शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

व्यंग्य // वैश्य साहित्यकार सम्मेलन का रंगारंग कार्यक्रम // मनोज कुमार झा


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सेठ जी शहर में साहित्य सम्मेलन करवा रहे हैं। चर्चा जोरों पर है। सेठ जी समाजसेवी पहले से थे, अब साहित्यसेवी भी हो गए। इनका छोटा लड़का दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. कर रहा है। साहित्यिक है। श्रृंगार रस की कविताओं से एक डायरी भर रखी है। सेठ जी अपने बेटे की साहित्य प्रतिभा से गद्गद् हो गए। उन्होंने उन कविताओं का एक संग्रह छपवा दिया। बेटे ने काव्य संग्रह का समर्पण अपनी कविताओं की प्रेरणा प्रेरणा अग्रवाल के नाम किया जिनसे वह दिन-रात लगातार प्यार करता था। पाठकों के विशेष ध्यानाकर्षण के लिए उसने उनकी मोहक अदा में एक तस्वीर भी संग्रह में छपवाई थी। प्रेरणा अग्रवाल के पिता जैसा कि स्वाभाविक है, एक बड़े व्यवसायी थे। तीन बंगलों, चार कारों और आधा दर्जन देशी-विदेशी कुत्तों के मालिक थे। प्रेरणा अग्रवाल छह बहनें थीं। इस तरह से सबके हिस्से एक-एक कुत्ता हुआ।

सेठ जी इस बात से काफी प्रसन्न थे कि उनके प्रतिभाशाली पुत्र ने प्रेम करने के मामले में भी जाति-बिरादरी का ख्याल रखा और बिना भाइयों की बहन से प्यार किया जो अभी लिव-इन से होता हुआ कहीं शादी में बदल गया तो ससुर के माल के छठवें हिस्से का हकदार हो जाएगा। ससुराल की जायदाद बिरलों को ही नसीब होती है।

बहरहाल, सेठ जी ने अपने कवि-पुत्र से कहा, “बेटा, मैं तुम्हारे काव्य संग्रह का विमोचन किसी श्रेष्ठ वैश्य साहित्यकार से कराना चाहता हूं। इस अवसर पर एक वैश्य साहित्यकार सम्मेलन हो जाए तो अच्छा रहे। इस देश में तरह-तरह के साहित्यिक संगठन हैं, पर वैश्य साहित्यकारों का एक भी संगठन नहीं है। मेरी इच्छा है कि वैश्य साहित्यकारों का भी एक राष्ट्रव्यापी संगठन हो और तुम इसके संस्थापक अध्यक्ष बनो। इससे तेरे यश और कीर्ति में चार चांद लग जाएंगे। मैंने साहित्य तो कभी नहीं पढ़ा, पर सुना है कि हिंदी साहित्य में वैश्य साहित्यकारों का बड़ा योगदान रहा है। एम.ए. करने के बाद तुम इसी विषय पर पीएच.डी. भी कर लेना। अब तुम किसी ऐसे साहित्यकार का पता लगाओ जो वैश्य हों, उन्हें बुलाने की जिम्मेदारी मेरी। और सुन, तू तो विद्वान है। ‘हिंदी साहित्य में वैश्य साहित्यकारों का योगदान’ शीर्षक से एक लेख लिख डाल। सम्मेलन में वह पढ़ना।”

पुत्र ने कहा, “डैड, आपका यह विचार अनोखा है। मैं इसका पता लगाता हूं कि अभी सबसे बड़ा साहित्यकार कौन है। लेख भी लिखूंगा। याद आया डैड, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का निर्माता कहा जाता है, वे भारतेंदु हरिश्चंद्र वैश्य ही थे। इस तरह तो साहित्य पर वैश्यों का कब्जा इतिहाससम्मत माना जाएगा। उनके ग्रुप में एक बालमुकुंद गुप्त भी थे। अपने हरियाणे के ही थे। उन्होंने ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ लिखा था। और डैड, ‘भारत-भारती’ लिखने वाले मैथिलीशरण गुप्त, उनके अनुज सियारामशरण गुप्त ये सभी वैश्य लेखक ही थे। छायावाद के दौर में जयशंकर प्रसाद वैश्य ही थे। इनका महाकाव्य ‘कामायनी’ अपने सिलेबस में है। नई कवितावादियों और प्रगतिशीलों में अनेकों नामी वैश्य साहित्याकर हुए हैं। डॉ. जगदीश गुप्त, केदारनाथ अग्रवाल, भारतभूषण अग्रवाल, नेमिचंद जैन और भी ना जाने कितने। संभवत: जैनेन्द्र भी वैश्य ही थे, पर कन्फर्म करना पड़ेगा। अनेकों वैश्य साहित्यकार हैं डैड, पर दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा। लेख तो मैं तैयार कर लूंगा। पर ज्यादातर साहित्यकार अपने को मार्क्सवादी कहते हैं, ये जाति-बिरादरी नहीं मानते। क्या ये वैश्य साहित्य सम्मेलन में आएंगे?”

