बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

हास्य-व्यंग्य // देवी लक्ष्मी का आगमन और स्वप्न का टूटना // प्रदीप उपाध्याय

इस बार भी सपत्नीक दीपोत्सव पर्व की तैयारी कर रहे थे। बाल गोपाल भी हाथ बंटा रहे थे। अचानक हम लोगों के सामने महालक्ष्मी जी प्रकट हुईं। हम सभी अचम्भित थे और तत्काल कुछ सुझाई भी नहीं दिया। हम सभी जन नतमस्तक होकर उनकी चरण वन्दना करने लगे।

मैंने चरणों में शीश नवाते हुए कहा-"माते ,धन्य भाग्य हमारे,जो इस गरीब की कुटिया में आप पधारीं।"

"वत्स मैं तो प्रति वर्ष ही अपने भक्तों का ध्यान रखने आती हूँ। दुनिया में कोई भी दीन और श्रीहीन न रहे लेकिन तुम लोगों की आकांक्षायें बढ़ती ही जाती हैं।"

"माते,दुनिया में अमीरी-गरीबी की जो गहरी खाई है,यह असमानता ही झगड़े की जड़ है। क्या गरीबी मिटाना संभव नहीं है!"

"संभव है वत्स,लेकिन लालच और लोभ से तुम लोग कहाँ पीछा छुड़ा पा रहे हो और फिर तुम गरीबी को भी तो परिभाषित नहीं कर पाये हो!"

सही कहा आपने लेकिन नई सरकार ने गरीबी को परिभाषित करने का बीड़ा उठाया है। गरीब कौन है,इसका उत्तर सरकार को सही सही रुप में अभी तक नहीं मिल पाया था और शायद इसीलिए वर्तमान सरकार भी खोजबीन में लगी हुई है। पहले भी काफी खोजबीन की जा चुकी थीं ,गरीबी के विशिष्ट मानक भी निर्धारित किये गये । ये मानक पोषण,घर,स्वच्छता,बिजली जैसे भी रहे । वैसे गरीबी के मानक तय करने के प्रयास तो वर्षों से किये जा रहे हैं और अलग अलग मानक भी निर्धारित किये गये परन्तु इन गरीब कौन है, यह निश्चित रुप से अभी भी सरकारी स्तर पर परिभाषित नहीं हो पाया । हाँ हम गरीब जन जरुर जानते हैं कि गरीब कौन है और अमीर कौन! माते,मुझे लगता है कि शायद इसीलिए गरीबी के दंश से छुटकारा नहीं पाया जा सका ।पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिराजी ने भी गरीबी हटाओ का नारा दिया था किन्तु जब गरीबी ही सही ढ़ंग से परिभाषित नही हो सकी तो गरीबी हटेगी कैसे!

"गरीब और गरीबी क्या ऐसे नहीं दिखायी देते,"लक्ष्मी जी ने प्रतिप्रश्न किया।

लेकिन माते,"अब किसी ने सुझाव दिया है कि गरीबों सम्बन्धी योजनाएं लम्बे समय तक उन्हें फायदा देने वाली होना चाहिए,तभी गरीबी का चक्र टूट पाएगा। देखिये कितने समय के बाद यह बुद्धिमत्तापूर्ण आइडिया आया है। यह बड़े ही शोध का परिणाम रहा होगा वरना इतनी अक्लमंदी की बात इतनी आसानी से कहाँ आ पाती है। पहले पहल तो न्यूनतम खपत के आधार पर ही गरीब मान लिया गया था,इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य को शामिल नहीं किया गया था। बाद में एक निर्धारित सीमा तक कैलोरी की खपत और रुपये के खर्च के आधार पर गरीबी की सीमा रेखा खींचने का प्रयास किया गया। समय समय पर कई प्रयास हुए कि गरीबी की सीमा रेखा तय कर दी जाए लेकिन जिस रेखा को भी खींचने का प्रयास एक्सपर्ट ग्रुप ने किया,आलोचकों ने उसकी हवा निकालना शुरु कर दिया। अब बात यहीं आकर ठहर जाती है कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों का प्रतिशत यदि तीस है तो गरीबी रेखा पर जीवन यापन करने वालों का प्रतिशत कितना होगा।"

"खर्च के आधार पर यदि गरीबी की रेखा खींचने का प्रयास करेंगे तो कई जनसेवक और जनप्रतिनिधि आपको ऐसे मिलेंगे जिन्हें कभी अपनी जेब में हाथ ही नहीं डालना पड़ता है तब खर्च के हिसाब से इनसे ज्यादा गरीब कौन हो सकता है!यदि गरीब की परिभाषा तय की जा रही है तब हमें यह भी देखना होगा कि स्व अर्जित आय तथा स्वयं व्यय की जाने वाली राशि ही मानक होगी या फिर दूसरों के द्वारा किया गया व्यय भी मानक हो सकता है। कई लोगों की तनख्वाह सूखी बचत के रूप में बैंक खातों में पड़ी रह जाती है,खर्च निरंक। अब इसमें बेचारे उनका क्या दोष!

खैर, पोषण के आधार पर यदि मानक तय करने की बात आयेगी तो आज की स्थिति में बड़े बड़े बैंक बैलेंस वाले लोग भी रोटी से ज्यादा दवाई खाकर ही जीवित रहते हैं। खाने का खर्च तो उनका भी कम मिलेगा और खुराक के आधार पर गणना करेंगे तब तो उन्हें कुपोषित मानने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचेगा। ऐसे में गरीबी की सीमा रेखा में समाने वाले तो बहुतेरे होंगे , कई लोग कृपावंत हैं इस रेखा में शामिल करवाने के लिए। परिभाषित तो कई बार हुई है गरीबी,आगे भी होती रहेगी लेकिन गरीब कौन है,इसका निर्धारण अभी तक सही तरीके से नहीं हो पाया है। गरीब तो खोजना पड़ेगा तभी गरीब और गरीबी परिभाषित हो पाएगी,तभी गरीब कल्याण एजेंडा सार्थक हो सकेगा। हमें नयी परिभाषा का इंतजार है।"

"वत्स तुम लोग बहुत ही आशावादी हो। जिस दिन तुम गरीब और गरीबी को परिभाषित करने में सफल हो जाओ,उसदिन मेरा आह्वान कर लेना। मैं गरीबी दूर करने तत्काल आ पहुँचूंगी। सर्व कल्याण से ही मुझे खुशी मिलेगी।" तना कहकर देवी लक्ष्मी अपने वाहन उलूक राज पर सवार होकर अन्तर्ध्यान हो गयीं। इधर पत्नी की झिड़की ने मेरा स्वप्न और नींद दोनों ही तोड़ दिए।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबुजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढ़की रोड़,देवास,म.प्र

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