बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

इटली की लोक कथाएँ–2 : 6 तीन मकान // सुषमा गुप्ता

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एक बार एक बहुत ही गरीब स्त्री थी। उसकी तीन बेटियाँ थीं। जब वह मरने वाली थी तो उसने अपनी तीनों बेटियों को अपने पास बुलाया और बोली — “मेरी प्यारी बेटियों, अब मेरे मरने में ज़्यादा देर नहीं है। मैं तुम लोगों को अकेला छोड़ कर जा रही हूँ।

जब मैं मर जाऊँ तो तुम अपने चाचाओं को बुला लेना और उनसे कहना कि वे तुम्हारे रहने के लिये एक एक छोटा घर बनवा दें। तुम लोग उनमें रह सकती हो। एक दूसरे के साथ आपस में प्यार से रहना तो आराम से और सुरक्षित रहोगी।”

इतना कह कर उसने आखिरी साँस ली और मर गयी। उसकी तीनों बेटियाँ बहुत ज़ोर से रो पड़ीं।

अपनी माँ का अन्तिम संस्कार करके फिर वे उस घर से बाहर चली गयीं जहाँ उनको उनका एक चाचा मिला जो चटाइयाँ बुनता था।

सबसे बड़ी लड़की कैथरीन बोली — “चाचा जी, चाचा जी, हमारी माँ अभी अभी मर गयी है। आप तो बहुत रहमदिल हैं क्या आप मेरे लिये अपने बचे हुए भूसे से एक मकान बना देंगे?”

सो उनके उस चटाई बुनने वाले चाचा ने बचे हुए भूसे से उसके लिये एक मकान बना दिया और वह उस मकान में रहने चली गयी।

दूसरी दोनों बहिनें और आगे चलीं तो उनको उनका एक और चाचा मिला जो बढ़ई था। बीच वाली बहिन जूलिया ने उससे कहा — “चाचा जी, चाचा जी, हमारी माँ अभी अभी मर गयी है। आप तो बहुत रहमदिल हैं क्या आप मेरे लिये एक लकड़ी का मकान बना देंगे?”

उस बढई ने उस लड़की के लिये लकड़ी का एक घर बना दिया और वह लड़की उस लकड़ी के मकान में रहने चली गयी।

अब केवल सबसे छोटी बेटी मरीटा बच रही थी। वह आगे बढ़ी तो उसको भी उनके एक चाचा मिले। उनके यह चाचा लुहार थे।

उसने उनसे कहा — “चाचा जी, चाचा जी, हमारी माँ अभी अभी मर गयी है। आप तो बहुत रहमदिल हैं क्या आप मेरे लिये एक लोहे का मकान बना देंगे?”

सो उस लुहार ने उसके लिये एक लोहे का मकान बना दिया और वह उस लोहे के मकान में रहने चली गयी। अब तीनों अपने-अपने मकान में आराम से रहने लगीं।

एक दिन एक शाम को एक भेड़िया बाहर निकला। वह कैथरीन के घर की तरफ गया और उसका दरवाजा खटखटाया।

कैथरीन ने पूछा — “कौन है?”

“मैं एक बहुत छोटी सी चीज़ हूँ। मैं बहुत भीग गया हूँ। मुझे बहुत ठंड लग रही है मुझे अन्दर आने दो।”

“भाग जाओ यहाँ से। तुम तो भेड़िये हो और मुझे खाना चाहते हो।”

भेड़िये ने उस भूसे के मकान की दीवार को एक धक्का दिया और उस मकान के अन्दर घुस गया और कैथरीन को खा लिया।

अगले दिन दोनों छोटी बहिनें कैथरीन से मिलने गयीं तो उन्होंने देखा कि उसके मकान के भूसे को पीछे धकेला गया है और वह मकान तो खाली है।

“उफ़ कितनी बुरी बात है। हमारी बड़ी बहिन को जरूर ही भेड़िये ने खा लिया है।”

शाम को वह भेड़िया फिर से वापस आया और बीच वाली बहिन जूलिया के घर गया। वहाँ जा कर उसने उसके घर का दरवाजा खटखटाया।

जूलिया ने पूछा — “कौन है?”

