मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–4 : 10 उत्तरी हवा की भेंट // सुषमा गुप्ता

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10 उत्तरी हवा की भेंट[1]

एक बार जैपोन[2] नाम का एक किसान एक प्रायर[3] के खेत पर रहता था और वह खेत एक पहाड़ी के ऊपर था। वहाँ उत्तरी हवा[4] आ कर अक्सर ही उसकी खेती खराब कर जाया करती थी।

एक दिन उसने निश्चय किया कि मैं इस हवा की खोज में जाऊँगा जो मेरा इतना नुकसान करती है। उसने अपनी पत्नी और अपने बच्चों से विदा कहा और पहाड़ों की तरफ चल दिया।

जब वह जिनव्रीनो किले[5] के पास पहुँचा तो उसने उस किले का दरवाजा खटखटाया। उत्तरी हवा की पत्नी ने खिड़की से झॉका और वहीं से पूछा — “दरवाजे पर कौन है?”

किसान जैपोन बोला — “मैं हूँ जैपोन। क्या आपके पति अन्दर हैं?”

पत्नी बोली — “अभी तो वह बाहर गये हैं, समुद्र्र के किनारे लगे पेड़ों के बीच में बहने के लिये, पर जल्दी ही वापस आ जायेंगे। तुम अन्दर आ कर उनका इन्तजार कर सकते हो।”

जैपोन अन्दर चला गया और बैठ कर उत्तरी हवा का इन्तजार करने लगा। करीब एक घंटे बाद उत्तरी हवा लौटा तो जैपोन बोला — “गुड डे उत्तरी हवा।”

“तुम कौन हो?”

“मैं एक किसान हूँ और मेरा नाम जैपोन है।”

“तुम्हें क्या चाहिये?”

किसान बोला — “आप अच्छी तरह जानते हैं कि आप हर साल मेरी उपज खराब कर देते हैं। और केवल आप ही की वजह से मैं और मेरा परिवार भूखा मरता है।”

उत्तरी हवा ने पूछा — “तो फिर अब तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

किसान बोला — “मैं आपके दिये हुए अपने उन सब दुखों के बदले में कुछ चाहता हूँ।”

उत्तरी हवा ने उससे पूछा — “बोलो मैं तुमको क्या दूँ?”

किसान बोला — “यह तो मैं आप पर छोड़ता हूँ कि आप मुझे क्या देना चाहते हैं।”

उत्तरी हवा का दिल जैपोन के पास गया और उसने उससे कहा — “लो यह बक्सा लो और जब भी तुमको भूख लगे तो इसको खोलना और जो खाना पीना चाहो वह माँग लेना। वह तुमको मिल जायेगा। पर इस बक्से के बारे में किसी को बताना नहीं नहीं तो तुम इसे खो दोगे और फिर तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।”

जैपोन ने उत्तरी हवा को धन्यवाद दिया और चल दिया। रास्ते में वह एक जंगल से गुजर रहा था तो उसे कुछ भूख लग आयी। उसने बक्सा खोला और कहा — “मुझे शराब चाहिये। डबल रोटी चाहिये और डबल रोटी के साथ कुछ खाने को चाहिये।”

उसने इतना कहा ही था कि बक्से में से एक बहुत ही स्वादिष्ट डबल रोटी, एक बोतल शराब और एक सूअर के माँस का टुकड़ा निकल आया। जैपोन ने जंगल के बीच वह स्वादिष्ट खाना खाया और फिर अपनी यात्रा पर चल दिया।

अपने घर पहुँचने से पहले ही वह अपनी पत्नी और बच्चों से मिला जो अपने घर से चल कर उससे मिलने घर के बाहर चले आये थे। उन्होंने पूछा — “तुम्हारी यात्रा कैसी रही? सब कुछ ठीक रहा न?”

किसान बोला — “हाँ सब कुछ बहुत ही अच्छा रहा।” कह कर वह उन सबको घर के अन्दर ले गया और कहा — “चलो अब तुम सब लोग मेज पर बैठ जाओ अब हम लोग खाना खायेंगे।” सब तुरन्त ही मेज पर बैठ गये।

मेज पर बैठ कर जैपोन ने बक्से को खोला और उससे कहा — “सबके लिये शराब, डबल रोटी और खाने की कई सारी चीजें. दो।”

तुरन्त ही सबके लिये बहुत ही स्वादिष्ट खाना मेज पर लग गया। सबने बहुत दिनों बाद इतना स्वदिष्ट खाना खाया था सो खूब पेट भर कर खाया।

जब खाना खत्म हो गया तो जैपोन ने अपनी पत्नी से कहा — “इस बात को प्रायर से मत कहना कि मैं यह बक्सा ले कर आया हूँ नहीं तो यह बक्सा उसको भी चाहियेगा और वह मुझसे इसे ले जायेगा।”

पत्नी बोली — “ओह मैं तो उससे यह बात सपने में भी कहने की नहीं सोचूँगी।”

यात्रा के बाद जब जैपौन घर आ गया तो प्रायर ने जैपोन की पत्नी को बुलाया और उससे पूछा — “तुम्हारा पति कहीं बाहर गया था न? वापस आ गया? कैसी रही उसकी यात्रा?”

