का व्यापार चल निकला है .अभी हाल ही की बात है जब एक स्टिंग ऑपरेशन के दौरान एक महिला डॉक्टर को, मोटी रकम लेकर, कन्या भ्रूणों को नष्ट करने का काम करते हुए केमरे पर पकडा गया था ।उदयपुर की झील को कन्या भ्रूण तैरते दीखे तो ऐसे समाज पर एक कलंकित प्रश्न चिन्ह न लगे तो क्या लगे ?

खैर आज २१ वी शताब्दी में पहुँच कर भी ऐसी सामाजिक मानसिकता क्यों है सोचना पड़ेगा?समाज में लड़की के जन्म को क्यों नकारा जाता है . १ .देखा जाय तो इसका कारण महिलाओं को हेय दृष्‍टि से देखना है .पुरुष प्रधान समाज में महिला एक उपभोग्‍य वस्‍तु है। इस मानसिकता का विकास करने में हमारे यहॉ के धर्म ग्रंथों की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। यह बड़े दुःख और विडम्‍बना की बात है कि,भारतीय समाज और खासकर महिलाएँ जिन्हें अपना पूज्‍यनीय ग्रंथ मानकर उसकी पूजा करती है। उसका पाठ करती है, अपने बारे में इस ग्रंथ में क्‍या लिखा है यह जाने बगैर। या जो जानती है वह खुले तौर पर प्रतिरोध नहीं कर सकती क्‍योंकि उनके उपर समाज , धर्म एवं परिवार का दबाव होता है।

यह कहना कुछ गलत नहीं होगा कि कोई भी धर्म ग्रंथ स्‍त्री के स्‍वतंत्र अधिकार, शोषण से मुक्‍ति, बलात्कार  ,दहेज,  विधवा जीवन या परिवार वालों से यौनत्याचार इत्यादि की बात नहीं करता. इन सभी धर्म ग्रंथों के खिलाफ समय-समय पर महिलाओं ने अपना प्रतिरोध अलग-अलग रुप में व्‍यक्‍त किया है।

२ .दूसरा बड़ा कारण स्त्री भ्रूण हत्या का जो में समझ पाती हूँ ,जन्‍म के बाद अपने भाई की तुलना में सभी सुविधाओं में माता-पिता द्वारा भेदभाव करना, शादी के बाद दहेज के लिए शोषण किया जाना, या लड़का न हो रहा हो तो उसके लिए उसे पति, परिवार और समाज द्वारा दोष देना आदि।स्त्री जीवन का स्वागत न स्त्री कर सकती है न पुरुष। और इसी कारण स्त्री भ्रूण हत्याएं होती है .

३ .चारों ओर लड़कियों एवं महिलाओं को डंसने के लिए सांपों के झुंड़ फुफकार रहे हैं, अपनी सभ्यता और संस्कृति की हदों को लांघ कर छोटी छोटी बालिकाओं का शोषण कर रहे हैं .

४ कारण को विस्तार पूर्वक देखें तो हम पाते हैं आजादी के 6९ साल बाद भी महिलाओं मे शिक्षा का अभाव दिखता है, उनका संगठन मजबूत नहीं है उनमें एकता की आवाज कमजोर दिखाई देती है। साहित्‍य, कला,  संस्‍कृति और रोजगार में अपना अस्‍तित्‍व सिद्ध करने के लिए वर्तमान समय में भी स्‍त्रियों को संघर्ष करना पड़ रहा है।

यह सच है कि आज की नारी कल की नारी के लिए पृष्ठ भूमि बना रही है वह अन्‍याय की अत्‍याचार की , समस्‍त उत्‍पीड़न और शोषण के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ रही है। अपने हक और अधिकारों को पाने के लिए वह आगे आ रही है।स्‍त्री पुरुषों द्वारा अपने पर लादे गए सामाजिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक, राजनैतिक आदि वर्चस्‍व से पूर्णतः मुक्‍त होना चाह रही है।

आज की नारी यह सिद्ध करना चाहती हैकि, वह अपने निर्णय खूद ले सकती हूँ। उसे किसी की दया और भीख पर नहीं जीना है , स्‍वाभिमान से जीना है। भावनाओं की कद्र करने वाले पुरुषों का वो सम्मान करती है और आज ऐसे अनेक पुरुष सामने आ रहे हैं जो इस त्रासदी पर खुल कर बोल रहें हैं आज की नारी ऐसे पुरुष वर्ग का सम्मान करती है किन्‍तु कलम चलाकर अपने अनेक कृतियों के माध्‍यम से उत्‍पीड़न के प्रति उत्‍पन्‍न प्रतिरोध को व्‍यक्‍त करती रहती है ।

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यह दो पंक्तियाँ मेरी भी

मुझे जीने दो माँ

आने दो अपने अँगना

तितली सा उड़ने दो

कलियों सा महकने दो

सच मानो

में तुम्हारा दामन महका दूंगी माँ .

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मंजुल भटनागर

1 blogger-facebook:

  1. सुन्दर आलेख, चिंता का विषय तो है ही, यह भी सोचना होगा की नारी की हत्या की दोषी नारी ही है या और कोई, आज भ्रूण हत्या में शामिल जितनी डॉक्टर हैं उनमे ९० प्रतिचत से ज्यादा नारी हैं, भ्रूण हत्या के लिए राजी होने वाली सारी माताएं नारी हैं, इनको मजबूर करने वाले वाली कौन हैं सास, ननद और देवरानी जेठानी, पति और ससुर की इन मामलों में कम चलती है| अतः नारी वर्ग को स्व-जागृत होना होगा शिक्षित होना होगा तभी समाज से कुरीतियाँ जाएँगी, नारी अगर निश्चित करले की गर्भ नही गिरना तो कौन मजबूर कर सकता है, एक सबसे बड़ा कारण है दहेज़ जिसकी चिंता ही कन्या-भ्रूण को गिरवाने के लिए लोगों को मजबूर करती है दूसरी यह सोच की लड़का ही खंडन का नाम रोशन करेगा या आगे ले जायगा.

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