बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

हास्य-व्यंग्य // बाबा बनो सुख से जिओ ! // यशवंत कोठारी

आजकल मैं धरम-करम के धंधे में व्यस्त हूँ. इस धंधे में बड़ी बरकत है, बाकी के सब धंधे इस धंधे के सामने फेल हैं. लागत भी ज्यादा नहीं, बस एक लंगोटी, एक कमंडल, कुछ रटे रटाये श्लोक, कबीर, तुलसी के कुछ दोहे. बस काम शुरू. हो सके तो एक चेली पाल लो बाद में तो सब दौड़ी चली आएगी. जिस गाँव में असफल रहे हैं वहीं उसी गाँव के बाहर जंगल में धुनी, अखाड़ा, आश्रम. डेरा खोल दो. काम शुरू. लेकिन डर भी लग रहा है. इन दिनों बाबाओं की जो हालत हो रही है वो किसी से छिपी हुई नहीं हैं. कई बाबा जेल में है कई जेल जाने की तैयारी कर रहे हैं, कई बाबाओं की चेलियाँ भी जेल में हैं. कई कथा वाचकों के पास ट्रस्ट है, ये ट्रस्ट इन के घर परिवार के लोग चलाते हैं, बाबा अपने आप को पाक दामन बताते हुए साफ कहते हैं मेरे नाम पर कुछ नहीं है एक इंच जमीं भी नहीं, कई बाबा तो मौका देख कर उद्योगपति बन गए, कम्पनी खोल लिए, बड़े बड़े शोरूम बना लिए. लेकिन बाबाओं की शांति धरम, अध्यात्म की खोज पूरी नहीं हो रही है.

साधु, संत सन्यासी में कोई फर्क नहीं होता है, ऋषि मुनि भी जब जरूरत होती तो राज्य के पास जाकर अनुदान मांगते, मगर आजकल के साधु संत सन्यासी खुद ही राजा बन गए हैं, कुछ सन्यासी तो मठ से निकल कर राजभवन में घुस गए हैं.

धरम के धंधे में कभी भी घाटा नहीं हो सकता हैं. यह व्यवसाय पूरे नफे का है.

दुखी और परम दुखी आत्माएं आती हैं, बाबा लोग इन दुखी आत्माओं के दुःख दूर करने के वादे करते हैं, सपने दिखाते हैं, इन सपनों को पूरा करने के रास्ते दिखाते हैं जो इन बाबाओं की गुफाओं से होकर गुजरते हैं.

एक बाबा कृपा बरसाते हैं इस कृपा के लिए भक्तों को बाबा के खाते में बड़ी रकमें डालनी पड़ती हैं. बाबा दवाईयां भी बेचते हैं, बाबा की पत्रिकाएं किताबें भी खरीदनी पड़ती है. फिर भी यदि कृपा नहीं बरसती तो भक्तों का भाग्य ही ख़राब है. भाग्य हीन का बाबा भी क्या करे. एक गुरु ने नदियों पर रैली निकाली, दूसरे बाबा ने यमुना पर आश्रम लगाया पांच करोड़ का जुरमाना दिया, मगर बाबा पद्म पुरस्कार पा गाये. एक बाबा नदियों को जोड़ना चाहते हैं तो दुसरे बाबा गंगा की सफाई के नाम पर बजट की सफाई कर रहे हैं. बाबाओं का समां कुभ में देखते ही बनता है, पहाड़ों, गुफाओं से सत्ता का सफ़र बाबाओं को रास आने लगा हैं लेकिन अभी भी कुछ सच्चे गुरु, मुनी हैं जिन पर संसार टिका हुआ है.

एक मठ वाले ने नारा दिया –दिव्य व् भव्य पुत्र के लिए सम्पर्क करें. दूसरा क्यों पीछे रहता उसने कन्याओं को बुला कर ब्लैक मेल करना शुरू किया. बाबा जी जेल में है.

भारत में भगवानों कोई कमी नहीं है हर तरफ भगवन ही भगवान, आप कही भी जाकर मिल ले. महिलाएं अकेली आये तो तुरंत फायदे की गारंटी . ये भगवान सरकार सत्ता के पास रहते है, राजनीतिक दल इनको की वोटर मानते है, जो इनको वोट दिलाते हैं. कई बाबाओं ने सरकार सत्ता से बड़े बड़े लाभ ले लिए, अपने स्कूल कालेज अस्पताल खोल लिए. करोडों अरबों की सम्पत्ति कर ली. रामायण गीता पुराण लिखने वाले गरीबी में मर गए मगर बाबा सब के सब अमीर है.

जब पुरे कुएं में ही भाग घुली हुई हो तो आम दुखिया क्या करेगा. बीमार, अपाहिज, लाचार, बेरोजगार शादी बच्चों की आस वाला हर तरफ से निराश होकर बाबा, साधु, ओझा, फ़क़ीर, की शरण में जाता है, और अपने मन को शांत करता है. बाबा बलात्कार के भी विशेषज्ञ हो जाते है. कभी भी कहीं भी इनकी सेवाएँ उपलब्ध हो जाती हैं.

धर्म अध्यात्म शांति, सुकून, ज्ञान विज्ञान की बातें इन बाबाओं को पसंद नहीं आती . बाबाओं के माफिया बन गए हैं जो भोली भाली जनता को अपने जल में फंसा लेते हैं.

एक बाबा के निजी सचिव ने बताया –हम जनता को नहीं बुलाते जनता खुद ही अपने दुःख दर्द के लिए हमारे पास आती है. हम तो जनता, भक्तों के दुःख दूर कर रहे हैं. झाड़ा डलवाना, उपर की हवा से बचाव, भूत प्रेत चुडैल डाकन आदि से बचाव के नाम पर बाबा लम्बा माल खींचते हैं. शराब, शबाब के शौकीन बाबा को सब कुछ मुफ्त और श्रद्धा के साथ मिलता है. चेलियों का तो क्या कहना एक से बढ़ कर एक सिर्फ इशारा ही काफी है.

अतः मैंने भी तय किया है कि बाबा बनूँगा. क्या रखा है इस कविता, कहानी व्यंग्य में .

बाबा बनो सुख से जिओ.

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यशवंत कोठारी ८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार जयपुर -३०२००२

1 blogger-facebook:

  1. सुरेन्द्र वर्मा9:36 am

    तथाकथित बाबाओं की अच्छी खबर ली है यशवंत जी ने | बधाई | सुरेन्द्र वर्मा |

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