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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–4 : 3 जादुई महल // सुषमा गुप्ता

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3 जादुई महल [1] एक बार एक राजा था जिसके एक बेटा था जिसका नाम था फ़िओरडीनैन्डो [2] । वह हमेशा पढ़ता ही रहता था। वह हमेशा अपने कमरे में बन्द रहत...

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3 जादुई महल[1]

एक बार एक राजा था जिसके एक बेटा था जिसका नाम था फ़िओरडीनैन्डो[2]। वह हमेशा पढ़ता ही रहता था। वह हमेशा अपने कमरे में बन्द रहता और बस पढ़ता ही रहता।

कभी-कभी वह अपनी किताब बन्द कर देता और खिड़की में से बाहर बागीचे की तरफ और उसके आगे जंगल की तरफ भी देख लेता पर फिर अपना पढ़ना शुरू कर देता।

वह अपने कमरे में से कभी बाहर ही नहीं निकलता सिवाय दोपहर और शाम का खाना खाने के। हाँ कभी-कभी वह बागीचे में टहलने के लिये निकल जाता था।

एक दिन राजा का एक शिकारी जो एक बहुत ही अच्छा नौजवान था और बचपन में राजकुमार के साथ खेला भी था राजा से बोला — “राजा साहब, क्या मैं फ़िओरडीनैन्डो से बात कर सकता हूँ? मैंने उसे बहुत दिनों से नहीं देखा है।”

राजा बोला — “हाँ हाँ क्यों नहीं। हो सकता है कि तुम्हारा उससे मिलना मेरे बेटे का मन बदल दे।”

सो वह शिकारी फ़िओरडीनैन्डो के कमरे में घुसा। राजकुमार ने उसको देखा तो पूछा — “अरे, ये कील लगे बूट पहन कर तुम यहाँ कैसे आये?”

शिकारी कई तरीके के शिकारों को समझाता हुआ बोला — “मैं तो राजा का शिकारी हूँ।” फिर उसने उसको पक्षियों के और खरगोशों के तरीके बताये और जंगलों के कई हिस्सों के हाल भी सुनाये।

फ़िओरडीनैन्डो की सोच जाग गयी। वह उससे बोला — “सुनो, मैं भी शिकार में अपनी किस्मत आजमाना चाहता हूँ। पर मेरे पिता जी को यह बात अभी नहीं बताना वरना वह यह सोचेंगे कि यह तुम्हारा विचार है। मैं बस किसी सुबह उनसे तुम्हारे साथ जाने की इजाज़त माँग लूँगा।”

वह शिकारी बोला — “जैसी तुम्हारी इच्छा।”

अगले दिन नाश्ते के समय फ़िओरडीनैन्डो ने राजा से कहा — “पिता जी, कल मैंने शिकार के ऊपर एक किताब पढ़ी जो मुझे इतनी मजेदार लगी कि मुझे शिकार पर जाने की और अपनी किस्मत वहाँ आजमाने की बड़ी इच्छा हो रही है। क्या मैं शिकार पर जा सकता हूँ?”

राजा बोला — “बेटे शिकार खेलना उसके लिये एक खतरे वाला खेल है जो उसमें नया हो। पर तुमको मैं उस काम से रोकूँगा नहीं जिसको तुम करना चाहते हो।

साथ के लिये तुम मेरा शिकारी ले जा सकते हो जो किसी शिकारी कुत्ते से कम नहीं है। बस उसको तुम अपनी नजर से दूर मत करना।”

अगली सुबह फ़िओरडीनैन्डो और राजा का शिकारी दोनों अपने-अपने घोड़ों पर सवार हो कर अपनी अपनी बन्दूक ले कर जंगल की तरफ चल दिये।

शिकारी ने हर उस चिड़िया और हर उस खरगोश को मारा जो भी उसको रास्ते में दिखायी दिया। फ़िओरडीनैन्डो ने भी शिकार करने की कोशिश की पर हर शिकार उसके निशाने से बच कर निकल गया।

शाम को शिकारी का थैला तो शिकार से भरा हुआ था पर फ़िओरडीनैन्डो के थैले में एक पंख भी नहीं था।

चलने से पहले फ़िओरडीनैन्डो को एक झाड़ी में एक खरगोश दिखायी दिया सो उसने उसका शिकार करने के लिये अपना निशाना साधा।

