मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

लघुकथा - कंधों का बोझ // अविनाश कुमार तिवारी

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पार्क की एक बेंच पर अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठे शर्मा जी आज अपने कंधों को कुछ जादा भारी महसूस कर रहे थे। हालाँकि वो उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ बहुत सी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाती है और कंधों का बोझ बहुत हद तक कम भी हो जाता है. लेकिन उनके कंधों पर इतना बोझ क्यों था??

दरअसल वो दम्पत्ति एक मुंबई में नशा मुक्ति केंद्र के पास के पार्क में बैठे हुए थे जहाँ उनका 28 वर्षीय पुत्र वरुण भर्ती था।

कुशाग्र बुद्धि और बहुमुखी प्रतिभा का धनी था वरुण। 7 पूर्व आईआईटी की परीक्षा पास करने के बाद मुम्बई आईआईटी में प्रवेश मिल गया था। बहुत ख़ुशी के साथ मुंबई विदा किया था शर्मा दंपत्ति ने बेटे को की 5-6 सालोx बाद उसे बड़ी मल्टी नेशनल कम्पनी में बड़े अफसर के रूप में पाकर गर्व करेंगे।

पहले वर्ष में ही आकर्षक व्यक्तित्व का धनी वरुण सबका चहेता बन गया। कॉलेज के तीसरे वर्ष में उसकी दोस्ती रेहान से हुई, कुछ दिनों बाद वो रेहान के मित्रों से भी दरअसल वो 10-12 लड़के लड़कियों का समूह था जो सुकून पाने के लिए नशे का सहारा लेते थे। ऐसा कोई नशा नहीं था जो वो लोग न करते हों। अपने समूह का नाम उन्होंने "घेट्टो" रखा था उनके अनुसार उनके इस नाम का अर्थ था "समाज से घृणा" ये लोग समाज से उकताया हुआ महसूस करते थे स्वयं को और अपनी ही दुनिया में रहकर मात्र नशे को अपना साथी मानते थे ।साथ ही साथ बाहर से आय नए लड़के लड़कियों को अपने समूह का हिस्सा बना लेते थे। कुछ दिनों में वरुण उनके समूह का हिस्सा बन ही गया।

वो भी इनके तमाम कृत्यों में बराबर का साझेदार बन गया। उसके घर जाने पर उसके माता-पिता ने उसके चेहरे को तेज को उतरा हुआ महसूस भी किया लेकिन बाहर रहने का असर होगा सोचकर बात को टाल भी दिया। इसी बीच वरुण की दोस्ती नायरा से हुई जो की उसी घेट्टो समूह का हिस्सा थी। बातें आगे बढ़ी और दोनों के बीच प्यार भी पनप गया। कॉलेज खत्म होने के बाद वरुण का चयन जल्द ही एक बड़ी आईटी कंपनी में हो गया. इसके बाद वो नायरा के साथ लिव इन रिलेसनशिप में रहने लगा।

इसी बीच उनका समूह नशे में मस्त था और उन्हें पुलिस का रेड का सामना करना पड़ा। हालाँकि वो जमानत पर छूट गए किन्तु बदनामी भी हुई और साथ ही साथ वरुण को अपनी जॉब से भी हाथ धोना पड़ा। भविष्य में पैसों के अभाव के कारण नशे के आदि हो चुके वरुण और नायरा अपनी जरुरतों को पूरा करने में असमर्थ थे। नशे की प्यास न बुझने के कारण नायरा ने समुद्र में डुबकी लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद बात शर्मा दम्पत्ति तक पहुँचने में देर नहीं लगी। और 2 दिनों बाद सीधे मुंबई पहुँचे तब तक एक समाजसेवी संस्था का माध्यम से उनका बेटा वरुण एक नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती था। उसे देखने का बाद भारी कंधे के साथ शर्मा दंपत्ति बैठे हुए थे उस बेंच पर बेटे की स्वस्थता की कामना लिए।
शर्मा जी कह रहे थे -

" कितनो घरों को खाता है ये नशा, कितने भविष्यों को गर्त में डालता है, ये कैसा सुकून है जो जीवन तबाह कर जाता है "

जिम्मेदारियों के बोझ से छूटने के इस समय में आज उन्हें और जादा बढ़ा हुआ महसूस कर रहा हूँ,कितने बोझिल हो गये हैं कंधे मेरे।

अविनाश कुमार तिवारी

रायपुर (छत्तीसगढ़)

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  1. मेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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