बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

कहानी // स्वाभिमान // देवी नागरानी

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बच्चा निरंतर रोता रहा, इस क़दर कि रोते-रोते उसका गला खुश्क हो गया. उसकी आवाज़ गले में अटक सी गई. बार-बार उस मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ ने मेरे मन में अनगिनत अहसास जगाये, जो मुझे अपने माज़ी के कैदखाने में फिर से घसीट कर लेकर जाते रहे. कानों में रोने की आवाज़ कुछ ऐसे उतरी कि मेरे अंतर्मन में तूफानों सा तहलका तांडव करने लगा. एक ज्वाला सी मन में उत्पन्न हुई उन बेजवाबदार माँ-बाप के लिए, जो उस बच्चे को इस तरह ठंडी घास पर लिटाकर खुद न जाने कहां गुम हो गए? इतना भी ख्याल न रहा कि सूरज ढलने को आया है और रात का अंधेरा चारों ओर हावी हो रहा है. बच्चे की ओर से इतने गैर जिम्मेदार, लापरवाह...कि बस.... हद हो गई है....!

मैं बच्चे के क्रंदन से मन से जुड़ी रही. सर्दियों के कारण शाम का धुंधलका भी गहरा होता रहा. बाग़ में बैठे छोटे-बड़े, एक-एक करके उठते हुए अपने-अपने ठिकानों की ओर रवाना होते रहे. मैं भी उठने का विचार कर ही रही थी कि बच्चे के रोने की आवाज ने एक बार फिर मुझे उसकी ओर आकर्षित किया. मैं बेंच से उठकर खड़ी हो गई, जहां पिछले दो घंटे से अपने माज़ी के नए पुराने रिश्तों के बेजोड़ जोड़ में उलझी रही. फिर से बच्चे की रुलाई ने मुझे उन ख्यालों की जंजीरों से मुक्त किया. उठकर चारों ओर देखा, फिर उस ओर क़दम बढ़ाये जहां से आवाज़ आ रही थी.

क़दम दर क़दम आगे बढ़ाते हुए, एक पेड़ के नीचे चादर पर चार पांच महीने का बच्चा रोता बिलखता दिखाई दिया. ठंड के कारण ज़ोर ज़ोर से रोते-रोते वह क्लांत हुआ जा रहा था. कभी वह अपने हाथ पांव मार कर खुद की असहाय अवस्था का इज़हार करता, तो कभी मुंह में अपना अंगूठा डालकर निद्रा की गोद में विश्राम पाने का प्रयास करता. आगे जाकर देखा, बच्चा अच्छा खासा खूबसूरत था. भरा हुआ बदन, गोल चेहरा, बड़ी बड़ी आंखें, पैरों में सुंदर ऊन के मोजे, हाथों में चांदी के सफ़ेद और काले मोतियों के कड़े. आंखों में पड़ा काजल, रोने की वजह से आंसुओं के साथ उसके गुलाबी गालों पर कालापन पोत गया था. रोते-रोते उस बच्चे की आंख लग गई थी.

मैंने चारों ओर निहारा, बाग़ काफी वीराना हो चुका था. बस कुछ नौजवान लड़के लड़कियां यहां वहां बेमक़सद घूम रहे थे, पर किसी का भी ध्यान बच्चे की आवाज़ की ओर न गया था. मैंने तुरंत अपने कंधों पर पड़ी शॉल बच्चे के बदन पर डाली दी. क्या करना है, क्या नहीं करना है, यह निर्णय लेने की कशमकश अभी भी जारी थी.

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ऐसी ही इन्तहाई कशमकश के दौर से पहले भी गुज़री हूँ मैं . दस साल पहले ऐसी ही एक उलझी डगर पर मेरी जिंदगी आकर ठहरी थी. उस कशमकश के दौर में मुझे एक फैसला लेना पड़ा, घर छोड़ने का कठोर फैसला. कारण तब भी बच्चा ही था!