पर क्योंकि वह खरगोश बहुत छोटा था फ़िओरडीनैन्डो को लगा कि वह तो उसको केवल भाग कर ही उसको पकड़ लेगा पर जैसे ही वह उस झाड़ी के पास पहुँचा खरगोश वहाँ से भाग लिया और फ़िओरडीनैन्डो भी उसके पीछे-पीछे दौड़ लिया।

जब भी फ़िओरडीनैन्डो को लगता कि वह उसको पकड़ लेगा वह खरगोश उससे आगे निकल जाता। फिर वह आगे जा कर रुक जाता जैसे उसके पास आने का इन्तजार कर रहा हो और फिर फ़िओरडीनैन्डो के पास आते ही वह फिर भाग लेता।

उसका पीछा करते-करते फ़िओरडीनैन्डो शिकारी से इतना दूर निकल आया कि रास्ता भूल गया और वापस नहीं जा सका। उसने शिकारी को बार-बार पुकारा भी पर किसी ने उसको कोई जवाब ही नहीं दिया।

अब तक अंधेरा हो चुका था और खरगोश भी गायब हो गया था। दुखी और थका माँदा फ़िओरडीनैन्डो एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिये बैठ गया। उसको वहाँ बैठे देर नहीं हुई थी कि उसने पेड़ों के बीच से एक रोशनी चमकती देखी।

उसको देख कर वह उठ गया और पेड़ों के नीचे-नीचे हो कर उस रोशनी की तरफ जाने लगा। चलते-चलते वह एक साफ मैदान में आ गया जहाँ एक बहुत सुन्दर सजा हुआ महल खड़ा था।

उसका सामने का दरवाजा खुला हुआ था सो फ़िओरडीनैन्डो ने उसमें से पुकारा — “हलो, अन्दर कोई है?” पर वहाँ से भी किसी की आवाज नहीं आयी – यहाँ तक कि उसकी अपनी आवाज भी नहीं गूँजी।

वह उस महल के अन्दर घुस गया तो एक बड़े कमरे में पहुँचा। वहाँ आग जलाने की जगह आग जल रही थी और उसके पास ही शराब और गिलास रखे हुए थे। फ़िओरडीनैन्डो वहीं पास पड़ी एक कुरसी पर सुस्ताने के लिये बैठ गया। थकान मिटाने के लिये उसने वहाँ रखी थोड़ी सी शराब पी।

शराब पीने के बाद वह उठा और महल के दूसरे कमरे में पहुँचा तो वहाँ दो आदमियों के लिये खाने की मेज सजी रखी थी। प्लेट, चम्मच, छुरी, कॉटे सब सोने और चॉदी के थे।

उस कमरे के परदे, मेजपोश, नैपकिन्स सब मोती और हीरे से कढ़ी हुई सिल्क के थे। छत से लटके झाड़फानूस आदि सब ठोस सोने के थे और बड़ी-बड़ी टोकरियों के साइज़ के थे।

क्योंकि वहाँ कोई था नहीं और फ़िओरडीनैन्डो भूखा था सो वह खाना खाने के लिये उस मेज पर बैठ गया।

उसने अभी अपना पहला कौर तोड़ कर मुँह में रखा ही था कि उसको सीढ़ियों से नीचे आती कपड़ों की सरसराहट सुनायी दी। उसने घूम कर उधर देखा तो उसको एक रानी वहाँ अपनी 12 दासियों के साथ आती दिखायी दी।

रानी जवान थी और बहुत ही सुन्दर थी पर उसका चेहरा एक भारी से परदे के पीछे छिपा हुआ था। वह भी उसी मेज पर आ कर खाना खाने बैठ गयी। सारे खाने के बीच न तो रानी बोली और न ही उसकी एक भी दासी बोली।

वह फ़िओरडीनैन्डो के सामने मेज के दूसरी तरफ बैठी हुई थी। उसकी दासियों ने उसको उसका खाना परोसा और उसकी शराब उसके गिलास में डाली।

इस तरह सारा खाना शान्ति में खाया गया। रानी अपना खाना अपने मुँह तक उस परदे के पीछे ले जा कर ही खाती रही।

