गुरुवार, 28 सितंबर 2017

समीक्षा // उस जनपद का का कवि हूँ / त्रिलोचन

पुस्तक : उस जनपद का का कवि हूँ / त्रिलोचन / राधाकृष्ण प्रकाशन / नई दिल्ली / १९८१ प्रथम संस्करण

कविता संग्रह <उस जनपद का कवि हूँ> में त्रिलोचन की कवितायेँ सन १९५० के उस समय को रेखांकित करती हैं जब छायावाद-रहस्यवाद के प्रभाव को चुनौती दी जाने लगी थी और प्रगतिशील नई कविता अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुई थी। यही कारण है कि त्रिलोचन की इन कविताओं में अनेक ऐसी कवितायेँ भी सम्मिलित हैं जो छायावादी-रहस्यवादी दायरे की मुक्ति से अपनी छटपटाहट के बावजूद उसके प्रभामंडल से पूरी तरह छुटकारा नहीं पा सकी हैं। उदाहरण के लिए जो त्रिलोचन के मिज़ाज से अपरिचित है, उसे यदि इस संग्रह का निम्नलिखित ‘सानेट’ सुनाया जाए तो वह इसे एक छायावादी कविता ही समझेगा –

गीतमयी हो तुम, मैंने यह गाते गाते

जान लिया, मेरे जीवन की मूक साधना

में खोई हो ---

किन्तु ‘उस जनपद का कवि हूँ’ का मुख्य स्वर और मूल उद्देश्य छायावाद के विरुद्ध एक ज़बरदस्त प्रतिक्रिया, और वह भी लगभग प्रचारात्मक ढंग से प्रस्तुत करना ही है।

बड़े बड़े शब्दों में बड़ी बड़ी बातों को

कहने की आदत औरों में है पर मेरा

ढर्रा अलग है –

आकाश बिहारी कवि अभिलाषा

उड़ने की ही रखते थे, गर्जन ही गर्जन

उनका सुन पड़ता था, शीतल वर्षा धारा

नहीं भूमि पर आती थी, वर्जन ही वर्जन

उनमें था; या जग-जीवन का वारा न्यारा

त्रिलोचन के कथ्य का अंतिम लक्ष्य कविता को व्यक्तिवादी, आत्मतुष्ट घेरे से निकाल कर बहिर्मुखी बनाना है, “वह कविता क्या जो कोने में बैठ लजाए” ! इसके अलावा जिस आंग्ल रूमानी कविता जिसका उन दिनों धड़ल्ले से अनुकरण हो रहा था, उसके खिलाफ भी अपनी ओजस्वी वाणी मुखरित करना त्रिलोचन का उद्देश्य था।

--अनुकरण कितने दिन और रहेगा.

यह युग, यह जीवन, यह आशा और निराशा

स्वयं स्फूर्त, क्या इसमें कहीं नहीं है भाषा (पृष्ठ, ११२

अथवा

कविता के चहरे पर जो पाउडर उधार का

लगा हुआ था भद्दा सा –-

वह कलंक धो दिया, सहज मैंने बना दिया –

सीधे सादे स्वर में डर के गान सुनाए (पृष्ठ, ११३

‘उस जनपद का कवि हूँ’ की कवितायेँ हमें प्रत्यक्षत: आम आदमी से जोड़ती हैं। ये सामान्य जन के सुख दुख, पीड़ा और दारिद्र्य की कविताएं हैं। इनकी प्रथम सहानुभूति और चिंता भूखे-नंगे व्यक्ति के लिए है – “उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है / नंगा है (पृष्ठ, १७)। इसका कारण है त्रिलोचन अच्छी तरह जानते हैं कि आज भले ही हम कितनी ही बड़ी बड़ी बातें क्यों न करें “छूछा / पेट काम तो नहीं करेगा” इसीलिए भूखे और नंगे लोग “दुनिया में जिसको / अच्छा नहीं समझते’, भिक्षा मांगने के लिए मजबूर हैं। त्रिलोचन ने स्वयं इस प्रकार की आर्थिक विपन्नता झेला और सहा है –

विदा किया तब कहा यह लाना वह लाना ---

क्या दूं, क्या दूं, क्या दूँ, क्या दूँ, क्या दूँ, क्या दूँ

अपनी पहुँच में कहाँ, क्या है जो मैं ला दूं (पृष्ठ, ४२

इसीलिए तो वे ईमानदारी और साहस के साथ स्पष्ट कह पाते हैं “---मुझको जो पिछड़े हैं पथ पर / उन्हें देखना है ---तूम महिमा में मुग्ध, तुम्हें क्या कौन कहाँ है !”

यहाँ कदाचित यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि त्रिलोचन के कविता संसार में दरिद्र के प्रति और उसके पक्ष में केवल घोषणा मात्र ही नहीं है बल्कि ईमानदार संवेदना भी है। इस सन्दर्भ में पृष्ठ ९५ और ९६ पर प्रकाशित ‘सुकनी बुढ़िया’ पर लिखी लिखी गईं दो कवितायेँ सार्थक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

बेशक त्रिलोचन दरिद्रता और पिछड़ेपन से आहत हैं और उनकी संवेदनाएं दरिद्र के ही साथ हैं किन्तु संवेदनाओं का उनका संसार इससे कहीं अधिक विस्तृत है। वस्तुत: उनके काव्य में हमें सम्पूर्ण जीवन की झलक मिलती है जो उन्हें “कुछ प्रकाश, कुछ अन्धकार से बना बनाया” मिला है और जो सभी “रसों से सना-समाया” है। उनकी कवितायेँ जग-जीवन के केवल कृष्ण पक्ष को ही उजागर नहीं करतीं बल्कि उस शुक्ल पक्ष को भी रेखांकित करती हैं जहां प्रेम उमड़ता है और प्रकृति खेलती और इठलाती है। प्रेम का एक चित्र देखें –

