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गांधी का व्यावहारिक आदर्शवाद // डा. सुरेन्द्र वर्मा

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हम जब भी आदर्शवाद की बात करते हैं, सामान्यत: ऐसा प्रतीत होता है मानो हम अपने व्यावहारिक जगत से हट कर किसी ऐसे वायवी आदर्श की कल्पना कर रहे ह...

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हम जब भी आदर्शवाद की बात करते हैं, सामान्यत: ऐसा प्रतीत होता है मानो हम अपने व्यावहारिक जगत से हट कर किसी ऐसे वायवी आदर्श की कल्पना कर रहे हों जो हमारी पहुँच के बाहर हो | यदि वास्तव में हमारा आदर्श ऐसा है जो कभी ज़मीन पर उतारा ही नहीं जा सकता, तो ऐसे आदर्श को लेकर हम क्या करेंगे ? उसे हासिल तो किया ही नहीं जा सकता | वह तो केवल कोरी कल्पना भर रह जाएगा जो शायद कविता या स्वप्न में तो काम आ सके किन्तु मानव समाज और व्यक्ति के लिए तो बेकार ही है | जिसे उपलब्ध करने की मनुष्य के पास क्षमता ही न हो, वह उसका आदर्श हो ही नहीं सकता | हमारा आदर्श वही हो सकता है जिसे हम अपने प्रयत्न द्वारा प्राप्त कर सकें | इसी का नाम व्यावहारिक आदर्श है |

अंगरेजी में आदर्शवाद – Idealism – के दो अर्थ हैं | एक तो वह आदर्शवाद जिसका ज़िक्र अभी किया गया | दूसरा ‘प्रत्ययवाद’ जो वस्तुत: किसी आदर्श की कल्पना नहीं करता बल्कि जो पदार्थ की बजाय ‘प्रत्यय’ को अंतिम सत्ता के रूप में ग्रहण करता है | इसे प्रत्ययवाद कहा गया है | लेकिन अंग्रेज़ी में इस प्रत्ययवाद को भी Idealism ही कहते हैं | Idea-ism कहना ज़बान के लिए थोड़ा मुश्किल होता है | इसलिए मुख-सुख की खातिर idea और ism के बीच में ‘l’ लगाकर Idea-ism को भी idealism कर दिया है |

गांधी जी आदर्शवादी भी थे और प्रत्ययवादी भी | उनके अनुसार अंतिम सत्ता पदार्थ न होकर प्रत्यय है, और यह प्रत्यय “सत्य” है | यही “सत्य’ हमारा आदर्श है और इस आदर्श को प्राप्त किया जा सकता है. इसकी उपलब्धि सर्वथा संभव है |

(२)

गांधी जी उन बिरले विचारकों में से थे जिन्होंने “सत्य” को अंतिम और सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्वीकार किया है | प्लेटो ने अपने दर्शन में तीन मूलभूत मूल्यों को का उल्लेख किया है | शिवम्, सत्यं और सुन्दरम् | इनमें सत्य वह मूल्य है जिसमें शिव और सुन्दर दोनों समाहित हैं | अतः सत्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है | लेकिन यह बड़े आश्चर्य की बात है कि विश्व के विचारकों में बहुत कम ऐसे हैं जिन्होंने सत्य को एकमात्र और अंतिम सत्ता माना हो | गांघी उनमें से एक हैं | गांधी के अनुसार सत्य ही सत्ता है, सत है | यही हमारे “”होने का” एकमात्र आधार है | भारतीय दर्शन का कथन है, “सत्यन्नास्ति परो धर्म:” | सत्य के बराबर और कोई धर्म नहीं है और यही वह धर्म है जो हमें धारण किए है, जो हमारी ‘अस्ति’ का अधिष्ठान है | और यदि ऐसा है तो यह धर्म असत्य पर आधारित नहीं हो सकता | सत्य ही धर्म है | यही सबका अधिष्ठान है | यही परम सत्ता है | यह निरपेक्ष सत्य है | हमारा आपका या इसका उसका सत्य नहीं | किसी अन्य की अपेक्षा से यह सत्य नहीं है | यह सापेक्ष न होकर निरपेक्ष है |

गांधी ने निरपेक्ष सत्य और सापेक्ष सत्य में स्पष्ट अंतर किया है | निरपेक्ष सत्य वह सर्वोच्च सत्य है जिसमें अन्य तमाम सत्य नियम समाए हुए हैं | यह शाश्वत नियम है | नाम-रूप आते जाते रहते हैं किन्तु जो नित्य है और शाश्वत है वह हमारी दृष्टि से परे है | देश काल की सीमाओं से बंधा नहीं है | पारमार्थिक है | वह सब जो व्यावहारिक रूप से सत्य है इसी एकमात्र, अद्वैत, पारमार्थिक सत्य से सत्य है, प्रकाशित है | अतः निरपेक्ष सत्य को पाने का रास्ता हमें लगातार सापेक्ष सत्यों के अन्वेषण, उनकी खोज से ही प्राप्त हो सकता है | गांधी जी इसी खोज में निरंतर लगे रहे | उनकी आत्मकथा सत्य की खोज है |

