मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–4 : 5 औलिव// सुषमा गुप्ता

5 औलिव[1]

एक बार एक अमीर ज्यू की पत्नी अपनी बच्ची को जन्म देते ही मर गयी सो उस ज्यू को अपनी नयी पैदा हुई बच्ची को पालने पोसने के लिये एक किसान के पास छोड़ना पड़ा। यह किसान एक ईसाई था।

पहले तो वह किसान इस बोझ को उठाना नहीं चाहता था। उसने कहा — “मेरे अपने बच्चे हैं और मैं आपकी बच्ची को हिब्रू[2] रीति रिवाजों के अनुसार नहीं पाल सकता।

क्योंकि वह हमेशा मेरे बच्चों के साथ रहेगी और हम लोग तो ईसाई हैं तो उनके साथ रहते-रहते वह ईसाई रीति रिवाजों को अपना लेगी और वह आपको अच्छा नहीं लगेगा।”

ज्यू बोला — “कोई बात नहीं। पर बस तुम मेरे ऊपर इतनी मेहरबानी कर दो कि इसको पाल लो। मैं तुमको इसका बदला जरूर दूँगा।

अगर मैं इसको इसकी 10 साल की उम्र होने तक लेने के लिये नहीं आया तो तुम इसके साथ जैसा चाहो वैसा करना। क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि शायद मैं फिर कभी न आ पाऊँगा। फिर यह बच्ची हमेशा के लिये तुम्हारे पास ही रहेगी।”

इस तरह उस ज्यू और उस किसान में यह समझौता हो गया कि वह अपनी बेटी को अगर 10 साल की होने तक न ले जाये तो वह उसके साथ जो चाहे करे और वह बच्ची भी फिर उसी के पास रहेगी।

इसके बाद वह ज्यू उस बच्ची को उस किसान के पास छोड़ कर दूर देशों की यात्रा पर अपने काम पर निकल पड़ा।

बच्ची उस किसान की पत्नी की देख रेख में बड़ी होने लगी। वह लड़की इतनी सुन्दर और अच्छी थी कि वह उस किसान को ऐसी लगती थी जैसे वह उसकी अपनी बेटी हो।

बच्ची बड़ी होने लगी, वह चलने लगी, फिर वह दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगी और फिर जैसी-जैसी उसकी उम्र होती गयी वह वैसा-वैसा ही काम भी करने लगी। पर किसी ने भी कभी उसको ईसाई धर्म के बारे में नहीं बताया।

उसने हर आदमी को अपनी-अपनी प्रार्थना करते सुना पर उसको यह नहीं पता था कि वे लोग किस धर्म की प्रार्थना करते थे। जब तक वह 9 साल की हुई तब तक वह इन सब बातों से बिल्कुल ही अनजान रही।

जब वह 10 साल की हुई तो वह किसान और उसकी पत्नी यह आशा करते रहे कि बस अब किसी भी दिन वह ज्यू अपनी बेटी को लेने के लिये आने वाला होगा।

फिर उसका 11वाँ साल भी निकल गया, 12वाँ भी, 13वाँ भी और 14वाँ भी पर वह ज्यू नहीं आया। अब किसान को लगने लगा कि शायद वह मर गया और अब वह कभी अपनी बेटी को लेने नहीं आयेगा।

वह अपनी पत्नी से बोला — “हम लोगों ने काफी इन्तजार कर लिया अब हम इस बच्ची को बैप्टाइज़[3] करा देते हैं।”

सो उन्होंने उसको बड़ी धूमधाम से बैप्टाइज़ करा दिया और ईसाई बना दिया। सारे शहर को बुलाया गया था। उन्होंने उसका नाम औलिव[4] रख दिया। फिर उसको उन्होंने स्कूल भेज दिया ताकि वह वहाँ पढ़ने लिखने के साथ साथ कुछ लड़कियों वाली बातें भी सीख सके।

जब औलिव 18 साल की हुई तो वह वाकई में एक बहुत ही अच्छी लड़की बन चुकी थी। उसको सब तौर तरीके आ गये थे और वह बहत सुन्दर भी हो गयी थी। सब उसको बहुत प्यार करते थे।

