सोमवार, 11 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस विशेष // आज की हिंदी // डॉ. हरीश कुमार

डॉ. हरीश कुमार

हर दिवस हर पल हर क्षण ऐसा कौन सा समय है जब हम हिंदी नहीं होते। हिंदी मात्र एक भाषा नहीं वरन एक संस्कृति का नाम है ,एक तालमेल और सम्बन्ध का नाम है जो भारतीयों को दशकों से जोड़ती आई है। नए शब्दों को स्वीकारती ,उन्हें अपनी गोद में समेटती नए कलेवर और नए रंगों में ढलती प्रवाहमयी नदी है।

बचपन से लेकर आज तक कितनी यादें कितने अनुभव और कितनी संवेदनायें इस भाषा की चाशनी में ही तो डूबी है। जैसे शरीर के भीतर एक निर्मल आत्मा होती है उसी प्रकार हिंदी हमारी भावनाओं कि आत्मा है ,इसलिए राष्ट्र भाषा कहलाती है। इस तरह के शोर और अफवाहें फैला करती हैं कि हिंदी भाषा का अस्तित्व संकट में है ,पर ये एक कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं। जो भाषा लोक जीवन से जुड़ी हो अपने देश के जन मानस के इतिहास से जुड़ी हो ,उनकी संस्कृति से जुड़ी हो उस पर कैसा संकट। हिंदी भाषा को शाश्वत बनाने वाला गुण है उसकी अन्य भाषाओं के प्रति स्वीकृति। आज अनेक देशज ,विदेशी और तत्सम शब्द नए रूप और कलेवर में हिंदी में ढल चुके हैं।

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बेस्टसेलर बन चुके साहित्य के अंतर्गत पौराणिक कथाओं में आमिष त्रिपाठी ,देव दत्त पटनायक और महानगरीय कहानी में सत्य व्यास , दिव्यप्रकाश दुबे ,दीप त्रिवेदी ,मानव कौल, निखिल सचान ,पूजा उपाध्याय आदि का नाम जुड़ा है और अनुवाद में प्रभात रंजन जैसे लेखक बड़ा व्यापक काम हिंदी मे कर रहे है। गीता श्री , अनंत विजय , मनीषा कुलश्रेष्ठ , ओम थानवी , अलोक पुराणिक आदि कई लेखक हिंदी को कथेतर साहित्य में भी आगे ले जा रहे हैं।

‘हिंदी नयी चाल में ढल रही है ‘ इसीलिए जीवंत है। समय के साथ चलने वाली भाषाएं कभी नहीं मरती। आज पत्रकारिता , अनुवाद , मार्केटिंग ,व्यापार ,ब्लॉग लेखन आदि में रोजगार की नयी संभावनाओं के साथ हिंदी कुलाचे भर रही है। पेंगुइन जैसे अंग्रेजी के बड़े प्रकाशक भी अब हिंदी में किताबें छाप रहे हैं। भारत में रोजगार और व्यापार की जरूरत है हिंदी भाषा। याद कीजिये अंग्रेजों का समय उन्हें भी भारत में आकर हिंदी सीखनी पड़ी , हिंदी के विकास और उसकी समझ के लिए नये कालेज खोलने पड़े। आज भारत की शिक्षा में , व्यापार में , राजनीति में , समाज में , संस्कृति में यदि किसी को पैठ बनानी है तो वो हिंदी को दरकिनार नहीं कर सकता।

देश में छपने वाली लगभग ७० प्रतिशत पात्र पत्रिकाएँ हिंदी से जुड़ी हैं ,हिंदी भाषा अपने आप में एक व्यवसाय बन चूका है। हर वर्ष नए सम्पादक ,प्रकाशन ,लेखक और किताबें बड़ी संख्या में हिंदी से जुड़ रही है।इसलिए हिंदी को लेकर जो संकट और चिंता का हो हल्ला मचाया जा रहा है वो बेमानी है। हाँ कम से कम हम हिन्दुस्तानियों को ये बात समझनी होगी कि हिंदी हमारे अस्तित्व से जुड़ी है। प्रसिद्ध लेखक रसूल हमजातोव लिखते है कि उनके देश में सबसे बड़ी गाली ये दी जाती है कि’ जा तू अपनी मातृभाषा भूल जाए ‘| इससे बड़ा अभिशाप क्या होगा। मातृभाषा भूलने का मतलब अपनी जड़ो से कट जाना है और इन जड़ो से होकर ही तो हमारी आत्मा का भोजन आता है।