“बेटे, मैं मानता हूं तू विद्वान है। पढ़ाई में मैं तेरे आगे कुछ नहीं हूं। तूने यह जो कहा मारकसवादी, इसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। पर हमारे समाज में जातिवाद के आगे सब वाद फेल हैं। और वैश्य साहित्यकारों का पता कर किसी को विमोचन के लिए तैयार कर। साहित्यकार वैश्य हो या किसी अन्य जाति का, स्वभाव से ही सुरा-सुंदरी व पत्रम्-पुष्पम् का प्रेमी होता है। हमारे लिए मांस-मदिरा वर्जित है, पर साहित्यकरों के लिए नहीं। उन्हें सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी से ही यह छूट मिली हुई है। पर बेटा, तुम परिवार की परंपरा को ध्यान में रखते हुए मांस-मदिरा से दूर रहना। सुंदरियों के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा। इन्हें शास्त्र में वर्जित नहीं माना गया है। और बेटा, साहित्य साधना बिना सौंदर्योपासना के नहीं हो सकती। इतना तो विद्वान अफसरों की संगति में मैं समझ चुका हूं। क्या कहूं बेटा, अक्सर इनकम टैक्स के बड़े अफसर कवि भी होते हैं। उनकी सेवा हमें अफसर के नाते अलग और कवि होने के नाते अलग से करनी पड़ती है।”

“डैड, ये सुरा को मेरे लिए वर्जित कर आपने ठीक नहीं किया। फिर मैं कैसे साहित्यकार बन पाऊंगा?” सेठपुत्र ने इसरार किया।

“बेटे, अभी तू छात्र है। जब स्थापित साहित्यकार बन जाना तो इम्पोर्टेड सुरा ग्रहण कर सकते हो। उसे शराब नहीं माना गया है। हाकिमों का साथ देने के लिए कभी-कभी तो यह मैं भी ग्रहण कर लेता हूं, पर भक्ष्य-अभक्ष्य क ख्याल रखना। और बेटे, एक विचार मन में कौंधा है। लेख लिखते हुए इस बात का भी उल्लेख कर देना कि साहित्य क्या, इस देश को अंग्रेजों से आजाद भी एक वैश्य ने ही कराया। महात्मा गांधी तो वैश्य ही थे बेटा। इसलिए समाज में वैश्यों का स्थान सर्वोपरि है।”

“हां, डैड! यह तो बड़ी दूर की सूझी आपको। मैं जरूर इसे हाइलाइट करूंगा। पर डैड, जब तक मैं स्थापित साहित्यकार नहीं हो जाता तब तक ठीक है शराब नहीं पिऊंगा, पर क्या बियर पर भी रोक रहेगी? इसकी इजाजत तो दे देते डैड। नहीं तो साहित्यकार बनने की दिशा में कदम कैसे उठेंगे?”

“अरे बेटे, मेरा कहना है कि साहित्यकार बनने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। साहित्य अपने आप में एक नशा है। इसलिए जो भी करना छुपछुपा कर ही करना, बदनामी मोल लेना बुद्धिमानी नहीं है। इस बात को किसी से मत बताना कि तुम प्रेरणा जी से लिव-इन में हो। वैश्य समाज में अभी यह बात नहीं चली है। तुम तो शादी के लिए प्रपोज करो। धूम-धाम से तेरी शादी करूंगा। ऐसी ससुराल उन्हें ही नसीब होती है जिन्होंने पूर्व जन्म में बहुत पुण्य कार्य किए हों। प्रेरणा जी के पिता जी कोई न कोई बिजनेस तुम्हें संभालने के लिए दे ही देंगे। तुम मौज करोगे बेटा मौज। अभी फिलहाल पूरा ध्यान विमोचन और सम्मेलन पर रखो। मैंने सभी अखबारों में खबरें छपवाने का पूरा इंतजाम कर लिया है।” कहते हुए सेठ जी गद्दी पर गए और पुत्र महोदय सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह के समर्पण पृष्ठ पर छपी प्रेरणा जी की तस्वीर में खो गए।

