बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

अंकुश्री की लघुकथाएँ

अपनी-अपनी व्यवस्था

अंदर खचाखच भीड़ के कारण देह से देह छिला रही थी. जितने लोग बैठे थे, उससे अधिक खड़े थे. खड़े लोगों में से कुछ ने अपने हाथों में सामान भी पकड़ रखा था.

प्लेटफार्म की भागदौड़ अब कम हो गयी थी और डब्बे में हलचल अधिक बढ़ गयी थी. कुछ आवाजें भी प्लेटफार्म से डब्बे में घुस आयी थीं. उनमें मूंगफली, पान और झालमूढ़ी बेचने वालों की आवाजें विशेष रूप से सुनाई दे रही थीं.

डब्बे में सवार लोगों का गंतव्य अलग था, उनकी समस्याएं अलग थीं. उनका चेहरा अलग था ही, उनका व्यवहार भी अलग था. वे लोग बोल रहे थें, मगर आपस में कम, एक-दूसरे पर अधिक. टिकट लेकर चढ़ने पर भी नहीं बैठ पाने की कुव्यवस्था पर भी कुछ लोग बोल रहे थे. कुछ लोग इसलिये बोल रहे थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उन्हें भी बोलना चाहिये.

खिड़की के निकट की सीट पर एक ब्रीफकेस रखा था. उसे हटा कर वह बैठने ही जा रहा था कि ऊपर से आवाज आयी, ‘‘कहां तक जाना है?’’

सामान रखने के लिये बनी ऊपरी बेंच पर एक सज्जन लेटे थे. आवाज उन्हीं की थी. उसे खुशी हुई कि यात्रियों की अनजानी भीड़ में से किसी ने उसके बारे में भी सोचा. किन्तु उसका गंतव्य सुन कर जब सज्जन ने कहा, ‘‘मुझे वहां बैठना है’’ तो उसकी सारी खुशी हवा हो गयी.

डब्बा में खड़ा होने की जगह नहीं थी. फिर भी वे सज्जन न केवल लेटे थे, बल्कि बैठने के लिये उन्होंने दूसरी जगह भी छेंक रखी थी. अपनी व्यवस्था के प्रति वे बहुत खुश थे. उनकी खुशी चेहरे से साफ झांक रही थी.

वह उनकी व्यवस्था देख कर दंग था. तभी एक यात्री ने ब्रीफकेस हटा कर वहां बैठते हुए अपने सहयात्री को आवाज लगायी,‘‘तुम भी बैठ जाओ !’’

सहयात्री नीचे रखे ब्रीफकेस पर बैठ गया. तभी दो और यात्री आगे आये और ऊपर लेटे हुए सज्जन को बैठा कर खाली हुई जगह में बैठ गये. मगर उस सज्जन के मुंह से कोई आवाज नहीं निकल पायी. लोगों की अपनी-अपनी व्यवस्था देख कर वह भी खिड़की से सट कर एक तरफ खड़ा हो गया.

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उधार

किसी लावारिस पुरुष की लाश अन्त्य परीक्षण के लिये आयी हुई थी. भिखारिन को यह बात मालूम होते ही वह अन्त्य परीक्षण कक्ष के पास पहुंच गयी. अन्त्य परीक्षण हो चुकने के बाद लाश को दो मेहतर उठा कर मुर्दाघर की ओर ले जाने लगें. भिखारिन इसी ताक में थी. वह दौड़ कर मेहतरों के निकट चली गयी और उनके सामने गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘दो घंटे के लिये दे दो बाबू ! - - - तुम्हारी भी कुछ कमायी हो जायेगी.’’ अस्पताल के आस-पास भिखारियों की भीड़ बढ़ जाने के कारण भीख से होने वाली उसकी आमदनी इधर कुछ दिनों से कम हो गयी थी.

