गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–2 : 13 - सात साल तक चुप // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक माता पिता थे जिनके दो बेटे और एक बेटी थी। पिता अक्सर घर से बाहर रहता था क्योंकि उसको अपने काम से बाहर आना जाना पड़ता था।

एक दिन जब वह बाहर गया हुआ था तो उसके दोनों छोटे बेटों ने अपनी माँ से कहा — “माँ, हम अपने पिता जी से मिलने जा रहे हैं।”

उनकी माँ ने कहा — “ठीक है जाओ।”

सो वे अपने पिता से मिलने चल दिये। जब वे जंगल में पहुँचे तो वे वहाँ खेलने के लिये रुक गये। कुछ देर बाद ही उन्होंने देखा कि उनका पिता तो उन्हीं की तरफ आ रहा था।

वे उसकी तरफ भागे और जा कर उसकी टाँगों से लिपट गये “पिता जी, पिता जी।”

पर उनका पिता उस दिन कुछ खराब मूड में था सो बोला — “मुझे परेशान मत करो, जाओ यहाँ से।”

पर बच्चों ने उसकी इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसकी टाँगों से लिपटे ही रहे। पिता जब बहुत परेशान हो गया तो वह ज़ोर से बोला — “शैतान तुम दोनों को उठा कर ले जाये तुम लोग सुनते नहीं हो।”

इत्तफाक से शैतान उस समय वहीं से गुजर रहा था सो इससे पहले कि पिता जान पाता कि क्या हो रहा था वह उन दोनों बच्चों को वहाँ से उठा कर ले गया।

पिता बेचारा तो देखता ही रह गया और कुछ जान ही न सका कि क्या हो गया। वह पछताता सा घर आ गया क्योंकि उसको तो आशा ही नहीं थी कि जो वह कहेगा वह इस तरह सच हो जायेगा।

जब माँ ने देखा कि पिता बिना बच्चों के चला आ रहा है तो वह बहुत चिन्ता करने लगी और उसने अपने बच्चों के लिये रोना शुरू कर दिया।

उसके पति ने पहले तो यही कहा कि उसको मालूम नहीं था कि वे कहाँ हैं पर फिर बाद में उसने मान लिया कि उसने उनको शाप दिया और फिर वे उसकी आँखों के सामने से गायब हो गये।

इस पर उनकी छोटी बेटी बोली — “माँ और पिता जी आप दुखी न हों। अगर मेरी अपनी ज़िन्दगी चली भी जाये तो भी मैं अपने भाइयों को ढूँढने जरूर जाऊँगी।”

उसके माता पिता ने उसको उनको ढूँढने जाने के लिये बहुत मना किया पर उसने उनकी एक न सुनी। उसने अपने लिये थोड़ा सा खाना लिया और अपने भाइयों को ढूँढने चल दी।

चलते चलते वह एक महल के सामने आ गयी। उस महल का लोहे का दरवाजा था। वह उसमें से हो कर उस महल के अन्दर चली गयी।

उस महल में एक नौजवान बैठा था। उसने उस नौजवान से पूछा — “क्या तुमने इत्तफाक से मेरे भाइयों को देखा है? उनको एक शैतान उठा कर ले गया है।”

वह नौजवान बोला — “मैं नहीं कह सकता कि मैंने उनको देखा है पर तुम उस दरवाजे से हो कर उस कमरे में चली जाओ। वहाँ 24 बिस्तर लगे हुए हैं। वहाँ देख लो अगर तुम्हारे भाई वहाँ हों तो।”

उस लड़की को वहाँ उसके भाई मिल गये। वह तो उनको देख कर बहुत खुश हो गयी। वह बोली — “तो तुम लोग यहाँ हो। मुझे खुशी है कि कम से कम तुम लोग यहाँ सुरक्षित तो हो।”

भाइयों ने कहा — तुम ज़रा हमको पास से देखो कि क्या हम सुरक्षित हैं?”

बहिन ने उनके बिस्तर के नीचे झाँका तो देखा कि उनके बिस्तरों के नीचे तो बहुत सारी आग जल रही थी। वह डर के मारे चिल्लायी — “ओह भैया, मैं तुम लोगों को बचाने के लिये क्या करूँ?”

