बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

दीपावली विशेष आलेख : चांद को रोशन करने चले हैं, अंधेरे में डूबा अबूझमाड़ है ! // लोकनाथ साहू ललकार

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दीपावली सुख, शांति, समृद्धि और समरसता का प्रकाश पर्व है ।  अमावस की बिरबिट काली रात को नन्हे-नन्हे माटी के दीये जब घर-आंगन को कतारबद्ध रोशन करते हैं तो इनकी शोभा न्यारी लगती है । इनके अप्रतिम सौंदर्य को निहारने के लिए आकाश में निहारिकाएँ उमड़ पड़ती हैं । दूत बनकर पुरवाई दीयों से मनुहार करती है ।  तब दीयों की आभा और भी बढ़ जाती है  । सचमुच, दीपावली उल्लास और उमंग का त्यौहार है ।  अंधकार में प्रकाश के विजय का प्रतीक है । दुःख में सुख का अहसास है । अशांति में शांति का बिम्ब है । विपन्नता में संपन्नता का सुवास है । समाज में समरसता का संचार है ।

इतना सब होते हुए भी, आज समस्याओं का अमावसी अंबार है ।  जमीन के मुकाबले जनसंख्या का विकराल विस्फोट, काले व्यापारियों की जमाखोरी, इठलाती-चिढ़ाती मंहगाई, नेताओं एवं सबलों का भ्रष्टाचार, निर्बलों में कराह, कुंठा और हताशा,  अभावजनित अपराध, युवाओं में बेरोजगारी-बेकारी, किसानों की दुर्दशा, जवानों में आंतरिक असुरक्षा की भावना, असत्य, आतंक एवं अहिंसा का बोलबाला, माता-बहनों-बेटियों पर सरेआम प्रहार, उनके साथ दुराचार एवं दरिंदगी, उनकी सरेआम उठाईगिरी एवं तस्करी, उनमें भय, अनिश्चितता एवं असुरक्षा की भावना, नैतिक एवं पारंपरिक सामाजिक मूल्यों का पतन, सबलों द्वारा निर्बल एवं सीमांत वर्ग का शोषण, अत्याचार एवं हिंसा, वृद्ध माता-पिता के प्रति असम्मान एवं असुरक्षा, टूटते-बिखरते परिवार, और भी बहुत कुछ । रावण का पुतला हर बरस जलाते हैं, किन्तु रावणत्व की आज भरमार है ।  रामत्व कहीं दिखता नहीं है । ये ऐसी समस्याएं हैं, जिनसे वर्तमान दागदार और शर्मसार है ।  पूंजीवाद का अजगर तेजी से पसरने लगा है । मानव मूल्यों पर बाजारवाद हावी है । स्वभाविक प्रश्न है, आज ऐसा है तो आज से पचीस-पचास-सौ साल बाद देश-समाज का स्वरूप कैसा होगा ?

दरअसल, हमने महापुरूषों एवं बुजुर्गो द्वारा स्थापित मूल्यों के हरे-भरे वृक्षों को सींचा ही नहीं ।  उल्टे अब उन्हें काट रहे हैं ।  नैतिक मूल्यों की हरियाली खत्म हो रही है ।  अपसंस्कृति का प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है । यही हमारे पारिवारिक-सामाजिक पर्यावरण के असंतुलन का सबसे बड़ा कारक है । गांधीजी का सत्य और अहिंसा का सपना चूर-चूर हो रहा है । शास्त्रीजी का "जय जवान-जय किसान" दम तोड़ रहा है ।  महावीरजी का "जीओ और जीने दो" का सिद्धांत तिनके की तरह बिखरने लगा है । इंदिराजी का "गरीबी भारत छोड़ो" का उद्घोष ध्वस्त हो चुका है ।  कलामजी का युवावर्ग भ्रमित और भटका हुआ नज़र आता है । कुल मिलाकर, हमारा देश आज़ादी के क्रांतिवीरों, सैनिकों और शहीदों के सपनों का हिन्दुस्तान बन न सका ।  आज भी सुदूर जंगलों में रहने वाले गरीब आदिवासियों को इलाज या प्रसव कराने के लिए एम्बुलेंस या मोटरगाड़ी नहीं मिलती । उन्हें खाट में बिठाकर, कंधों में उठाकर अस्पताल ले जाना पड़ता है ।  चाहे सुकमा हो या अबूझमाड़, कालाहांडी हो या बलांगीर या अन्य वन प्रांतरों के गरीब लोग, वे मर-मरकर जीते हैं, छाले पीते हैं, तब जाकर साँस लेते हैं । उनके लिए आज़ादी और त्यौहार के क्या मायने ?


चांद को रोशन करने चले हैं, अंधेरे में डूबा अबूझमाड़ है
दीपावली को जगमग करके, अंधेरे में डूबा खुद कुम्हार है

पूंजीवाद की आंधी और बाजारवाद के तूफान से सत्य, प्रेम, विश्वास और नैतिक मूल्यों के दीये बुझने लगे हैं ।  पसरते अंधकार को समय रहते दूर करना आवश्यक है । चाहे और दीये बुझ जाएं पर हमें याद रखना चाहिए है कि कम से कम एक दीया बुझने न पाए । वो है- आस का दीया । गर आस का दीया जलता रहा तो बाकी बुझे दीयों को हम एक-एक कर रोशन कर सकते हैं । तो आइए, इस दीपावली हम सुख, शांति, समृद्धि, समरसता, समर्पण, सहानुभूति, सद्मार्ग, सद्बुद्धि, सत्य, अहिंसा, प्रेम और विश्वास के दीये जलाएं । सरहदों में शांति और खेतों में खुशहाली के लिए दीये जलाएं ।  और हॉ, अपने अंतस में एक आस का दीया जरूर जलाएं । दीपोत्सव की शुभकामनाएं ... !
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लोकनाथ साहू ललकार
बालकोनगर, कोरबा (छत्तीसगढ़)

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