मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

समीक्षा : अनवरत यात्रा (दोहा संग्रह) / शिवमूर्ति सिंह // समीक्षक : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

शिवमूर्ति सिंह

समीक्षा : अनवरत यात्रा (दोहा संग्रह) / शिवमूर्ति सिंह / प्रतिभा प्रकाशन / इलाहाबाद / २०१३ / मूल्य, रु, १५०/-

दोहों में कटाक्ष

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

शिवमूर्ति सिंह से मेरा परिचय एक कहानीकार के रूप में हुआ था | उस समय मुझे इस बात का बिलकुल आभास नहीं था कि वे एक बड़े कवि भी हैं जिन्होंने गीत, मुक्तक, दोहा आदि, काव्य विधाओं में उल्लेखनीय काम किया है | उनका यह दोहा संग्रह “एक अनवरत यात्रा” जब मुझे पढ़ने को मिला तो मैं दंग रह गया | मुझे लगा कि शिवमूर्ति जी के दोहे कबीर, रहीम और बिहारी के दोहों के बरक्स यदि रखे जाएं तो किसी भी तरह से वे उनसे कमतर नहीं हैं |

दोहा हिन्दी का आदि छंद माना गया है | यह अपने में स्वतन्त्र और सम्पूर्ण छंद होता है | प्राकृत और अपभ्रंश में इसे ‘दुहा’ कहा गया है | तमिल भाषा में इसे ‘कुरल’ की संज्ञा दी गई है | दक्खिनी हिन्दी में इसे ‘दोहरा’ कहते हैं | उर्दू में ग़ज़ल के ‘शेर’ भी बहुत कुछ दोहों की तरह होते हैं | अपने में स्वतंत्र और सम्पूर्ण | वे ग़ज़ल के दूसरे शेरों में ताका-झांकी नहीं करते |

हिन्दी में दोहों की एक अलग ही बुनावट है | दो पंक्तियों के इस छंद में चार चरण होते हैं | पहले और तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं | इनकी विषय सामग्री बहुत व्यापक है | भक्ति, श्रृंगार, नीति, वीरता आदि, किसी भी विषय को वे अपनी अंतर्वस्तु बना लेते हैं | परम्परागत दोहों में हमें उपदेश भी मिलता है | वे ‘प्रस्क्रिप्टिव’ होते हैं |

दोहे अपने स्वरूप और अपनी अंतर्वस्तु से ही नहीं जाने जाते | उनमें अभिव्यक्ति की सहजता, भावों की गहनता, मार्मिकता और सम्प्रेषण की त्वरा भी आवश्यक है | थोड़े में बहुत कह जाना दोहों की विशेषता है |

समकालीन हिन्दी काव्य में अतुकांत कविता बहुत दिनों तक छाई रही | उससे उकताकर विरोध में जब नए सोच और नई शैलियों का पदार्पण हुआ तो दोहों को पुन: अपनी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त हो गई | यह स्वाभाविक था | अनेक नए और पुराने कवियों ने अपनी काव्याभिव्यक्ति का वाहन दोहों को बनाया | दोहाकारों की एक पूरी पंक्ति तैयार हो गई | अशोक अंजुम, और देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ ने स्वतन्त्र रूप से कई दोहा-संकलनों का सम्पादन किया | आज के दोहों को जन जन में पहुंचाने का इन्होंने प्रशंसनीय कार्य किया |

अशोक अंजुम द्वारा संपादित कृति “नई सदी के प्रतिनिध दोहाकार” में शिवमूर्ति सिंह को भी स्थान मिल चुका है | शिवमूर्ति सिंह के दोहों में, जैसा कि वे स्वयं स्वीकार करते हैं, जहां क्रूर और अमानवीत समय के सच को रेशा रेशा खोला गया है वहीं अमानवीय मूल्यों को प्रकाशित कर उन्हें स्थापित करने का भी आग्रह है | इन दोहों मे समाज की धड़कने हैं, धर्म और राजनीति के विद्रूप और विसंगतियां हैं, प्रकृति है, ऋतुएँ हैं, पाश्चात्य प्रभाव से घायल हमारी संस्कृति और हमारे मूल्य हैं और वह उपेक्षित आम-आदमी है जो भयावह, क्रूर समय के थपेड़े झेल रहा है |

वैसे तो शिवमूर्ति के दोहों में आपको कई स्वर और अनेक छटाएं मिलेंगीं किन्तु इनके दोहों का मूल स्वर व्यंग्यात्मक है | शिवमूर्ति जी वर्तमान व्यवस्था और राजनीति से ही नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक स्थितियों से भी अति असंतुष्ट हैं | इस क्रोध की अभिव्यक्ति उनके दोहों में कटाक्ष और व्यंग्य के रूप में हुई है | उन्हें जहां जहां भी असंगतियाँ और विरोधाभास दिखाई दिया है वहां वे तंज कसने से चूकते नहीं | बुराई की वे भर्त्सना करते हैं, तोहमत करते हैं, उसे दुत्कारते और धिक्कारते हैं |

आज व्यंग्य के लिए राजनीति सर्वाधिक और सहज रूप से उपलब्ध है | राजनीति को निशाना बनाते शिवमूर्ति के कुछ दोहे उद्धरित करने योग्य हैं –

राजनीति में नीति के अतिरंजित दो वर्ण

राज करो, साधो सदा सुरा, सुन्दरी, स्वर्ण

कैसा माया जनतंत्र की क्या कुदरत का खेल

माथ छछूंदर लग रहा शुद्ध चमेली तेल

एक समय था जब राजनीति गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने के लिए उत्साहित थी और ‘अंतिम व्यक्ति’ के लिए उसकी प्रथम चिंता थी | लेकिन आज –