किसान और उसकी पत्नी भी उसको देख कर बहुत खुश थे और उनके दिमाग में बहुत शान्ति थी कि बच्ची बहुत ही अच्छी बढ़ रही थी। कि एक दिन उनके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी और उन्होंने देखा कि वहाँ तो वह ज्यू खड़ा था।

वह बोला — “मैं अपनी बेटी को लेने आया हूँ।”

यह सुनते ही माँ चिल्लायी “क्या? तुम तो यह कह कर गये थे कि अगर तुम 10 साल तक नहीं आये तो इसका हम जो चाहे वह कर सकते हैं और फिर यह हमारे पास रहेगी।

इसलिये तबसे यह अब हमारी बेटी है। अब तो यह 18 साल की हो गयी है अब तुम्हारा इसके ऊपर क्या अधिकार है। हमने इसको बैप्टाइज़ भी करा दिया है और औलिव अब एक ईसाई लड़की है।”

ज्यू बोला — “इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह ईसाई हो या हिब्रू पर बेटी यह मेरी है। मैं इससे पहले आ नहीं सका क्योंकि मैं बस आ ही नहीं सकता था पर यह बेटी मेरी है और अब मैं इसको लेने के लिये आया हूँ।”

सारा परिवार एक आवाज में चिल्लाया — “पर हम उसको तुमको नहीं देंगे। यह निश्चित है।”

काफी लड़ाई झगड़ा हुआ तो ज्यू यह मामला कचहरी में ले कर गया। कचहरी ने उसको लड़की को ले कर जाने की इजाज़त दे दी क्योंकि आखिर वह बेटी तो उसी की थी।

अब उस गरीब किसान और उसके परिवार के पास और कोई चारा नहीं था कि वह कचहरी की बात माने। वे सब खूब रोये और सबसे ज़्यादा तो औलिव ही रोयी क्योंकि अपने असली पिता को तो वह जानती तक नहीं थी और अब उसको एक दूसरे आदमी के साथ जाना पड़ रहा था।

रोते रोते वह उन अच्छे लोगों को छोड़ कर जिन्होंने उसको इतने दिनों तक इतने प्यार से पाला पोसा अपने असली पिता के पास चली गयी।

उसको विदा करते समय उसकी माँ ने “औफिस औफ द ब्लैस्ड वरजिन”[5] की एक किताब उसको दी और कहा कि वह यह कभी न भूले कि वह एक ईसाई है। और इसके बाद वह लड़की चली गयी।

जब वे घर पहुँचे तो उस ज्यू ने औलिव से सबसे पहली बात तो यह कही — “हम लोग ज्यू हैं और तुम भी। तुम अब वैसा ही करोगी जैसा हम करते हैं। अगर मैंने तुमको कभी भी वह किताब पढ़ते हुए देख लिया जो तुमको उस औरत ने दी है तो बस भगवान ही तुम्हारी सहायता करे।

पहली बार तो मैं उसको आग में फेंक दूँगा और तुम्हारी पिटाई करूँगा। और अगर दूसरी बार मैंने तुमको उसको पढ़ते देख लिया तो तुम्हारे हाथ काट डालूँगा और तुमको घर से बाहर निकाल दूँगा।

इसलिये ख्याल रखना कि तुम क्या कर रही हो क्योंकि जो मैंने तुमसे कहा है मैं वही करूँगा इसमें कोई शक नहीं है।”

जब औलिव को इस तरह की धमकी मिली तो वह बेचारी क्या करती। वह बाहर से तो यही दिखाती रही कि वह ज्यू थी पर अन्दर अपने कमरा को ताला लगा कर वह “औफिस और लिटैनीज़ औफ ब्लैस्ड वरजिन” पढ़ती।

जिस समय वह यह किताब पढ़ती उस समय उसकी वफादार नौकरानी बाहर पहरा देती रहती कि कहीं ऐसा न हो कि उसका पिता उसको वह सब पढ़ते देख ले।