इधर सेठ जी ने कव्य संग्रह के विमोचन और वैश्य साहित्याकर सम्मेलन की तिथि तय कर दी। उनका सिद्धांत था ‘शुभस्य शीघ्रम्’। हिंदी के उन साहित्यकारों के बड़े-बड़े पोस्टर तैयार करवाए जाने लगे जो जाति से वैश्य थे। इनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त का नाम सर्वोपरि था। सेठ जी के पुत्र ने भी ‘हिंदी साहित्य में वैश्य साहित्याकारों का योगदान’ विषय पर एक धांसू लेख तैयार कर लिया था। अब वे किसी ऐसे बड़े साहित्यकार को विमोचन के लिए तैयार करने दिल्ली गए जो जाति से वैश्य हों। वैश्य तो कई थे, पर वैश्य साहित्यकार सम्मेलन के नाम पर भड़क उठते थे। आखिर बड़ी हिम्मत कर डॉ. जैन का पता हासिल किया और दरवाजे की घंटी बजा दी। उन्होंने अपना विद्यार्थी जान बैठाया, पानी पिलवाया और नौकर को चाय बनाने के लिए कहा। पर जब इन्होंने वैश्य साहित्यकार सम्मेलन और काव्य संग्रह के विमोचन की बात कही तो भड़क गईं और डांट कर भगा दिया।

कई जगह डांट खाने के बाद जब उनकी हिम्मत जवाब देने लगी और महसूस हुआ कि अब सारे किए-धरे पर पानी फिरने वाला है तो बड़े मायूस हुए। निराश कमरे में पड़े प्रेरणा जी के मैसेज का इंतजार कर रहे थे, तभी बियर की बोतलें लिए दो दोस्त आ गए। अभी गिलासों में बियर ढलनी शुरू हुई ही थी कि प्रेरणा जी भी आ गईं। लो कट जींस और टॉप में ग़ज़ब ढा रही थीं। एक गिलास और लाई गई। दो बोतल दम साध कर पी गई, फिर आगे पीने के साथ ही विचार-विमर्श का दौर शुरू हुआ। प्रेरणा जी ने कहा कि वे एक प्रोफेसर को जानती हैं जिन्होंने साहित्य के आलोचक के रूप में बड़ा नाम कमाया। कट्टर मार्क्सवादी थे। हैं वैश्य ही। जब मैं बी.ए. (हिंदी ऑनर्स) में थी तो हाथ धोकर मेरे पीछे पड़े थे। पर मैंने भी एक लिमिट से ज्यादा उन्हें नहीं बढ़ने दिया। कहते थे कि तुम्हें कवयित्रि के रूप में स्थापित करवा कर ही रहूंगा। उन दिनों कई बड़ी पत्रिकाओं में मेरी कविताएं छपवाईं। भगवान जानता है, मैंने आज तक एक भी कविता नहीं लिखी, पर उन्होंने दो साल के भीतर मेरी दो दर्जन कविताएं बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं में फोटो सहित छपवा दी। पर बदले में उन्हें कुछ खास नहीं मिला तो निराश हो गए और मेरी एक सहेली जो मुझसे कुछ कम सुंदर थी, उसे साहित्यकार बनाने का बीड़ा उठा लिया। सुनते हैं, अब उन्होंने मार्क्सवाद से घोषित रूप से नाता तोड़ लिया है, किसी संगठन में भी नहीं हैं। प्रतिबद्ध तो हैं, पर बस सुरा-सुंदरी से। इनसे मैं मिलूं तो काम बन सकता है। फीस तो सभी लेते हैं, ये तैयार हुए तो इन्हें कुछ ज्यादा दे देंगे। मैं मिल लेती हूं, आज ही शाम को जाऊंगी।

“मैं भी चलूंगा।” सेठपुत्र बोले।

प्रेरणा जी ने कहा, “तुम्हारे जाने से बनता काम बिगड़ जाएगा। तुम घबराओ नहीं, मैं उन्हें लिमिट से आगे जाने नहीं दूंगी।” इस पर सहमति बन गई। बियर भी खत्म ही हो चली थी।

देर रात जब प्रेरणा जी प्रोफेसर साहब से मिल कर आईं तो सेठपुत्र जिन की चुस्कियां ले रहे थे। आते ही प्रेरणा जी ने कहा कि काम बन गया। पच्चीस मांग रहा था, पर मैंने कह-सुन कर बीस पर राजी कर लिया। इम्पोर्टेड व्हिस्की का इंतजाम रखने को कहा है।

“और कुछ?” सेठपुत्र ने उतावलेपन से पूछा।

“और क्या? देखते ही गले से लगा लिया और कमर पर हाथ फेरने लगा। पी रहा था। बाल खिचड़ी हो गए हैं। बूढ़ा लग रहा था। शादी तो उसने की ही नहीं।”

