गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

कहानी // मुंशीजी का नौकर // विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’

कहानी

मुंशीजी का नौकर

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विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’

(1960-63)

आज मुंशीजी की बरबस याद आ रही है। दिल्ली आये एक वर्ष से ऊपर हो रहा है, पर अब तक एक नौकर नहीं मिला मुझे। एक छोकरा मिला भी, तो उसका ’ब्राण्ड न्यू’ रूप श्रीमतीजी को बर्दाश्त न हुआ और सातवें ही दिन उसे विदा करना पड़ा। पर नौकर का अभाव अब भी मैं बुरी तरह अनुभव कर रहा हूँ - शायद इसलिए, कि उसके हिस्से के एक-चौथाई काम मुझे ही करने पड़ते हैं। एक-चौथाई काम तो महरी कर जाती है और आधा श्रीमतीजी रो-गाकर स्वयं कर लेती हैं, पर बाकी एक-चौथाई से बचने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। पता नहीं, मेरी उन मित्राणी का भाग्य ब्रह्मा ने किस कलम से लिखा है, जिन्हें पिछले सात वर्षों में एक दिन भी नौकर का अभाव न रहा। नौकर एक-के-बाद-एक इस तरह उनके पास आते हैं, जैसी किसी अच्छी फिल्म के प्रीमियर के दिन ’बुकिंग काउंटर’ पर दर्शकों के हाथ बढ़ते हैं। मैं तो इसे उनके ’श्रीमानजी’ का अहोभाग्य ही मानता हूँ, नहीं तो उन्हें भी पता चल जाता कि आजकल सब्ज़ियों के क्या भाव हैं, कपड़े ’प्रेस’ करने में कमर कितनी दुखती है, कुछ लिखते-लिखते अचानक सिगरेट ख़रीदने जाने पर कैसा अनुभव होता है, बिछावन लगाते समय श्रीमतीजी का हाथ बँटाने में कितनी खीझ होती है, आदि-आदि! ख़ैर, वे किस्मत के धनी हैं - उन्हें याद करना बेकार है इस समय। अभी तो मुझे मुंशीजी की याद आ रही है, जिनकी स्थिति में मैं अपने को बावन तोले पाव रत्ती पा रहा हूँ।

’मुंशीजी’ से शायद आप यह समझ रहे हों कि वे किसी गद्दी पर मुनीम होंगे या किसी ज़मींदार के पटवारी। जी नहीं, वे सरकार बहादुर के एक वफ़ादार नौकर थे - किसी बड़े अफसर के गज़टशुदा पी. ए.। लेकिन चूँकि उनका नाम था प्रेमचंद, इसलिए लोगों ने उन्हें ’मुंशी प्रेमचंद’ का ’मुंशी’ बतौर ’ऑनरेरी’ ख़िताब दे दिया था और वे चपरासियों तथा अपने मातहतों के अलावा सब लोगों द्वारा ’मुंशीजी’ के ही नाम से पुकारे जाते थे। मैं भी उन्हें ’मुंशीजी’ ही कहता था। पड़ोसी होने के साथ-साथ वे मेरे मित्र भी थे, इसलिए उन्हें ’मुंशीजी’ कहने में मुझे कभी संकोच न हुआ। वे भी मुझे ’रशीमजी’ कह कर पुकारते थे - पता नहीं, जानबूझ कर वे ऐसा करते थे, या ’रश्मि’ कहने में उन्हें कठिनाई होती थी।

