शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

साहित्यकारों की ट्रेन से जीवंत होगी भारतीय संस्कृति // सूर्यकांत मिश्रा

संदर्भ : साहित्यकारों के नाम पर होंगी ट्रेनें


दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा देने वाली भारतीय रेल्वे ने अब अपनी ट्रेनों का नाम भारत वर्ष के मूर्धन्य साहित्यकारों के नाम करने की घोषणा के साथ व्यक्तित्व और कृतित्व करने के लिए सम्मानजनक स्थान बनाने का संकल्प लेकर साहित्य पुरोधाओं की गाथाओं को अमर करने का बीड़ा उठाया है। इस मामले में हमारा छत्तीसगढ़ पुरजोर गौरवान्वित होने का हक रखता है। छत्तीसगढ़ का शुरू से ही साहित्य से गहरा नाता रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में हम बड़े सम्मान के साथ डा. बल्देवब प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, डा. नंदूलाल चोटिया और छत्तीसगढ़ी में व्यंग्य का प्रारंभ करने वाले शरद कोठारी का ना मले सकते है। अब रेल्वे की पहल के अनुसार ट्रेनों का नामकरण साहित्यकारों के नाम पर किया जाना वास्तव में अपने पुरखों की यादों को संजोना ही है। केंद्र सरकार में बैठे देश के नेता और रेल मंत्रालय को इस मामले में संवेदनशीलता का परिचय देते हुए वह नीति अपनानी होगी, जो किसी साहित्यकार अथवा उनके परिजनों को दर्द देने वाली न हो। इस नाते हम छत्तीसगढ़ के वासी होने के कारण यहां के साहित्यकारों का सम्मान भी चाहते है। साहित्यकारों के नाम पर पहले भी ट्रेनों के नाम रखे जा चुके है। अब उन्हें विस्तृत करने की एक और पहल सामने आयी है। इस निर्णय पर अमल शुरू होने के साथ इस पीढ़ी को हमारे साहित्यकारों के विषय में जानकारी मिलने लगेगी और वे उन्हें याद रख पायेंगे।

देश के साहित्यकारों और साहित्य के प्रति  यह निर्णय आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति और सृजनकर्ताओं से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण कार्य दिखायेगा। हम बड़े गर्व से यह कह सकेंगे कि आने वाले मेहमान आज बल्देवप्रसाद मिश्र एक्सप्रेस से पहुंच रहे है, जबकि वापसी में वे मुक्तिबोध एक्सप्रेस पर सवार होंगे। पहले भी हमारे देश की सरकार ने गुरू देव रविन्द्रनाथ टैगोर की रचना गीतांजली पर ट्रेन का नाम गीतांजली एक्सप्रेस रखकर इसकी शुरूआत की थी। इतना ही नहीं उक्त ट्रेन की गति और लंबी दूरी ने गुरूदेव के नाम को पूरे भारत वर्ष में बच्चे बच्चे तक पहुंचाया था। शुरूआती दौर में पश्चिम बंगाल की ओर दौड़ने वाली ट्रेन का नाम महाश्वेतादेवी के नाम पर और बिहार की पटरियों पर दौड़ने वाली रेलों का नाम प्रसिद्ध साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर पर करने की घोषणा भी की जा चुकी है। रेल्वे की इस अहम पहल में देश के सारे राज्यों के साहित्यकारों का सम्मान हो, तो एक अच्छी परंपरा पूरे देश में रेलों के माध्यम से दौड़ पड़ेगी। हर प्रदेश की ट्रेन के डिब्बों में अंदर की ओर उन साहित्यकारों के सृजन के महत्वपूर्ण अंशों को छापने के साथ ही साहित्यकारों का चित्र अंकित किया जाना भी अच्छा कदम हो सकता है। रेल्वे की इस नायाब प्रयोग धर्मिता से जहां साहित्यिक मनिषियों को सम्मान मिलेगा, वहीं दूसरी ओर साहित्य सृजन के प्रति हमारी युवा पीढ़ा का रूझान भी सामने आ पायेगा।