पर उसकी सारी सावधानी बेकार गयी क्योंकि एक दिन उस ज्यू ने उसको अनजाने में पकड़ लिया। एक बार जब वह घुटनों के बल झुक रही थी और वह किताब पढ़ रही थी उसके पिता ने उसे देख लिया।

बस उसने गुस्से में आ कर उससे वह किताब छीन ली और उसको आग में फेंक दिया और फिर उसको बहुत बेरहमी से मारा भी।

पर इससे औलिव ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी नौकरानी को बाजार भेज कर वैसी ही एक और किताब मंगवा ली और उसको पढ़ना शुरू कर दिया।

पर इस घटना के बाद से ज्यू को शक हो गया था सो वह भी उसके ऊपर बराबर नजर रखे हुए था। आखिर उसने उसको फिर से पकड़ लिया।

इस बार बिना कुछ बोले वह उसको एक बढ़ई का काम करने वाले की जगह ले गया और वहाँ उससे उसकी मेज पर हाथ फैलाने के लिये कहा।

फिर उसने एक तेज़ चाकू लिया और उससे उसके दोनों हाथ काट डाले और उसको एक जंगल में ले जा कर छोड़ आने के लिये कहा।

वहाँ वह लड़की बेचारी मरे हुए से भी ज़्यादा बुरी हालत में पड़ी रही। और अब जब उसके हाथ ही नहीं थे तो वह कर भी क्या सकती थी।

वह वहाँ से उठी और उठ कर चल दी। चलते चलते वह एक बहुत बड़े महल के पास आ निकली। पहले तो उसने सोचा कि वह उस महल के अन्दर जाये और कुछ भीख माँगे पर उसने देखा कि उस महल के चारों तरफ तो एक चहारदीवारी खिंची हुई है और उसमें कोई दरवाजा नहीं है।

पर उसने देखा कि उस महल की चहारदीवारी के अन्दर एक बहुत सुन्दर बागीचा था। इधर उधर देखने पर उसे चहारदीवारी के ऊपर से झॉकता हुआ एक नाशपाती का पेड़ दिखायी दे गया जिस पर पकी हुई पीली पीली नाशपाती लदी हुईं थीं।

उसके मुँह से निकला “काश मुझे उनमें से एक नाशपाती मिल जाती। क्या कोई ऐसा रास्ता है जिससे उन तक पहुँचा जा सके?”

उसके मुँह से अभी ये शब्द निकले ही थे कि वह दीवार फट गयी और उस नाशपाती के पेड़ की शाखें नीचे झुक गयीं।

वह शाखें इतनी नीचे झुक गयीं कि औलिव जिसके हाथ ही नहीं थे उन शाखों पर लगी नाशपातियों को अपने मुँह में पकड़ कर खा सकती थी। जब उन नाशपातियों को खा कर उसका पेट भर गया तो वह पेड़ फिर से ऊँचा हो गया और दीवार भी बन्द हो गयी।

औलिव फिर से जंगल में चली गयी। अब उसको नाशपातियों का भेद पता चल गया था। सो अब वह रोज 11 बजे उस नाशपाती के पेड़ के पास आती और खूब फल खाती और रात बिताने के लिये जंगल वापस लौट जाती।

ये नाशपातियाँ बहुत बढ़िया रसीली और पकी हुई थीं। एक सुबह उस राजा ने जो उस महल में रहता था नाशपाती खाने की सोची तो उसने अपने नौकर को कुछ नाशपातियाँ लाने के लिये बागीचे में भेजा।

नौकर कुछ दुखी सा लौट कर आया और उसने आ कर राजा को बताया — “मैजेस्टी, ऐसा लगता है कि कोई जानवर इन नाशपातियों को उनके बीज की जगह तक खा रहा है।”

“ऐसा कौन हो सकता है उसको पकड़ने की कोशिश करो।”

राजा ने उस नाशपाती के पेड़ के पास पेड़ की डंडियों से एक झोंपड़ी बनवायी और रोज रात को वह उसमें लेट कर नाशपाती के चोर को पकड़ने के लिये पहरा देता रहा।