मुंशीजी की अवस्था यही चालीस के लगभग थी। घर में पत्नी थीं, बूढ़ी माँ थीं और परमपिता के सात प्रसाद थे - बस, दस आदमियों का ’छोटा-सा’ परिवार था। इसके अनुसार ही, उन्होंने एक छोटा-सा मकान भी ले रखा था, जिसमें दो कमरे थे और मकान-मालिक फ़ी कमरा उनसे तीस रुपये भाड़ा लिया करता था। तनख़्वाह भी भगवान् की दया से कुछ बुरी नहीं थी - पचहत्तर कम पूरे चार सौ! लेकिन उनकी श्रीमतीजी - माफ़ कीजिएगा, यहाँ मैं थोड़ी लिबर्टी ले रहा हूँ - एक हद तक फूहड़ थीं। सबेरे पाँच बजे से उठ कर रात के ग्यारह बजे तक वे इस तरह काम में लगी रहती थीं, जैसे एवरेस्ट की चढ़ाई की तैयारी कर रही हों - सोने की तो बात दूर, दो क्षण बैठने का भी समय वे नहीं निकाल पाती थीं। ऐसी हालत में मुंशीजी का खीझना वाजिब ही था। वे कभी-कभी तुनक कर पत्नी से कहते - ’’यह क्या दिन-भर मज़दूरिन की तरह कमर कसे खड़ी रहती हो। कभी दो मिनट बात करने का भी समय नहीं मिलता।’’ लेकिन उनकी श्रीमतीजी को जैसे कोई मतलब ही नहीं था उनकी सुकुमार भावनाओं से। वे छूटते ही आँखें तरेर कर बोलतीं - ’’चार नौकर लगा रखे हैं न घर में! मुझे तो पागल कुत्ते ने काट रखा है, जो दिन-भर देह खटाती रहती हूँ!’’ और, मुंशीजी को ऐसा लगता, जैसे उन्हें एक साथ चार-पाँच चाँटे रसीद कर दिये गये हों। वे दबे स्वर में बुदबुदाते - ’’सौ बार तो कहा कि एक नौकर रख लो।’’ और धीरे-धीरे वहाँ से खिसकने लगते; लेकिन पीछे से पत्नी की आवाज़ पीछा करती रहती - ’’हाँ, नौकर के मुँह थोड़े ही होगा - वह तनख़्वाह थोड़े ही लेगा। बच्चों के लिए पूरा दूध तो हो नहीं पाता, रखेंगे नौकर!’’ मुंशीजी तड़प जाते इस अन्तिम वाक्य को सुन कर, पर विवाद बढ़ाना उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा, सो ग़म खाकर एक गिलास ठंडा पानी पी लेते और दिन-भर सोचते रहते कि वे नौकर क्यों नहीं रख सकते। उनकी समझ में नहीं आता कि उनसे कम वेतन पानेवाले उनके पड़ोसी जब नौकर रख सकते हैं, तो वे क्यों नहीं रख सकते। आखिर, मौक़ा देख कर यह सवाल वे अपनी पत्नी के समक्ष रखते और जवाब में उन्हें सुनने को मिलता कि उनकी आमदनी कम है।

एक दिन अपनी पत्नी से यह उत्तर सुन कर उनका स्वाभिमान जाग उठा; बोले - ’’मेरे बराबर किसी की तनख़्वाह है भी आसपास में? खन्ना तीन सौ पाता है, उसके यहाँ नौकर है। सिन्हा को सिर्फ़ दो सौ अस्सी मिलते हैं, उसके यहाँ नौकर है। गाँगूली ढाई सौ पाता है, उसके यहाँ नौकर है। औरों को तो छोड़ो, पौने दो सौ पानेवाले त्रिवेदी ने भी नौकर रख छोड़ा है।’’

लेकिन उनकी पत्नी को जवाब देने के लिए एक मिनट की भी ज़रूरत नहीं हुई। उन्होंने तुरन्त कहा - ’’खन्ना तीन सौ पाता है, लेकिन उसके परिवार में कुल पाँच प्राणी हैं। सिन्हा और गाँगूली के यहाँ भी सिर्फ चार-चार प्राणी हैं। त्रिवेदी तो अकेले मियाँ-बीवी ही है। किसी की भी आमदनी आदमी-पीछे साठ रुपये से कम है? लेकिन तुम्हारी? आदमी-पीछे साढ़े बत्तीस रुपये। ... पता नहीं, इस बुद्धि से तुम दफ़्तर में काम कैसे करते हो!’’

