विश्वसनीयता (लघुकथा)-प्रदीप कुमार साह

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एक शिक्षक अपने छात्र को साहित्य विषयक पाठ का पठन-पाठन कराए. तत्पश्चात छात्र को संबोधित अपनी टिप्पणी में कहा,"तो बच्चों, पाठ के माध्यम से आपने जाना कि एक अच्छी साहित्यिक पुस्तक किस तरह उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है और किसी आदमी की जिंदगी बदल सकता है."

तभी शिक्षक की अनुमति से एक छात्र नम्रतापूर्वक अपनी जिज्ञासा उनके समक्ष रखा,"श्रीमान, एक अच्छी साहित्यिक पुस्तक का उचित मानदंड क्या है?"

शिक्षक स्नेहपूर्वक उसे समझाया,"एक पुस्तक को तभी अच्छी साहित्यिक पुस्तक की मान्यता मिल सकती है जबकि उसके पाठक के आयुवर्ग के मद्देनजर उसमें रोचक और शिक्षाप्रद रचनाओं का समावेश हो तथा वह सकारात्मक उद्देश्य प्राप्त कराने में सहायक हो."

सीधा-सादा छात्र मासूमियत भरे शब्द में पुनः पूछा,"श्रीमान, अच्छी और शिक्षाप्रद साहित्यिक पुस्तक में संकलित रचना की गुणवत्ता में विश्वसनीयता-स्थापन की आवश्यकता क्या नहीं है, यथा एक शिक्षक और उनके छात्र तथा एक माता-पिता एवं उनकी संतति के मध्य विश्वसनीयता सदैव स्थापित रहती है?"

शिक्षक सहजता से बोले,"हाँ, वह तत्व तो बेहद आवश्यक है."

छात्र पुनः पूछा,"श्रीमान, किसी रचना की विश्वसनीयता क्या उसके पात्र पर निर्भर नहीं होता?"

छात्र के बहुविध प्रश्न से शिक्षक को आश्चर्य हुआ, तथापि वह स्नेहपूर्वक बोले,"हाँ, यह तथ्य भी सत्य है कि किसी रचना की विश्वसनीयता उसके पात्र पर पूर्णरूपेण निर्भर है."

छात्र निर्भीकतावश पुनः अपने शिक्षक से पूछा,"श्रीमान, जब एक साहित्यिक पुस्तक में कोई भी रचना वह प्रतीत नहीं होता कि उसके पात्र की वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई संबंध है, तब वह पुस्तक अपने उद्देश्य-पूर्ति में सफल क्या हो पाता है?

उक्त परिस्थिति में एक पुस्तक और उसमें समाहित रचना पाठक के समक्ष सकारात्मक चुनौती स्वीकार करने से संबंधित लक्ष्य रखने में सफलता हासिल क्या करता है? उक्त पुस्तक की विश्वसनीयता क्या तब भी अक्षुण्ण रहती है? पुनः जिसकी स्वयं की विश्वसनीयता संदिग्ध है, वह एक जिंदगी बदल सकने में कदाचित समर्थ क्या हो सकता है?"

छात्र के एकाधिक प्रश्न से शिक्षक की भृकुटि तन गई. तथापि वह संयत रहकर कुछ समय तक विचार किया. फिर अनायास ही बोल पड़ा,"वास्तव में संसार की सबसे बड़ी चीज किसी विषय-वस्तु की विश्वसनीयता होती है. संसार में विश्वसनीयता-रहित बड़ी से बड़ी चीज-वस्तु महत्वहीन हैं."

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