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देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 5 जमीन और पानी पर चलने वाली नाव // सुषमा गुप्ता

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5 जमीन और पानी पर चलने वाली नाव [1] एक बार एक राजा ने अपने राज्य में यह मुनादी पिटवायी कि “जो कोई आदमी ऐसी नाव बनायेगा जो जमीन पर भी चलेगी औ...

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5 जमीन और पानी पर चलने वाली नाव[1]

एक बार एक राजा ने अपने राज्य में यह मुनादी पिटवायी कि “जो कोई आदमी ऐसी नाव बनायेगा जो जमीन पर भी चलेगी और पानी में भी, तो मैं उस आदमी से अपनी बेटी की शादी कर दूँगा।”

उस देश में एक आदमी रहता था जिसके तीन बेटे थे। उसके पास एक घोड़ा, एक गधा और एक सूअर का बच्चा भी था।


जब उसके सबसे बड़े बेटे ने यह मुनादी सुनी तो उसने अपने पिता से कहा — “पिता जी आप अपना घोड़ा बेच दीजिये और उससे जो पैसे मिलेंगे मैं उनसे नाव बनाने का सामान खरीदूँगा।

फिर मैं उस सामान से एक ऐसी नाव बनाऊँगा जो जमीन और पानी दोनों पर चल सके। फिर मैं राजकुमारी से शादी कर लूँगा।”

पिता अपना घोड़ा नहीं बेचना चाहता था पर अपने बेटे की जिद के आगे उसको झुकना पड़ा। घर में शान्ति बनाये रखने के लिये उसने अपना घोड़ा बेच दिया और उस पैसे से उसके लिये नाव बनाने के लिये औजार खरीद दिये।

अगले दिन वह लड़का सुबह सवेरे उठा और नाव बनाने के लिये लकड़ी काटने के लिये जंगल चल दिया।

जब उसकी नाव आधी बन गयी तो एक छोटा सा बूढ़ा वहाँ आया और उससे बोला — “बेटा, तुम यह क्या बना रहे हो?”

“बस ऐसे ही जो मुझे अच्छा लग रहा है।”

“और तुमको क्या अच्छा लग रहा है?”

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“बैरल[2] की पट्टियाँ।”

“तो कल तुमको बैरल की पट्टियाँ अपने आप कटी मिल जायेंगी अभी तुम अपने घर जाओ।” कह कर वह बूढ़ा वहाँ से चला गया।

अगली सुबह जब वह वापस जंगल गया तो जहाँ उसने अपनी वह आधी बनी नाव और लकड़ी और औजार छोड़े थे वहाँ बैरल की पट्टियों का ढेर लगा पड़ा था।

उस ढेर को देख कर तो उस लड़के ने अपना सिर पीट लिया और रोता चिल्लाता घर वापस आ गया।

घर आ कर उसने अपने पिता को सब कुछ बताया तो पिता को भी बहुत बुरा लगा। उसने तो अपने बेटे की खुशी के लिये अपना घोड़ा बेचा था पर अब उसका मन अपने बेटे की गरदन मरोड़ने का कर रहा था।

2–3 हफ्ते बाद उसके बीच वाले लड़के को अपनी किस्मत आजमाने की खुजली उठी। वह भी नाव बनाना चाहता था। उसने अपने पिता से उसका गधा बेचने के लिये कहा ताकि वह उसको बेचने से आये पैसों से वैसी नाव बना सके।

हालाँकि वह आदमी अपना गधा बेचना नहीं चाहता था पर अपने दूसरे बेटे की जिद के आगे उसको झुकना पड़ा और उसने उसके लिये अपना गधा बेच दिया।

उस पैसे से उसने भी कुछ सामान खरीदा और वह भी नाव बनाने जंगल की तरफ चल दिया। वहाँ जा कर उसने भी लकड़ी काटी और उसकी नाव बनानी शुरू कर दी।

जब उसकी नाव भी आधी बन गयी तो एक बूढ़ा उसके पास आया और उससे बोला — “बेटा, तुम यह क्या बना रहे हो?”

“बस ऐसे ही जो मुझे अच्छा लग रहा है।”

“और क्या तुम बताओगे कि तुमको क्या अच्छा लग रहा है?”