“और कुछ?” सेठपुत्र ने फिर पूछा।

“और क्या यार, कमर के नीचे थपकी दे दी तो क्या हुआ? डोंट बी स्टुपिड। चलो, डिनर कर के आते हैं।”

निश्चित तिथि पर धूमधाम से काव्य संग्रह का विमोचन हुआ। कई साहित्यकार आए, पर उनमें जिला स्तरीय साहित्याकरों की संख्या ही ज्यादा थी। राज्य स्तरीय भी नामालूम से एक-दो वैश्य साहित्यकार आ गए। हां, जिले के तमाम अफसर कार्यक्रम में लगातार मौजूद रहे। प्रेरणा जी ने मंच संचालन किया। रेशमी साड़ी में उनकी खूबसूरती देखते ही बनती थी। सेठ जी उनसे बेटा-बेटा कह के बातें कर रहे थे। मंच की सजावट देखने लायक थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद वैश्य साहित्यकार के रूप में स्थापित कर दिए गए थे। पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही थी। दर्शकों-श्रोताओं को जूस, कोल्ड ड्रिंक, आइसक्रीम, फ्रूट सलाद आदि पेश किए जा रहे थे। काव्य संग्रह के विमोचन की औपचारिकता के बाद जब सेठपुत्र ने अपना ‘शोधलेख’ पढ़ा तो अफसरों और स्थानीय कॉलेजों के प्राध्यापकों-प्रोफेसरों ने वाह-वाह किया। इस कार्यक्रम की समाप्ति के बाद चुने हुए लोगों के लिए एक विशेष कक्ष में सुरापान का प्रबंध था।

दूसरे दिन वैश्य सम्मेलन के साथ ही कवि सम्मेलन का कार्यक्रम भी था। दिन में वैश्य साहित्य सम्मेलन संपन्न हुआ। लगभग सभी वक्ताओं ने एक सुर से कहा कि जब हिंदी साहित्य के निर्माता भारतेंदु ही वैश्य थे तो साहित्य का भविष्य वैश्यों के हाथों ही सुरक्षित रह सकता है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज साहित्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, पर जब हमारे बीच सेठ जी के पुत्र के समान कवि और प्रेरणा जी जैसी कवयित्रि मौजूद हैं, साथ ही वैश्यों की नई पीढ़ी बिजनेस के साथ ही साहित्य में भी योगदान करने को तैयार है तो हम हर खतरे पर काबू पा लेंगे।

रात में कवि सम्मेलन में समां बंध गया। यह देखकर कि सिर्फ कविताओं से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन संभव नहीं है, सेठ जी ने आईपीएल की तर्ज पर चीयर गर्ल्स का इंतजाम भी कर रखा था। ये मुंबई से पलायन कर आई बार बालाएं थीं। ये मंच पर चारों ओर कमर मटका रही थीं और पीकर मस्त हुए कवियों को बदमस्त बना रही थीं। हर कविता-गीत के बंद और ग़ज़ल के हर मिसरे के बाद ये डांस करतीं। एक कवि के काव्य पाठ के बाद पांच मिनट का चीयर गर्ल डांस होता, फिर दूसरे कवि को मौका मिलता।

कुल मिला कर काव्य संग्रह का विमोचन, वैश्य साहित्य सम्मेलन और काव्य पाठ के साथ चीयर गर्ल्स का रंगारंग कार्यक्रम बेमिसाल रहा। कार्यक्रम के अंत में अफसरों, स्थानीय नेताओं और पत्रकारों की बधाइयां स्वीकार करने क बाद धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सेठ जी ने कहा कि वे हर साल इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करेंगे और उन्हें पूरी उम्मीद है कि वैश्य समुदाय जैसे बिजनेस में अपनी सर्वोपरि भूमिका निभा रहा है, वैसे ही साहित्य के प्रचार-प्रसार में भी अपनी भूमिका निभाएगा। इसे इतिहास ने साबित किया है कि हमारी जाति में साहित्यकारों की कमी नहीं रही है। इसे हमारे बेटे और प्रेरणा जी ने भी साबित किया है। साहित्य सेवा देश की सबसे बड़ी सेवा है। मैं चाहता हूं कि हर वैश्य परिवार से एक न एक युवा साहित्य के क्षेत्र में जरूर आवे। तब हमारा देश फिर से विश्वगुरु कहलाने लगेगा।

अंतत: तालियों की जोरदार गड़गड़ाहट के साथ सम्मेलन समाप्त हुआ।

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e-mail- manojkumarjhamk@gmail.com

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