गांधी ने व्यावहारिक सत्यों को, सापेक्ष सत्यों को, अवास्तविक नहीं माना | वे आंशिक रूप से सत्य हैं; समय सापेक्ष हैं | किन्तु वे हमें शाश्वत सत्य की क्षणिक झलक (‘fleeting glimpses’) प्रदान करते हैं | जब तक हमें पूर्ण सत्य प्राप्त नहीं हो जाता हमें अपने अनुभव के इन्हीं सापेक्ष सत्यों पर निर्भर रहना पड़ता है | तबतक यही हमारे मार्ग-दर्शक होते हैं |

यहाँ एक प्रश्न उठाया जा सकता है | यदि हर व्यक्ति का अपना अपना सत्य है और सत्य के प्रति अपना अपना दृष्टिकोण है और उसी के अनुसार उसे अपना काम करना है तो क्या इससे अराजकता नहीं हो जाएगी ? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है और इसका उत्तर गांधी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ दिया है जिसे हम आगे स्पष्ट करेंगे | किन्तु एक बात जो गांधी की सत्य की अवधारणा से उभर कर आती ही वह ये है कि गांधी का आदर्शवाद कोरा आदर्शवाद नहीं है. वे सत्य-प्रत्यय को आदर्श मानते हैं और इस तरह पदार्थ के ऊपर प्रत्यय को तरजीह देते हुए वे प्रत्ययवाद का समर्थन करते हैं किन्तु इस आदर्श को वे अप्राप्य नहीं मानते और न हीं व्यक्ति के उन सापेक्ष अनुभवों को जिन्हें वह सत्य मानकर चलता है असत्य मानते हैं | बल्कि इन्हीं अनुभवों से निरपेक्ष सत्य तक पहुँचने की राह निकालते हैं | गांधी के आदर्शवाद को व्यावहारिक आदर्शवाद इसीलिए कहा गया है |

(३)

हरेक का अपना अपना सत्य है और हरेक को अपने उसी सत्य का अनुसार आचरण करना चाहिए | गीता में भी कहा है, ”स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:” | अपना ही धर्म (सत्य) कल्याणकारक है, उसमे मर जाना भी श्रेयस्कर है; दूसरे का धर्म भयावह है | लेकिन यहाँ एक बौद्धिक समस्या यह आती है कि ऐसे में यदि सब अपने अपने धर्म या सत्य का अनुपालन करने लगे, जो ज़रूरी नहीं एक दूसरे से मेल खाता हो, तो फिर स्थिति क्या अराजक नहीं हो जाएगी? गांधी ने इस समस्या का समाधान अपने अहिंसा के प्रत्यय से किया है |

गांधी-दर्शन में सत्य और अहिंसा का समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है | जिस तरह गांधी ने सत्य को मूलभूत सत्ता बताया है उसी तरह अहिंसा को उन्होंने सत्यानुभूति का एकमात्र मार्ग बताया है| गांधी की व्रत-व्यवस्था में सत्य और अहिंसा का एक अनन्य स्थान है क्योंकि दोनों ही मुक्ति के अंतिम सोपान हैं | ये वे मूलभूत मूल्य हैं जिनकी उपलब्धि हमारा परम लक्ष्य है | निरपेक्ष सत्य की उपलब्धि सापेक्ष सत्यों से होकर संभव है किन्तु सापेक्ष सत्य एक नहीं है | ये अनेक हो सकते हैं और एक दूसरे के विरोधी भी हो सकते हैं | ऐसे में अहिंसा हमारी सहायक हैं | जब तक अहिंसा का माध्यम न हो सत्य की सारी खोज बेमतलब हो जाती है | यही कारण है की गांधी सत्य को पाने के लिए अहिंसा को ‘राज-मार्ग’ बताते हैं | अगर हम अहिंसा अपनाते हैं तो हरेक को अपने सत्य के साथ, बिना एक दूसरे के आड़े आए आए हुए, धीरे धीरे निरपेक्ष सत्य तक पहुँचने का मार्ग मिल सकता है | आखिर हमारा अपना सत्य ही हमें परम सत्य तक पहुंचा सकता है | किसी दूसरे का अनुभव नहीं | ज़ाहिर है, गांधी ने अहिंसा से एक व्यापक अर्थ लिया है | अहिंसा केवल हिंसा न करना ही नहीं है | यह तो अहिंसा का न्यूनतम अर्थ है | वास्तविक अहिंसा प्रेम है | प्रेम में ही अहिंसा का सार है | गांधी इससे भी आगे जाते हैं और कहते हैं प्रेम ही नहीं शायद करुणा अहिंसा के सबसे निकट है | जहां प्रेम और करुणा है वहां एक दूसरे के सत्य के लिए सम्मान भी है | सत्य तक पहुँचाने का मार्ग ऐसे में अपने आप खुल जाता है | प्रेम सत्य की खोज के लिए एक सामूहिक प्रयत्न बन जाता है | गांधी जी सत्योपलाब्धि को एक वैयक्तिक उपलब्धि नहीं मानते | जब तक एक भी व्यक्ति सत्योपलाब्धि (या कहें, आत्मोपलब्धि से) वंचित रहता है, मोक्ष संभव नहीं है | गांधी का यह विचार उनके दर्शन को एक सामाजिक और सार्वभौमिक आयाम प्रदान करता है |