“मैं झाड़ू के हैन्डिल बना रहा हूँ।”

“तो कल तुमको झाड़ू के हैन्डिल अपने आप बने मिल जायेंगे अभी तुम अपने घर जाओ।” कह कर वह बूढ़ा वहाँ से चला गया।

शाम को वह लड़का भी अपनी नाव के लिये लकड़ी काट कर घर चला गया। घर जा कर उसने खाना खाया और सो गया। सुबह सवेरे उठ कर जब वह जंगल गया तो उसने देखा कि उसकी काटी सारी लकड़ी के तो झाड़ू के हैन्डिल बने रखे हैं।

यह देख कर उसने भी अपना सिर पीट लिया और रोता चिल्लाता घर वापस आ गया। घर आ कर उसने अपने पिता को सब कुछ बताया तो पिता को भी बहुत बुरा लगा।

उसने तो अपने बेटे की खुशी के लिये अपना गधा बेचा था पर अब उसका मन उसकी गरदन मरोड़ने का कर रहा था।

वह चिल्ला कर बोला — “तुम्हारे साथ जो कुछ हुआ ठीक ही हुआ। बल्कि तुम दोनों के साथ जो हुआ वह ठीक हुआ क्योंकि तुम लोगों के विचार ही बेवकूफी के थे। और यह मेरे साथ भी ठीक हुआ क्योंकि मैंने तुम बेचकूफों की बात सुनी।”

उसका सबसे छोटा बेटा यह सब सुन रहा था। वह बोला — “अब जब हम यहाँ तक आ ही गये हैं पिता जी तो हमको बाकी बचा रास्ता भी पार कर लेना चाहिये।

पिता जी, मैं भी अपनी किस्मत आजमाना चाहता हूँ। हम यह सूअर का बच्चा बेच देते हैं, नये औजार खरीदते हैं और कौन जाने शायद मैं ही वैसी नाव बनाने में कामयाब हो जाऊँ।”

यह सुन कर तो पिता के गुस्से का पारा आसमान पर चढ़ गया पर काफी कहा सुनी के बाद वह सूअर का बच्चा भी बेच दिया गया, नये औजार खरीदे गये और वह लड़का अगले दिन नाव बनाने के लिये लकड़ी काटने के लिये जंगल पहुँच गया।

उसकी भी नाव जब आधी बन गयी तो वही पहले वाला बूढ़ा फिर वहाँ आया और उससे पूछा — “बेटे, तुम क्या कर रहे हो?”

लड़के ने जवाब दिया — “बाबा, मैं एक ऐसी नाव बना रहा हूँ जो जमीन पर भी चल सके और पानी पर भी तैर सके।”

बूढ़ा बोला — “तो तुमको ऐसी नाव जो जमीन पर भी चल सके और पानी पर भी तैर सके अपने आप मिल जायेगी अभी तुम अपने घर जाओ।” और यह कह कर वह बूढ़ा वहाँ से चला गया।

अपने दूसरे भाइयों की तरह वह भी शाम होने पर घर चला गया। जा कर उसने खाना खाया और सो गया। अगले दिन जब वह सुबह सवेरे जंगल पहुँचा तो उसको वैसी ही एक नाव तैयार खड़ी मिली। वह लड़का तो उस नाव को देख कर बहुत खुश हो गया।

उसके पतवार भी थे और उसमें पाल भी लगे हुए थे। वह तुरन्त ही उस नाव पर चढ़ गया और बोला — “चल नाव चल, जमीन पर चल।”

और नाव जंगल में हो कर इतनी आसानी से जाने लगी जैसे कि कोई नाव पानी पर तैरती है। चलते चलते वह उसके घर आ गयी। उसके पिता और भाई उस नाव को देख कर बड़े आश्चर्य में पड़ गये।

लड़का फिर बोला — “चल नाव चल, जमीन पर चल।” अब वह राजा के महल की तरफ चल दी – पहाड़ों पर चढ़ती हुई, मैदानों में से गुजरती हुई और जब भी कोई नदी आती तो उसमें तैरती हुई।

अब उसके पास नाव तो थी पर उसको चलाने के लिये कोई टीम[3] नहीं थी। वह अब एक ऐसी नदी में आ पहुँचा था जिसका पानी समुद्र की एक धारा से आना था पर उसका पानी नदी तक नहीं पहुँच रहा था।

क्योंकि नदी के मुँह पर उसके किनारे पर खड़ा एक बहुत ही बड़ा आदमी झुक कर उस समुद्र की धारा में से पानी पी रहा था और उसका पानी नदी में आ ही नहीं पा रहा था जिससे वह धारा सूखी सी हो रही थी।

लड़का बोला — “हे भगवान, कितना सारा पानी पीने वाला आदमी है यह। क्या ही अच्छा हो अगर यह मेरे साथ राजा के महल तक चले।”

वह चिल्ला कर बोला — “क्या तुम मेरे साथ राजा के महल तक चलना पसन्द करोगे?”

उस बड़े आदमी ने एक घूँट पानी और पिया और बोला — “खुशी से। अब जब कि मेरी प्यास थोड़ी सी बुझ गयी है तो मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ।” कह कर वह उस नाव पर चढ़ गया।

अब वह नाव पानी पर तैरने लगी क्योंकि समुद्र का पानी अब नदी में आने लगा था। नदी में तैरने के बाद अब वह नाव फिर से जमीन पर चलने लगी थी।

चलते चलते वे दोनों एक ऐसी जगह आये जहाँ एक आदमी एक बड़ी मोटी सी भैंस को लोहे के डंडे में लगा कर आग के ऊपर भून रहा था।

उस आदमी को देख कर उस लड़के ने उस आदमी से पूछा — “क्या तुम मेरे साथ राजा के महल तक चलना पसन्द करोगे?”