पर इस तरह से तो उसकी नींद भी खराब होती रही और चोर भी नहीं पकड़ा गया और नाशपातियाँ भी कोई कुतरता ही रहा। क्योंकि वह चोर रात में तो आता नहीं था।

तो उसने दिन में पहरा देने का विचार किया। 11 बजे उसने दीवार खुलती देखी। नाशपाती का पेड़ झुकते देखा और किसी लड़की को नाशपाती खाते देखा। औलिव ने पहले एक नाशपाती खायी, फिर दूसरी, फिर तीसरी . . .।

राजा ने जो गोली चलाने को तैयार था यह सब देख कर आश्चर्य में अपनी बन्दूक नीचे रख दी। वह तो बस नाशपाती खाती हुई उस लड़की को ही देखता रह गया।

नाशपाती खा कर वह दीवार के बाहर गायब हो गयी थी। उसके जाते ही दीवार भी बन्द हो गयी थी।

उसने अपने नौकरों को तुरन्त ही बुलाया और उनको उस लड़की के पीछे भागने के लिये और उसको उसके पास लाने के लिये कहा।

उसके पीछे भागते भागते वे जंगल में पहुँच गये और वहाँ वह लड़की उनको एक पेड़ के नीचे सोती मिल गयी। वे उसको पकड़ कर राजा के पास ले आये।

राजा ने उससे पूछा — “तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रही हो? और मेरी नाशपाती चुराने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”

जवाब में लड़की ने अपने दोनों हाथ आगे कर दिये।

उन हाथों को देख कर राजा के मुँह से निकला — “उफ बेचारी। ऐसा कौन बेरहम आदमी है जिसने तुम्हारे साथ ऐसा किया?”

इस पर उस लड़की ने उसको अपनी पूरी कहानी सुना दी। राजा बोला — “मुझे अब अपनी नाशपाती की चिन्ता नहीं है पर मुझे अब तुम्हारी चिन्ता है। चलो तुम मेरे साथ चल कर रहो। मेरी रानी माँ तुमको जरूर ही रख लेंगी और तुम्हारी ठीक से देखभाल भी करेंगी।”

सो औलिव राजा के साथ चली गयी और राजा ने उसको अपनी माँ से मिलवाया। पर राजा ने माँ से न तो नाशपाती का जिक्र किया और न ही पेड़ के झुकने का और न ही दीवार के अपने आप खुलने बन्द होने का ही कोई जिक्र किया।

उसको लगा कि उसकी माँ कहीं उस लड़की को जादूगरनी[6] न समझ ले और उसे बाहर न निकाल दे या उससे कहीं नफरत न करने लगे।

रानी ने औलिव को अपने घर में रखने से इनकार तो नहीं किया पर उसको रखने में कोई रुचि भी नहीं दिखायी। वह उसको बहुत थोड़ा सा खाना देती थी। वह भी इसलिये कि राजा उस बिना हाथ वाली लड़की की सुन्दरता की वजह से उसकी तरफ बहुत आकर्षित था।

उस लड़की के बारे में वह राजा क्या सोचता था उन सब विचारों को उसके दिमाग से निकालने के लिये एक दिन माँ ने अपने बेटे से कहा — “तुम अगर चाहो तो तुमको और कितनी भी सुन्दर सुन्दर राजकुमारियाँ मिल जायेंगीं।

तुम नौकर, घोड़े और पैसा लो और चारों तरफ घूम कर आओ मुझे यकीन है कि तुमको जरूर ही अपनी पसन्द की कोई न कोई राजकुमारी मिल जायेगी।”

माँ की बात मान कर राजा ने नौकर घोड़े और पैसे लिये और चल दिया राजकुमारी को ढूँढने। वह कई देशों में घूमा।

छह महीने बाद जब वह घर लौट कर आया तो माँ से बोला — “तुम ठीक कहती थी माँ। दुनिया में राजकुमारियाँ तो बहुत हैं पर तुम मुझसे नाराज न होना माँ, लेकिन औलिव जैसी दयालु और सुन्दर राजकुमारी इस दुनिया में और कोई नहीं है। इसलिये मैने फैसला किया है कि मैं शादी करूँगा तो औलिव से ही करूँगा।”

माँ चिल्लायी — “क्या? जंगल से लायी गयी एक बिना हाथ वाली लड़की से तुम शादी करोगे? तुम उसके बारे में कुछ जानते भी तो नहीं। क्या तुम अपने आपको इस तरह से बदनाम करोगे?”