वे बोले — “अगर तुम सात साल तक चुप रहो तभी तुम हमको बचा सकती हो। पर इस बीच तुमको बहुत तकलीफें उठानी पड़ेंगी।”

बहिन बोली — “तुम चिन्ता न करो भैया। तुम मेरे ऊपर विश्वास रखो मैं सब देख लूँगी।”

उसने उनको वहीं छोड़ा और वापस उसी कमरे में चली आयी जहाँ वह नौजवान बैठा था। उसने उस लड़की को अपने पास आने का इशारा किया पर उस लड़की ने ना में अपना सिर हिलाया, क्रास का निशान बनाया और वहाँ से चली गयी।

उसके सात सालों का चुप रहना वहीं से शुरू हो चुका था। चलते चलते वह एक जंगल में आ पहुँची। वह बहुत थक गयी थी सो वह एक पेड़ के नीचे लेट गयी और सो गयी।

उसी जंगल में एक राजा शिकार करने के लिये निकला हुआ था। वह उधर से गुजरा और उस बच्ची को सोते हुए देखा तो उसके मुँह से निकला — “ओह कितनी सुन्दर लड़की है।”

उसने उसे जगाया और उससे पूछा कि वह इस जंगल में कैसे आयी। अब वह बोल तो सकती नहीं थी सो उसने अपना केवल सिर हिला कर उसको बताया कि वह वहाँ अपनी मरजी से नहीं आयी थी।

राजा ने उससे पूछा कि क्या वह उसके साथ चलना पसन्द करेगी। उसने सिर हिला कर बताया कि हाँ वह उसके साथ जायेगी।

राजा ने सोचा कि वह शायद सुन नहीं सकती होगी सो वह उस से ज़ोर से बोला पर जल्दी ही उसको पता चल गया कि वह तो फुसफुसाहट भी सुन सकती थी।

वह उसको घर ले आया और उसको गाड़ी से बाहर निकाला। घर में अन्दर ला कर उसने अपनी माँ को बताया कि वह एक न बोलने वाली लड़की को ले आया है। वह जंगल में अकेली सो रही थी और अब वह उससे शादी करना चाहता है।

माँ बोली — “मैं इस बात के लिये कभी राजी नहीं होऊँगी कि तुम एक बिना बोलने वाली लड़की से शादी करो।”

वह बीच में ही बोला — “पर यहाँ मैं बताऊँगा कि क्या करना है इसलिये हमारी शादी होगी।” और उन दोनों की शादी हो गयी।

राजा की माँ बहुत ही बुरी थी और अपनी बहू को बहुत ही बुरे तरीके से रखती थी पर बहू बेचारी सब कुछ शान्ति से सहती रही। इस बीच में उसको बच्चे की आशा भी हो गयी।

एक दिन राजा की माँ ने अपने बेटे को कहा कि वह एक शहर में जाये और उस शहर की देखभाल करे जहाँ उसको धोखा दिया जाने वाला था। राजा ने अपनी पत्नी को विदा कहा और उस शहर को चल दिया।

राजा के पीछे रानी ने एक बेटे को जन्म दिया पर राजा की माँ ने दाई की सहायता से उसके बिस्तर में यह दिखाने के लिये एक कुत्ता रखवा दिया कि उसने एक कुत्ते को जन्म दिया है और उसके बेटे को एक बक्से में बन्द करके महल की छत पर रखवा दिया।

वह बेचारी लड़की परेशान सी इधर उधर देखती रही पर अपने भाइयों की परेशानी याद करके केवल मन मसोस कर रह गयी। कुछ भी न कह सकी।

राजा की माँ ने अपने बेटे को लिखा कि उसकी पत्नी ने एक कुत्ते को जन्म दिया है।

राजा ने जवाब दिया कि वह अब अपनी पत्नी के बारे में कुछ सुनना नहीं चाहता था। उसने अपने आने से पहले ही अपनी पत्नी के लिये यह भी कहा कि उसको खाने के लिये थोड़ा सा पैसा दे कर घर के बाहर निकाल दिया जाये।

पर राजा की माँ ने एक नौकर के साथ बहू को बाहर भेज दिया और नौकर से कहा कि वह उसको मार कर उसकी लाश समुद्र में फेंक दे और उसके कपड़े वापस ले आये।

जब वे दोनों समुद्र के किनारे पहुँचे तो नौकर ने कहा — “मैम, मेहरबानी करके आप अपना सिर झुकाइये। मुझे आपको मारने का हुकुम मिला है।