हिंदी को केवल हिंदी साहित्य से जोड़कर सीमित न करें इसका क्षेत्रफल बहुत व्यापक है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हम इस भाषा में सांस लेते, बातें करते ,विचार और तकरार करते हैं। हमारे बुजुर्गों कि कहानियां किस्से ,बातें और उनसे जुड़े रिश्ते नातों की हर संवेदना इस भाषा में सिमटी है। पूरा उत्तर भारत और मध्य भारत का बड़ा भू भाग हिंदी पट्टी का विशाल इतिहास और गाथा समेटे अनेक उपबोलियों में विकसित हो रहा है। सारी उपबोलिया हिंदी भाषा के इस वटवृक्ष की टहनियां ही तो हैं।

इस भाषा में पढ़ते लिखते हमारी कल्पनाओं ने नयी खोजो ,विचारों ,संवादों को रचा है। ट्रेन में ,बस में ,रास्ते पर ,अजनबी भारतीय प्रदेशों में ये भाषा हमारी ऊँगली पकड़ कर हमें आसानी से जुड़ना सिखाती है ,तारतम्य पैदा करती है। हम कितने सुरक्षित महसूस करते है अपनी भाषा के इस स्नेह के साथ। बेकार में ही स्वयम को छोटा महसूस करना या अपनी भाषा को निम्न समझना हमारी अपनी निजी मानसिक समस्या हो सकती है ,उसे दूर करना ही होगा। अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना आज हम चीन ,रूस और जर्मनी जैसे विकसित देशों से सीख सकते हैं। उन्होंने आज तक चाहे जितनी भी तरक्की की हो अपनी भाषा का साथ कभी नहीं छोड़ा। हम भारतीयों को भी ये बात समझनी होगी। हिंदी ,हिन्दू ,हिन्दुस्तान एक ही माला के मोती है। ये माला न बिखरे इसके लिए इन तीनों को ही हमें जोड़ कर रखना होगा , हर कीमत पर हर बलिदान पर क्योंकि यही हमारी अंतिम निशानी होगी ,हमारी विराट सभ्यता को जीवित रखेगी।

डा हरीश कुमार 
बरनाला .पंजाब

4 blogger-facebook:

  1. हरीश जी,
    सुंदर लेख साझा करने हेतु आपका आभार.
    हिंदी मात्र भाषा है संस्कृति नहीं. हमारी संस्कृति भारतीय है. हिंदी राष्ट्रभाषा भी नहीं है राजभाषा है. न ही हिंदी भारतीयों की मातृभाषा है. यहाँ अलग अलग भाषायी लोग बसते हैं. हाँ कुछ की मातृभाषा हिंदी भी है. आपका वक्तव्य कि हम हिंदी में साँस लेते हैं.. विचार करते हैं सर्वथा गलत है. कल आप तबला भी हिंदी में बजाएँगे और हँसेंगे भी हिंदी में. इन क्रियाओं का दायरा असीमित है. सीमित कर इन्हें पंगु मत बनाइए. आप जिस भाषा में पकड़ रखते हैं उसमें विचार व्यक्त करते हैं विचारते नहीं हैं .इस पर सोचिए.
    हिंदी संबंधी लेखों के लिए आप मेरा निजी ब्लॉग laxmirangam.blogspot.com देख सकते हैं। हिंदी कुंज पोर्टल पर मेरा विशेष पेज भी है. आप इन पर अपने विचारों से अवगत कराएँ तो चर्चा हो सकती है.
    एम आर अयंगर. 7780116592/8462021340

    उत्तर देंहटाएं
  2. नमस्ते, आपकी यह प्रस्तुति "पाँच लिंकों का आनंद" ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में गुरूवार 14 -09 -2017 को प्रकाशनार्थ 790 वें अंक में सम्मिलित की गयी है। चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर। सधन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हिंदी दिवस पर बहुत अच्छी जानकारी ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ज्ञानवर्धक लेख है हरीश जी ------- पर मैं अयंगर जी से भी सहमत हूँ ------ अयंगर जी हिंदी के लिए बहुत ही संवेदनशील है | आभार आपका -

    उत्तर देंहटाएं

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