“एक छोटी सी चीज़ जो रास्ता भूल गयी है। मेहरबानी करके मुझे अपने घर में शरण दो।”

“नहीं, तुम तो भेड़िये हो और अब की बार तुम मुझे खा जाओगे।”

भेड़िये ने उस लकड़ी के मकान को एक हल्का सा धक्का दिया तो उसका दरवाजा खुल गया। उस मकान में घुस कर उसने जूलिया को भी तुरन्त ही खा लिया।

अगली सुबह जब मरीटा जूलिया के घर गयी तो उसको पता चला कि उसको भी भेड़िया खा गया है। उसने अपने आपसे कहा — “उफ़, भेड़िये ने उसे भी खा लिया। बेचारी मैं, अब मैं तो दुनियाँ में अकेली रह गयी।”

शाम को वह भेड़िया मरीटा के घर गया और उसका दरवाजा खटखटाया।

मरीटा ने पूछा — “कौन है?”

“एक छोटी सी चीज़ जो ठंड के मारे अधजमा हो गया हूँ और मरा जा रहा हूँ।”

मरीटा बोली — “तुम भाग जाओ यहाँ से। तुमने मेरी दो बहिनों को तो खा लिया है और अब तुम मुझे भी खाना चाहते हो। मुझे सब पता है।”

भेड़िये ने उसके मकान के दरवाजे में भी धक्का मारा पर वह दरवाजा तो उसके बाकी लोहे के घर की तरह से मजबूत था सो वह दरवाजा तो उससे नहीं टूटा पर उससे उसका कन्धा जरूर टूट गया।

चीखता चिल्लाता वह लोहार के घर की तरफ दौड़ा गया और उससे बोला — “मेरा कन्धा ठीक करो।”

लोहार बोला — “मैं लोहा ठीक करता हूँ हड्डियाँ नहीं।”

भेड़िये ने बहस की — “पर मेरी हड्डियाँ तो लोहे से टूटी हैं इसलिये अब ये तुम्हीं को ठीक करनी हैं।”

यह सुन कर लोहार ने अपना हथौड़ा और कीलें उठायीं और भेड़िये का कन्धा जोड़ दिया।

अपना कन्धा ठीक करा कर भेड़िया मरीटा के पास वापस लौटा और बन्द दरवाजे में से ही पुकारा — “ओह प्यारी मरीटा, तुमने मेरा कन्धा तोड़ दिया कोई बात नहीं पर मैं तुमको अभी भी उतना ही प्यार करता हूँ।

अगर तुम कल सबेरे मेरे साथ चलोगी तो मैं तुमको मटर के बागीचे में ले चलूँगा जो यहाँ से पास में ही है।”

“ठीक है जब तुम तैयार हो जाओ तब मेरे पास आ जाना।”

पर वह लड़की बहुत होशियार थी। उसको पता था कि वह भेड़िया केवल उसको घर से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था ताकि उसकी बहिनों की तरह से वह उसको भी खा सके।

अगले दिन वह सुबह जल्दी ही उठ गयी और अपने आप अकेली ही मटर के बागीचे में चली गयी। वहाँ से उसने बहुत सारी मटर तोड़ीं और उनको अपने ऐप्रन में भर कर घर आ गयी।

घर आ कर उसने उन मटरों के छिलकों को तो अपनी खिड़की से बाहर फेंक दिया और मटरों को पकने के लिये रख दिया।

भेड़िया उसके पास 9 बजे आया और बोला — “ओ प्यारी मरीटा, चलो मटर के बागीचे चलें।”

मरीटा बोली — “नहीं, ओ बेवकूफ नहीं, मुझे नहीं जाना। मैंने तो मटर पहले ही तोड़ ली हैं। क्या तुमको मेरी मटर के छिलके खिड़की के नीचे पड़े दिखायी नहीं दे रहे? ज़रा एक लम्बी साँस खींच कर तो देखो तो तुमको उनके पकने की खुशबू भी आयेगी और फिर तुम होंठ चाटते रह जाओगे।”

भेड़िया यह सुन कर अपना सा मुँह ले कर रह गया पर फिर भी बोला — “ओह कोई बात नहीं। मैं कल सुबह फिर आऊँगा तब हम लोग लूपिन तोड़ने चलेंगे।”

“ठीक है कल मैं तुम्हारा 9 बजे इन्तजार करूँगी।”

पर इस बार भी वह जल्दी उठी और लूपिन के बगीचे में जा कर ऐप्रन भर कर लूपिन तोड़ लायी। लूपिन ला कर उसने उनको भी पकाने के लिये रख दिया।

जब भेड़िया सुबह 9 बजे आया और मरीटा को लूपिन तोड़ने के लिये बुलाया तो उसने उसको अपनी खिड़की के नीचे पड़े उनके छिलके दिखा दिये।