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मेरी शादी बीस साल की उम्र में हुई, तेरह सदस्यों के स्वस्थ-संपन्न परिवार में. मेरा पति घर का सबसे छोटा बेटा था. मेरे जेठ के तीन बच्चे, मंझले देवर के दो बच्चे, मेरे सास-ससुर, मैं और मेरा पति सुभाष. शादी के बाद मेरा नाम अर्चना से बदलकर ‘रचना’ रखा गया.

‘रचना एक कप चाय तो दे देना.’  आवाज़ मेरे बड़े जेठ की होती.

‘और बहू, अपने ससुर को भीगा हुआ दातुन तो दे आना.’ यह आवाज़ सास के दुलार भरे आदेश की होती- ‘और सुनो उनकी पतलून में नाड़ा भी डाल देना.’

‘जी मांजी....!’

‘जब फुर्सत मिले तो मेरी चिलम भर देना बहू.’ काम में इज़ाफा करते बड़ी सास ज़ोर से आवाज़ देकर कहती.

प्यार में बंधी उनके आवाज़ों के पीछे भागते-दौड़ते दौड़ते, कैसे सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम हो जाती, पता ही नहीं चलता. सभी को खुश रखने की चाहत जैसे एक जुनून बन गई. मां ने भी तो विदाई के समय यही कहा था- ‘सबको अपना समझ कर उनका मान-सम्मान करना, सेवा करके खुश रखना. उनकी छोटी-छोटी सेवाओं से उनके दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश करना!’

एक तो बाली उमर, दूसरा माँ के दिये हुए संस्कारों की मर्यादा, और तीसरा बड़ों का आदर-सम्मान व् सेवा करने की इच्छा मुझसे यह सब कुछ कराती रही. उनकी ख़ुशी की खातिर खुद को भुलाने में बड़ा सुख मिलता. माँ ने यह भी कहा था-“उनकी ख़ुशी में खुश रहने का वरदान क्या होता है यह तुम तब समझोगी जब तुम खुद अपने बच्चों की माँ बन जाओगी.’

बार-बार कहे गए माँ के शब्द कोमल हृदय पर अंकित से हो गए. और सब सच भी लगने लगा, क्योंकि घर के सभी सदस्य मुझ पर कुर्बान जाते थे. एक तो उन्हें सुंदर सयानी समझदार बहू मिलने की खुशी, दूसरा सबकी हाँ में हाँ मिलाने का मेरा हुनर उन्हें बहुत रास आया. मैंने माँ की जो बात गांठ बांध कर रखी थी, वह कारगर हुई.

रात को सब सदस्य खाना खाने के बाद, दिन भर का समाचार आपस में बाँटते, सलाह-मशवरा करके अपने अपने कमरों में जाते. बहुएं बारी-बारी से सास के कमरे में जाकर उसके पैर दबातीं. मैं, परिवार की छोटी बहू होने के नाते, कभी-कभी बड़ी जेठानी के पांव भी दबा दिया करती थी.

सुभाष का स्वभाव हंसमुख था. संयुक्त परिवार होने के कारण घर में हमेशा शोरगुल रहा करता था, पर एकांत का लुत्फ़ लेने के लिए कभी वह मुझे बाग में, तो कभी पिक्चर ले जाता. मैं खुश, बहुत खुश थी. अपनी माँ के घर मैं अकेली संतान थी, कोई न बात करने वाला, न खेलने वाला, न बांटने वाला था. बड़े संयुक्त परिवार में रहते लगा कि दो या तीन बच्चे होने ज़रुरी है. अगर बेटी हो और उसकी शादी हो जाए तो बेटा साथ हो. रिश्तों का बड़ा बीहड़ न सही, एक छोटी से बगिया तो हो, जहाँ बहन के बच्चों का कोई मामा हो, या भाई के बच्चों की कोई बुआ हो. एक बच्चे से तो रिश्तों में बरकत आने से रही. यह मेरी अपनी सोच थी जो यहाँ और वहां के बीच की तुलनात्मक परिस्थिति से उत्पन हुई थी.

