बुधवार, 13 सितंबर 2017

व्यंग्य // हिंदी उठ ! आज दिन है तेरा // गिरीश पंकज


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हिंदी उठ। रोना- धोना छोड़। नहा धो कर हो जा तैयार । आज तेरा दिवस है।  अरी पगली,  आज 14 सितंबर है। आज के दिन तो मुस्कुरा। देख, चारों तरफ तेरी जय जय हो रही है । सरकारी दफ्तर जहां कल तक गोरी मेम राज किया करती थी, वहां आज तेरी प्राण प्रतिष्ठा होने वाली है । लोग तेरा  चरण -वन्दन करेंगे। तेरे माथे पर  तिलक-चन्दन लगाएंगे। तू धन्य होगी रे । इसलिए चल, आज के दिन तो मुस्कुरा।

देख तो जरा, कैसे हर तरफ हिंदी- हिंदी हो रही है । तू यह गीत गुनगुना सकती है, मैं देखूं जिस ओर सखी री, सामने ममेरा वंदन है।  ध्यान से सुन। गाठ वर्ष की भाँति  इस बार भी वर्ष भर तेरा उपयोग करने की कसमें खाई जा रही है । भले ही कसमें झूठी हों, लेकिन कसम-तो-कसम है । मां कसम,  यह सब देख कर हमको बड़ा अच्छा लग रहा है । हमें भरोसा है कि तुझे भी बड़ा अच्छा लग रहा होगा।  वाह , तूने अपने आंसू पोंछ लिए। आई रे, आई रे हंसी आई।  हिंदी तू धन्य है ।इसलिए अब देर मत कर और और फौरन तैयार हो जा । आज तो तेरे अभिनंदन का दिन है बावरी। कल से तेरे क्रंदन का दिन शुरू हो जाएगा। लेकिन जो आज का एक दिन मिला है खुशी का,  उसमें जरा से झूम ले तू। नृत्य कर ले ।थोड़ा इधर तो आ । लोगों को आशीर्वाद दे दे ।

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हिंदी , चल।  बिलकुल देर न कर। बाहर तेरे स्वागत में बैंड -बाजा बज रहा है।  यह और बात है कि बाद में तेरा ही बैंड बज जाएगा. फिलहाल तो भक्त गण आरती  का थाल सजा कर खड़े हैं.तेरी पूजा शुरू होने ही वाली है इसलिए उदासी छोड़. झिझक को त्याग और अभिनंदन को स्वीकार कर के मग्न हो कर नाच।  साल भर बाद यह दिन आया है।  कवियों के मन भाया है. लोग तुझ पर कविता लिख रहे हैं. तेरे नाम पर सम्मान झोंक रहे हैं. सरकारी कार्यालयों में तेरे नाम से बजट स्वीकृत हो गया है. कितना अंदर करना है, यह कमीशन भी तय हो चुका है. तेरे आने के बाद एक साथ अनेक का भला हो जाता है।

देख तो जरा, वो गरीब लेखक  कैसे मग्न हो कर नाच रहा है. जैसे घूरे के दिन फिरते हैं, वैसे ही हिंदी लेखक के दिन भी फिरते हैं. तेरे दिवस के बहाने उस बेचारे का भी भला हो जाता है. उसे एक नई शॉल मिल जाती है जो ठंड में बड़े काम आती है. एक नारियल भी मिलता है, जो अक्सर सड़ा निकलता है, लेकिन  तेरे भक्त उसे श्रीफल कह कर टिका देते हैं। ये सब चलता रहता है. तो दुखियारी माई, उठ. आलस त्याग. निराशा छोड़  और बाहर निकल. आज तेरा दिन है माते ! जय हिंदी, जय नागरी।

मेरी बात सुन कर हिंदी मुस्कराई।  उसने अपने आँसू पोछे और बोली, ''अब तुम कहते हो तो तैयार हो जाती हूँ।  प्रशंसा के कागजी घोड़े पर सवार हो जाती हूँ।  लेकिन एक दिन की चांदनी , फिर अंधेरी रात  है.. हर साल एक दिन की रानी बनती हूँ और फिर नौकरानी की भूमिका में आ जाती हूँ।  गोरी अँगरेज़ी मेम का जलवा देख कर खुद के होने पर पछताती हूँ।  कैसा है मेरा देश, जहाँ उसकी अपनी कोई राष्ट्र-भाषा नहीं, और सच कहूं तो मुझे अब कोई आशा नहीं।''

मैंने कहा, ''माते,  एक-न-एक दिन तेरे अच्छे दिन आएँगे। सब्र का फल मीठा होता है। ''  

अच्छे दिन की बात सुन कर हिंदी बहुत ज़ोर से  और बोली, ''यह तो बस एक सुंदर जुमला है।  देश के अच्छे दिन तो आए नहीं, मेरे क्या आएँगे।  फिर भी हम वन्देमातरम तो जाएंगे। तुम सब हिंदी का जाप करते रहो. शायद कल को हिंदी -हिंदी हो जाए.''

मैंने कहा, ''माते,टू मच थैंक्स , आप कुछ पॉजिटिव हुईं.''

हिंदी मुस्कराई , '' हां, बेटे।

इस बूढ़ी को अब

निगेटिव हो कर भी

क्या मिलेगा इसलिए

पॉजिटिव हो रही हूँ,

अपने कंधे पर

'हिंगलिश' बिटिया को भी

ढो रही हूँ।''

हम दोनों हँस पड़े. हिंदी का दुःख धीरे-धीरे कम होता गया और वह अपनी आरती उतरवाने के लिए तैयार होने लगी.

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गिरीश पंकज

(गिरीशचंद्र उपाध्याय)
संपादक, सद्भावना दर्पण

२८ प्रथम तल, एकात्म परिसर,

रजबंधा मैदान रायपुर, छत्तीसगढ़. 492001*
मोबाइल : 09425212720, 877 0969574

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निवास - सेक़्टर -3 , एचआईजी -2 , घर नंबर- 2 ,  दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010
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पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2008-2012)
8  उपन्यास, 16  व्यंग्य संग्रह सहित 60  पुस्तके

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1- http://sadbhawanadarpan.blogspot.com
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