पर उसने माँ की बात बिल्कुल नहीं सुनी और उससे तुरन्त ही शादी कर ली। रानी माँ के लिये एक बिना जान पहचान की लड़की को अपनी बहू बना कर घर ले आना बहुत बड़ी बात थी जिसे वह सहन न कर सकी।

वह औलिव के साथ हमेशा ही बहुत बुरा बरताव करती थी पर यह भी ध्यान रखती कि वह राजा के सामने उसके साथ वैसा बरताव न करे ताकि कहीं ऐसा न हो कि राजा नाखुश हो जाये। पर औलिव ने राजा की माँ के खिलाफ राजा से कभी कुछ नहीं कहा।

इसी बीच औलिव को बच्चे की आशा हो आयी। यह जान कर राजा को बड़ी खुशी हुई। पर इत्तफाक से उसी समय उसके एक पड़ोसी देश के राजा ने उसके राज्य के ऊपर हमला कर दिया तो उसको अपने देश की रक्षा के लिये उससे लड़ने जाना पड़ा।

जाने से पहले वह औलिव को अपनी माँ को सौंपना चाहता था पर रानी माँ ने कहा — “मैं यह जिम्मेदारी नहीं ले सकती क्योंकि मैं तो खुद ही यह महल छोड़ कर कौनवैन्ट[7] जा रही हूँ।”

इसलिये औलिव को उस महल में अकेले ही रहना पड़ा। सो राजा ने उससे उसको रोज एक चिठ्ठी लिखने के लिये कहा।

और इस तरह राजा लड़ाई पर चला गया, रानी माँ कौनवैन्ट चली गयी और औलिव नौकरों के साथ महल में अकेली रह गयी। रोज एक आदमी औलिव की चिठ्ठी ले कर महल से राजा के पास जाता था। इस बीच औलिव ने दो बच्चों को जन्म दिया।

उसी समय रानी माँ की एक बूढ़ी चाची रानी माँ को महल की खबर देने के लिये कौनवैन्ट गयी। यह जान कर कि औलिव ने दो बच्चों को जन्म दिया है रानी माँ कौनवैन्ट छोड़ कर महल वापस लौट आयी। उसका कहना था कि वह अपनी बहू की सहायता करने महल वापस आ रही थी।

उसने चौकीदारों को बुलाया और जबरदस्ती औलिव को बिस्तर से उठाया, उसके दोनों हाथों में एक एक बच्चा दिया और उन चौकीदारों से कहा कि वे उसको जंगल में वहीं छोड़ आयें जहाँ राजा ने उसको पाया था।

उसने चौकीदारों से कहा — “इसको भूखा मरने के लिये वहीं छोड़ देना। अगर तुम लोग मेरा हुकुम नहीं मानोगे और इस बारे में एक शब्द भी किसी और से कुछ भी कहोगे तो तुम्हारे सिर काट दिये जायेंगे।”

उसके बाद उसने राजा को लिख दिया कि उसकी पत्नी बच्चों को जन्म देते समय मर गयी और साथ में बच्चे भी मर गये।

राजा उसके झूठ पर विश्वास कर ले इसके लिये उसने तीन मोम के पुतले बनवाये और बड़ी शान से शाही चैपल[8] में उनका अन्तिम संस्कार किया और उनको दफन कर दिया।

इस रस्म के लिये उसने काले कपडे. भीे पहने और बहुत रोयी भी। उधर राजा भी न तो अपनी लड़ाई से इस बदकिस्मत घटना के लिये घर आ सका और न ही वह इस सब में अपनी माँ का कोई झूठ देख सका।

X X X X X X X

अब हम औलिव के पास चलते हैं। वह बेचारी बिना हाथ की अपने दोनों बच्चों को लिये बीच जंगल में भूखी प्यासी पड़ी थी।