पत्नी ने कहा — “ठीक रही।”

प्रायर बोला — “मुझे यह सुन कर खुशी हुई। क्या वह कोई ऐसी चीज़ ले कर आया है जो बताने लायक हो?”

इस तरह वह जैपोन की पत्नी से एक सवाल से दूसरा सवाल निकाल निकाल कर पूछता रहा और इससे पहले कि जैपोन की पत्नी यह जानती कि वह क्या उसको क्या कह रही है उसने उसको उस जादुई बक्से के बारे में सब कुछ बता दिया।

यह सुन कर प्रायर ने जैपोन को तुरन्त ही बुला भेजा और बोला — “जैपोन, मेरे अच्छे दोस्त, मैंने सुना है कि तुम्हारे पास एक बहुत ही अच्छा बक्सा है। क्या मैं उसे देख सकता हूँ?”

जैपोन ने एक बार तो सोचा कि वह उस सारी कहानी को झूठ कह दे पर क्योंकि उसकी पत्नी ने इस बात को उससे कहा था इसलिये वह अब यह नहीं कर सकता था सिवाय इसके कि वह प्रायर को वह बक्सा दिखाता और बताता कि वह कैसे काम करता है।

“हाँ हाँ क्यों नहीं।” वह घर आया और अपना बक्सा प्रायर के पास ले जा कर उसे दिखाया। देखते ही प्रायर बोला — “जैपोन, यह बक्सा तो तुम्हें मुझे देना पड़ेगा। इसे तुम मुझे दे दो।”

जैपोन बोला — “अगर यह बक्सा मैं तुमको दे दूँगा तो फिर मैं क्या करूँगा। मैं खाना कहाँ से खाऊँगा। तुमको तो मालूम है कि मेरी सारी उपज खराब हो गयी है और अब मेरे पास खाने के लिये कुछ भी नहीं है।”

प्रायर बोला — “अगर यह बक्सा तुम मुझे दे दो तो मैं तुमको जितना अन्न तुम चाहोगे उतना अन्न दे दूँगा, जितनी शराब तुम चाहोगे उतनी शराब मैं तुमको दे दूँगा। इसके अलावा और भी जो कुछ तुम चाहोगे वह सब मैं तुमको दे दूँगा। पर यह बक्सा तुम मुझे दे दो।”

जैपोन के पास उस बक्से को प्रायर को देने के अलावा और कोई चारा नहीं था सो उसने वह बक्सा प्रायर को दे दिया और बदले म्ंों उसको क्या मिला?

प्रायर ने उसको कुछ बोरे अनाज के दिये, और बस। जैपोन फिर से अपनी बुरी हालत में वापस आ गया था और यह सब उसकी पत्नी वजह से हुआ था।

उसने अपनी पत्नी से कहा — “तुम्हारी वजह से मैंने अपना बक्सा खोया। उत्तरी हवा ने मुझसे कहा था कि तुम इसके बारे में किसी से कहना नहीं और मैंने उसका कहा नहीं माना तो अब मैं उसके वापस जाने की हिम्मत भी कैसे कर सकता हूँ।”

पर मरता क्या न करता। उसने हिम्मत बटोरी और एक बार फिर से उत्तरी हवा के किले की तरफ चल दिया। वहाँ पहुँच कर उसने एक बार फिर उत्तरी हवा के किले का दरवाजा खटखटाया।

उत्तरी हवा की पत्नी ने खिड़की से बाहर झॉका और पूछा — “बाहर कौन है?”

“मैं हूँ जैपोन।”

तभी उत्तरी हवा ने बाहर देखा और पूछा — “जैपोन, अरे अभी कुछ दिन पहले ही तो तुम यहाँ आये थे और मुझसे एक बक्सा ले गये थे। अब तुम्हें क्या चाहिये?”