इस बार भेड़िये को गुस्सा आ गया उसने सोचा कि वह उस लड़की से अपनी इस बेइज़्ज़ती का बदला जरूर लेगा पर प्रगट में उसने उससे कहा — “ओ शरारती लड़की, तूने मुझे बेवकूफ बनाया और देख मैं तो तुझे कितना पसन्द करता हूँ।

ऐसा करते हैं कल तू सुबह तैयार रहना मैं तुझको अपनी जानी पहचानी जगह ले चलूँगा। वहाँ हम लोगों को बहुत ही अच्छे काशीफल मिलेंगे। फिर हम उनकी एक बढ़िया दावत करेंगे।”

मरीटा बोली — “ओह यह तो बड़ा अच्छा है। मैं यकीनन आऊँगी।” सो हर बार की तरह से अगली सुबह भी मरीटा दिन निकलने से पहले ही काशीफल के बागीचे की तरफ भाग गयी।

पर इस बार उस भेड़िये ने भी 9 बजे का इन्तजार नहीं किया। वह भी 9 बजे से पहले ही पहले काशीफल के बागीचे में मरीटा को खाने जा पहुँचा।

जैसे ही मरीटा ने भेड़िये को दूर से देखा तो उसने जल्दी से एक काशीफल का गूदा निकाल कर उसको खोखला किया और उसके अन्दर दुबक कर बैठ गयी। क्योंकि उसके पास छिपने की या कहीं भागने की और कोई जगह ही नहीं थी।

वह भेड़िया आदमी के माँस की बू को सूँघते हुए और सब काशीफलों को सूँघते सूँघते इधर उधर घूमता रहा पर मरीटा का उसे कहीं पता नहीं चल पा रहा था।

फिर उसने सोचा कि हो सकता है मरीटा मुझसे पहले ही घर पहुँच गयी हो तो अब मैं अपनी ही काशीफल की दावत कर लूँगा। सो उसने काशीफलों को दाँये से बाँये से खाना शुरू किया।

जब वह भेड़िया मरीटा के काशीफल के पास आया तो मरीटा काँप उठी कि अब तो वह भेड़िया उस काशीफल के साथ साथ उस के अन्दर की मरीटा को भी खा लेगा।

तभी भेड़िया मरीटा के काशीफल की तरफ आ गया और बोला — “मैं इस बड़े काशीफल को मरीटा के घर ले चलता हूँ और इसको उसे भेंट में दे दूँगा। इससे वह मेरी दोस्त हो जायेगी।”

सो उसने उसी काशीफल में अपने दाँत गड़ाये जिसमें मरीटा बैठी थी और उसको ले कर मरीटा के लोहे के मकान की तरफ भाग लिया। वहाँ जा कर उसने वह काशीफल उसके मकान की खिड़की की तरफ फेंक दिया।

और चिल्लाया — “मरीटा, ओ मेरी प्यारी मरीटा। देख मैं तेरे लिये कितनी सुन्दर भेंट लाया हूँ।”

उधर मरीटा सुरक्षित रूप से उस काशीफल में से बाहर निकल आयी और उसने घर में अन्दर घुस कर अपनी खिड़की बन्द कर ली और अन्दर से ही भेड़िये की तरफ देख देख कर मुँह बनाने लगी।

फिर बोली — “धन्यवाद मेरे दोस्त, मैं तो काशीफल में ही छिपी थी। अच्छा हुआ जो तुम मुझे मेरे घर तक मुझे उठा कर ले आये।” भेड़िये ने जब यह सुना तो वह अपना सिर चट्टान पर पटकने लगा।

उस रात बहुत बरफ पड़ी। मरीटा आग के पास बैठी उसकी गरमी ले रही थी कि उसने चिमनी में कुछ शोर सुना। उसने सोचा कि लगता है कि यह तो भेड़िया मुझे खाने आ रहा है।

सो उसने एक बड़े से बरतन में पानी भरा और आग के ऊपर उसको उबलने के लिये लटका दिया।

धीरे-धीरे भेड़िया चिमनी में नीचे उतरा और फिर वहाँ से उस जगह कूदा जहाँ उसने सोचा कि मरीटा बैठी होगी।

पर यह क्या? वह तो मरीटा के ऊपर नहीं बल्कि उबलते पानी के बरतन के ऊपर गिर गया था। वह वहीं उस उबलते पानी में जल कर मर गया।

इस तरह से चालाक मरीटा अपने आपको दुश्मन से बचा पायी और फिर सारी ज़िन्दगी शान्ति से रही।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया व इटली की बहुत सी अन्य लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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