बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

समीक्षा – ‘खुद ग़ज़ल बोलेगी’ / नीलमेंदु सागर // समीक्षक – डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

नीलमेंदु सागर

समीक्षा – ‘खुद ग़ज़ल बोलेगी’ / नीलमेंदु सागर

ग़ज़ल का हिन्दीकरण

डा. सुरेन्द्र वर्मा

नीलमेंदु सागर ने काव्य की विभिन्न विधाओं पर अपने हस्ताक्षर किए हैं। जहां उन्होंने एक ओर हाइकु लिखे हैं, वहीं दूसरी ओर गज़लें भी कही हैं। ‘खुद ग़ज़ल बोलेगी’, जैसा कि शीर्षक ही बताता है,उनकी बोलती ग़ज़लों का एक मनोरम, लेकिन विचारवान, संग्रह है। इसमें उन्होंने अपनी ७५ गज़लें प्रस्तुत की हैं। ये गज़लें अनेक भाव-भूमियों पर रची गई हैं।

नीलमेंदु जी एक संवेदनशील कवि हैं और जहां भी उन्हें अन्याय ओर ज्यादती दिखाई देती है, वे उसे सहन नहीं कर पाते। वे न केवल उसे अपनी रचनाओं में उघार कर रख देते हैं बल्कि उसे अपनी और अपने पाठक की करुणा का भागीदार भी बना देते हैं। सामाजिक गैर-बराबरी को रेखांकित करते हुए वे कहते हैं –

सीढियां क्यों आसमान में लगाते हो पहाड़ो

घाटियों के लिए भी कभी पिघल जाना चाहिए (पृष्ठ ७३)

इतना ही नहीं, उनके स्वर में जहां करुणा है वहीं वांछित परिवर्तन के लिए “अश्क के नीचे दहकती आग भी है” (७५)। लेकिन मुश्किल यह है कि हम बाहर की चकाचौंध में इतने खो गए हैं कि यह सब देखकर हंसी सी आती है।

मानिए न मानिए ज़माना यह लाजवाब है

हम चाहते ज़िंदगी महज़ मीना बाज़ार हो (७१)

नीलमेंदु जी इस मीनाबाजार से बाहर आने का रास्ता ढूँढ़ते हैं – कविता में भी और जीवन में भी। आज मनुष्य का सारा आग्रह सतही चीजों पर आकर टिक गया है। जो सचमुच महत्वपूर्ण और मूल्यवान है, उसे दरकिनार कर दिया गया है।

ज़िंदगी ख़त-ए-ख़ास थी अखबार हो गई

सुबह ताज़ा शाम को बेकार हो गई (४५)

नीलमेंदु जी की इन रचनाओं में कहीं कहीं हास्य और व्यंग्य का स्वर भी मुखरित हुआ है ओर हमें अनायास ही अकबर इलाहाबादी याद आ जाते हैं –

है शिकायत का पुलिंदा बीवियों के बैग में

हम पटाते प्रेमिकाएं कुकुर-कुक्कुट की तरह

कब्जियत सरकार की जब जब बदलती दस्त में

तेल चीनी आदि मिलती दवा-मिक्सचर की तरह (२६)

राजनीति को सबक सिखाने के लिए व्यंग्य एक ऐसा हथियार है जिसका नीलमेंदु ने खुलकर प्रयोग किया है। वे आज के नेताओं को उन्हें अपनी औकात की याद दिला देते हैं-

मसीहा बन गए कैसे पद्म थे आप गोबर के

फ़टाफ़ट आपकी कितनी बढी औकात, क्या कहने ! (१६)

ज़ाहिर है आज का लोकतंत्र ऐसे ही मसीहाओं के पाश में बंधा है। “लोक का सुहावना हरा सुआ / तंत्र जाल में फंसा कि मर गया”। आज के हालात को देखकर कवि सचमुच बेहद दुखी है –

इधर देखा उधर देखा, गाँव कस्बा नगर देखा

ईंट पत्थर के बुतों सा आदमी का जिगर देखा

लोक को परतंत्र देखा, तंत्र को पशु कटघरे में

सब सियासी कुकर्मों का खुला अजायबघर देखा (४)

आज की सियासत पूरी तरह संवेदनहीन हो गई है। लोग मंहगाई से त्रस्त हैं। सरकार के हाव-भाव पूरी तरह बेफिक्र हैं, बल्कि उसका आचरण तो किसी प्रशिक्षित वेश्या की तरह का है।

विष डंक मारती मंहगाई

सरकार दिखाती सौ नखरे (८५)

नीलमेंदु सागर की इन रचनाओं में सामाजिक चेतना न केवल घनीभूत है बल्कि उसका सर्वत्र विस्तार भी है|

काव्य विधाओं में गज़ल एक ऐसा काव्य-रूप है जो उर्दू और हिन्दुस्तानी ज़बान में खूब रच बस गया है। उर्दू में इसका अपना एक डिक्शन और अंदाज़े-बयां है। आरम्भ में हिन्दी ने जो गज़लें लिखी गईं वे बहुत कुछ उर्दू ग़ज़ल की प्रकृति के अनुरूप ही थीं। लेकिन धीरे धीरे हिन्दी में ग़ज़ल कहने वाले कवि इस बात पर अधिक बल देने लगे कि गज़ल को उसकी ‘बहरों’ से नज़र-अंदाज़ कर उसे हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप ढाला जाए और उसे हिन्दी के छंद-शास्त्र पर आधारित कर दिया जाए। बहरहाल गज़ल के इस ‘हिदीकरण’ को लेकर तमाम सवाल उठाए जा सकते हैं और यह कोशिश किस हद तक सफल होगी, इस पर प्रश्न-चिह्न लगाया जा सकता है। मैंने यह संदेह इसलिए व्यक्त किया है कि नीलमेंदु जी के ग़ज़ल-संग्रह,’खुद ग़ज़ल बोलेगी’ की रचनाओं में, मुझे लगा की वे ही गज़लें श्रेष्ठ बन सकी हैं जिनमे ग़ज़ल के अंदाज़े-बयां को अधिकाधिक सुरक्षित रखा गया है

आशा है हिन्दी जगत में इस ग़ज़ल संग्रह का खुले मन से स्वागत किया जाएगा।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी

१, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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  1. नीलमेंदु सागरजी की बोलतीं ग़ज़लों की समीक्षा संतुलित रूप से आपने की, साथ में हिन्दी ग़ज़ल रचना की थोड़ी सी समीक्षा हुई। मेरे हिसाब से न केवल हिन्दी अपितु अध्र्य सभी भारतीय भाषाओं में भी ग़ज़लों कि शायद यही हाल है। कम से कम गुजराती भाषा में ऐसा ही है ऐसा मैं यकीनन कह सकता हूं।

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