पलकें नीचे गिरीं, आँख में कहाँ ढिठाई

तबतक आ पाई थी रोम रोम ही मानों

आँख बन गया,सिहरन से लहराया –

चुपके चुपके प्राणों की वह अदला बदली

भीतर बाहर छाई इंद्र धनुष की बदली (पृष्ठ, ३९

इसी प्रकार का एक सुन्दर प्रकृति का चित्र (सानेट, पृष्ठ ५५) भी देखते ही बनाता है –

झीने से बादल जिनमें चटकीली लाली

उभर उठी थी, जिनकी आभा हरियाली पर

थिरक उठी थी, जाते जाते क्षितिज-पटी पर

सूरज ने सोना बरसाया, छाया काली

बढ़ने लगी, रंग फिर धीरे धीरे बदले –

प्रेम और प्रकृति के अनेक हृदयग्राही चित्रों के बावजूद भी त्रिलोचन का कविता संसार क्रान्ति-कामी है,कामुक नहीं। अत्याचार से लड़ने के लिए कवि सहज ही तत्पर है। शान्ति की बात – कोरी बात – उसे बेमतलब लगती है। समस्याओं का सही समाधान ही उसका श्रेय है।

कोई भूखा हो तो उसको लाकर रोटी दो

मत लम्बी चौड़ी बात बनाओ इसकी

उसकी सारे जग की. नींव छोड़कर खिसकी

तो दीवाल गिरेगी – (पृष्ठ, ८७

जो लोग “शांति का गरम मसाला बाँट रहे हैं मुफ्त सभी को” ऐसे व्यक्तियों से त्रिलोचन को चिढ है।वह शायद इसीलिए गांधी दर्शन से कभी सहमत नहीं हुए। किन्तु आर्थिक अत्याचार के विरुद्ध गांधी की आवाज़ की वे सराहना करते हैं –

---उसका (गांधी का)यह नारा है

काम करे सो खाए, जग में परोपजीवी

ज़मीदार पूंजीपति सबको ललकारा है (पृष्ठ, ७७

कई मुद्दों पर असहमति के बावजूद गांधी जी का न रहना त्रिलोचन को खटकता है।

बापू तुम होते तो कितना अच्छा होता

बिना तुम्हारे सूना सूना सा लगता है (पृष्ठ ७७

त्रिलोचन का नाम सानेट-लेखन के लिए प्रसिद्ध है। सानेट अंग्रेज़ी कविता का एक प्रकार है जिसमें कविता १४ पंक्तियों में लिखी जाती है। पहली १२ पंक्तियाँ प्राय: एक दूसरे के बाद तुकांत होती हैं और अंतिम दो पंक्तियाँ परस्पर तुकान्त होती हैं। सभी पंक्तियों की मात्राएं समान होती हैं।

त्रिलोचन सानेट अपनाते हैं, इसमे भला किसी को क्या शिकायत हो सकती है। कुछ बातें लेकिन विचारणीय हैं। एक तो यह कि त्रिलोचन कुल मिलाकर पाश्चात्य संस्कृति के विरोधी हैं – ऐसा उनकी कई कविताओं में भी झलकता है – परन्तु दूसरी और वे कविता का सानेट रूप अपनाकर अपने स्वयं को अंग्रेज़ी प्रभाव से मुक्त भी नहीं कर सके हैं।

कहा गया है कि त्रिलोचन ने सानेट को मात्रिक संगीत में ढालकर इसका एक ऐसा ढांचा तैयार किया है जो पूरी तरह हिन्दी की आतंरिक लय से मेल खाता है। यह बात पूरी तरह किसी भी वस्तुनिष्ठ समीक्षक के गले नहीं उतर सकती। त्रिलोचन के सानेट पाठ में न तो रवानी है और न ही किसी तरह का संगीत है। प्रत्येक पंक्ति मानो ज़बरदस्ती केवल तुक बैठाने के लिए काटी-छांटी गई है। हर पंक्ति के बीच कहीं विराम तो कहीं अर्ध विराम आ जाता है। इससे पूरी पंक्ति एक साथ पढ़ने में बड़ी कठिनाई होती है। वस्तुत: इन कविताओं को यदि सानेट के ढाँचे में न लिखा जाकर सामान्य मुक्त छंद में लिखा जाता तो इनका पाठ सहज-स्वाभाविक हो जाता।

और अंत में दो शब्द त्रिलोचन की भाषा के सम्बन्ध में। हिन्दी को भाषागत दृष्टि से समृद्ध करने में त्रिलोचन को सदैव याद किया जाएगा। उन्होंने गाँव के भदेस शब्दों को साहित्यिक गरिमा प्रदान की और अनेक संज्ञाओं को क्रियाओं की तरह इस्तेमाल कर भाषा के उपयोग को भी समृद्ध किया। “कभी न रिताया” (पृष्ठ, ६४) “नस नस टाची जान पडी” (पृष्ठ ६१) “फुन्नइत हो जाता हूँ”,(पृष्ठ, २८) आदि कुछ भाषाई और व्याकरण संबंधी बिलकुल नए प्रयोग हैं जो त्रिलोचन के यहाँ प्रचुर मात्रा में देखे जा सकते हैं।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी

१, सर्कुलर रोड ,

इलाहाबाद -२११००१

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