‘अन्त्य’ पंगु होकर गिरा पीट रहा है माथ

‘उदय’ धूर्त जा मिल गया हथेलियों के साथ

कृषक खुदकशी कर रहे राजभवन में जश्न

संसद पर हंसते रहे, भूख मौत के प्रश्न

तख़्तनशीं हैं आज सब, क़तली जोकर धूर्त

ये ही गांधी के सभी, स्वप्न करेंगे मूर्त

यों कहने के लिए आज का प्रजातंत्र प्रजा का, प्रजा द्वारा, प्रजा के लिए शासन है किन्तु आमजन आज हाशिए पर पडा है और संवेदनहीन ‘नेता’ प्रजातंत्रीय फसल काट रहे हैं | क्योंकि आज –

सेवक, तस्कर माफिया व्यापारी श्रीमंत

नेता जी की देह में हुए सभी जीवंत

कुर्सी ने सर चढ़ कहा, पूज मुझे बन काठ

अगर दया दिखलायगा बिखर जायगा ठाट

जब से भारत इंडिया हुआ है पश्चिमी बयार ने हमारे सारे समाज और संस्कृति को भृष्ट कर दिया है | शिवमूर्ति सिंह इस प्रभाव को अपनी देशी ठसक में ‘पछुआ’ हवा कहते हैं | निम्न दोहे में दोहाकार ‘बाज़ार हाट’ की जगह ‘हाट-बार’ कहकर इसी पछुआ (बयार) को रेखांकित करता हैं |--

ले आई पछुआ यहाँ भोगवाद के बीज

घर की लक्ष्मी हो गई हाट-बार की चीज़

युवा करें रंगरेलियाँ, बूढ़े कोसें भाग

रिश्ते पापड़ सा जले इस पछुआ की आग

तन-मन पर ऐसा चढ़ा पछुवा का उन्माद

अपनी अमराइयों की पुरवा लगे अस्वाद

आज मनुष्य अपनी सभी सीमाओं को लांघ गया है | उसने अपना नाता पूरी तरह से भोगवादी संस्कृति से जोड़ लिया है | मनुष्यता के सारे बंधन टूट गए हैं और जैसा की कवि कहता है, “इंसानों में आरही चौपायों की गंध” | ‘यूज़ एंड थ्रो’ का ऐसा रोग लग गया है कि ‘’नारी (तक) हुई ‘कमाडिटी’, फेंको करके भोग” | समाज की इस दुर्गति के लिए शिवमूर्ति जी पाश्चात्य जीवन पद्धति को ही उत्तरदायी मानते हैं कि जिसमें अध्यात्म के लिए कोई स्थान नहीं है और अर्थ ही एकमात्र साध्य हो गया है | किन्तु इसके विपरीत भारतीय सोच में –

अर्थ सदा साधक रहा, किन्तु आज यह हाल

सिद्धि-साध्य सबकुछ यही, साधक है बेहाल

यही कारण है कि सारे मानवीय मूल्य विमूल्य हो गए हैं | स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि

है कोहरे की कैद में फंसा हुआ दिनमान

मांग रहा है रोशनी खाद्योतों से दान

डाल डाल वट वृक्ष की गिद्ध काक अधीन

कोयल कीर कपोत सब हैं कौड़ी के तीन

ऐसा नहीं है कि शिवमूर्ति सिंह के यहाँ केवल कटाक्ष ही मिलते हैं | वे अत्यंत सहृदय और संवेदनशील भी हैं | वे तो वस्तुत: प्रेम-पथ पर एक अनवरत यात्रा के लिए निकले हैं | इस संकलन का आगाज़ ही प्रेम विषयक दोहों से किया गया है |

प्रेम पंथ में है नहीं कोई कहीं पड़ाव

एक अनवरत यात्रा एक अरोध बहाव

अकथ कथा है प्रेम की अकथ अनोखी रीत

गूंगे का गुड जानिए, है अभिव्यक्ति अतीत

भोग नहीं यह योग है, योगी प्रेमी यार

नित चकोर सा चोंच से चुनना है अंगार

शिवमूर्ति सिंह के कुछ दोहों में प्रकृति चित्र भी लाजवाब हैं | बरखा सम्बंधित दोहे देखते ही बनते हैं | ‘खुश्बू के मधु-छंद’ शीर्षक खंड में सभी दोहे प्रकृति के रूप रंग को ही समर्पित हैं –

बरसे वारिद झूमकर, सरसे गिरी-वन-बाग़

सिर सिज सिरसिज हो गए, सरसी-सरित तड़ाग

इन्द्रधनुष ले हाथ में बरसा है शर तान

मार रहा नभ, मेदनी मुदित झेलती बान

‘आश्लेवा’ को अंक ले भागा रसिया मेह

विसुध अभागिन ‘आद्रा’ रही सिसकती गेह

“अनवरत यात्रा” का शायद ही कोई ऐसा दोहा हो जो उल्लेखनीय न हो | पूरी पुस्तक ही उद्धृत की जा सकती है अत: सहृदय पाठकों के लिए बजाय इसके कि वे पुस्तक पर समीक्षाएं पढ़ें स्वयं पुस्तक को ही पढ़कर उसका रसास्वादन लेना अभीष्ट होगा |

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८)

१/१० एच आई जी,/ सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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