जैपोन बोला — “ओह तो क्या आपको याद है कि मैं आपसे एक बक्सा ले गया था? वह बक्सा मेरे मालिक ने मुझसे ले लिया और फिर वापस नहीं दिया। मैं तो फिर से गरीब और भूखा रह गया।”

उत्तरी हवा बोला — “मैंने तुमसे कहा था न कि इसके बारे में तुम किसी को बताना नहीं इसलिये अब तुम यहाँ से चले जाओ। अब मैं तुमको कुछ और नहीं देने वाला।”

किसान गिड़गिड़ाया — “जनाब केवल आप ही तो मेरे नुकसान को पूरा कर सकते हैं। मुझ पर मेहरबानी कीजिये।”

सो दोबारा उत्तरी हवा का दिल जैपोन के पास गया और उसने एक सोने का बक्सा निकाल कर उसको देते हुए कहा — “इस बक्से को तब तक मत खोलना जब तक तुम भूख से बिल्कुल परेशान न हो जाओ नहीं तो यह तुम्हारी बात नहीं मानेगा।”

जैपोन ने उत्तरी हवा को धन्यवाद दिया और अपने घर की तरफ चल दिया। इस बार वह घाटी की तरफ से आया। जल्दी ही उसे भूख लग आयी। उसने वह सोने का बक्सा खोला और बोला — “मुझे दो।”

तुरन्त ही बक्से में से एक बड़े साइज़ का आदमी[6] निकल पड़ा। उसके हाथ में एक बड़ा सा डंडा था। निकलते ही उसने जैपोन को उस डंडे से पीटना शुरू कर दिया।

जितनी जल्दी जैपोन वह बक्सा बन्द कर सका उसने वह बक्सा बन्द कर दिया और फिर अपने घर की तरफ चल दिया। यह मार खा कर उसका सारा शरीर अकड़ रहा था और दर्द कर रहा था। वह काफी घायल भी हो गया था।

पहले की तरह से उसकी पत्नी और बच्चे उसको लेने के लिये घर के बाहर तक आये और उससे पूछा कि उसका सफर कैसा रहा।

उसने कहा — “ठीक रहा। अब की बार मैं पहले बक्से से भी ज़्यादा अच्छा बक्सा ले कर आया हूँ।”

घर में अन्दर जा कर उसने उन सबको मेज के चारों तरफ बिठाया और वह सोने का बक्सा खोला। इस बार केवल एक नहीं बल्कि दो दो बड़े आदमी डंडा लिये निकले और उसके परिवार को मारने लगे।

उसकी पत्नी और बच्चे तो डंडे की मार खा कर बेचारे चीखने लगे पर वे आदमी रुके ही नहीं जब तक उस किसान ने वह बक्सा बन्द नहीं कर दिया।

फिर वह अपनी पत्नी से बोला — “अब तुम प्रायर के पास जाओ और उसे बताना कि मैं इस बार पहले से भी ज़्यादा अच्छा बक्सा ले कर आया हूँ।”

अगले दिन जैपोन की पत्नी प्रायर के पास गयी तो प्रायर ने अपना हर बार वाला सवाल पूछा — “सो जैपोन अपनी यात्रा से वापस आ गया। इस बार वह क्या ले कर आया है?”

जैपोन की पत्नी बोली — “इस बार तो वह पहले से भी बहुत बढ़िया बक्सा ले कर आया है प्रायर जी। वह ठोस सोने का बना है और जो खाना वह देता है वह तो लोग बस सपने में ही सोच सकते हैं। पर जैपोन बोलता है कि कुछ भी हो जाये अब की बार वह इस बक्से को किसी को नहीं देगा।”

यह सुन कर प्रायर की उस बक्से को लेने की इच्छा बहुत ज़ोर पकड़ गयी और उसने जैपोन को बुला बेजा।

जब जैपोन प्रायर के पास पहुँचा तो प्रायर बड़ी नरमी से बोला — “जैपोन तुम नहीं जानते कि तुम्हारे आने से मैं कितना खुश हूँ। और वह भी जब जबकि तुम पहले वाले बक्से से भी बढ़िया बक्से के साथ वापस आये हो। इसे कम से कम मुझे दिखाओ तो।”

जैपोन मुस्कुराता हुआ बोला — “मैं ऐसा कर तो सकता हूँ पर फिर तुम उसको भी मुझसे ले लोगे।”

प्रायर उसको कुछ विश्वास दिलाता हुआ बोला — “नहीं नहीं, मैं वायदा करता हूँ कि मैं उसको तुमसे बिल्कुल नहीं लूँगा।”