ट्रेनों का नाम साहित्यकारों को समर्पित करने की घोषणा के बाद मैं यही निवेदन करना चाहता हूं कि साहित्य धरोहर के इस यज्ञ में हमारे अपने साहित्यकारों का नाम गुम न हो जाये, जैसा की समाचार पत्रों में सामने आया है कि नाम की सूची मांगे जाने पर छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने कालीदास और मेघदूत जैसे अद्वितीय कवियों के नाम भेजे है। निःसंदेह इन कवियों से हम और हमारा देश सदियों से गौरवान्वित होता रहा है। हम किसी भी रूप में उन महामनाओं के नाम पर आपत्ति नहीं करना चाहते है। यह सोचने वाली बात है कि जब रेल्वे ने स्पष्ट रूप से स्थानीय साहित्यकारों के नाम देने का निर्देश दिया था, तब हमारे क्षेत्र के साहित्यकार याद क्यों नहीं किये गये? मैं हमारे छत्तीसगढ़ के ऐसे रचनाकारों के नाम भी देश के ट्रेनों में देखना चाहता हूं जिन्हें पूरा देश सम्मान प्रदान करता आ रहा है। जी हां! निःसंदेह मैं नाम लेना चाहता हूं डा. बल्देव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध और पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी का। पूरे देश में कवि सम्मेलनों के मंच पर आदर के साथ याद किये जाने वाले डा. नंदूलाल चोटिया को भी स्थान किया जाना लाजिमी लगता है। इसी कड़ी में मैं राजनांदगांव के व्यंग्यकार और दैनिक सबेरा संकेत के संस्थापक, संपादक शरद कोठारी का नाम भी भारतीय रेल के माथे पर देखना चाहता हूं।

साहित्यकारों के नाम पर ट्रेनों का संचालन करते समय बड़ी सावधानी बरती जानी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित साहित्यकारों के बीच अन्य प्रसिद्धी प्राप्त साहित्यकार एवं रचनाकार इससे वंचित न रह जाये। कारण यह कि कुछ ऐसे भी बिरले लोग रहते है, जिनके नाम सामान्यजनों तक नहीं पहुंच पाते है, किंतु उनका लेखन याद किया जाता है। इस संदर्भ में मुझे ‘उसने कहा था’ कहानी और उसके लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की याद सहसा ही स्मृति पटल पर गोता लगाने पहुंचा दी। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्हें हिंदी, संस्कृति, प्राकृत तथा पाली भाषा का उच्च कोटि ज्ञान था। अपनी छोटी जीवन यात्रा में उन्होंने एक यही कहानी लिख पाई जो ‘उसने कहा था’ शीर्षक से उन्हें शीर्षस्थ साहित्यकार बना दिया। महज 39 वर्ष की उम्र में उन्होंने हमसे विदा ले ली। इस तरह के साहित्यकारों की सम्मान भी इस क्रम में जरूरी है। चूंकि मैं स्वयं ही एक शिक्षक हूं, और कुछ वर्ष पूर्व उनकी इसी कहानी को कक्षा 11वीं में पढ़ाया करता था। यही कारण है कि इस लेख को कलमबद्ध करते समय मुझे उनकी यादों में खो जाना पड़ा।

ट्रेनों का नाम साहित्यकारों के नाम करने की योजना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सार्थक मानी जा सकती है। प्रतिवर्ष बदल रहे शैक्षणिक कार्यक्रमों ने भी हमारे साहित्यकारों को पाठ्य सामग्री से बाहर निकाल फेंका है। होना तो यह चाहिए कि प्रत्येक कक्षा में कम से कम 5 साहित्यकारों (कवि, व्यंग्यकार, निबंधकार, नाटककार एवं कहानीकार) की रचना अनिवार्य रूप से शामिल की जाये। साथ ही देश के मानव संसाधन विकास मंत्रालय और प्रदेश के शिक्षा मंत्रालयों का काम काज देख रहे जिम्मेदार लोगों को यह भी अनिवार्य कर देना चाहिए कि कक्षा 6वीं से लेकर 12वीं तक उच्च शिक्षा में कालेज के प्रथम वर्ष से लेकर स्नाकोत्तर तक प्रत्येक परीक्षा में हिंदी साहित्यकारों का योगदान एवं उनकी हिंदी के प्रति सेवा से संबंधित प्रश्न पत्र में पास होना अनिवार्य हो। इस प्रकार की व्यवस्था हमारी हिंदी भाषा के साथ प्रांतीय भाषाओं को भी सम्मानजनक स्थान पर पहुंचा सकेगी।

डा. सूर्यकांत मिश्रा

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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