शनिवार, 9 सितंबर 2017

मंजूषा मन - कविताएँ

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1 अलाव

एक अलाव सुलगाये रखना
नितांत आवश्यक है
सुकून से जीने को,

सुलगता रहे अलाव
धधकती रहे एक आग...

जब भी मिले कोई दर्द
झौंका जा सके इस अलाव में,
जब पाएं कोई पीड़ा
छोड़ी जा सके आग में घी सी
बढ़ाई का सके आग,

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जब छलकें आँसू,
किंछे जा सकें
इसकी ऊंची उठतीं
लपटों को कम करने

कभी जो जमने लगे
शिराओं में बहता रक्त,
हाथ ताप
फिर जुटाई जा सके
जीने की ऊर्जा...

इसके धुँए से
से बढ़ाई जा सके
साँसों की रफ्तार,
फूँकी जा सके
फेफड़ों की धौंकनी में क्षमता...

और जब कभी हो
बचा हुआ समय,
काट खाने वाली फुर्सत
तो खर्च किया जा सके
राख कुरेदने में...

बड़े काम का होता है
मन भीतर सुलगता
अलाव।


2 बोझ

अपने कंधों पर लिया है मैंने
सृष्टि विस्तार का बोझ,
मेरे होने से
चल रही है दुनिया
मेरे होने से हो तुम
तुम्हारा नाम
तुम्हारी पहचान
तुम्हारा नामलेवा...

जब मैंने उठाया ये बोझ
तब क्या
अपने जीवन को चलाने
कुछ पत्थर उठाने का साहस
न होगा मुझमें...

सुनो!!
तुम्हें तो अंदाज़ा ही नहीं
मेरी ताकत का
मेरे हौसले का

जीवन का बोझ अकेले उठाने
तुम मुझे छोड़ सकते हो
पर सुनो...
तोड़ नहीं सकते..


3 बन्धन

एक वस्त्र का कोना
डाल दिया गया
उसके कंधे पर
दूसरा छोर लहरा रहा था हवा में...

दूसरा वस्त्र का
एक सिरे से ढक दिया गया उसे भी
यूँ उसके तन पर वस्त्रों की कमी न थी
पर यह भी था
अति आवश्यक वस्त्र...

फिर
दोनों वस्त्रों के पकड़े गए
हवा में झूलते छोर
तिलकधारी पंडित कुछ बड़बड़ाये
और दोनों हवा में लटकते छोर
बांध दिए गए आपस में
कितनों ली राहत की सांस
जैसे निपट गया हो
कोई बहुत बड़ा काम...

बन्ध गए दोनों
जन्मों जन्म के लिए
एक दूसरे से
बस एक वस्त्र के बंधने से...

किसी ने नहीं देखा
इस गांठ के बीच
बन्ध पाये या नहीं
दोनों के मन भी।

4 उमस

जब कभी
कठिनाइयों की बारिश
भिगो देती है तन मन..

आंखों की नमी
बिखर जाती है वातावरण में,
सांसो में आती जाती हवा
कर देती है इन्कार
बहने से,

घबराने लगता है जी
तेज हो जातीं हैं धड़कनें
माथे पर चमक आतीं हैं
पसीने की बूंदें...

जेब से निकाल रुमाल
पोंछ लिया पसीना,
किसी पुराने अखवार से
झल ली हवा...
यूँ ही जूझ लिए कठिनाइयों से।

किसी ने बड़बड़ाते हुए कहा-
उफ्फ!! कितनी उमस है,

कोई क्या जाने
और क्या क्या है
उमस के साथ....
-------00------
  

परिचय

नाम - मंजूषा मन

पिता - प्रभुदयाल खरे

माता - ऊषा खरे

जन्म - 9 सितम्बर 1973, सागर (मध्य प्रदेश)

शिक्षा - समाज कार्य में स्नातकोत्तर (MSW)

लेखन - कविता, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे, छंद, माहिया, कहानी-लघुकथा आदि।

प्रकाशन -
1.  "मैं सागर सी" हाइकु-ताँका संग्रह, पोएट्री बुक बाजार प्रकाशन लखनऊ

साझा संकलन
1.  "पीर भरा दरिया" संयुक्त माहिया संग्रह।
2.  "कलम के कदम" साझा काव्य संकलन।
3.  "सत्यम प्रभात" साझा प्रेरक काव्य संग्रह।
4.  "अंतर्मन की खोज" साझा प्रेरक कहानी संग्रह।
5.  "आधुनिक हिंदी साहित्य की उत्कृष्ट कविताएं" साझा काव्य संग्रह।
6. "अनवरत" साझा काव्य संकलन।

पत्र पत्रिकाएँ- सरस्वती सुमन, साहित्य समीर-दस्तक, अभिनव प्रत्यक्ष, हिंदी चेतना, हरिगंधा, उदयन्ति, वेब पत्रिकाओं जैसे अनुभूति, सहज साहित्य, साहित्य सुधा, हिंदी समय, त्रिवेणी, हिंदी हाइकु, पतंग आदि में प्रकाशन
सम्मान -
1. "शब्द निष्ठा सम्मान 2016" कविता के लिए, "आचार्य रतनलाल विद्यानुग अखिल भारतीय प्रतियोगिता" अजमेर, राज.

2. "काव्य कृष्ण सम्मान 2016" पोएट्री बुक बाजार प्रकाशन एवं मौलिक काव्य सृजन द्वारा, दिल्ली में।

3. ''राष्ट्र गौरव सम्मान 2017’’ पुस्तक "मैं सागर सी" के लिए "साहित्य समीर दस्तक" भोपाल द्वारा

4. “काव्य गौरव सम्मान” छत्तीसगढ़ की प्रमुख संस्थाओं सद्भावना साहित्य संस्थान, छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल, राष्ट्रिय काव्य सृजन एवं नवरंग काव्य मंच के संयुक्त तत्वाधान द्वारा

सम्प्रति - कार्यक्रम अधिकारी, अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन (सामुदायिक विकास कार्यक्रम)

संपर्क- अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन
बलौदा बाजार
छत्तीसगढ़,  पिन – 493331


ई मेल – manjusha.mann9@gmail.com
manjushaoshi73@gmail.com

6 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर कविताएँ

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद ओमकार जी

      हटाएं
  2. ...बन्ध गए दोनों / जन्मों जन्म के लिए / एक दूसरे से / बस एक वस्त्र के बंधने से... साधुवाद काव्योक्त दृष्टि |

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बहुत धन्यवाद रामलाल जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. मंजूषा को पढ़ती रही हूँ. अच्छा लिखती हैं. इन कविताओं में अलाव बहुत अच्छी लगी.

    उत्तर देंहटाएं

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