जब रानी ने खाना खत्म कर लिया तो वह उठी और उसकी दासियाँ वापस उसको सीढ़ियों से ऊपर ले गयीं। फ़िओरडीनैन्डो भी मेज से उठ गया और उसने फिर महल देखना शुरू किया।

अब वह एक बड़े सोने वाले कमरे में आ गया था जहाँ रात को सोने के लिये एक पलंग बिछा हुआ था। वहाँ उसने अपने कपड़े उतारे और चादर में घुस गया।

उस पलंग की छत के पीछे एक छिपा दरवाजा था। उसने देखा कि उस छिपे दरवाजे में से रानी उस कमरे में आयी। वह अभी भी चुप थी, उसके चेहरे पर अभी भी परदा पड़ा हुआ था और उसके पीछे अभी भी उसकी 12 दासियाँ चल रही थीं।

फ़िओरडीनैन्डो यह सब देख रहा था। उसकी दासियों ने सिवाय उसके चेहरे के परदे के उसके सारे कपड़े उतारे और उसको फ़िओरडीनैन्डो के बराबर में पलंग पर लिटा दिया। फिर वे चली गयीं।

फ़िओरडीनैन्डो को यकीन था कि वह रानी या तो कुछ बोलेगी या फिर अपना परदा हटायेगी। पर वह न तो कुछ बोली और न ही उसने अपना परदा हटाया और वह तुरन्त ही सो भी गयी।

उसकी आती जाती सॉसों से उसका परदा हिल रहा था। फ़िओरडीनैन्डो कुछ पल तो कुछ सोचता रहा फिर सो गया।

सुबह को रानी की दासियाँ फिर वहाँ आयीं, उन्होंने रानी को कपड़े पहनाये और वहाँ से ले गयीं।

फ़िओरडीनैन्डो भी उठ गया। नाश्ता मेज पर लगा हुआ था सो उसने जी भर कर नाश्ता किया और फिर नीचे घुड़साल में चला गया। वहाँ उसका घोड़ा घास खा रहा था। वह उस पर चढ़ा और जंगल की तरफ दौड़ गया।

सारा दिन वह जंगल में सड़क ढूँढता रहा जो उसको उसके घर तक पहुँचा देती। वह अपने साथी को भी ढूँढता रहा कि उसका कोई पता मिल जाता पर ऐसा लगता था कि वह तो दोबारा खो गया था।

और जब रात हुई तो उसी एक साफ जगह में वही महल फिर से खड़ा हुआ था। वह फिर उसके अन्दर चला गया और फिर एक बार उसके साथ वही सब हुआ जो पहले दिन हुआ था।

पर अगले दिन जब वह जंगल में अपने घोड़े पर सवार हो कर जा रहा था तो उसको अपना शिकारी साथी मिल गया। उसने फ़िओरडीनैन्डो को बताया कि वह उसको तीन दिन से ढूँढ रहा था। फिर वे दोनों साथ साथ घर लौट आये।

जब शिकारी ने उससे उसके उन तीन दिनों के बारे में पूछा जिनमें वह गायब था तो उसने अपनी मुसीबतों की कुछ-कुछ कहानी बना कर उसको बता दी पर सचमुच में उसके साथ क्या हुआ था यह नहीं बताया।

महल वापस आ कर तो फ़िओरडीनैन्डो बिल्कुल ही बदला हुआ आदमी हो गया था। अब वह पढ़ता नहीं था बल्कि अब उसकी आँखें अपनी किताबों के पन्नों पर से हट कर बागीचे के उस पार जंगल की तरफ देखती रहतीं।

यह सब देख कर उसकी माँ ने एक दिन उससे पूछा कि वह क्या सोच रहा है। पहले तो फ़िओरडीनैन्डो ने उसे कुछ बताया नहीं पर वह भी उसके पीछे पड़ी रही। तब कहीं जा कर उसने उसे बताया कि जंगल में उसके साथ क्या हुआ था।

उस समय उसने अपनी माँ से यह भी नहीं छिपाया कि वह उस रानी से प्यार करने लगा था। पर वह अब उससे शादी कैसे करे जब कि उसने न तो उसे अपना चेहरा ही दिखाया था और न ही वह कुछ बोली थी।