वह किसी तरह से अपने दोनों बच्चों को लिये हुए एक ऐसी जगह आ गयी जहाँ एक पानी का तालाब था और वहाँ एक बुढ़िया कपड़े धो रही थी।

औलिव बोली — “माँ जी, मेहरबानी करके अपने एक पानी से भरे कपड़े को मेरे मुँह में निचोड़ दीजिये। मुझे बहुत प्यास लगी है।”

उस बुढ़िया ने जवाब दिया — “नहीं मैं तुमको पानी नहीं पिलाऊँगी। तुम खुद अपना सिर इस तालाब में झुकाओ और अपने आप पानी पियो।”

“पर क्या आप देख नहीं रहीं कि मेरे हाथ नहीं हैं और मुझे अपने बच्चों को भी अपनी बॉहों में पकड़ना है?”

“कोई बात नहीं। कोशिश तो करो।”

सो औलिव घुटनों के बल झुकी पर जैसे ही वह पानी पीने के लिये तालाब के ऊपर झुकी उसकी दोनों बॉहों से उसके एक के बाद एक दोनों बच्चे फिसल गये और पानी में गायब हो गये।

“ओह मेरे बच्चे, ओह मेरे बच्चे। मेरी सहायता करो मेरे बच्चे डूब रहे हैं।” पर वह बुढ़िया तो हिल कर भी नहीं दी।

वह बोली — “तुम डरो नहीं, वे डूबेंगे नहीं, तुम उनको निकाल कर देखो।”

“पर यह मैं कैसे करूँ मेरे तो हाथ ही नहीं हैं।”

“अपनी बॉहोेंं को तुम पानी में डालो तो।”

औलिव ने अपनी बिना हाथ की बॉहें पानी में डालीं तो उसको लगा कि उसकी बॉहें तो बढ़ रहीं हैं और उसके हाथ फिर से आ गये हैं। अपने उन हाथों से उसने अपने बच्चे पकड़ लिये और उनको सुरक्षित पानी से बाहर निकाल लिया।

वह बुढ़िया बोली — “अब तुम अपने रास्ते जा सकती हो। अब तुम्हारे पास अपना काम करने के लिये हाथों की कोई कमी नहीं है। बाई।”

इससे पहले कि औलिव उसको धन्यवाद देती वह बुढ़िया तो वहाँ से गायब हो चुकी थी।

शरण की खोज में जंगल में घूमती हुई औलिव अब एक नये घर में आ गयी थी। उस घर का दरवाजा खुला पड़ा था सो वह शरण माँगने के लिये उस घर के अन्दर चली गयी।

अन्दर जा कर उसने देखा कि घर तो खाली पड़ा था। वहाँ कोई नहीं था और एक चूल्हे के ऊपर एक बरतन में दलिया उबल रहा था। वहीं पास में कुछ और खाने का सामान भी रखा हुआ था।

सो औलिव ने पहले अपने बच्चों को खाना खिलाया फिर खुद खाया। फिर वह एक कमरे में गयी जहाँ एक बिस्तर लगा हुआ था और दो पालने रखे थे। उसने अपने बच्चों को पालने में सुलाया और वह खुद उस बिस्तर पर लेट गयी और सो गयी।

वह उस मकान में बिना किसी को देखे और बिना किसी चीज़ की जरूरत महसूस करते हुए रहती रही। उसको वहाँ सब कुछ अपने आप ही मिल रहा था।

X X X X X X X

अब हम राजा के पास चलते हैं। राजा की लड़ाई खत्म हो गयी थी। वह घर लौटा तो उसने देखा कि सारा शहर तो दुख मना रहा है। उसकी माँ ने उसकी पत्नी और उसके दो बच्चों की मौत पर उसको तसल्ली देने की बहुत कोशिश की पर जैसे जैसे समय बीतता गया वह औलिव की कमी से और ज़्यादा दुखी होता गया।

एक दिन अपना दिल बहलाने के लिये उसने शिकार पर जाने का इरादा किया। वह शिकार के लिये जंगल पहुँचा ही था कि कुछ देर बाद तूफान आ गया और वह तूफान से बचने के लिये कोई जगह ढूँढने लगा।

