गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

व्यंग्य // व्यंग्य परेशान है // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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इन दिनों व्यंग्य बड़ा परेशान है। समझ में नहीं आता वह क्या करे, क्या न करे। अभी तक, ज़ाहिर है, वह उपहास करता था – एक ऐसा उपहास जिसमें थोड़ा हास्य और थोड़ी आलोचना का पुट रहता था। हास्य तो उसका अभिन्न साथी और आत्मीय मित्र रहा है। तभी तो व्यंग्य कभी अकेले नहीं आया। हमेशा अपने मित्र को साथ लेकर आता रहा है। वह सदैव हास्य-व्यंग्य के नाम से ही जाना जाता रहा है। हास्य और व्यंग्य का साथ ठीक वैसा ही रहा है जैसा कि चोली-दामन का साथ हो। लेकिन इन दिनों लोग हाथ धोकर हास्य-व्यंग्य के पीछे पड़ गए हैं। दोनों का साथ आँखों में खटकने लगा है। चोली और दामन अलग अलग। चोली चोली की तरह और दामन दामन की तरह दिखना चाहिए। दोनों का साथ खतरनाक है।

व्यंग्य से साफ़ साफ़ कह दिया गया है, तुम जो हर समय हास्य को लेकर घूमते फिरते हो, यह ठीक नहीं है उसके साथ रहकर तुम भी उसकी ही तरह बदमाश हो जाओगे। हास्य का क्या है ? जब मन में आया हंसाने लगता है – न पात्र देखता है न परिस्थिति। बस कभी भी आ जाता है। कोई वजह हो तो ठीक, नहीं तो बिलावजह ही सही। कोई तमीज़ नहीं है उसे ! कब कहाँ कैसे हंसना चाहिए, उसने कभी सोचा ही नहीं। जन साधारण के लिए चलो ठीक है। आम आदमी को सोच-विचार से भला क्या लेना-देना है ! यही वजह है कि हास्य हमेशा आम आदमी के साथ रहा है। उसकी रोजमर्रा की बातचीत का एक ज़रूरी हिस्सा बन कर रहा है। व्यंग्य के साथ रहते रहते, हास्य से वह कभी उपहास भी बना तो भी बस गुदगुदाता भर है। किसी चींटे या चींटी की तरह हलकी सी चिकोटी काटता है। पर आप तो जानते ही हैं, समझदार के लिए इतना ही काफी होता है।

लेकिन व्यंग्य, उसके तो जीन्स ही अलग हैं। वह चिकोटी नहीं लेता। उसके खून में आम आदमी का खून नहीं बहता। उसमें राजसी खून है। राजा गुदगुदाता नहीं। चिकोटी नहीं लेता। दंड देता है। किसी भी दोष को हलके में नहीं लेता। उसका विश्वास सज़ा देने में है। लेकिन यह व्यंग्य, हास्य के साथ रहते रहते अपना असली स्वरूप ही भूलने लगा है। वह भूल जाता है की उसे हलकी सी चिकोटी काटकर, गुदगुदाना नहीं है। उसे तो कुछ ‘कर’ गुज़रना है। व्यंग्य “किया” जाता है, व्यंग्य “कसा” जाता है, व्यंग्य “मारा” जाता है। व्यंग्य बाण है। वह घायल करता है। अन्दर तक घुस के, जैसा कि मुहावरा हैं, लहूलुहान कर देता है। व्यंग्य राजा-बेटा है। हास्य आम आदमी का जाया है। व्यंग्य को अपनी औकात भूलनी नहीं चाहिए। उसे बता दिया गया है, खबरदार जो हास्य के साथ रहा। हंसी की बात नहीं है। तू व्यंग्य है, व्यंग्य की तरह रह। हास्य-व्यंग्य का कोई जोड़ नहीं हो सकता।

जब से हास्य से अलग करके व्यंग्य का आम आदमी के क्षेत्र से अपहरण कर लिया गया है और उसे राजनीति और साहित्य में पदस्थ कर दिया गया है, व्यंग्य की अपनी तेजस्विता निखर आई है। अब राजनीति में छोटा-मोटा हास्य-व्यंग्य नहीं चलता। तूने मेरे दामन में दाग देखता है- ले, मैं तेरा दामन ही खींच लेता हूँ। चीर-हरण के दृश्य अब आम हो गए हैं। और तो और, अब कोई बच्चा तक शेष नहीं रहा जो कह सके कि राजा नंगा है। हर कोई हमाम में है और हर किसी का बेरहमी से पर्दाफाश किया जा रहा हैं। व्यंग्य का आलम यह है कि यदि आप नंगे नहीं हैं तो भी आपको नंगा दिखाया जा रहा है। व्यंग्य कसते-कसते राजनीति आज स्वयं ही एक व्यंग्य हो गई है।

साहित्य के क्षेत्र का भी हाल बुरा है। साहित्य में व्यंग्य आ तो गया लेकिन वहां उसकी हैसियत क्या है, आज तक स्पष्ट नहीं हो पाई। चोर, चोर, व्यंग्य के घर में हास्य घुस आया है। पकड़ो-पकड़ो जाने न पाए !

साहित्य शोर मचा रहा है। और बावजूद इसके व्यंग्य के साथ हास्य, चोरी छिपे ही सही, नमूदार हुए बिना रहता नहीं। कौन माई का लाल है जो उसे पकड़ पाएगा ? कोई बताए तो !

आप तो जानते ही हैं कुछ राजनीतिज्ञ किस्म के लोग जैसे हर जगह आ जाते हैं साहित्य में भी घुस आए हैं। और उन्होंने व्यंग्य का जो हाल राजनीति में कर रखा है, उसका वही हाल वे साहित्य में भी करने के लिए कटिबद्ध हैं। व्यंग्य उनके लिए दोषारोपण है। मराठी में तो ‘व्यंग’ (‘व्यंग्य’ नहीं व्यंग) दोष को कहते ही हैं। दोष हो न हो उसे आरोपित कर देना और फिर मज़े ले लेकर व्यंग्य कसना, मारना, व्यंग्यबाण चलाना ही आज लिए साहित्यिक व्यंग्य बन गया है। पहले कुत्ते को कहो कि वह आदमी है और फिर उसे आदमी की तरह इज्ज़त बख्श दो, यही आज का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

क्या कर रहे हैं आप यह ? व्यंग्य को उसे उसकी नैसर्गिक जगह से हटाओ मत भाई। उसे अपने संगी साथियों के साथ बना रहने दो। उसका विकास स्वयं ही हो जाएगा। वह इंसानों के साथ रहना चाहता है। किसी दूसरे क्षेत्र में ज़बरदस्ती उसे लाने की कोशिश न करो। सहज आ जाए तो बात दूसरी है।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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  1. डॉ सुरेंद्र वर्मा जी ने 'व्यंग्य परेशान है' व्यंग्य में व्यंग्य की जो स्थिति है या कुछ कथित साहित्यकार व्यंग्य के नाम पर जिस तरह नाक भौं सिकोड़ते हैं, उस पर बहुत बढ़िया तंज़ करा है।

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