बात खुलने पर मेहतरों की नौकरी जा सकती थी. इसलिये शुरू में वे ना-नूकुर करते रहे. लेकिन कुछ हिल-हुज्जत के बाद सौदा तय हो गया. मेहतरों ने लावारिस लाश को अस्पताल के सामने मुख्य चौराहे पर रख दिया.

लाश चादर से ढ़की हुई थी. भिखारिन लाश के समीप बैठ कर करूण चीत्कार करने लगी. उसका चेहरा घूंघट में छिपा हुआ था. केवल उसकी रूलाई सुनाई दे रही थी. दर्द भरी उसकी रूलाई सुन कर अस्पताल के आस-पास आ-जा रहे लोग वहां इकट्ठे होने लगे. देखते-देखते लाश के चारों तरफ लोगों की भीड़ लग गयी.

दोनों मेहतरों की मुट्ठी में भिखारिन की दी हुई रेजगारी कुनमुना रही थी. जब उन्होंने देखा कि भीड़ काफी बढ़ चुकी है तो वे अपनी मुट्ठी की रेजगारी लाश के ऊपर फेंक दिये. रेजगारी लाश के ऊपर और आसपास छितरा गयी. उसके बाद दोनों मेहतर वहां से चले गये. जाते-जाते वे भीड़ में खड़े लोगों को सुना कर कह गये, ‘‘ऐसी मौत किसी की नहीं हो. बेचारी भरी जवानी में विधवा हो गयी.’’

लाश पर मेहतरों द्वारा पैसा फेंकने भर की देर थी. वहां खड़े अन्य लोग भी लाश पर पैसा फेंकने लगें. भीड़ में लोगों का आना-जाना लगा रहा. लोग अठन्नी-चवन्नी, रुपया- दो रुपये लाश पर डालते रहें. देखते-देखते लाश के ऊपर पैसे का पथार पड़ गया.

करीब दो घंटे बीत जाने पर दोनों मेहतर वहां फिर आ गये. दफनाने के बहाने लाश को उठा कर वे मुर्दाघर की ओर चल पड़ें. बिखरे हुए पैसे बटोरने के बाद भिखारिन भी कुछ देर के लिये लाश के पीछे हो ली.

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एक सवारी

वह बहुत जल्दीबाजी में था. तेजी में जब टैक्सी स्टैण्ड पहुंचा तो आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘एक सवारी, एक सवारी.’’ उसे खुशी हुई कि टैक्सी की सवारी पूरी हो गयी है, मात्र एक सवारी के लिये रुकी हुई है. उसके बैठते ही टैक्सी खुल जायेगी, इसी विश्वास के साथ उछल कर वह टैक्सी में बैठ गया.

आशा के विपरीत टैक्सी में उसके बैठ जाने के बाद भी टैक्सी वाले का चिल्लाना जारी रहा, ‘‘एक सवारी, एक सवारी - - -’’

कुछ देर में एक और व्यक्ति आया अैर टैक्सी में सवार हो गया. लेकिन उसके बावजूद न तो टैक्सी खुली और न टैक्सीवाले का चिल्लाना ही बंद हुआ. लोग एक-एक कर आते गये और टैक्सी में सवार होते गये.

टैक्सी के सभी सवार जल्दी में थे. एक तो जल्दीबाजी के कारण वे घबराये हुए थे, दूसरे उनके शरीर का कोई न कोई अंग किसी न किसी यात्री से दबा हुआ था. टैक्सी में टस-से-मस होने तक की जगह नहीं बची थी. बेसब्री और परेशानी के कारण सभी यात्रियों की हालत शोचनीय होती जा रही थी. तभी एक और सवारी आकर टैक्सी में बैठा. उसके बैठने पर सभी यात्रियों ने राहत की सांस ली कि अब टैक्सी खुल जायेगी. लेकिन तभी टैक्सी वाला फिर चिल्लाया, ‘‘एक सवारी, एक सवारी - - - -’’

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इज्जत

- अंकुश्री

मंत्री जी केवल एक धोती पहना करते थे. सभी जानते थे कि धोती के अलावा वे और कोई कपड़ा प्रयोग में नहीं लाते हैं. लेकिन बहुत कम लोगों को पता था कि धोती मात्र से वे अपना काम क्यों चलाते हैं.

