मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

मोक्षदायिनी देवप्रबोधिनी एकादशी // डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

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मोक्षदायिनी देवप्रबोधिनी एकादशी


डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया । अतः उसी दिन से आरम्भ करके भगवान् चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ला एकादशी को जागते हैं । इस कारण कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव प्रबोधिनी, हरिप्रबोधिनी , देवउठनी एकादशी कहते है ।

देवप्रबोधिनी एकादशी और उसके जागरण का महत्व संक्षिप्त में पद्मपुराण के उत्तरखण्ड में महादेवजी द्वारा कार्तिकेय को इसका माहात्म्य बताया गया है । यह एकादशी व्रत पाप का नाशक, पुण्य की वृद्धि करने वाला तथा तत्वचिन्तन परायण पुरूषों को मोक्ष देने वाला है । समुद्र से लेकर सरोवरों तक जितने भी तीर्थ है वे भी तभी तक गरजते है जबकि कार्तिक मास में श्रीहरि की प्रबोधिनी एकादशी तिथि नहीं आती । प्रबोधिनी को एक मात्र ही उपवास से सहस्त्र अश्वमेध और सौ राजसूुय यज्ञों का फल प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है । इस चराचर त्रिलोकी में जो वस्तु अत्यन्त ही दुर्लभ मानी जाती है , उसे भी मांगने पर हरिप्रबोधिनी एकादशी प्रदान करती है।

यदि इस दिन एकादशी को उपवास किया जाता है तो वह अनायास ही , ऐश्वर्य, संतान, ज्ञान ,राज्य और सुख-सम्पत्ति शांति प्रदान करती है । मनुष्य द्वारा कृत मेरूपर्वत तुल्य जाने-अनजाने में कुछ किये गये पाप इस एकादशी के एक ही उपवास से भस्म हो जाते है । इस एकादशी को रात्रि जागरण करने से हमारे हजारों जन्म जमान्तर क्रे पापकर्म रूई के ढेर के समान जल कर नष्ट हो जाते हैं ।

रात्रि में जागरण करते समय भगवद् सम्बन्धी गीत, भजन ,कीर्तन ,नृत्य, वाद्य,और पुराणों के पाठ की भी व्यवस्था करनी चाहिये। धूप ,दीप नैवेद्य पुष्प , गंध ,चन्दन फल और अर्ध्य आदि से भगवान् की पूजा करनी चाहिये । मन में श्रृद्धा रखकर दान देना और इन्द्रियों को संयम में रखना चाहिये । सत्यभाषण , निद्रा का त्याग, प्रसन्नता , शुभकर्म में प्रवृत्ति मन में आश्चर्य और उत्साह, आलस्य, आदि का त्याग ,भगवान् की परिक्रमा तथा नमस्कार इन बातों का विशेष ध्यान रखकर पालन करना चाहिये। प्रत्येक प्रहर में उत्साह और श्रृद्धापूर्वक भगवान् की आरती उतारनी चाहिये। जो पुरूष इन बातों का पालन करता है तथा एकादशी जागरण करता है , वह पुनः इस पृथ्वी पर जन्म -मरण के बन्धन में नहीं पड़ता है । जो भक्त कार्तिक में पुरूषसूक्त के द्वारा प्रतिदिन श्रीहरि की पूजा करता हैं उसके करोड़ो वर्षो तक भगवान की पूजा सम्पन्न हो जाती है जो मनुष्य पाँचरात्र में बतायी गई यथार्थ विधि के अनुसार कार्तिक में भगवान् का पूजा अर्चन करता हैं वह निश्चित ही मोक्ष का भागी होता है ।

जो भक्त कार्तिक में ''ऊँ नमों नारायणाय'' इस मंत्र के द्वारा श्रीहरि की अर्चना करता है वह नर्क के दुःखों से मुक्त होकर अनामयपद् को प्राप्त होता है जो कार्तिक में श्रीविष्णुसहस्त्रनाम तथा गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करता है , उसका पुनर्जन्म नहीं होता है । उसके वंश में सभी हजारों सैकड़ों पुरूषों को भी उसकी भक्ति फलस्वरूप विष्णुधाम प्राप्त हो जाता है । जो भक्त कार्तिक शुक्ल पक्ष में इस एकादशी का व्रत पूर्ण करके प्रातःकाल सुन्दर कलश् दान करता है । वह श्रीहरि के परमधाम को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है कि इस एकादशी के दिन घर्म कर्म में प्रवृत्ति कराने वाले भगवान श्रीहरि जागते है । अतः इसे देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहते है ।

- डॉ.नरेन्द्रकुमार मेहता

मानस शिरोमणि एवं विद्यावाचस्पति

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