लेकिन जीवन में हर किसी का सोचा हुआ, कहां साकार होता है? हंसते मुस्कुराते चार साल गुज़र गए. चौबीस साल पूरे कर के पच्चीसवें साल में पाँव धरा, पर पैर अभी भी भारी न हुआ. सबकी आंखें मुझपर टिकी हुई थीं, सुखद समाचार की आशा से मेरी ओर निहारा करते, मेरी चाल पर नज़र रखते. उनकी नज़रें दिन तमाम मेरा पीछा करतीं, मुझे भी उनकी आंखों की भाषा पढ़नी आ गई. सच तो यह है कि मैं खुद भी माँ बनना चाहती थी, औलाद का सुख क्या होता है उसका लुत्फ लेना चाहती थी, अपनी ममता को अपने बच्चों पर निछावर करना चाहती थी. मेरी सभी चाहतें मन में धरी की धरी रहीं.

समय बीतने के साथ साथ रिश्तों की वह गर्मजोशी, वह स्नेह-दुलार, आवाज़ में अपनापन न जाने कहाँ गायब होता गया, और एक अजनबीपन का अहसास मन में घर करने लगा. सुभाष भी मुझसे कुछ खिंचा खिंचा सा रहने लगा. मैं जैसे घर की कोई बेकार चीज़ सी बनती जा रही थी, जिसके वजूद का कोई मूल्य ही न था. हर सदस्य अपना काम भी खुद करता, मुझे आवाज़ देने की जैसे किसी को जरूरत ही न रही.

कभी सोचती कि इस बदलाव का कारण क्या हो सकता है? क्या मेरी सेवा में कोई कमी आ गई है, या कोई भूल चूक हो गई थी मुझसे? बस सोचों के भंवर में फंस कर रह गई. एक दिन दुपहर के एकांत में बड़ी भाभी के कमरे में जाकर उसकी गोद में अपना सर रख कर रोते हुए मैंने पूछा ‘ भाभी आपको मेरी कसम, सच-सच बताना कि घर में बर्फ़ जैसी खामोशी क्यों छा गई है? क्यों हर कोई मुझसे किनारा करने पर तुला हुआ है?’

मेरे सर पर हाथ फेरते हुए जो कुछ भाभी ने बताया, उसे सुनकर तो मेरे होश के परिंदे भी उड़ गए. लगा जैसे जिंदगी में कोई भूचाल आया हो जिसमें मैं, सुभाष, और घर के सभी सदस्य छिट पुट से हो गए थे.

भाभी कहती रही....और सुनते सुनते मैं अपने अस्तित्व की नैया को बीच भंवर में डूबते देख रही थी. इतना बड़ा फैसला होने जा रहा था, और मेरे कानों तक भनक न पड़ी. अपने पति सुभाष पर गुस्सा आया, जिस ने शादी के समय कुछ वादे निभाने के लिए किये थे. क्या वे सब झूठे थे? क्या रिश्तों की डोर में बंधी गाँठ इतनी कच्ची है जो किसी इच्छा-पूर्ति के न होने पर आसानी से खुल जाए या मनमर्ज़ी से खोल दी जाय?

बात खुलकर सामने आई. दूसरे दिन ही सास ने बुलाकर कहा ‘बहू सुभाष की नई पत्नी आएगी तो घर हरा-भरा हो जाएगा, ख़ानदान बढ़ेगा. आखिर सुभाष के दिल में भी बाप बनने के कुछ अरमान हैं. बहुत सोचकर हमने यह फैसला यह लिया है. हम कभी भी तुम्हारा बुरा नहीं चाहेंगे, तुम घर का हिस्सा हो और रहोगी. घर की खुशी के लिए अपना सहकार देने के लिए तैयार रहो. मालिक पर भरोसा रखो, आनेवाली खुशियों से शायद तुम्हारी भी खुशी लौट आये.‘

