सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

दीपावली विशेष हाइकु // धर्मेंद्र निर्मल

लक्ष्य सिद्धि
  ऐश्वर्या दीप्ति हो
  धर्म दीवाली

हो दीये जैसा
   उज्ज्वल निर्मल
  जीवन तेरा

दीप प्रेम का
जहां जब भी जला 
सुख  ही फैला

दे उजियारा 
  खुद को जलाकर 
  दीप महान

मन से मिले
  दीयों - से सिलसिले 
  खुशियाँ पले

इस  दीवाली
  दुख झरे बिखरे
   उगे खुशियाँ

मानव  गढे
   माटी दीया अंजोर
   तू  ईश गढे

माटी के दीप
  जगमग  जग में 
  कौन हो तुम

दीप दहके 
   तन मन महके 
  दुख  बहके

जलो दीप साथ
  ज्यों दीप की ज्योति 
  परहित में

मन के दीप
   जलाकर  जग में
  फैला खुशियाँ

निर्मल मन
  मिलती खुशहाली 
  रोज दीवाली

दीये का रोना
  कब किसने देखा 
  छोड़ अंधेरा

जलना पर
  औरों  को देखकर
  मत जलना

दीप ज्योति सी
  देह सीप दमके
   खुशियां  मोती

जलो दीप सा
  जग में उजियारा
   जीवन भर

खुशियाँ फैला
  जगमग जीवन
   हो  फुलझड़ी

लो जीत  गया
    आज अमावस से
    माटी का दीया

दीपावली में
   ज्यों दीप सिलसिले
  मिटे फासले

धानी चूनर 
धरा  है  लहरायी
  दीवाली  आयी

पकी फसलें 
   दीये लिये फैसले 
  मिटे फासले

धरा आकाश 
   मिलके हुए एक
  दीवाली रास

तारे ही तारे
  धरती आकाश में
  दिन रात में

जगमगाए 
   हर एक जीवन
  शुभकामना

धर्मेन्द्र निर्मल
धर्मेन्द्र निर्मल

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