तूफान बहुत तेज़ था। राजा ने सोचा — “इस तूफान में तो मैं मर ही जाऊँगा और फिर बिना औलिव के मैं जी कर करूँगा भी क्या सो अगर में मर भी जाऊँ तो क्या है।”

वह यह सब कह ही रहा था कि उसको दूर कहीं बड़ी धुँधली सी रोशनी चमकती दिखायी पड़ी सो वह शरण पाने की उम्मीद में उधर ही चल पड़ा। चलते चलते वह एक घर के सामने आ गया। वहाँ आ कर उसने उस घर का दरवाजा खटखटाया तो औलिव ने दरवाजा खोला।

राजा ने औलिव को पहचाना नहीं और औलिव भी कुछ बोली नहीं। वह राजा को अन्दर ले गयी और आग के पास बिठाया। फिर औलिव और बच्चे उसका दिल बहलाने के लिये उसके साथ खेलते रहे।

राज औलिव को देखता रहा कि उस लड़की की शक्ल औलिव से कितनी मिलती जुलती थी पर यह देख कर कि इसके हाथ तो बिल्कुल सामान्य थे उसने अपना सिर ना में हिलाया कि नहीं यह नहीं हो सकता यह औलिव नहीं हो सकती।

बच्चे उसके चारों तरफ खेल कूद रहे थे। उनकी तरफ प्यार से देखते हुए वह बोला — “अगर आज मेरे बच्चे ज़िन्दा होते तो वे भी ऐसे ही होते पर वे तो अब मर चुके हैं। उनकी माँ भी मर गयी है और मैं यहाँ अकेला बैठा हूँ।”

इस बीच औलिव मेहमान का बिस्तर लगाने के लिये चली गयी। उसने वहीं से बच्चों को बुलाया और उनसे फुसफुसा कर बोली — “जब हम फिर से दूसरे कमरे में वापस जायें तो तुम मुझसे कहानी सुनाने के लिये कहना।

मैं तुमको मना करूँ या तुमको धमकी दूँ तभी भी तुम कहानी सुनाने की जिद करते रहना। ठीक?”

“ठीक है माँ हम ऐसा ही करेंगे।”

जब वे सब फिर आग के पास आगये तो बच्चे बोले — “माँ कोई कहानी सुनाओ न।”

“तुम क्या सोचते हो यह कोई समय है कहानी सुनाने का? अब बहुत देर हो रही है और देखो यह हमारे मेहमान भी थके हुए हैं इनको भी तो सोना है।चलो तुम भी सो जाओ।”

“नहीं माँ कहानी सुनाओ न।”

“अगर तुम चुप नहीं रहोगे तो मैं तुम्हारी पिटाई करूँगी।”

राजा बोला — “बच्चे हैं बेचारे। तुम इतने छोटे बच्चों की पिटाई कैसे कर सकती हो? इनको कहानी सुना दो न। इनको खुश रखा करो। मुझे भी अभी नींद नहीं आ रही है और फिर मैं भी तुम्हारी कहानी सुन लूँगा।”

यह सुन कर औलिव बैठ गयी और उसने कहानी सुनानी शुरू की। धीरे धीरे राजा उस कहानी को गम्भीर हो कर सुनने लगा और जैसे जैसे वह कहानी आगे बढ़ती जाती थी वह उसको सुनने के लिये और ज़्यादा उत्सुक होता जाता था और कहता जाता था “फिर क्या हुआ, फिर क्या हुआ।”

क्योंकि यही कहानी तो उसकी पत्नी की भी थी पर उसकी इतनी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह इतनी बड़ी उम्मीदों के पुल बॉध सकता कि वह उससे यह कह सकता कि तुम ही तो मेरी औलिव हो।

क्योंकि उसकी कहानी का वह हिस्सा तो अभी तक आया ही नहीं था जिसमें उसके हाथ ठीक हो जाते हैं।

अन्त में वह रो पड़ा और उससे पूछा — “पर उसके हाथों का क्या हुआ जिन्हें काट डाला गया था?