वह बोला — “हाँ हाँ क्यों नहीं। मुझे बस ज़रा सा समय दो ताकि मैं यह कौर खा लूँ फिर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।”

“हाँ हाँ जरूर।”

इस पर उस आदमी ने उस भैंस को उस लोहे के डंडे में से निकाला और अपने मुँह में ऐसे रखा जैसे वह कोई चिड़िया हो और उसे खा कर उस लड़के साथ उसकी नाव पर सवार हो गया। सो अब तीनों राजा के महल चल दिये।

नाव झीलें पार करती हुई और खेतों में से होती हुई चली जा रही थी कि उनको एक बड़े साइज़ का आदमी[4] मिल गया जो एक पहाड़ के सहारे खड़ा था।

उसको इस तरह खड़े देख कर वह लड़का उससे बोला — “हलो, क्या तुम मेरे साथ राजा के महल तक चलना पसन्द करोगे?”

वह बोला — “मैं तो यहाँ से हिल भी नहीं सकता।”

“पर क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं यहाँ से हटा तो यह पहाड़ गिर जायेगा।”

“तो गिर जाने दो।”

वह आदमी उस पहाड़ को एक हाथ से सँभाले हुए उस लड़के की नाव में कूद कर बैठ गया।

पर जैसे ही वह नाव वहाँ से चली उस आदमी का हाथ उस पहाड़ के नीचे से हट गया और वह पहाड़ एक ज़ोर की आवाज के साथ नीचे गिर कर चकनाचूर हो गया।

वह नाव फिर से सड़क और पहाड़ियों पर से होती हुई राजा के महल की तरफ चल दी और आखीर में राजा के महल के सामने आ कर रुक गयी।

वहाँ आ कर वह लड़का नाव में से उतरा — “राजा साहब, यह लीजिये। यह नाव मैंने अपने हाथों से बनायी है। यह जमीन और पानी दोनों पर चल सकती है। अब आप अपने वायदे के मुताबिक अपनी बेटी की शादी मुझसे कर दें।”

राजा उस लड़के को देख कर बहुत ही दुखी हो गया। वह तो ऐसे गरीब लड़के की आशा ही नहीं कर रहा था कि कोई ऐसा गरीब लड़का इतनी अच्छी नाव बना कर लायेगा जो पानी और धरती दोनों पर चल सकेगी और उसको अपनी बेटी की शादी एक ऐसे आदमी से करनी पड़ जायेगी।।

वह यह सब देख कर अपनी मुनादी पर पछताने लगा कि मैंने ऐसी मुनादी पिटवायी ही क्यों। अब उसको अपनी बेटी किसी गरीब को देनी पड़ेगी।

कुछ सोच कर राजा बोला — “ठीक है। मैं अपनी बेटी की शादी तुमसे करूँगा पर तुमको मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी। मेरी दावत में जो भी मैं तुमको दूँगा वह सारी चीज़ें तुमको और तुम्हारी टीम के लोगों को खत्म करनी पड़ेंगी। तुम उनमें से एक पंख या एक किशमिश भी नहीं छोड़ सकते।”

“ठीक है। यह बताइये कि यह दावत है कब?”

“कल।” और अगले दिन उसने यह सोचते हुए 1000 चीज़ों की दावत का इन्तजाम किया कि न तो उस लड़के ने इतनी सारी चीज़ें कभी देखीं होंगी और न ही वह अपनी टीम के साथ ये सब चीज़ें खा पायेगा।

सो अगले दिन वह लड़का केवल एक आदमी को साथ ले कर उस दावत में आया। यह वही आदमी था जो भुनी हुई भैंस भुनी हुई चिड़िया की तरह खा रहा था।

लेकिन जब उन सबको खाने का समय आया तो वह तो बस खाता गया, खाता गया, खाता गया। कुछ को चबाते हुए, कुछ को साबुत की साबुत निगलते हुए जब तक कि उसने वहाँ रखी सारी की सारी चीज़ें खत्म नहीं कर लीं।

राजा तो उस आदमी को देखता ही रह गया। फिर उसने ताली बजा कर अपने नौकरों को बुलाया और उनसे पूछा कि रसोई में अभी कुछ बचा है क्या?