उसकी माँ बोली — “बेटा, मैं बताती हूँ कि तुम क्या करो। तुम एक बार उसके साथ खाना और खाओ। जब तुम दोनों वहाँ बैठ जाओ तो उसका कांटा ऐसे नीचे गिरा दो जैसे तुमने उसका वह कांटा गलती से गिरा दिया हो।

जब वह उसको उठाने के लिये नीचे झुके तो उसका परदा चेहरे से खींच दो। इस मौके पर वह तुमसे जरूर ही कुछ कहेगी।”

यह सुनते ही बस उसने तुरन्त ही अपने घोड़े पर जीन कसी और जंगल की तरफ चल दिया और उसी खुली जगह पहुँच गया। वहाँ वह महल अभी भी खड़ा हुआ था। जब वह वहाँ पहुँचा तो उसका वहाँ पहले की तरह से स्वागत हुआ।

जब शाम को रानी खाना खाने आयी तो उसने रानी का कांटा अपनी कोहनी मार कर नीचे गिरा दिया। वह उसको नीचे से उठाने के लिये झुकी तो उसने उसका परदा खोल दिया।

इस पर वह चांद की किरन जैसी सुन्दर और सूरज की आग जैसी तपती हुई रानी उठी और चिल्लायी — “ओ बुरा बरताव करने वाले नौजवान, तुमने मुझे धोखा दिया है।

अगर मैं तुम्हारे पास बिना बोले और बिना अपना परदा हटाये एक रात और सो जाती तो मैं अपने ऊपर पड़े हुए जादू से आजाद हो जाती और तुम मेरे पति हो जाते।

पर अब मुझे एक हफ्ते के लिये पैरिस[3] जाना पड़ेगा और फिर वहाँ से पीटरबोरो[4]

पीटरबोरो में मैं एक टूर्नामैन्ट[5] में इनाम की तरह से दी जाऊँगी। और फिर तो भगवान ही जानता है कि कौन मुझे जीतेगा। अच्छा, विदा। और ध्यान रखना कि मैं पुर्तगाल की रानी हूँ।”

यह कहते के साथ ही वह खुद भी गायब हो गयी और उसके साथ ही उसका वह महल भी गायब हो गया। फ़िओरडीनैन्डो अब घने जंगल में अकेला खड़ा था। यहाँ से घर का रास्ता मालूम करना उसके लिये आसान काम नहीं था।

पर किसी तरह से जब वह अपने घर पहुँच गया तो उसने अपना बटुआ पैसों से भरा, अपने शिकारी साथी को बुलाया और घोड़े पर सवार हो कर उसके साथ पैरिस चल दिया।

वे तब तक अपने घोड़ों पर से नहीं उतरे जब तक पैरिस में किसी सराय में नहीं पहुँच गये। कुछ देर आराम करने के बाद वह यह जानना चाहता था कि वह पुर्तगाल की रानी वाकई में वहाँ थी भी या नहीं।

वह उस सराय के मालिक के पास पहुँचा और उससे पूछा कि शहर की क्या खबर थी। सराय का मालिक बोला — “कोई खास तो नहीं। तुम किस तरह की खबर की आशा कर रहे हो?”

“किसी भी तरह की खबर, लड़ाई की खबर, दावत के दिनों की खबर, किसी खास आदमी के शहर में आने की खबर।”

सराय का मालिक बोला — “ओह, अब याद आया एक मजेदार खबर है। पांच दिन पहले पुर्तगाल की रानी यहाँ आयी है और तीन दिन में वह यहाँ से पीटरबोरो चली जायेगी।

वह बहुत ही सुन्दर स्त्री है और पढ़ी लिखी भी बहुत है। उसको नयी-नयी जगह जाना अच्छा लगता है और शहर के दरवाजे के बाहर हर शाम को अपनी 12 दासियों के साथ घूमना बहुत अच्छा लगता है।”

फ़िओरडीनैन्डो ने पूछा — “क्या मैं उसको देख सकता हूँ?”

