सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

दिवाली विशेष संस्मरण // शर्मिंदगी // अमित गोदरा


बहुत दुःख होता है मुझे जब मैं गलतियां करता हूं। और ऐसा मेरी ज़िंदगी में होता ही जा रहा है। कभी-कभी तो नुकसान मेरे इर्द-गिर्द वस्तुओं व लोगों को भी पहुंचता है।
बात एक शनिवार की है जब घर में अचानक खबर हुई कि बड़ा भाई दिवाली की छुट्टियाँ लेकर आज सुबह आ रहा है। सभी इतने खुश थे और अम्मा इंतज़ार में डूबी जा रही थी। तभी मैं मोटरसाइकिल पर झट-पट उन्हें लेने निकला। उनसे मिलकर मुझे भी सुकून मिला और हम बाते करते गाँव में पहुंचे कि मेरा ध्यान बीच सड़क पड़े टोटके पर गया और अगले ही चौराहे पर बायीं ओर से आ रही मोटरसाईकिल में हम ठुक गये। माहौल ही कुछ ऐसा था कि कुछ समझ नहीँ आया और हादसा देखते-ही-देखते हुआ।

शनिवार तो मुझ पर चढ़ चुका था और इंजन से थोड़ा पाँव भी जल चुका था। सभी इतने शांत थे कि मुझे माफ़ी मांगने में शर्म आ रही थी, ब्रेक जो नहीं दबे थे मुझसे। बड़े भाई का स्वागत इस तरह हुआ कि उनका गुस्सा नहीं शांत हुआ और घर आकर उन्होंने जूते फेंके तब पता चला कि उनके महंगे जूते टायर से घिस कर फट चुके थे और टखना छिल कर खून से रंगा था। इस अफ़सोस में मैं चुपचाप अपने कमरे में चला गया और वहाँ माँ ने उन्हें दिलासा दी और कहा, "बेटा नाराज़ मत हो और अपनी मनोदशा को मत बिगड़ने दो।" माँ ने सब कुछ सम्भाल लिया था और भाई साहब बहन के जन्मदिन का तोहफा दिखाने लगे।


चोट हुई तो दिल पर, घाव तो निशान बनकर रह गए।
इस शर्मिंदगी में हम, अपनों से बात करने से डर रहे।
- अज्ञात

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