जैपोन ने उस चमकते हुए सोने के बक्से का एक कोना ही दिखाया। तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं कर सका कि वह बक्सा इतना सुन्दर हो सकता था। उसका मन उस बक्से को लेने के लिये लालायित हो उठा।

उसने जैपोन से तुरन्त ही कहा — “जैपोन, इसको तुम मुझे दे दो और मैं तुमको तुम्हारा पुराना वाला बक्सा अभी ला कर दे देता हूँ।

तुम इस सोने के बक्से का क्या करोगे। इसको तुम मुझे दे दो और मैं तुमको वह तुम्हारा पुराना वाला बक्सा वापस दे देता हूँ। और इसके बदले में और भी जो कुछ तुम चाहो वह मैं तुमको सब दे दूँगा।”

जैपोन ने कुछ अविश्वास दिखाते हुए उससे पूछा — “क्या तुम ठीक कह रहे हो?”

प्रायर बोला — “हाँ हाँ मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ।” कह कर वह उसका पुराना वाला बक्सा अन्दर से निकाल लाया और उसको जैपोन को दे दिया।

जैपोन ने अपना पुराना वाला बक्सा उससे ले लिया और नया सोने का बक्सा उसको देते हुए बोला — “प्रायर, इस बक्से को खोलने से पहले तुम ज़रा सावधान रहना। जब तक तुमको बहुत अच्छी तरह से भूख न हो इस बक्से को मत खोलना।”

प्रायर बोला — “यह बक्सा तो मेरे पास बड़े अच्छे समय से आया है। कल मेरे घर बिशप[7] आ रहे हैं और उनके साथ में और भी कुछ पादरी आ रहे हैं। मैं उनको दोपहर तक भूखा रखूँगा और फिर बक्सा खोल कर बहुत अच्छा खाना खिलाऊँगा।”

सो जैपोन अपना वह नया बक्सा प्रायर को दे कर अपना पुराना बक्सा उससे वापस ले कर खुशी खुशी अपने घर वापस चला गया।

अगली सुबह अपनी मास[8] कहने के बाद सारे पादरी प्रायर की रसोई के चक्कर लगाने लगे। वे आपस में बोले — “इस प्रायर ने आज हमको सुबह भी नाश्ता नहीं खिलाया और अभी भी इसकी रसोई में आग नही जल रही है।”

पर जो प्रायर को जानते थे वे बोले — “ज़रा इन्तजार करो। खाने के समय यह अपना बक्सा खोलेगा और हमको इतना बढ़िया खाना खिलायेगा जैसा कि तुम लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा।”

दोपहर को प्रायर और सारे पादरी मेज के चारों तरफ बैठे। मेज के बीच में सोने का बक्सा चमक रहा था। सबकी आँखें उस बक्से पर ही लगी थीं।

खाने का समय आने पर प्रायर ने अपना वह सोने का बक्सा खोला तो इस बार उसमें खाने की बजाय छह बड़े बड़े आदमी डंडे ले कर बाहर आ गये और उन पादरियों को पीटने लगे।

इससे प्रायर के हाथ से वह बक्सा छूट गया और वह बक्सा खुला का खुला ही नीचे फर्श पर गिर पड़ा और वे छह आदमी वहाँ बैठे सब आदमियों को मारते रहे।

इत्तफाक से जैपोन वहीं पास में ही छिपा खड़ा था। उसने वह खुला हुआ बक्सा नीचे पड़ा देख लिया तो उसको उठा कर बन्द कर दिया नहीं तो वे लोग तो वहाँ बैठे सारे लोगों को मार ही डालते। बक्सा बन्द होते ही वे छहों बड़े लोग भी गायब हो गये।

इस तरह बिशप और पादरियों को यह खाना मिला और शाम को वे अपने चर्च का काम भी नहीं कर सके।

जैपोन ने अपने दोनों बक्से अपने पास रख लिये और फिर उनको किसी को नहीं दिया। प्रायर ने भी उसके बाद जैपोन से कुछ नहीं माँगा। उसके बाद से वे सब आराम की जिन्दगी बिताने लगे।


[1] The North Wind’s Gifts (Story No 83) – a folktale from Mugello area, Italy.

Adapted from the book: “Italian Folktales”, by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Jeppone is the name of the peasant

[3] A title given to a Monastic Superior in a Monastery

[4] Northern Winds are normally are very cold and spoil the harvests.

[5] Ginevrino Castle where North Wind lived.

[6] Translated for the word “Giant”

[7] Bishop is a higher rank man in Church, “Paadaree” has been translated for the word priests.

[8] Mass is Christians’ special worship

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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