“हाँ हाँ, क्यों नहीं? जब वह खुले में घूमती है तो कोई भी आने जाने वाला उसको देख सकता है।”

“बहुत बढ़िया। ऐसा करो, तो तब तक तुम हमें खाना खिला दो फिर हम उसको देखने जायेंगे। और हाँ लाल शराब[6] भी साथ में ले आना।”

उस सराय के मालिक की एक बेटी थी जो अब तक अपनी शादी के लिये आने वाले सब उम्मीदवारों को मना कर चुकी थी क्योंकि कोई उसको अच्छा ही नहीं लगा था।

पर जैसे ही उसने फ़िओरडीनैन्डो को घोड़े से उतरते देखा उसने अपने आपसे कहा कि “यही है वह नौजवान जिससे मैं शादी करूँगी।”

वह तुरन्त अपने पिता के पास यह कहने के लिये गयी कि वह उस लड़के से प्यार करने लगी है जो अभी अभी उनकी सराय में आया है और यह पूछने गयी कि वह कैसे उस नौजवान से शादी कर सकती है।

यह सुन कर उस सराय के मालिक ने फ़िओरडीनैन्डो से कहा — “मुझे आशा है कि पेरिस तुमको पसन्द आयेगा और यह भी हो सकता है कि तुमको यहाँ किस्मत से अपनी होने वाली पत्नी भी मिल जाये।”

फ़िओरडीनैन्डो बोला — “मेरी पत्नी तो दुनिया की सबसे सुन्दर रानी है और मैं सारी दुनिया तक उसका पीछा करता रहूँगा।”

सराय के मालिक की बेटी को जो यह सब छिप कर सुन रही थी गुस्सा आ गया। सो जब उसके पिता ने उसको तहखाने से लाल शराब लाने के लिये भेजा तो उसने उस शराब की बोतल में एक मुठ्ठी अफीम डाल दी।

खाना खा कर फिओरडीनैन्डो और उसका शिकारी साथी पुर्तगाल की रानी का इन्तजार करने शहर के दरवाजे के बाहर चल गये पर अचानक ही उन दोनों को बेहोशी सी आने लगी और वे जमीन पर गिर पड़े। और उनकी आँख लग गयी।

कुछ ही देर में रानी उधर आयी तो उसने फ़िओरडीनैन्डो को पहचान लिया। वह उसके ऊपर झुकी और उसका नाम ले कर पुकारा। उसने उसके ऊपर हाथ फेरा, हिलाया डुलाया, इधर उधर लुढ़काया पर वह नहीं जागा। तो उसने एक हीरे की अंगूठी अपनी उंगली से निकाल कर उसकी भौंह पर रख दी।

अब हुआ यह कि पास ही एक गुफा में एक साधु रहता था। उसने एक पेड़ के पीछे से यह सब देखा। जब रानी चली गयी तो वह दबे पांव वहाँ तक गया और फ़िओरडीनैन्डो की भौंह पर से वह हीरे की अंगूठी उठा ली और उसको ले कर अपनी गुफा में वापस चला गया।

जब फ़िओरडीनैन्डो की आँख खुली तो अंधेरा हो चुका था। उसको यह सोचने में कुछ देर लग गयी कि वह कहाँ था। फिर उसने अपने शिकारी साथी को हिला-हिला कर जगाया।

दोनों ने उस लाल शराब को यह कह कर कोसा कि वह कितनी तेज़ थी और इस बात पर दुखी भी हुए कि वे रानी से नहीं मिल सके।

अगले दिन उन्होंने सराय के मालिक से कहा — “आज हमें सफेद शराब[7] देना और देखना कि वह बहुत तेज़ न हो।”

सराय के मालिक की बेटी ने उस दिन उस शराब में भी कुछ मिला दिया और वे दोनों फिर से घास के मैदान में जा कर खर्राटे भरने लगे।

पुर्तगाल की रानी ने उसे फिर से जगाने की कोशिश की पर उस दिन भी वह जब उसे न जगा सकी तो उसने अपने बालों का एक गुच्छा उसकी भौंह पर रख दिया और वहाँ से चली गयी।

साधु फिर अपनी गुफा से बाहर निकला और बालों का वह गुच्छा उठाया और अपनी गुफा में चला गया।

जब फ़िओरडीनैन्डो और शिकारी जागे तो आधी रात हो चुकी थी और उनको इस बात का पता ही नहीं चला कि वहाँ क्या हुआ था। अब फ़िओरडीनैन्डो को इस गहरी नींद के बारे में कुछ शक हो गया कि हर शाम को वह क्यों सो जाता था।