(४)

गांधी का सबसे बड़ा योगदान सत्याग्रह का आविष्कार है |यह एक ऐसी प्राविधि की खोज है जिससे हम बिना हिंसा अपनाए, अन्याय का विरोध कर सकते हैं | इस अर्थ में गांधी कोई ऐसे प्रत्ययवादी दार्शनिक नहीं हैं जिन्हें संसार में आवागमन से मोक्ष प्राप्ति की कोई उत्कट इच्छा हो लेकिन गांधी ने संसार में रहते हुए अपनी आध्यात्मिक दृष्टि को सहेजे रखा और इसका लोप नहीं होने दिया | उनका एकमात्र परम लक्ष्य पूरे संसार में हिंसा से मुक्ति ही रहा. यही उनके मोक्ष की अवधारणा रही | मोक्ष की कोई भी अवधारणा क्यों न हो, मोक्ष प्राप्ति के लिए भारत के लगभग सभी दार्शनिक सम्प्रदायों में आत्मानुशासन पर बल दिया गया है |योग दर्शन में यम-नियम निर्धारित किए गए हैं जिन्हें सभी अन्य विचारकों ने स्वीकार किया है | जैन और बौद्ध दर्शनों ने भी इन्हें किसी न किसी नाम-रूप में अपनाया है | मोक्ष प्राप्ति के लिए गांधी जी के एकादश व्रतों में भी पांचों ‘यम’ सम्मिलित हैं | सत्य और अहिंसा तो हैं ही, इसके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य, अस्तेय, और अपरिग्रह भी हैं | पर इन पांच के अलावा गांधी ने अपने समय और समाज की आवश्यकताओं को देखते हुए छ: और व्रतों को भी अपने एकादश व्रतोनुशासन में सम्मिलित किया है | इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं | एक तो यह कि गांधी जी व्यक्ति और समाज में एक-सूत्रता पाते हैं | मोक्ष केवल व्यक्तिगत मामला नहीं है इसके लिए जो अनुशासन हो उसका एक सामाजिक आयाम भी होना चाहिए | शरीरश्रम, स्वदेशी, अभय, अस्पृश्यता, सर्वधर्म-समानत्व ये सभी ऐसे व्रत हैं जो मोक्ष के सन्दर्भ में गांधी की सामाजिक दृष्टि को स्पष्ट करते हैं | गांधी ने मोक्ष को एक वैयक्तिक ओर निजी उपलब्धि कभी नहीं माना | निजी तौर पर भी हिंसा से पूर्ण मुक्ति एक असंभव वस्तु है { हम शरीरधारियों को शरीर की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भी कुछ न कुछ हिंसा करनी ही पड़ती है | इसका नि:संदेह यह आशय नहीं है की हम हिंसा के लिए खुली छुट ले लें | इसका अर्थ यह है की हम अपनी हिंसा का दायरा दिन-ब-दिन ईमानदारी से कम करते जाएं | इतना ही नहीं, अहिंसा में जीवन की संपृक्तता का भाव होने से किसी एक व्यक्ति की हिंसक चूक सारे संसार को प्रभावित किए बगैर नहीं रह सकती | इसका अर्थ यह हुआ कि हमें न केवल स्वयम को बल्कि पूरे संसार को अहिंसा के लिए प्रेरित/अनुशासित करना है | अतः मोक्ष का प्रयत्न व्यावहारिक तभी हो सकता है जब आप स्वयम ही नहीं सारे संसार को इस दिशा में लेकर चलें | यह प्रयत्न सत्याग्रह द्वारा किया जा सकता है | जहां कहीं भी हिंसा, अन्याय या सामाजिक विषमता हो हमें सत्याग्रह का मार्ग ही अपनाना होगा | हिंसा के तांडव को यही रोक सकता है |
कहना न होगा, गांधी बेशक एक व्यावहारिक आदर्शवादी दार्शनिक हैं |

डा. सुरेन्द्र वर्मा १० एच आई जी / १,सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१ मो. ९६२१२२२७७८

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रचनाकार: गांधी का व्यावहारिक आदर्शवाद // डा. सुरेन्द्र वर्मा
गांधी का व्यावहारिक आदर्शवाद // डा. सुरेन्द्र वर्मा
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