इसके साथ ही, मुंशीजी की बुद्धि पर छाये बादल इस तरह फटे कि वे पसीने से सराबोर हो गये। उनसे कुछ कहते नहीं बन पड़ा। वे इस उधेड़बुन में पड़ गये कि उनकी तनख़्वाह छः सौ रुपये कैसे होगी, कब होगी, होती क्यों नहीं! यदि उनके वश में होता, तो एक क्षण की भी देर किये बिना वे अपनी तनख़्वाह बढ़ाने का ऑर्डर निकाल देते। लेकिन अफ़सोस! बेचारे होंठ चबा कर रह गये।

एक दिन मुंशीजी मेरे पास आकर बोले - ’’भाई रशीमजी, आप नौकर क्यों नहीं रखते?’’

मैं उनके इस अप्रत्याशित सवाल से चौंक उठा, बोला - ’’नौकर रखूँ? मैं? आख़िर क्यों?’’

वे बोले - ’’हाँ, आप! दूसरे लोगों ने जिस लिए नौकर रखे हैं, उसी लिए!’’

’’लेकिन मुझे ज़रूरत क्या है नौकर की? अकेला आदमी हूँ। होटल मे खाता हूँ। दिन-भर रहता हूँ बाहर, रिपोर्टरी के चक्कर में। नौकर क्या करूँगा रख कर?’’

मुंशीजी ने एक ठंडी आह भरी - ’’हाँ, ठीक ही तो है! आपको नौकर की क्या ज़रूरत!’’ और, वे निराश-से चलने लगे। मैंने उन्हें रोका - ’’लेकिन सुनिए तो। ऐसी क्या बात हो गयी आज?’’

मुंशीजी रुक गये, वापस लौट आये; फिर भरे दिल से कहने लगे - ’’ये नौकर लोग भी, पता नहीं, अपने को क्या समझते हैं!’’

मेरा कौतूहल जाग उठा, पूछा - ’’क्यों मुंशीजी, किसी नौकर ने गुस्ताख़ी की आपके साथ? किसने?’’

मुंशीजी का क्रोध उबल पड़ा, बोले - ’’वही त्रिवेदी का नौकर। पता नहीं, क्या समझता है अपने को! कहा कि भैया, ज़रा दो सिगरेट ला दे बाज़ार से, तो फट से बोला कि मुझे फ़ुर्सत नहीं है सिगरेट-फिगरेट लाने की। ... मालिक तो करता है क्लर्की और नौकर की यह शेख़ी!’’

मैंने जवाब दिया - ’’उससे आपने बेकार कहा। वह तो बदतमीज़ है ही। किसी दूसरे से कहा होता!’’

मुंशीजी निराशा से भर उठे, बोले - ’’अरे भाई, किससे कहता! सबको देख चुका हूँ। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।’’

’’लेकिन गाँगूली का नौकर तो अच्छा-भला है! वह तो ऐसा नहीं है!’’ अपने अनुभव के आधार पर मैंने कहा, क्योंकि जब भी मुझे ज़रूरत होती थी, वह मेरे काम आता था।

मुंशीजी बोले - ’’वह तो सही है। बेचारा सीधा-सादा, भला-सा लड़का है, लेकिन गाँगूली की बीवी वैसी हो, तब न! एक दिन उसने चुपचाप मेरी श्रीमतीजी से आकर कहा कि मेरा काम करने पर उसकी मालकिन बिगड़ती है। ... सच तो यह है कि जितने बुरे नौकर नहीं हैं, उससे ज़्यादा उनके मालिक-मालकिन हैं। नौकरों को सिर चढ़ने के लिए शह देते हैं। खन्ना का नौकर तो मुझे देख कर यों बीड़ी का धुआँ उगलता है, जैसे मैं उसका चपरासी होऊँ। कोई तमीज़ नहीं। छिः-छिः! सिन्हा के नौकर का भी यही हाल है। गली में मिल जाएगा, तो मुझे ही एक ओर दब कर रास्ता देना पड़ेगा, वह अपनी अकड़-भरी चाल नहीं रोकेगा। अब तो, ऐसा लगता है, जैसे नौकर न रखना कोई पाप करना है। एकदम भिखमंगा ही समझते हैं लोग मुझे! ... लेकिन मैंने भी अब तय कर लिया है। मैं भी नौकर रखूँगा, चाहे जो हो जाए!’’