आज रानी का पैरिस में आखिरी दिन था। कल वह पीटरबोरो चली जायेगी। उसके वहाँ जाने से पहले वह उससे किसी भी कीमत पर मिलना चाहता था।

सो आज उसने सराय के मालिक को कहा कि आज उसको शराब नहीं चाहिये वह उनको केवल खाना ही खिला दे। सो उस दिन सराय के मालिक की बेटी ने उनके सूप में कुछ मिला दिया।

जब वह खाना खा पी कर घास के मैदान में पहुँचा तभी से वह कुछ नींद सी महसूस कर रहा था।

उसने दो पिस्तौल निकालीं और शिकारी साथी को दिखायीं और बोला — “मुझे मालूम है कि तुम वफादार हो पर फिर भी मैं तुमको चेतावनी देता हूँ कि अगर आज तुम जगे नहीं रह सके और मुझे जगा कर नहीं रख सके तो बस तुम समझ लेना। मैं इन दोनों पिस्तौलों की सारी गोलियाँ तुम्हारे भेजे में उतार दूँगा।”

और उसके बाद फ़िओरडीनैन्डो लेट गया और खर्राटे भरने लगा। जागे रहने के लिये शिकारी बार-बार अपने को नोचने लगा पर एक बार के और दूसरी बार के नोचने के बीच में उसकी भी आँख झपक जाती।

धीरे-धीरे उसका नोचना भी बहुत धीमा होता गया और वह भी खर्राटे भरने लगा।

रानी वहाँ फिर आयी। वह फिर रोयी, उसने उसको अपने गले से लगाया, उसके चेहरे पर मारा, उसको चूमा, उसको हिलाया पर उसकी कितनी कोशिशों के बाद भी वह नहीं जागा।

जब वह उसको नहीं जगा पायी तो वह इतनी ज़ोर से रोने लगी कि आँसुओं की बजाय उसके गालों पर उसके खून की एक दो बूँद झलक आयीं।

उसने अपने रूमाल से अपना खून पोंछा और उसे फ़िओरडीनैन्डो के चेहरे पर रख दिया। फिर वह अपनी गाड़ी में बैठी और वहाँ से सीधी पीटरबोरो चली गयी।

हर बार की तरह से इस बार भी वह साधु अपनी गुफा से निकल कर आया, वह रूमाल उठाया और वहीं यह देखने के लिये खड़ा रहा कि देखूँ अब क्या होता है।

जब फ़िओरडीनैन्डो जागा तो आधी रात हो चुकी थी। सो उसने देखा कि रानी से मिलने का आज का आखिरी मौका भी उसके हाथ से निकल गया था।

उसने अपनी दोनों पिस्तौलें उठायीं और अपना कहा पूरा करने के लिये कि वह उन दोनों पिस्तौलों की सारी गोलियाँ उस शिकारी के सिर में उतार देगा उनका घोड़ा[8] खींचा ही था कि उस साधु ने उसका हाथ पकड़ लिया।

साधु बोला — “यह बेचारा तो बहुत ही मासूम है तुम इसको क्यों मारते हो। जुर्म तो सराय के मालिक की बेटी ने किया है। उसी ने तुम्हारी लाल शराब में, सफेद शराब में और सूप में नशे की दवा मिलायी।”

फ़िओरडीनैन्डो ने पूछा — “मगर वह ऐसा करेगी ही क्यों? और आप उसके बारे में इतना सब कैसे जानते हैं?”

“क्योंकि वह तुमसे प्यार करती है। उसी ने तुमको अफीम दी थी। मैं सब जानता हूँ। मैं पेड़ के पीछे से वह सब देखता रहा हूँ जो यहाँ होता रहा है। रानी भी यहाँ पिछले तीन दिन से आ रही थी और तुमको जगाने की कोशिश करती रही थी।

एक बार उसने अपनी हीरे की अंगूठी तुम्हारी भौंह पर रखी, दूसरी बार उसने अपने बालों का गुच्छा रखा और तीसरी बार खून के आँसू वाला रूमाल रखा।”

“तो वे सब चीज़ें अब कहाँ हैं?”