सुनकर अपने वजूद के होने और न होने का फासला जाना. मैं क्या सोचती हूँ, क्या महसूस करती हूँ, किसी को परवाह नहीं. बस एक खुशी को हासिल करने के लिए सभी को इस तरह मेरा दिल तोड़ना लाज़मी लगा. सबकुछ सुनकर मैं सुस्त चाल, व् गीली आँखों से अपने कमरे में आई. पलंग पर बैठी तो लगा यह कमरा अब मेरा नहीं है, न मैं इस घर का हिस्सा हूँ. अगर होती तो एक बेकार बेजान हिस्सा समझ कर वे मेरी जगह किसी और को ले आने की बात न सोचते, और न मेरे जज्बात को यूं कुचलते. यह तो सौदागरों का घर है. यहां मेरे सिवाय हर किसी की इच्छा पूरी होनी चाहिए, फिर चाहे उसके लिए मुझे ही क्यों न बलि का बकरा बनना पड़े.

औरत और मर्द के वजूद का मूल्यांकन आंका जाता है. मर्द शक्ति वाला है उसकी तमन्ना पूरी हो उसके लिए दूसरी शादी कर सकता है. अगर उसमें से बच्चा न हो तो तीसरी शादी भी करेगा. पर औरत को अधिकार देने और लेने की डोर वह अपने हाथ में रखेगा. यह रिश्ते नातों का कैसा जंगल है जहां निभाने की रस्में स्वार्थ की बुनियाद पर खड़ी हैं.

मेरे तन-मन में जैसे आग लग गई. नफ़रत का अहसास मन में जागा, लगा अपनों के बीच नहीं, गैरों के बीच में पनाह पाई है. एक औरत कभी भी अपनी गृहस्थी को तोड़ना नहीं चाहती जिसे वह यत्न, प्रयत्न और प्रयास से खड़ा करती है. पर जब वहीं उसके स्वाभिमान और सम्मान के चिथड़े रोज़ उड़ने लगते हैं तो वह उसका त्याग करने पर मजबूर हो जाती है. जीवन प्रदान करना उसकी क्षमता है. हां पुरुष प्रधान समाज में हालत से मुकाबला करना कठिन ज़रूर है. यहीं औरत अपनी बनाई दीवारों की कैदी बन जाती है. अपने भीतर के न्यायालय में स्वयं को यह निर्णय सुनाती है, कारावास का दंड भोगती है.

बस उसी वक्त मन मजबूत किया, एक कठोर फैसला लिया. शादी में मिले सोने के जेवर भी नहीं लिए. जो नई दुल्हन सुहागन बनकर इस घर में, इस कमरे में आएगी, रहेगी, सोएगी, खानदान के वारिस को जन्म देगी, सब उसी को मुबारक हो. मेरा कुछ भी नहीं है- न घर, न पति, न मान, न सम्मान. शायद बच्चा एक ठोस बुनियाद है रिश्ते कायम रखने के लिए, और इस शर्त पर मैं पूरी न उतर पायी.

सूटकेस में कुछ ज़रूरी सामान लिया और बाहर आंगन में आई. सब बैठे थे. फ़क़त सास के पाँव छूते हुए कहा ’मुझे माफ करना, मैं अब यहां नहीं रह सकूंगी. अपने घर जा रही हूँ’

ससुराल से जुड़े सभी नाते तोड़कर चौखट लांघ कर बाहर आई, न सुभाष की ओर, न किसी और की ओर देखा...! उनसे जुड़ी आशाएं, निराशाएं, उम्मीदें और ऐतमाद सब बेमतलब लगे. आगे बढ़ते क़दमों को पीछे से आती आवाजें... रचना...रचना.... अरे ..! तुम. तुम…’.  न रोक पाईं. कदम आगे एक दिशाहीन राह पर चलते हुए भी पीछे नहीं लौटे. उस समय मैं घर की चारदीवारी के हर पहरे को तोड़कर, अपने ही बंदीगृह से भाग निकली. अनगिनत रेगिस्तान पार करते हुए, कई वीरानों से गुज़रकर एक नए क्षितिज पर जा पहुँची.

