सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

व्यंग्य // बाज़ार से गुजरा है वो, खरीदार नहीं है....// गिरीश पंकज

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वो बाज़ार से गुज़र रहा था लेकिन कुछ-कुछ डरा हुआ था.

उसका चेहरा देख कर मैंने पूछ लिया , ''बाज़ार में रौनक है लेकिन तुम्हारे चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, क्या बात है ?''

वह उदास मुस्कान के साथ बोला, ''जब जेब खाली हो, यानी कंगाली -ही - कंगाली हो तो बाज़ार सबसे डरावनी जगह लगती है।''

मैंने पूछा, ''जेब क्यों खाली है? जबकि सामने दिवाली है।  क्या गरीब और क्या अमीर, हर कोई बाजार में ही नज़र आ रहा है।  देखो, वो सेठ अपनी सेठानी के साथ कितनी ज़बरदस्त खरीदारी कर रहा है।  हर दुकानदार मालामाल है, और तू है कि कंगाल है? अरे,  क्या तू किसी की जेब नहीं काटता? क्या रिश्वतखोरी नहीं करता? बोल न पगले, क्या किसी को ठगने का धंधा नहीं करता? तू है कौन, तेरा परिचय क्या है? बोल न आम आदमी ?''

वह मुस्कराने लगा, ''अरे, तुमने तो ठीक ही पहचाना, मैं आम आदमी हूँ. जो आम के मौसम में भी ठीक से आम नहीं खा पाता। ऐसा आदमी हूँ जिसकी आमदनी इतनी ही है कि ज़िंदा भर रह सके.''

मैंने कहा, ''तुम्हारे चेहरे को देख कर मैं पहले ही समझ गया था कि इतना उदास और परेशानहाल चेहरा किसी आम आदमी का ही हो सकता है।  धनतेरस पर हर कोई  कुछ-न-कुछ ख़रीद रहा है और तुम हो कि चचा ग़ालिब का शेर गुनगुनाते हुए घूम रहे हो ?''

आम आदमी अब जोर से हँस पड़ा. लगा जैसे बाज़ार की रौनक अचानक कुछ बढ़ -सी गई है. वह बोला, ''अरे आप तो ज्योतिषी भी लगते हैं? अभी कुछ देर पहले ही मैं गुनगुना ही रहा था, 'दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ'  हम लोग बाजार से गुजरते हैं और तृप्त हो जाती हैं।  जैसे गरीब और भूखा बच्चा होटल के बाहर खड़ा हो कर मिठाइयों को निहारता है और  जलेबी, रसगुल्ला या राजभोग आदि खाने की कल्पना करके ही तृप्त हो जाता है. अपन का भी यही हाल है।  लोगों को खरीदते देखते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं कि चलो,  कोई तो है जो खरीद रहा है. धनतेरस पर हर कोई धन के लिए तरसे यह ठीक नहीं।  हम लोग तरसते रहें तो कोई बात नहीं. बाकी लोग धनतेरस में धनबरसे का सुख लेते रहे.''

मैंने कहा, ''तुम बड़े दिल वाले हो. सबको दुआएं दे रहे हो..''

उसने कहा, ''अपने हिस्से जो है, उसे देने में क्या दिक्कत है? क्या लोग   ये भी नहीं देते?''

मैंने कहा, ''बिलकुल, लोग दुआएँ देने में भी कंजूसी करते हैं।  तुम खुल कर दे रहे हो इसका मतलब है तुम सबसे धनवान हो। ''

आम आदमी बोला, ''काहे मज़ाक करत हो बाबू ?   हम और धनवान?''

हमने कहा, ''तुम्हारे पास दुआओं का खज़ाना है भाई, जिसे लुटा रहे हो. वो जो मोटा सेठ  पूरे बाज़ार को खरीदने पर आमादा है उससे जाकर कहो तो कि आप पैसे मत दो, दुनिया के लिए  दुआएं भर कर दो , देख लेना नहीं करेगा।''

आम आदमी चकरा गया, बोला, ''अरे, क्या ऐसा भी हो सकता है? मुझे तो यकीन नहीं होता। ''

मैंने कहा, ''समाज में ऐसे अनेक लोग  ज़िंदा हैं जो किसी के कटे पर लघुशंका भी नहीं करते।  चलो, हम अपनी बात की सच्चाई को आजमाते है।''

इतना बोल कर मैं आम आदमी के साथ सामान खरीद रहे सेठ के पास जा पहुंचा. मैंने कहा, ' सेठ जी, दिवाली का समय है।  कुछ दे दीजिए।''

सेठ  बोला, ''आगे जाओ भाई, कड़की चल रही है।  बाजार लूटने पर आमादा है.  डिस्टर्व मत करो।' '

हमने कहा, ''आप दुनिया की खुशहाली के लिए दुआ भर कर दो।  हम लोग चले जाएंगे।''

सेठ कुछ देर सोचने लगा फिर बोला, ''ये फालतू काम हम नहीं करते।  जाओ, कहीं और जाओ.''

हम मुस्कराते हुए लौट आए।  आम आदमी बोला, '' आप तो उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं।  मेरे बारे में जान गए, उस सेठ का चरित्तर समझ गए।  आप हैं कौन?''

अब मुझे हँसी आ गई. मैंने कहा, ''मैं भी आम आदमी हूँ।  बस तुम बोलते नहीं, मैं बोलकर लिख भी लेता हूँ। ''

आम आदमी खुश हो गया और बोला, ''बाज़ार से घर खाली हाथ लौट रहा था. अब आपकी कविता के साथ लौटूंगा. कुछ सुनाइए। ''

मैंने कहा , ''कोई बड़ी कविता फ़ौरन तो सम्भव नहीं होगी, लो  तुकबंदी टाइप की कुछ सुन लो। 

'बाजार से गुजरा है, खरीदार नहीं है'

क्या आदमी जीने का हकदार नहीं है

खाली है जेब उसकी मुरझा गया चेहरा

वैसे है भला -चंगा बीमार नहीं है।''

आम आदमी खुशी-खुशी बाज़ार से बाहर हो कर घर की तरफ बढ़ गया। घर ही गया अथवा गम भुलाने के लिए ''कहीं और'' चला गया, यह ग्यारंटी से कहना मुश्किल है।  लेकिन बाज़ार से दूर हो गया, इतना तय है

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गिरीश पंकज

(गिरीशचंद्र उपाध्याय)
संपादक, सद्भावना दर्पण

२८ प्रथम तल, एकात्म परिसर,

रजबंधा मैदान रायपुर, छत्तीसगढ़. 492001*

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निवास - सेक़्टर -3 , एचआईजी -2 , घर नंबर- 2 ,  दीनदयाल उपाध्याय नगर, रायपुर- 492010
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पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2008-2012)
उपन्यास, 16  व्यंग्य संग्रह सहित 60  पुस्तके
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1- http://sadbhawanadarpan.blogspot.com
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