बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

हास्य-व्यंग्य // फ्रेण्ड रिक्वेस्ट चालू आहे….// प्रदीप उपाध्याय

image

मुझे लगता है कि सोशल मीडिया बड़े ही काम की चीज़ है। जो पूरे जीवन काल में नहीं हुआ,वह आश्चर्यजनक रूप से जीवन के ढ़लान के समय हो रहा है!जहाँ स्कूल-कॉलेज के दिनों में मुझे बड़ा ही सुमड़ा व्यक्ति करार देकर कोई घास नहीं डालता था,कोई दोस्ती के लायक नहीं समझता था, वहीं आज जब मैं बुढ़ा गया हूँ; हालांकि इस बात को मानने के लिए कोई तैयार नहीं होता और कहने वाले को पलटकर जवाब भी दे देता है कि बूढ़ा होगा तेरा बाप तथापि अब बाल काले करने की इच्छा मृत प्रायः हो चुकी है और ऐसे में सोशल मीडिया पर सैकड़ों लोगों की दोस्ती के बीच जब विदेशी बालाओं की डेली फ्रेण्ड रिक्वेस्ट प्राप्त हो रही है तब कब्र में लटकती टांगों में भी जोश भर गया है और मोबाईल/लैपटॉप स्क्रीन पर ऊंगलियाँ तेजी से दौड़ने लगी हैं!

अब दिल है कि मानता ही नहीं है; इच्छा होती है कि सभी विदेशी ललनाओं से दोस्ती कर ही लूं ,लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि ये विदेशी बालाएं हम बुढ़ा गये लोगों से ही क्यों दोस्ती करना चा्हती हैं! जब इनकी प्रोफाइल पर निगाह डालता हूँ तो कई एक ही दिन में तीन -चार पोस्ट डालकर फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर देती हैं,कई के सिर्फ मेल फ्रेण्ड्स ही दिखाई देते हैं! अब एक दिन में और कौन फ्रेण्ड बन सकता है!कुछ विदेशी बालाएं बेचारी ऐसी भी दिखाई दीं जो मित्रता की जल्दबाजी में अपना लिंग यानी सेक्स भी भूल गईं और फीमेल की जगह मेल अंकित कर गई। खैर,गलती इंसानों से ही होती है और यह किसी से भी हो सकती है।

बहरहाल,क्या कोई बता सकता है कि इन बालाओं को हम जैसे बूढ़े-खूसट लोगों को ही दोस्त बनाने की बात क्यों सूझी! दुनिया में एक से बढ़कर एक गबरु जवान पठ्ठे मौजूद हैं। माया के भण्डार वाले लोगों की भी कमी नहीं है। ऐसे लोग फेसबुक पर कम होंगे तो ट्विटर पर खोजे जा सकते हैं हम कलम घिस्सू लोगों से वाह-वाह के अलावा क्या मिलना है! आपको बता दूं कि अभी तक मैंने इन विदेशी बालाओं की फ्रेण्ड रिक्वेस्ट कबूल नहीं की है और वैसे भी इस उम्र में पत्नी का कोप भाजन नहीं होना चाहता हूँ। हाँ, छुपकर उन विदेशी बालाओं की प्रोफाईल जरुर चेक कर लेता हूँ। हम जैसे कई बुड्ढे उनके मित्र भी बन चुके हैं ,उनकी दोस्ती का हश्र तो नहीं मालूम लेकिन हाँ,पिछले दिनों समाचार पत्रों में पढ़ा जरुर था कि कुछ वरिष्ठ नागरिक यानी रसिक बुढ़ऊ ऐसी दोस्ती कर ठगी के शिकार हो गए थे किन्तु अपना दुखड़ा किसी के सामने रो भी तो नहीं सकते थे!

वैसे जो भी हो,मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि सभी विदेशी ललनाऐं ऐसी ठगोरी ही निकलेंगी लेकिन इनकी दोस्ती से हमें क्या हासिल! बुढा़पे में घर टूटने की नौबत आ जाए तो फिर कहाँ ठोर-ठिकाना!मन किसका नहीं ललचाता,हर कोई फिसलन पर ही तो खड़ा है। अभी बाबाओं के संस्करण तो चल ही रहे हैं। मेनका-विश्वामित्र का उदाहरण देकर हम अपना स्पष्टीकरण भी दे सकते हैं लेकिन कानून अंधा है और जग की बात तो छोड़ ही दीजिए! वैसे कलमकार को यह हक हासिल है किन्तु प्यारे जेब कट सकती है, सम्भल कर रहना,यह अन्तर्आत्मा की आवाज रह-रहकर सचेत भी करती है; फिर भी बागी मन कहता है कि ऐसी फ्रेण्ड रिक्वेस्ट मुझे स्वीकार ही लेना चाहिए क्योंकि साहित्य प्रेमी लोग उम्र, जाति, धर्म, मजहब, देश की सीमा से बंधे नहीं होते। आपका क्या ख्याल है।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------