आँखों में आँसू भर कर वह लड़की घुटनों के बल बैठ गयी और अपने हाथ जोड़ दिये।

उस नौकर को दया आ गयी तो उसने बस उसके बाल काट लिये और कपड़े उतार लिये। उसने अपनी कमीज और पैन्ट उसके पहनने के लिये छोड़ दी और वापस आ गया।

अब वह लड़की उस नौकर के कपड़े पहन कर वहाँ समुद्र के किनारे पर अकेली ही इधर उधर घूमती रही। आखिर उसको एक जहाज़ दिखायी दे गया तो उसने उसको इशारा किया।

वह जहाज़ सिपाही ले कर जा रहा था। उन सिपाहियों ने उससे पूछा कि वह कौन था क्योंकि उनको ज़रा सा भी शक नहीं हुआ कि वह कोई लड़की हो सकती थी।

इशारों से उसने उनको बताया कि वह एक नाविक थी उसका जहाज़ टूट गया था और वह उस जहाज़ में से अकेली ही बची थी।

सिपाहियों ने कहा — “अगर तुम नहीं भी बोल सकती हो तो कोई बात नहीं फिर भी तुम लड़ाई में हमारी सहायता कर सकती हो।”

लड़ाई में उस लड़की ने भी तोपें चलायीं। उसकी बहादुरी से खुश हो कर उन लोगों ने उसको तुरन्त ही कौरपोरल बना दिया। जब लड़ाई खत्म हो गयी तो उसने उनसे प्रार्थना की अब उसको छोड़ दिया जाये और उसको छोड़ दिया गया।

जब वह जमीन पर आ गयी तो उसको पता नहीं था कि वह अब कहाँ जाये। घूमते घूमते रात को उसको एक टूटा फूटा घर मिल गया तो वह उसी में चली गयी और वहाँ जा कर छिप गयी।

कुछ देर बाद ही उसको किसी के कदमों के चलने की आवाज सुनायी दी तो उसने बाहर झाँक कर देखा तो 13 खूनी घर के पिछले दरवाजे से बाहर जा रहे थे।

जब वे उसकी आँखों से काफी दूर चले गये। तो वह घर के पीछे के हिस्से की तरफ गयी। वहाँ उसने 13 आदमियों के लिये बहुत बढ़िया खाने की एक मेज लगी देखी।

वह मेज के चारों तरफ घूमी और उन सब प्लेटों में से उसने थोड़ा थोड़ा चखा ताकि वे खूनी जब वापस आयें तो उन खूनियों को कोई चीज़ कम न लगे।

फिर वह अपनी छिपने की जगह वापस आ गयी पर वहाँ से चलने से पहले वह एक प्लेट में से अपनी चम्मच निकाल कर बाहर रखना भूल गयी।

जब वे खूनी वापस लौट कर आये तो उनमें से एक ने उस चम्मच को तुरन्त ही देख लिया तो अपने साथियों से बोला — “ऐसा लगता है कि यहाँ कोई आया है।”

दूसरा बोला — “चलो फिर से हम सब थोड़ी देर के लिये बाहर चलते हैं और एक आदमी यहाँ देखभाल करता रहेगा।” सो सब बाहर चले गये और एक आदमी को वहाँ छोड़ गये।

यह सोचते हुए कि अब सब चले गये हैं वह लड़की अपने बिस्तर से उठी। जैसे ही वह बाहर आयी तो उस खूनी ने उसको पकड़ लिया और बोला — “अब मैंने तुझको पकड़ लिया है ओ चोर। ज़रा रुक जा।”

वह लड़की यह देख कर बहुत डर गयी और उसने इशारों से उसको बताया कि वह बोल नहीं सकती थी और वह यहाँ इसलिये चली आयी थी क्योंकि वह रास्ता भूल गयी थी।

यह सुन कर उस खूनी ने उसको तसल्ली दी और फिर खाना खिलाया। दूसरे लोग भी कुछ देर में वहाँ आ गये।

उन्होंने उसकी कहानी सुन कर कहा — “क्योंकि अब तुम यहाँ हो तो हमारे ही साथ रहो वरना हम तुमको मार देंगे।”

उसने हाँ में सिर हिलाया और फिर वह वहीं रहने लगी। पर उन खूनियों ने उसको फिर वहाँ कभी अकेला नहीं छोड़ा।

