गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

शबनम शर्मा की कविताएँ

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व्यथा शब्दों की
आसमान के ख़्याल,
धरा की गहराई,
रात्रि का अंधेरा,
दिन की चमक,
शब्द बोलते हैं।


         इन्सान की इन्सानियत,
         हैवान की हैवानियत,
         फूल की मुस्कान,
         काँटों का ज्ञान,
         शब्द बोलते हैं।


प्रकृति का प्रकोप,
जवान की शहादत,
विधवा का विलाप,
बच्चों की चीत्कार,
शब्द बोलते हैं।


         शब्दों की चोट,
         मन की खोट,
         नज़रों का फेर,
         गहन अन्धेर,
         शब्द बोलते हैं।


शब्दों पर कटाक्ष,
शब्दों पर प्रहार,
शब्दों का दुरुपयोग,
शब्दों का आत्मदाह,
सिर्फ़ शब्द झेलते हैं।

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नदी के पत्थर
एक शाम, एक बाबू
नदी के तट पर खड़ा
निहारता रहा, नहाते
पत्थरों को, सफ़ेद
गोल-गोल पत्थरों पे अड़ा
आदेश दे, फटेहाल
पिंजर शरीरों को,
ट्रक भर भिजवा देना
सुनसान तट से टला
सुन ये आवाज़
पत्थर थर्रा गये
फुसफुसाये, गुहार की
कि बीच में बड़े
पत्थर ने पहली
बार प्यार से बात की,
चुन लिये गये हो
भिजवा दिये जाओगे
किस-किस बंगले
की शान कहलाओगे
चीख़ों से नदी गूँज गई,
रोये बड़े छोटे मिलकर
सब पत्थर गले लगकर
सोच कल लाखों प्रहारों को
हज़ारों टुकड़ों को,
हौसला दिया बड़े
पत्थर ने, विदाई
दर्दनाक हो उठी।

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ज़िन्दगी की सांझ में
ज़िन्दगी की सांझ में
इक राग छेड़कर
मुझे चूल्हे के पास
अपनी कंबली में
बिठा लेना।
छोटी-छोटी लकड़ियाँ
मैं लगाती जाऊँगी
ताकि तुम्हारी साँसों
की गरमाहट का
अहसास होता रहे मुझे।
बड़ी लकड़ी सिर्फ़
तुम ही लगाना
शायद मुझे
नींद आ जाये
तुम्हारे सीने से
लगकर,
तृप्त हो जाये वो पिपासा
जो ताउम्र तुम्हारा सान्निध्य
ढूँढती रही।
ज़रूर अंकित करना
मेरे लबों पर चुंबन
जो बड़ी लकड़ी के
राख होने तक
गरमाहट देता रहे।

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याद
बरसों बाद
पीहर की दहलीज़,
आँख भर आई,
सोच
बेसुध सीढ़ियाँ चढ़ना
पापा के गले लग
रो देना,
हरेक का उनके
आदेश पर गिर्द घूमना,
खूँटी पर टंगा काला कोट,
मेज़ पर चश्मा, ऐश-ट्रे,
घर के हर कोने में
रौबीली गूँज।
आज घूरती आँखें,
रिश्तों को निभाती आवाज़ें,
समझती बेटी को बोझ,
हर तरफ़ परायापन
एक आवाज़ बुलाती,
जोड़ती उस पराये
दर से ‘पापा बुआ
आई हैं।’

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पीपल का पेड़
सदियों पुराना, दादाओं का दादा,
गाँव के उस छोर पर खड़ा पीपल का पेड़।
दिन बीते, माह बीते, बरस बीते, दशक बीते,
सदियाँ बीत गईं, इंसान पुश्त-दर-पुश्त गया,
पर एक टाँग पर खड़ा
देखता रहा बदलते युगों को
ये पीपल का पेड़।
दुनिया क्या से क्या हो गई,
राजाओं के महल डह गये,
पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,
नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर ये
सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।
सदियों तक पूज्य रहा
सभ्य रहा, बना रहा
आभूषण ये पीपल का पेड़।
आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,
चुपचाप काटा जाता है इसे,
वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा, गूँगा
व मूक बन जाता है।
देखता है सिर्फ, उसके आँसू,
ये गगन, ये हवा और देते
हैं आवाज़, चुप हो जा,
समझौता कर ले।
सह लेता है असंख्य वज्र
मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।