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मेरी सोच में बच्चे के रोने की आवाज ने फिर ख़लल दिया, और उस दलदल से निकल कर ममता के मोह जाल में जा फंसी. दिल ने कहा- ‘रचना, औरत तो सृष्टि के निर्माण की नींव होती है, ममत्व का संचार मातृत्व की उपलब्धि है. रोते बच्चे को उठाओ, छाती से लगाओ. मातृत्व के वरदान को स्वीकार करो.’ पर दिमाग़ ऐसा करने की इजाज़त न देता.

‘दूसरे का बच्चा तुम्हारा अपना कैसे हो सकता है?’ इस स्थिति में एक इन्सानियत का पैगाम देती हुई आवाज़ अंदर से उठती रही---‘रचना... रचना... इसको छोड़ कर न जाओ. बिन सहारे यह ज़मीन पर ही बेमौत मर जाएगा. जिसका कोई नहीं, इन्सानियत के नाते उसकी मदद करना क्या कोई गुनाह है? तुम तो खुद इस दौर से गुज़री हो. अपनी बेगुनाही की सज़ा भुगत रही हो. माँ न होने की जो सज़ा तुमने ख़ुद को दी है, तुमसे बेहतर और कौन जान पायेगा? अब सच सामने है. तुम इस मासूम बच्चे को देखा-अनदेखा कैसे कर सकती हो? क्या यह वाजिब होगा, न्यायगत होगा? माँ बाद में, पहले इंसान बनो! इन्सानियत की राह मत छोड़ो रचना....’!

मैंने नीचे झुककर बच्चे को गोद में उठाया, बांहों के बीच समेटकर उसे छाती से लगाया, उसे प्यार किया. यूँ महसूस हुआ जैसे वह मेरा ही बच्चा है, मेरा अपना जो अपने परायों की परिधियों के पार रिश्ते-नातों की पहचान से परे-सिर्फ़ मेरा बच्चा था और मैं उसकी माँ.

आज मैं अपने आप में संपूर्ण हूँ. जीवन में नारी की संपूर्णता माँ बनने में है-जो मुझे मिली है. स्कूल में शिक्षिका की नौकरी करते हुए भी पंद्रह साल गुज़र गए हैं, बेहद सुकून परस्त जीवन गुज़ार रही हूँ. सुकून का सबब है “प्रशांत’..मेरा बच्चा जो आज पंद्रह साल का हो गया है.

‘अम्मा, स्कूल की छुट्टियां मिलेंगी तो मुझे नाना-नानी के पास ले चलोगी?’

‘ जरूर प्रशांत, जरूर ले चलूंगी. तुम और मैं दोनों मिलकर उनकी खूब सेवा करेंगे. अब वे बड़े बुजुर्ग हुए हैं. उन्हें हमारे सहारे की ज़रूरत है और हमें उनकी…..!’

‘ हां माँ, मुझे नाना-नानी की, तुम्हारी बहुत ज़रूरत है. बड़ा होकर मैं आप सब का सहारा बनूंगा…!’

सच में मुझे सहारे की ज़रूरत थी. मेहरबान कुदरत ने मुझे प्रशांत के रूप में वह सहारा देकर मेरी सूनी गोद को शादाबियाँ बख्शी, मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास और मान-सम्मान मुझे सूद के साथ लौटाया है.

30 जुलाई २०१६

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देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत) , हिन्दी, सिंधी तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी काव्य-The Journey, 2 भजन-संग्रह, ४ कहानी संग्रह, २ हिंदी से सिंधी अनुदित कहानी संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद.(२०१६), श्री नरेन्द्र मोदी के काव्य संग्रह ‘आंख ये धन्य है का सिन्धी अनुवाद(२०१७) चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), NJ, NY, OSLO, तमिलनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल, सागर व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरस्कृत।

Devi Nangrani
323 Harmon cove towers ,
Secaucus, NJ 07094

dnangrani@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. जी...नमस्कार.
    कहानी-स्वाभिमान. सुन्दर कसी रचना. बधाइय़ा., मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास और मान-सम्मान मुझे सूद के साथ लौटाया है. अत सब कह देता है.
    -भवदीय- गोवर्धन यादव.

    30 जुलाई २०१६

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