एक दिन उन खूनियों का सरदार उससे बोला — “कल हम लोग फलाँ राजा के महल पर जायेंगे और उसकी सब कीमती चीज़ें ले कर आयेंगे। तुमको हमारे साथ चलना पड़ेगा।”

जब उसने उस राजा का नाम बताया तो वह तो उसका अपना पति था। सो उसने अपने पति को लिख कर उसके महल में होने वाली चोरी की चेतावनी भेजी और आने वाले खतरे के बारे में बताया।

इसका नतीजा यह हुआ कि जब वे खूनी आधी रात को महल के सामने वाले दरवाजे से घुसने लगे तो वहाँ छिपे हुए सिपाहियों ने निकल कर उनको एक एक करके मार डाला।

इस मारने में उनका सरदार और पाँच खूनी तो मारे गये पर बाकी बच कर भाग गये। वह उस लड़की को वहीं छोड़ गये जो खूनियों के वेश में थी।

सिपाहियों ने उसको पकड़ लिया और उसके हाथ पैर बाँध कर उसको जेल में डाल दिया। जेल के कमरे से वह लोगों को शहर के चौराहे पर फाँसी चढ़ाने की तैयारी करते देख सकती थी।

यह सब होते होते अब उसके चुप रहने के सात साल पूरे होने को आ रहे थे। केवल एक दिन ही बाकी रह गया था। अपने इशारों से उसने उन लोगों से बहुत प्रार्थना की कि वह उसकी फाँसी की सजा को कल तक के लिये बढ़ा दें।

बस एक दिन और फिर उसकी यह चुप खत्म हो जायेगी। राजा ने इसकी इजाज़त दे दी।

अगले दिन वे उसको फाँसी के तख्ते तक ले चले। जब वह पहली सीढ़ी पर चढ़ी तो उसने उनसे पूछा कि क्या वे उसको 3 बजे फाँसी चढ़ाने की बजाय 4 बजे फाँसी चढ़ा सकते हैं। बस वह एक घंटा और चाहती है।

राजा इस बात पर भी राजी हो गया। जब 4 बजे का घंटा बजा और वह एक और कदम आगे बढ़ी तो दो लोग राजा के पास आये, उसको सिर झुकाया और राजा से बात करने की इजाज़त माँगी।

राजा ने कहा — “बोलो।”

उन्होंने पूछा — “इस नौजवान को आप फाँसी क्यों चढ़ा रहे हैं?”

राजा ने उनको बताया कि वह ऐसा क्यों कर रहा था तो वे बोले — “वह कोई नौजवान नहीं है बल्कि हमारी बहिन है।” और फिर उन्होंने राजा को बताया कि वह सात साल तक चुप क्यों रही और इस सबके बारे में उसने सात साल तक एक शब्द भी क्यों नहीं कहा।

फिर वे अपनी बहिन से बोले — “बोल बहिन बोल। अब हम खतरे से बाहर हैं। हम सुरक्षित हैं।”

फिर उन दोनों ने उसकी हथकड़ी और बेड़ी खोली। सारे शहर के सामने उस लड़की ने कहा — “मैं राजा की पत्नी हूँ और मेरी नीच सास ने मेरे बच्चे को मार दिया।

महल की छत पर जा कर देखो तो तुमको वहाँ इसका सबूत मिल जायेगा। वहाँ एक बक्सा है। उसको खोल कर देखो तो तुम्हें पता चलेगा कि मैंने एक कुत्ते को जन्म दिया था या एक बेटे को।”

राजा ने तुरन्त ही अपने नौकरों को महल की छत पर वह बक्सा लाने के लिये भेजा। जब वे बक्सा ले कर आये और उसको खोला गया तो उस बक्से में वाकई एक बच्चे का ढाँचा निकला।

इस पर सारा शहर चिल्लाया — “इस लड़की की बजाय रानी और दाई को फाँसी पर चढ़ा दो।”

राजा ने ऐसा ही किया और दोनों बुढ़ियों को फाँसी पर लटका दिया गया। राजा की पत्नी को इज़्ज़त के साथ घर वापस ले आया गया। राजा ने रानी से माफी माँगी और रानी के दोनों भाइयों को राजा ने अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।

उसके बाद सब खुशी खुशी रहने लगे।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया इटली की बहुत सी अन्य लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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