एक दिन मंत्री जी के आवास पर आहूत बैठक में उनसे किसी ने इसका कारण पूछ दिया. उन्होंने बड़े मार्मिक ढंग से बताया, ‘‘मैं पिछड़े क्षेत्र का गरीब आदिवासी हॅू. हमारे क्षेत्र में मां-बहनों की देह पर इज्जत ढंकने लायक भी कपड़ा मयस्सर नहीं होता. मेरा प्रण है कि जब तक उन सबों को इज्जत ढंकने लायक कपड़ा मयस्सर नहीं हो जायेगा, मैं एक धोती से ही काम चलाऊंगा.’’

मंत्री जी की बात सुन कर उपस्थित सभी लोग उनके प्रति श्रद्धा से गदगद हो गये. बैठक समाप्त हो जाने पर मंत्री जी उठ कर अंदर चले गये. कुछ लोग बाहर बैठे हुए अब भी किसी समस्या पर बहस कर रहे थे. रात हो चुकी थी.

यकायक मंत्री जी के आवास के अंदर से चीखने की आवाज सुनाई पड़ी. बाहर बैठे लोग चीख की आवाज सुन कर दरवाजे की ओर बढ़ गये. लेकिन कमरा अंदर से बंद था. की-होल से किसी ने झांक कर देखा. अंदर का दृश्य देख कर उसे आंखों पर विश्वास नहीं हुआ तो उसने दूसरे को वह दृश्य दिखलाया.

अंदर मंत्री जी दो लड़कियों के कपड़े उतार रहे थे. एक कोई आपत्ति नहीं कर रही थी. मगर दूसरी, जो थी तो उनके पिछड़े क्षेत्र की ही, अपनी इज्जत जाती देख कर चीखने लगी थी. पहली उसे समझा रही थी, ‘‘ एक बार कपड़ा उतरवा लोगी तो जिंदगी भर कपड़ा की कमी नहीं होगी.’’

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एक अदद गांधी

- अंकुश्री

- आपके यहां कोई गांधी है या नहीं ?

- यह गांधी क्या होता है ?

- शपथ-ग्रहण समारोह के समय यह नाम काम आता है और अन्य सभा आदि में भी इस नाम का संदर्भ देने में काम आता है.

- हमारे यहां सभा-समारोह में चाय-बिस्किट काम में लाया जाता है. यह ‘गांधी’ किसी चाय-बिस्किट का ट्रेडमार्क है क्या ?

- नहीं, आप नहीं समझे ! हमारे यहां ‘गांधी’ की याद की जाती है और कहा जाता है कि हमें उनके बताये मार्गों पर चलना है.

- अच्छा ! गांधी ने कुछ मार्ग बतलाये थे, जिन पर चलने

की बात की जाती है.

- चलने की बात की जाती है या समझ लें कि चलने की कोशिश भी की जाती है. लेकिन समारोह आदि में उनकी और उनके आदर्श मार्गों की याद अवश्य की जाती है.

- अर्थात् गांधी के नाम का मतलब हुआ याद करने का शब्द!

- कुछ हद तक आपकी बात भी सही मानी जा सकती है. इस नाम को याद करने से एक लाभ यह होता है कि वक्ता को किसी विषय की चिंता नहीं करनी पड़ती और बोलने के लिये सामग्री की भी कमी नहीं हो पाती.

- और इसी बहाने किसी का नाम भी याद कर लिया जाता है.

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अंकुश्री

प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,

नामकुम, रांची-834 010

मो0 8809972549

E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. सभी कथाएँ विचारोतेजक हैं। अंकुश्री जी को बधाई।

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