तब औलिव ने उसको उस बुढ़िया धोबिन वाली घटना बतायी। सुनते ही राजा खुशी से चिल्लाया — “सो वह तुम ही हो?” कह कर उसने औलिव को गले लगा लिया। बरसों के बिछड़े मिल गये।

पर इस खुशी के तुरन्त बाद ही राजा चिन्ता में पड़ गया और बोला — “मुझे तुरन्त ही महल लौट कर अपनी माँ को उसके किये की वह सजा देनी चाहिये जो उनको मिलनी चाहिये।”

औलिव बोली — “नहीं नहीं ऐसा नहीं करो। अगर तुम मुझसे सचमुच प्यार करते हो तो तुम मुझसे वायदा करो कि तुम माँ पर बिल्कुल भी हाथ नहीं उठाओगे। अभी जो कुछ उन्होंने किया है वह इस पर अपने आप ही अफसोस करेंगी।

वह सोच रही होंगी कि वह राज्य की भलाई के लिये नाटक कर रही हैं। उनकी ज़िन्दगी बख्श दो। उनके उन सब कामों के लिये उनको माफ कर दो जो उन्होंने मेरे साथ किये। जब मैंने उनको माफ कर दिया तो तुम भी उनको माफ कर दो।”

सो राजा महल लौट गया और वहाँ जा कर उसने अपनी माँ को कुछ नहीं बताया। माँ बोली — “मैं तुम्हारे बारे में परेशान थी। इस तूफान में जंगल में तुम्हारी रात कैसी बीती?”

“माँ मेरी रात तो बहुत अच्छी बीती।”

माँ को कुछ शक हुआ तो आश्चर्य से बोली — “क्या?”

“हाँ माँ। वहाँ मुझे रात को एक घर मिल गया था। वहाँ बड़े दयालु लोग थे जिन्होंने मुझे आराम से रखा। औलिव की मौत के बाद यह पहला मौका था कि मैं इतना खुश था। पर एक बात बताओ माँ, क्या औलिव सचमुच में मर गयी?”

“इस बात के कहने का क्या मतलब है तुम्हारा? सारा शहर उसके दफन पर मौजूद था।”

“माँ मैं भी उसको एक बार अपनी आँखों से देखना चाहूँगा और उसकी कब्र पर एक बार फूल चढ़ाना चाहूँगा।”

यह सुन कर रानी को गुस्सा आ गया और वह गुस्से से बोली — “पर यह शक क्यों? क्या एक बेटे का अपनी माँ की तरफ यही फर्ज बनता है कि वह उसकी बात पर शक करे?”

“छोड़ो भी माँ, अब बहुत झूठ हो गया। औलिव आओ अन्दर आ जाओ।”

उसने औलिव को अन्दर बुला लिया तो वह अपने बच्चों को साथ ले कर अन्दर आ गयी। रानी जो अब तक गुस्से से लाल पीली हो रही थी डर से सफेद पड़ गयी।

पर औलिव बोली — “नहीं माँ जी आप डरिये नहीं, हम आपको दुखी करने नहीं आये हैं। हमारे लिये एक दूसरे को पाने की खुशी किसी भी चीज़ से ज्यादा बड़ी है।”

इसके बाद रानी माँ कौनवैन्ट चली गयी और राजा और औलिव ने अपनी बाकी की ज़िन्दगी खुशी आराम और शान्ति से गुजारी।


[1] Olive (Story No 71) – a folktale from Montale Pistoiese area, Italy, Europe.

Adapted from the book: “Italian Folktales” by Italo Calvino. Translated by George Martin in 1980.

[2] Hebrew customs and traditions

[3] Baptize – a Christian ceremony where the child officially becomes Christian. In this ceremony either the child is immersed in water, or water is sprinkled over his/her head, water is poured over him/her.

[4] Olive – name of the Jew girl

[5] A copy of the “Office of Blessed Virgin” - a special type of religious book in Christians

[6] Translated for the word “Witch”

[7] Convent – the building or buildings occupied by such a society; a monastery or nunnery.

[8] Royal Chapel – a private or subordinate place of prayer or worship; oratory.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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