वे बोले — “थोड़ा सा ही बचा है।”

राजा ने उसको भी वहाँ मँगवा लिया तो नौकर खाने के आखिरी टुकड़े तक को वहाँ ले आये। उस आदमी ने वह सब भी खा लिया।

राजा की समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे पर फिर कुछ सोच कर वह बोला — “हाँ अब मैं अपनी बेटी की शादी तुम्हारे साथ कर सकता हूँ पर अभी तो इस खाने के बाद शराब भी पीनी बाकी रह गयी है।

अब मैं तुम्हारे लिये अपने तहखाने में रखी सारी शराब मँगवाता हूँ जिसको तुमको और तुम्हारी टीम को पूरा का पूरा खत्म करना होगा।”

अब की बार उस लड़के के साथ वह नदी का पानी पीने वाला आदमी आया और उसने देखते देखते राजा की सारी शराब खत्म कर दी। फिर उसने वह शराब भी पी डाली जो राजा ने अपने लिये बचा कर रखी थी।

राजा बोला — “बहुत अच्छे। मैं इस बात के खिलाफ बिल्कुल भी नहीं हूँ कि मैं अपनी बेटी तुमको नहीं दूँगा पर अब दहेज का सवाल है जो उसके साथ जायेगा।

उसके श्रंगार करने की मेज, आलमारियाँ, पलंग, चादरें, कपड़े और घर की बहुत सारी चीज़ें हैं जो मैं उसको दूँगा। वे सब तुमको मेरी बेटी को उन सबके ऊपर बिठा कर एक ही बार में उसी समय ले जानी होंगी।”

लड़का उस आदमी की तरफ देखता हुआ बोला जिसने पहाड़ सँभाल रखा था — “क्या यह काम तुमको कोई काम लग रहा है?”

वह आदमी बोला — “क्या मुझे यह काम लग रहा है? नहीं, नहीं, यह तो मेरा शौक है।”

सब लोग महल चले गये। लड़के ने सामान लाने वालों से पूछा — “क्या तुम लोग तैयार हो? अगर तैयार हो तो सामान लादना शुरू करो।”

वे लोग कपड़ों की आलमारियाँ लाये, मेजें लाये, जवाहरात के बक्से लाये, और और भी बहुत सारा सामान लाये। सारा सामान ला कर उन्होंने उस आदमी की कमर पर लाद दिया।

उस सामान के ऊपर बैठने के लिये उस राजकुमारी को पहले अपने महल की मीनार पर चढ़ना पड़ा फिर वह उस ढेर पर आ कर बैठी।

जब वह बैठ गयी तो वह बड़ा आदमी चिल्ला कर बोला — “राजकुमारी जी, ज़रा कस कर पकड़ लीजियेगा। मैं अब चलना शुरू करता हूँ। कहीं ऐसा न हो कि मेरे चलने के धक्के से आप गिर जायें।”

इतना कह कर वह सब कुछ ले कर नाव की तरफ भाग लिया और कूद कर नाव पर चढ़ गया।

लड़का बोला — “ओ नाव, अब तुम उड़ चलो।” और नाव सड़कों, चौराहों और खेतों के ऊपर से होती हुई उड़ चली।

राजा अपनी बालकनी में खड़ा यह सब देख रहा था। वह चिल्लाया — “उनके पीछे जाओ और उन सबको पकड़ कर जंजीर में बाँध कर ले आओ।”

राजा की फौज उनके पीछे भागी परन्तु नाव के उड़ने से जो धूल का बादल उठा उससे वह उनको देख भी न सकी।

लड़के का पिता अपने छोटे बेटे को उसकी दुलहिन के साथ और पूरी नाव भरे सामान के साथ देख कर बहुत खुश हुआ।

फिर उस लड़के ने दुनिया का सबसे सुन्दर महल बनवाया जिसमें एक एक तल्ला उसने अपने पिता, भाइयों और अपने साथियों को रहने के लिये दे दिया और बाकी का महल उसने अपने और अपनी पत्नी के लिये रख लिया।

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[1] A Boat For Land and Water (Story No 99) – a folktale from Italy from its Rome area.

Adapted from the book : “Italian Folktales”, by Italo Calvino”. Translated by George Martin in 1980.

[2] A barrel is a hollow cylindrical container traditionally made of wooden staves bound by wooden or metal hoops. It has a standard size – in UK it is 36 Imperial gallons (160 L, 43 US Gallons). Modern barrels are made of US Oak wood and measure 59, 60 and 79 US Gallons. A US Gallon is 3.8 Liter and an Imperial Gallon is 4.5 Liter. See its picture above.

[3] Crew

[4] Translated for the word “Giant”.

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं के संकलन में से क्रमशः  - रैवन की लोक कथाएँ,  इथियोपिया इटली की  ढेरों लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

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रचनाकार: देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 5 जमीन और पानी पर चलने वाली नाव // सुषमा गुप्ता
देश विदेश की लोक कथाएँ — यूरोप–इटली–5 : 5 जमीन और पानी पर चलने वाली नाव // सुषमा गुप्ता
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