और, सचमुच, मुंशीजी के यहाँ तीसरे दिन ही एक नौकर आ गया। पता नहीं, उन्होंने अपनी श्रीमतीजी को इसके लिए राज़ी कैसे किया। अब मुंशीजी के चेहरे पर थोड़ी चमक आ गयी, मानों नौकर न हुआ, फ़ेसपॉलिश हो गया। पड़ोसियों के नौकर भी अब उनका थोड़ा लिहाज करने लगे, लेकिन पड़ोसिनों के मन में थोड़ी धुकुर-पुकुर मची। वे उनके नौकर को लेकर कानाफूसी करने लगीं। गाँगूली की बीवी ने तो स्पष्टतः मुझसे कहा - ’’ले तो आया है नउकर, लेकिन खोर्चा काहाँ से चोलाएगा। आप देखिएगा, चार दिन बाद चोला जाएगा। पोनरो (पन्द्रह) टाका में कोउन नउकर ठाहरेगा!’’

और, वास्तव में सातवें दिन ही मुंशीजी का नौकर उनके घर से इस तरह ग़ायब हुआ, जैसे गदहे के सिर से सींग। मुंशीजी ने आह भर कर मुझे बतलाया - ’’दुष्टों ने बहका दिया उसे! ... लेकिन कोई बात नहीं, दूसरा छोकरा लाऊँगा।’’

मुंशीजी ने ग़लत नहीं कहा था। उनके घर दूसरा छोकरा आया, पर वह भी चार दिन की चाँदनी दिखा कर मुंशीजी को फिर अन्धेरे में छोड़ गया। उसके बाद तीसरा नौकर आया, पर उसे चौथे दिन ही खन्ना की बीवी ने पाँच रुपये अधिक का प्रलोभन देकर अपने एक रिश्तेदार के यहाँ लगवा दिया। मुंशीजी फिर हाथ मलते रह गये। उन्होंने खन्ना-परिवार से बातचीत बन्द कर दी, पर खन्ना परिवार को इसका कोई मलाल न हुआ, उल्टे खन्ना की बीवी ने अपनी पड़ोसिनों से सगर्व कहा - ’’चलो, एक बला से छुट्टी मिली।’’

लेकिन मुंशीजी के यहाँ जो नई बला आयी, उस पर न तो खन्ना की बीवी का जादू चला और न गाँगूली की बीवी का। सिन्हा और त्रिवेदी के नौकर भी उससे बात करने में हिचकते। मुंशीजी का यह नौकर इस तरह अकड़ कर चलता, जैसे मुहल्ले का मालिक हो। मुंशीजी को अपने इस नौकर पर गर्व था और नौकर को अपने मालिक पर। वह बड़ी शान से दूसरे नौकरों से बोलता - ’’अरे, शर्म नहीं आती तुम्हें अपने मालिक की तारीफ़ करते? मेरे मालिक का मुक़ाबला तेरे पिद्दी मालिक करेंगे? मेरे मालिक गज़टिड आपीसर हैं, गज़टिड आपीसर। तेरे मालिकों-जैसे लोग सत्रह बार उन्हें सलाम करते हैं दिन-भर में। जा, जाकर अपनी-अपनी मालकिन की गोद में मुँह छिपा कर रो ले अपनी क़िस्मत पर!’’ उसके इस अभिमान पर सारी पड़ोसिनें क्षोभ से भर उठीं। उन्होंने मुंशीजी की बीवी से, और उनके श्रीमानों ने मुंशीजी से शिकायत की; पर दोनों ने एक ही जवाब दिया - ’’नौकरों के मामले में हमें नहीं पड़ना चाहिए। उनके आपस के झगड़ों में पड़ने से हमारी नीचता साबित होगी।’’ लेकिन यह आदर्श पड़ोसियों को पसन्द न आया, वे झगड़े पर आमादा हो गये। पर जिस तेज़ी से वे झगड़े पर आमादा हुए, उतनी ही तेज़ी से अपने-अपने घर में भी घुस गये। मुंशीजी के नौकर का रौर्द-रूप उनके लिए कुनैन की टिकिया बन गया। उसने यहाँ तक कह दिया कि यदि वे अधिक गड़बड़ करेंगे, तो अपने स्वनामधन्य चार-पाँच साथियों को बुलवा कर वह उनकी हड्डी-पसली बराबर करवा देगा। पड़ोसियों ने यह सुना, तो चुप बैठ गये; बोले - ’’गुंडे से लगना ठीक नहीं!’’