“वे सब चीजें मेरे पास हैं। मैंने उनको संभाल कर रख लिया है। यहाँ पर बहुत सारे चोर घूमते हैं वे उनको चुरा सकते थे। लो ये लो संभालो उनको। क्योंकि तुमने तरीके से काम किया इसलिये वे तुम्हारे लिये अच्छे साबित होंगे।”

“अब मैं क्या करूँ?”

साधु बोला — “पुर्तगाल की रानी पीटरबोरो चली गयी है जहाँ वह एक टूर्नामैन्ट में इनाम में दी जायेगी।

clip_image003एक नाइट[9] जो इस अंगूठी से, बालों के गुच्छे से और इस रूमाल से दूसरे नाइट को उसके घोड़े से उतारेगा वह जीत जायेगा और इस तरह उस रानी को जीत लेगा और उससे शादी कर लेगा।”

फ़िओरडीनैन्डो को दोबारा बताने की जरूरत नहीं थी। उसने रानी की वे तीनों चीजें उस साधु से ले लीं और पीटरबोरो की तरफ भाग लिया। वह वहाँ समय से पहुँच गया जहाँ वह उन नाइट्स के टूर्नामैन्ट में हिस्सा ले सका, पर किसी दूसरे नाम से।

सारी दुनिया से बहुत अच्छे-अच्छे खिलाड़ी अपने-अपने सामान, नौकर और हथियारों के साथ आये थे। शहर के बीचोबीच एक जगह बनायी गयी थी जहाँ यह टूर्नामैन्ट होने वाला था।

चारों तरफ देखने वालों के बैठने के लिये जगह बनी हुई थी। सारे नाइट्स रानी की तरफ निगाह लगाये हुए थे।

पहले दिन फ़िओरडीनैन्डो जीत गया। धन्यवाद उस हीरे की अंगूठी को जिसको उसने अपने भाले की नोक पर लगा लिया था।

दूसरे दिन भी फिओरडीनैन्डो जीत गया — बालों के गुच्छे को भाले की नोक पर लगाने की वजह से।

तीसरे दिन भी वह जीत गया भाले पर रूमाल लगाने की वजह से।

सारे नाइट्स अपने-अपने घोड़ों से गिर चुके थे। कोई भी नाइट अपने घोड़े पर नहीं था। और इस तरह फ़िओरडीनैन्डो रानी का पति घोषित कर दिया गया।

इसके बाद फ़िओरडीनैन्डो ने अपना हैलमैट खोला तब रानी जान पायी कि वह फिओरडीनैन्डो ही था। वह तो खुशी के मारे पागल ही हो गयी।

बड़ी शान से दोनों की शादी हुई। फिओरडीनैन्डो ने अपनी माँ और पिता को भी बुला भेजा। उन्होंने तो उसको मरा हुआ ही समझ लिया था और उसका दुख मना रहे थे पर उसको ज़िन्दा और खुश देख कर वे भी बहुत खुश हुए।

उसने अपनी दुलहिन को अपने माता पिता से मिलवाया और उनको बताया कि यह वही छोटा खरगोश है जो मुझे अपने पीछे भगा ले गया था। परदे वाली लड़की और पुर्तगाल की रानी जिसको मैंने बहुत बुरे जादू के फन्दे से आजाद किया है वह भी यही है और अब यह मेरी पत्नी है।”

उसके बाद सब लोग खुशी-खुशी रहे।

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[1] The Enchanted Palace (Story No 66) – a folktale from Italy from its Montale Pistoiese area.

Adapted from the book: “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] Fiordinando – the name of the prince

[3] Paris is the capital of France country in Europe.

[4] Peterborough is a cathedral city in the East of London, about 75 miles North of London. See its Cathedral’s picture above. It has a railway station as an important stop on the East Coast Main Line between London and Edinburgh.

[5] This tournament was among knights in which the knights used to fell another knight by their blunted lance.

[6] Red wine – it is very common drink in Italy. It is made from red grapes.

[7] White wine – another kind of popular wine of Italy

[8] Translated for the word “Trigger”

[9] A knight is a person granted an honorary title of knighthood by a monarch or other political leader for service to the Monarch or country, especially in a military capacity. See its picture above.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3864,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2812,कहानी,2137,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,865,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–4 : 3 जादुई महल // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–4 : 3 जादुई महल // सुषमा गुप्ता
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रचनाकार
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