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प्रेमिकायें
न जाने किधर
लुप्त हो गईं
वो प्रेमिकायें
सुगंधित गुलाब सी,
मधुर गान सी,
मीठे ख्वाब सी,
बादलों में मेघ सी,
दूध में उफ़ान सी,
मिट्टी की सोंधी
खुशबु सी,
सावन की पहली
बौछार सी, किताब में रखे पुराने फूल सी
हुआ करती थी कभी,
रहती पुरुष का
झरोखा बनकर
सदैव देती थी सूरज
की पहली किरन
चाँद की चाँदनी
भोर तक,
अहसास की
नाव में झुलाती
इस छोर से,
उस छोर तक।

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लहुलुहान अख़बार
इक दिन सुबह उठते ही
इक लहुलुहान
अख़बार मुझसे लिपट गया
मैंने उसे ढांढस बंधाया
और उसकी दास्ताँ
सुनने के लिए
उसे कुर्सी पर बिठाया
बोला सीना फाड़कर
देख-देख! कितने शहीदों का
खून मुझ पर लगा है
ये ही नहीं रेल दुर्घटनाओं,
बलात्कारों व कई
हवाई दुर्घटनाओं के
उलीचे हुए खून के
छींटे भी पड़े हैं मुझ पर,
ये एक दिन की नहीं
रोज़ मर्रा की बात
बन गई, थक गया हूँ
हार गया हूँ कुछ तो कर मेरे लिए,
वह चुपचाप अपना
आँचल संभाल बैठ गया
जब उसने देखा
कि उसे देखकर मेरी
आँखों से भी आँसू
टपक रहे थे।

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बांटकर दिखाओ
बाँटकर ज़मीन और आसमान
बाँटकर ये आदमी, मैं हिन्दू
तू मुसलमान, कितना खुश
होता है आदमी।
         क्या बाँट सकते हो तुम
         वो बलखाये कंटीले तार
         जिसका एक बल इधर
         और दूसरा उधर है।
बाँट दो उस पीपल के पत्ते,
जो उड़कर इधर से उधर,
घूम आते हैं।
क्या मज़ा आ जाये अगर
         रोक लो, बाँट लो उस
         बादल के टुकड़े को
         जो हमें वर्षा का झाँसा
         देकर उस तरफ़ बरसता है।
पक्षियों के घरौंदे इस तरफ़
और उडारी उस तरफ़ है
कोयल उस सामने वृक्ष पर
और आ रही कूक इधर है।
         शरीर से आत्मा को,
         मन्दिर से परमात्मा को
         मानव से इन्सानियत को
         बाँट सको, तो बाँटकर दिखाओ।

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श्रद्धांजलि
आज मेरा दिल उन वीरों को
श्रद्धांजलि देने के लिए,
अपने आप ही नतमस्तक है,
जिन्होंने अपने प्राणों की
बाज़ी लगाने में तनिक भी
संकोच नहीं किया,
पलटकर सूनी माँग,
सूनी कलाइयों को नहीं देखा,
सुबकते बच्चों, नम आँखों
को नहीं देखा,
माँ की ममता को, गले तले
उतार कर, बाप की लाठी को
उसके हाथों में ही थमाकर,
चल दिये भारत माँ की
रक्षा के लिए,
आज भारत माँ ही नहीं, समूचा
देश तुम्हारा, तुम्हारी जननी का ऋणी है
तुम्हें झुक-झुक कर असंख्य
बार प्रणाम करता है,
करता रहेगा।
तुम धन्य हो, वीर हो,
अमर हो, रहती दुनिया तक
तुम्हारी वीरता का ये
चर्चा चलता रहेगा।

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महीना बैसाख का
बच्चों के बस्ते छूटे, पड़ा शोर गलियारों में,
मदमज्ञत किसे पवन को, आया महीना बैसाख का।

हर कोई दबा-दबा सा, कह रहा, बैसाखी के मेले जायेंगे
हर कोई आज मदहोश है, आया महीना बैसाख का।
गेहूँ की बालियों से निकल, खनके हैं दाने खलिहानों में,
नव वर्ष का हर्षोल्लास लाया, महीना बैसाख का।

सुन गबरू के ढोल की धुन, नाजुक कमर बल खाने लगी,
सठियाए बाबे को भी ठुमकों की लचक ललचाने लगी,
जवानी, बुढ़ापे पर अजब खुमार लाया महीना बैसाख का।

कई आस, मुरादें, नव वर्ष पर लगने लगी,
कई दुलहनों की चूड़ियाँ खनकने लगीं।
जन-जन को, कण-कण को, नव वर्ष मुबारक हो,
कुछ ऐसा करने की ठानो कि संसार को ये वर्ष कुछ
दे सके, नई आस, नये सपने लाया है महीना बैसाख का।


- शबनम शर्मा

माजरा, तह. पांवटा साहिब,

जिला सिरमौर, हि.प्र.    

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