लेकिन यह बहादुर नौकर भी चार महीने बाद मुंशीजी के यहाँ से चला गया - बिना अपने मालिक से लड़े-झगड़े, शान्ति के साथ। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसे आदमी ने नौकरी छूटने पर शोर-शराबा क्यों नहीं मचाया - बड़े प्रेमपूर्वक उसने विदा कैसे ले ली? पर यह बात मैं मुंशीजी से पूछता कैसे? सो, चुप ही रहा - दो-चार दिन में यह बात पुरानी भी पड़ गयी।

फिर शायद मुझे उस नौकर की कभी याद भी न आती, अगर उस दिन मुंशीजी मेरे पास आकर उसकी चर्चा न करते। उन्होंने आते ही कहा - ’’भाई रशीमजी, सौ रुपये होंगे आपके पास? कर्ज़ चाहिए।’’

मुंशीजी और कर्ज़ - यह कैसी अनहोनी बात! मैंने कहा - ’’आपको कर्ज़ चाहिए? लेकिन आप तो ... ’’

’’हाँ, मैं कर्ज़ नहीं लेता; लेकिन क्या करूँ, ज़रूरत ही ऐसी आ पड़ी है! ... उस नौकर को तनख़्वाह देने के लिए मैंने भृंगराजजी से सौ रुपये कर्ज़ लिए थे। उनकी माँग आ गई है!’’ - मुंशीजी बोले।

मैंने उन्हें रुपये देते हुए पूछा - ’’लेकिन उसे आपने हटा क्यों दिया? अच्छा-भला तो था!’’

मुंशीजी मुस्कराये, बोले - ’’उसे रखने की अपनी हैसियत कहाँ थी, भाई? चार महीनों में ही तो सौ रुपये कर्ज़ करना पड़ा। पचास रुपये महीना तनख़्वाह और खाना-पीना! कम होता है इतना? फिर, उसे लाया भी तो था चार महीने के लिए ही। उस समय उसके मालिक-मालकिन विदेश गये हुए थे!’’

मुंशीजी की बातों से मेरा कौतूहल थोड़ा और जागा। मैंने पूछा - ’’लेकिन इतनी अधिक तनख़्वाह पर चार महीने के लिए उसे अपने यहाँ रखने की ज़रूरत क्या थी आपको?’

’’ज़रूरत थी, भाई, थी! ... वे अट्टहास कर उठे - ’’अब देखते नहीं, पड़ोसी कितने सीधे हो गये। उनकी सारी अकड़ हिरन हो गयी! अब ज़रा देखिए, गाँगूली की बीवी कैसे लथपथ होकर बर्तन माँजती है; खन्ना की बीवी कैसे झाड़ू लगाते-लगाते उठ कर कमर सीधी करती है; त्रिवेदी की बीवी अब शाम को सजने-सँवरने की बजाय किस तरह गाल में कालिख लगाये स्टोव पम्प करती नज़र आती है!’’

सचमुच तो! मैंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था। पिछले दो महीनों में सबके नौकर पैंतीस-चालीस रुपये तनख़्वाह की माँग कर नौकरी छोड़ चुके थे।

इसके कुछ दिन बाद सुनने को मिला, पड़ोसियों ने मुंशीजी से अनुरोध किया था कि यदि वे नौकर न रखने का वचन दें, तो वे फिर नौकर रख लें। उन्होंने उन्हें यह भी आश्वासन दिया था कि उनके नौकरों से वे ज़रूरत-बेज़रूरत बेहिचक काम ले सकेंगे।

उसके बाद मुंशीजी ने कभी नौकर नहीं रखा। नौकर रखने की ज़रूरत भी क्या थी भला - मुहल्ले के सभी नौकर उनके ही तो थे। काश! मुझे भी मुंशीजी की तरह नौकर रखने की ज़रूरत न पड़ती, मुहल्ले के नौकरों से ही काम चल जाता।

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विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’- परिचय

विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’ हिन्दी अकादमी द्वारा पुरस्कृत लेखक थे। यह पुरस्कार उन्हें स्वयं उनके जीवन पर आधारित उपन्यास, ’दिव्यधाम’, के लिए 1987 में मिला था। विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’ (11 दिसम्बर 1930 - 25 अगस्त 2016) का वास्तविक नाम विद्याभूषण वर्मा था।

वे मात्र 16 वर्ष की वय में दिल्ली के ’दैनिक विश्वमित्र’ समाचारपत्र के सम्पादकीय विभाग में नौकरी करने लगे। वे रात में काम करते और दिन में पढ़ते। अल्प वेतन से फ़ीस के पैसे बचा-बचा कर उन्होंने विशारद, इंटरमीडियेट, साहित्यरत्न, बी. ए. तथा एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।

’श्रीरश्मि’ ने ’दैनिक विश्वमित्र’ के अतिरिक्त ’दैनिक राष्ट्रवाणी’, ’दैनिक नवीन भारत’, साप्ताहिक ’उजाला’, साप्ताहिक ’फ़िल्मी दुनिया’ तथा मासिक ’नवनीत’ के सम्पादन में भी सहयोग दिया। वे 1959 से भारतीय सूचना सेवा से सम्बद्ध हो गये।

’श्रीरश्मि’ की लगभग तीन सौ रचनायें 1960 के दशक की प्रमुख हिन्दी, उर्दू, गुजराती तथा कन्नड़ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। हिन्दी पत्रिकाओं में से कुछ के नाम हैंः ’नीहारिका’, ’साप्ताहिक हिन्हुस्तान’, ’कादम्बिनी’, ’त्रिपथगा’, ’सरिता’, ’मुक्ता’, ’नवनीत’, ’माया’, ’मनोहर कहानियाँ’, ’रानी’, ’जागृति’ तथा ’पराग’।

उनके उपन्यास हैंः ’दिव्यधाम’, ’तो सुन लो’, ’प्यासा पंछीः खारा पानी’, ’धू घू करती आग’, ’आनन्द लीला’, ’यूटोपिया रियलाइज़्ड’ तथा ’द प्लेज़र प्ले’।

उन्होंने ’विहँसते फूल, नुकीले काँटे’ नाम से महापुरुषों के व्यंग्य-विनोद का संकलन किया।

’श्रीरश्मि’ द्वारा अनुवादित रचनायें हैंः ’डॉ. आइन्सटाइन और ब्रह्मांड’, ’हमारा परमाणु केन्द्रिक भविष्य’, ’स्वातंत्र्य सेतु’, ’भूदान यज्ञः क्या और क्यों’, ’सर्वोदय और शासनमुक्त समाज’, ’हमारा राष्ट्रीय शिक्षण’ तथा ’विनोबा की पाकिस्तान यात्रा’।

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